मिट्टी के बर्तन (पॉट) में स्पाइरुलिना की खेती स्पाइरुलिना एक प्रकार का खाद्य माइक्रो-एल्गी होता है। इसमें किसी प्रकार का विष नहीं होता है और यह प्रोटीन और विटामिन से भरपूर होता है तथा इसमें बहुत ही अधिक चिकित्सीय गुण होते हैं। कम जगह में और कम निवेश कर घर में ही महिलाओं द्वारा स्पाइरुलिना की खेती करने के लिए एक सरल व सस्ती तकनीकी विकसित की गई है। यह एक लाभप्रद उद्योग साबित हो सकता है क्योंकि सूखे हुए स्पाइरुलिना को अच्छे लाभ के साथ बेचा जा सकता है। आवश्यक सामग्री प्रति 25 वर्गमीटर खुले व सुरक्षित जगह में 35 से 40 लीटर की क्षमता वाले तीन मिट्टी के बर्तन (पॉट)। माध्यम बायो-गैस का घोल व 2-3 ग्राम समुद्री नमक या रासायनिक माध्यम (पोटैशियम डाइहाइड्रोजन फॉस्फेट, खाने का सोडा और सोडियम क्लोराइड); तथा शुद्ध स्पाइरुलिना कल्चर। प्रक्रिया मिट्टी के तीनों ही पॉट को गर्दन तक जमीन में गाड़ दिया जाता है। फिर इसमें माध्यम के साथ पानी भर दिया जाता है। स्पाइरुलिना कल्चर के लिए बायो गैस माध्यम सबसे सस्ता पोषक माध्यम है। शुद्ध स्पाइरुलिना की कुछ मात्रा माध्यम में डाल दी जाती है। (प्रारंभिक अवस्था में, फौरन मिश्रण के लिए घोल-भंडार के रुप में पोषक माध्यम उत्पादक को उपलब्ध कराया जाना होगा।) माध्यम को दिन में 3 से 4 बार हिलाया जाना होगा क्योंकि स्थिर अवस्था में स्पाइरुलिना वृद्धि नहीं करेगा। चूंकि स्पाइरुलिना को बढ़ने में 3-4 दिन लग जाते हैं इसलिए पॉट पर सूर्य की रोशनी अवश्य पड़नी चाहिए। वयस्क स्पाइरुलिना (जब पीला माध्यम गहरे हरें रंग में बदल जाए) कपड़े में छान कर सरलता से प्राप्त किया जा सकते हैं। स्पाइरुलिना को स्वच्छ पानी में धोने के बाद (चिपके हुए रासायनिक पदार्थों को हटाने के लिए) इसे सीधे ही चपाती/गूथे हुए आटा, चटनी, नूडल्स, डाइस, सब्जियां आदि के साथ (2% भार के अनुपात में) मिश्रित किया जा सकता है। इसे छांव में सुखा कर इसे संरक्षित किया जा सकता है। इसकी गुणवत्ता और इसके मूल्य के संरक्षण के लिए इसे तुरंत सूखा दिया जाना चाहिए। लाभ 35-40 लीटर की क्षमता वाले तीन मिट्टी के पॉट में पनपे स्पाइरुलिना आसानी से 2 ग्राम प्रति दिन (प्रति व्यक्ति) उच्च-गुणवत्ता वाले स्पाइरुलिना पावडर प्रदान कर सकता है जिससे रोजाना 100% विटामिन ए और 200% विटामिन बी-12 की आवश्यकता पूरी हो सकती है। कंक्रीट से बने तालाब या पोलिथीन से बने गड्ढे की तुलना में पॉट संभालना आसान होता है। क्षतिग्रस्त होने पर पॉट आसानी से बदले जा सकते हैं और आवश्यकतानुसार इन्हें एक जगह से दूसरे जगह भी ले जाया सकता है। यदि किसी प्रकार का संक्रमण, संदूषण या अन्य कोई दुर्घटना न हो तो लंबी अवधि के लिए पॉट कल्चर बनायी रखी जा सकती है। न्यूनतम अतिरिक्त प्रयास से अधिकतर पॉट बनाए जा सकते हैं। स्रोत : ए.एम.एम मरूगप्पा चेट्टियार रिसर्च केंद्र, अलगल प्रभाग, सावेरिव्यार पुरम, पुडुकोटइ जिला, तमिलनाडु