समय और स्थान का महत्व आज के युग में सर्वोत्तम है। जहाँ कलयुग समय प्रधान हे वही प्रौद्योगिकी का चौथा आयाम तीनो आयामों से परे एक सैद्धांतिक आयाम हैं। वस्तुतः, इसे समय या स्थान-समय के रूप में ही दर्शाया जाता है। निसंदेह चौथे आयाम को समझने में कठिनाई होती है, क्योंकि हम पहले तीन आयामों को आसानी से देख सकते हैं। समय के साथ मानव-जीवन प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करता हे और मोक्ष कोह प्राप्त होता है। यह एक शास्वत सत्य है। दुर्भाग्य-वश राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, १९९० के दशक से ही वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) से संघर्ष कर रही है। दिल्ली विश्व की सर्वोच्च प्रदूषित शहर में आती है। एक शोध ने पाया की दिल्ली के आस पास उसके अपने ही ताप विद्युत संयंत्र और निजी वाहन इसके दो मुख्य स्रोत है। प्रगति प्रकृति की बाधक नहीं होती बल्कि उसकी पूरक होती हैं। सौर ऊर्जा संभवतः हमें प्रगति और प्रकृति कोह बारीकी से समझना होगा। काल मंथन एक स्वम्भू और वैज्ञानिक प्रक्रिया है। विज्ञानं कुछ और नहीं बल्कि मानव मनोरथ की वैद्यता ही है। वैज्ञानिक क्रम में विश्व आज अक्षय ऊर्जा की और बढ़ रहा है जिसमे सौर ऊर्जा उसका एक अंश है। सौर ऊर्जा एक व्यवस्था है जहाँ सौर-मण्डल की विराट ऊर्जा कोह सूक्ष्म स्तर पर उपयोग में लिया जाता हैं। इसमे न ही प्रदुषण होता है और न ही वायु की गुणवत्ता पर कोई संकट आता है। इसकी अपार शक्ति कोह देख वैश्विक नेतृत्व ने इसको हाथो हाथ लिया है। हमारी कार्य करने की छमता ही ऊर्जा है। जीवन कोह गति ऊर्जा से ही मिलती है। आदि काल से भारत ने सूर्य के महत्व कोह समझा हे और आगे बढ़ा है। सौर ऊर्जा व्यवस्था में विभिन्न प्रकार के सौर यंत्रो का प्रयोग होता है। वस्तुतः यह प्रकाश-विद्युत् नियम के अंतर्गत काम करते हे और सूर्य से निकले प्रकाश कोह विद्युत् में संचालित करते है। मुख्यतः सिलिकॉन निर्मित फोटो वोल्टैक (PV) सेल्स और दर्पण/लेंस आधारित प्रणाली इसमे प्रमुख होती है। सोलर प्लेट्स के साथ, लिथियम आयन बैटरी, इन्वर्टर और रेफ्लेक्टर्स का भी उपयोग होता है। भारत आज विश्व के अग्रणी देशो में है जिसने सौर ऊर्जा के महत्व को समझा है। नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, भारत सरकार के अनुसार हमने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव प्लान (पीएलआई) बनाया है, जिसके अंतर्गत भारत सरकार उच्च दक्षता सौर पीवी मॉड्यूलों में गीगा वाट (जीडब्ल्यू) पैमाने के विनिर्माण क्षमता प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय उच्च दक्षता सौर पीवी मॉड्यूल कार्यक्रम के लिए 24,000 करोड़ रुपए की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना लागू कर रहा है। सौर पीवी निर्माताओं का चयन पारदर्शी चयन प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है। इस योजना में उच्च दक्षता सौर पीवी मॉड्यूलों के निर्माण और बिक्री पर, चालू होने के बाद पांच वर्षों के लिए चयनित सौर पीवी मॉड्यूल निर्माताओं के लिए उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआई) का प्रावधान है। इस योजना का लक्ष्य भारत में उच्च दक्षता वाले सौर पीवी मॉड्यूलों के निर्माण के लिए एक इकोसिस्टम का निर्माण करना है और इस प्रकार अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में आयात निर्भरता को कम करना है। दिल्ली में रूफटॉप सौर ऊर्जा की संभावनाएं और चुनौतियां भारत में सिलिकॉन और लिथियम के भंडार पर्याप्त है। भारत और राष्ट्रीय राजधानी छेत्र, दिल्ली में औसतन २५० - ३०० दिन होते होते है सौर उत्पादन के लिये जो विश्व में किसी भी क्षेत्र में सर्वाधिक है। सोचिये अगर हम ऊर्जा सौर यंत्रो से ले और वाहन उसी सौर ऊर्जा से चार्ज करे तोह क्या होगा। अतः सौर ऊर्जा में वह छमता है की वह ताप विद्युत संयंत्र हो या वाहन के प्रदूषण, दोनों से दिल्ली को मुक्त और सशक्त बना सके। दिल्ली एक विशेष राज्य है, यह आज के भारत की राजधानी है। प्राचीन काल से यह सफलता की केंद्र रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और भारत के प्रधानमंत्री दोनों ही इसे अपने स्तर पर संचालित करते है। प्रधानमत्री सोलर रूफटॉप योजना हो या मुख्यमंत्री, अभी दोनों ही योजना में आकर्षक वित्तीय सहायता दी जा रही है। जहाँ भारत के स्तर में हमने सौर ऊर्जा के सारे मुकाम पुरे किये है वही राजधानी छेत्र में तुलनात्मक कठिनाई सामने आयी है। विषेशतः सोलर रूफटॉप योजना आज भी असफल हैं। आज दो करोड़ से ज्यादा आबादी राजधानी में जीवन निर्वाह कर रही है। जनसँख्या घनत्व अधिक होने के बावजूद दिल्ली भारत के संपन्न राज्यों में से एक है। यहाँ का प्रति व्यक्ति आय देश में सर्वाधिक है। जहाँ अर्थव्यवस्था सफल होती है वहां उपभोग की मानसिकता जन्म ले सकती है। यह पर्यावरण और प्रकृति दोनों कोह नुक्सान पहुँचाती है। उधारण के रूप में आप देख सकते है, दिल्ली में वाहन घनत्व बाक़ी तीनों महानगर जैसे मुंबई, चेन्नई, कोलकत्ता के निजी वाहन को मिला भी दे तो ज़्यादा है। यह एक गंभीर समस्या है। हमने इस लेख के माध्यम से शोध किया और पाया राजधानी क्षेत्र की एक बहुत बड़ी आबादी मल्टी - स्टोरी फ्लैट और सोसाइटी में रहती है। गूगल के रिपोर्ट अनुसार, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने 1967 में अपनी आवास गतिविधियाँ शुरू करने के बाद से दिल्ली में दस लाख से अधिक घर बनाए हैं। डीडीए ने पिछले कुछ वर्षों में कई आवास योजनाओं की घोषणा की है, और उन सभी के पंजीकरण कराने वालों को फ्लैट आवंटित किए हैं। इसी तरह, 2019 के एक लेख के अनुसार, दिल्ली में 1,200 से अधिक सहकारी समूह हाउसिंग सोसायटी (सीजीएचएस) में 10 लाख से अधिक लोग रहते हैं। इनमें से अधिकांश सोसायटी मयूर विहार, पटपड़गंज, रोहिणी और द्वारका में स्थित हैं। अगर हम इसमें भारत और दिल्ली सरकार के कर्मचारी आवास कोह जोड़े तोह लगभग आधी दिल्ली से ज्यादा आबादी इसी व्यवस्था में रहती है। भारत के लोग भी वस्तुतः दो तरीके से रहते है। एक है उनका गांव और दूसरा है शहर। गांव में जहाँ मुख्यतः सबके पास अपना जमीन और छत होता है वही दूसरी और शहर में फ्लैट या सोसाइटी जैसा ही बहुसंख्यक व्यवस्था है। वित्तीय सहायता हम उन नागरिकों कोह दे रहे हे जिनके पास अपनी छत है परन्तु दुविधा यह है की दिल्ली की बहुसंख्यक आबादी एक अलग व्यवस्था में रहती है। यहाँ बहुत सारे लोग एक सामान छत के अनुसार रहते है। प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के अंतर्गत जिनके पास अपना छत है वोह तीन किलोवाट तक के सौर यंत्र पर 78,000 रुपए तक वित्तीय सहायता ले सकते है। फ्लैट्स अवं सोसाइटी, जहाँ दिल्ली या किसी भी भारतीय शहर की बहुसंख्यक आबादी रहती है, इससे अलग कॉमन एरिया का प्रावधान जोड़ा गया है। एक और वहां रहने वाले लोग खुद छत पर सौर यंत्र नहीं लगा सकते क्यूंकि वह कॉमन एरिया में आता है तोह दूसरी औरसरकारी नीति को लागू करने में चुनौतियां हैं। इन्ही सब तकनिकी कारणों से रूफ टॉप योजना अपने लक्ष्य कोह साध नहीं पा रही है। नीतिगत फैसलों में एक आकर्षण होना चाहिए। अस्पष्टता जहाँ निराशा कोह जन्म देती है वही पारदर्शिता आशा कोह। निति निर्माता इस समस्या कोह दो तरीके से हल कर सकते है। पहला, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) आगे आये और अपने द्वारा निर्मित छत पर सोलर संयत्र स्थापित करें। डीडीए किसी कोह भी छत का अधिकार नहीं देती और आज भी छत का मालिकाना हक डीडीए के ही पास है। इसके दो फायदे होंगे, सालो से बनी डीडीए आवास का पुनर्विकास होगा और डीडीए रूफ टॉप सोलर ऊर्जा से एक विशाल पर्यावरण के अनुकूल स्वयः संचालित सिस्टम का निर्माण होगा। डीडीए कुछ वर्षों से आर्थिक तंगी से गुजर रही है और हमें अपने शोध पर भरोसा है की यह प्रयास डीडीए कोह एक विन-विन (win-win) शक्ति प्रदान करेगा। दूसरा प्रयास हम कर सकते है, कम्युनिटी रूफटॉप अभियान से। कम्युनिटी रूफटॉप सोलर, दिल्ली या किसी भी भारत के महानगर के लिए वरदान हो सकती है। इस लेख के माध्यम से यह हमारा सौभाग्य होगा अगर नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, भारत सरकार, कम्युनिटी हो या बूट (BOOT) मॉडल किंतु उसका मूल्य क्रूड आयल के तर्ज पर प्रकाशित और निर्धारित करे। उधारण जैसे बूट वेंडर २ रुपये ९० पैसे प्रति यूनिट से ज़्यादा नहीं ले सकता। एक और जब हम सौर निर्माताओ कोह प्रोडक्शन बेस्ड प्रोत्साहन दे रहे हे तोह स्वाभाविक है हम भी कुछ वित्तीय अपेक्षा रखेंगे। सौर ऊर्जा निर्माता इसे क्लाउड मॉडल पर विकसित करे जैसे अभी एक बड़े निजी वाहन निर्माता ने बैटरी अस सर्विस (बअस) की शुरुवात की है। दिल्ली की स्तिथि देखते हुए ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी हो या भारत/दिल्ली सरकार के आवास/फ्लैट्स, सभी खाली छतोह पर सोलर संयंत्र निति के माध्यम से जरुरी हो। इन सोसायटियों/फ्लैट की छत मुख्यतः वीरान ही रहती है और अगर हम इस जगह सौर ऊर्जा कोह ला पाए तोह इससे बड़ी सफलता कोई और नहीं होगी। बिल्ट ओन ऑपरेट ट्रांसफर (बूट) सौर संयंत्रों में पारदर्शिता हो। दिल्ली की बिजली वितरण कंपनीज, नीतिगत अधिकारी, नवीनीकरण मत्रालय और सौर निर्माता सामंजस्य से बूट मॉडल कोह अपनाए और आगे बढे। आवाह्न, भुवनेश झा