भूमिका फसलों, पेडों, पौधों, गोबर, मानव-मल आदि जैविक वस्तुओं (बायोमास) में निहित ऊर्जा को जैव ऊर्जा कहते हैं। इनका प्रयोग करके उष्मा, विद्युत या गतिज ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है। धरातल पर विद्यमान सम्पूर्ण वनस्पति और जन्तु पदार्थ को 'बायोमास' कहते हैं। जैव ईंधन का प्रयोग सरल है। यह प्राकृतिक तौर से नष्ट होने वाला तथा सल्फर तथा गंध से पूर्णतया मुक्त है। पौधे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के द्वारा सौर ऊर्जा को जैव ऊर्जा में बदलते हैं। यह जैव ऊर्जा, विभिन्न प्रक्रियायों से गुज़रते हुए विविध ऊर्जा स्रोतों का उत्पादन करती है। उदाहरण के लिए पशुओं को चारा, जिसके बदले हमें गोबर प्राप्त होता है, कृषि अवशेष के द्वारा खाना पकाना आदि। यद्यपि कोयला एवं पेट्रोलियम भी पेड-पौधों के परिवर्तित रूप हैं, किन्तु इन्हे जैव-ऊर्जा के स्रोत की तरह नहीं माना जाता है क्योंकि ये प्रक्रिया हजारों वर्ष पहले हुई होगी। जैव ईंधन ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है जिसका देश के कुल ईंधन उपयोग में एक-तिहाई का योगदान है और ग्रामीण परिवारों में इसकी खपत लगभग 90 प्रतिशत है। जैव ईंधन का व्यापक उपयोग खाना बनाने और उष्णता प्राप्त करने में किया जाता है। उपयोग किये जाने वाले जैव ईंधन में शामिल है- कृषि अवशेष, लकड़ी, कोयला और सूखे गोबर। भारत में जैव ईंधन की वर्त्तमान उपलब्धता लगभग 120-150 मिलियन मीट्रिक टन प्रतिवर्ष है जो कृषि और वानिकी अवशेषों से उत्पादित है और जिसकी ऊर्जा संभाव्यता 16,000 मेगा वाट है। जीवाश्म ईंधन की तुलना में यह एक स्वच्छ ईंधन है। एक प्रकार से जैव ईंधन, कार्बन डाई-ऑक्साइड का अवशोषण कर हमारे परिवेश को भी स्वच्छ रखता है। जैव ऊर्जा के कुछ अवगुण भी है जैसे - ईंधन को एकत्रित करने में कड़ी मेहनत। खाना बनाते समय और घर में रोशनदानी (वेंटीलेशन) नहीं होने के कारण गोबर से बनी ईंधन वातावरण को प्रदूषित करती है जिससे स्वास्थ्य को गंभीर खतरा होता है। जैव ईंधन के लगातार और पर्याप्त रूप से उपयोग न करने के कारण वनस्पति का नुकसान होता है जिसके चलते पर्यावरण के स्तर में गिरावट आती है। बायोमास ऊर्जा के एक वैकल्पिक स्रोत के रूप में चूंकि बायोमास प्राकृतिक संसाधनों जैसे कि भूमि, जल, हवा एवं सूर्य की ऊर्जा का उत्पाद है इसलिए यह ऊर्जा के एक वैकल्पिक भरोसेमंद एवं अक्षय स्रोत के रूप में आशा की किरण प्रदान करता है। बायोमास एक आर्गेनिक चीज है जो स्थलीय एवं समुद्री दोनों पादपों एवं उनके व्युत्पन्नों से बनता है। पादप सामग्री प्रकाश संश्लेषण (फोटो सिन्थेसिस) के दौरान पर्यावरण के कार्बन डाइआक्साइड को चीनी (सुगर) में परिवर्तन के लिए सूर्य की ऊर्जा का प्रयोग करती है। बायोमास के दहन से ऊर्जा रिलीज होती है क्योंकि चीनी पुन: कार्बन डाइआक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार कम समय में ऊर्जा उत्पन्न होती है और रिलीज होती है जिससे बायोमास अक्षय ऊर्जा का एक स्रोत बन गया है। यद्यपि पर्यावरण के कार्बन डाइआक्साइड से जीवाश्म ईधन भी व्युत्पन्न किया जाता है। तथापि, इसमें अधिक समय लग जाता है – बायोमास के मामले में कुछ वर्षों की तुलना में कई मिलियन वर्ष। इस समय विश्व भर में कुल ऊर्जा आपूर्ति में बायोमास का हिस्सा 14 प्रतिशत है और इस ऊर्जा का 38 प्रतिशत विकासशील देशों में मुख्य रूप से देश के ग्रामीण एवं पारंपरिक स्रोतों में, उपयोग किया जाता है। बायोमास की संभावना भारत उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र है जिसमें सूर्य की रोशनी एवं वर्षा सुलभ है और इस प्रकार बायोमास उत्पादन के लिए आदर्श वातावरण मिलता है। इसके साथ ही कृषि की वृहत संभावना भी ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए व्यापक कृषि अपशिष्ट उपलब्ध कराती है। प्रत्येक वर्ष लगभग 460 मिलियन टन कृषि अपशिष्ट के अनुमानित उत्पादन बायोमास लगभग 260 मिलियन टन तक कोयले को सम्पूरित करने की क्षमता रखता है। इसके परिणामस्वरूप प्रत्येक वर्ष लगभग 250 बिलियन रु. की बचत हो सकती है। विभिन्न प्रकार के कृषि क्षेत्र/औद्योगिक अवशिष्ट कृषि अवशिष्टों के प्रकार मात्रा (मिलियन टन प्रति वर्ष) विभिन्न दालों एवं अन्नों के पुआल 225.50 बगास 31.00 चावल की भूसी 10.00 नारियल शेल 11.00 डंठल 02.00 कई तेल डंठल 04.50 अन्य 65.90 कुल 350.00 भारत में अक्षय ऊर्जा विकल्पों के आधार पर बायोमास की अनुमानित संभावना निम्नानुसार है। बायोमास ऊर्जा 16,000 मेगावाट बगास-सह-उत्पादन 3,500 मेगावाट कुल 19,500 मेगावाट बायोमास आधारित विद्युत उत्पादन के लिए राज्य सरकार/ उपयोग नीतियों एवं प्रोत्साहनों का सिंहावलोकन मद विवरण पावर हिवलिंग प्रभार शून्य - निर्यात की गई ऊर्जा का 20 प्रतिशत पावर बैंकिंग प्रभार 2 प्रतिशत पावर बैंकिंग अवधि शून्य से 12 महीने एसईसी द्वारा अंत: क्रय (बाय बैक)/राज्य उपयोगिता 2.75 रुपए से 3.16 रु. प्रति यूनिट तृतीय पक्ष बिक्री कुछ राज्यों में अनुमति राज्य सरकारों द्वारापूंजीगत सब्सिडी 1. कुछ राज्य परियोजना में इक्विटी के रूप में भाग लेते हैं। 2. कुछ राज्य 25 लाख रु. प्रति मेगावाट की पूंजीगत सब्सिडी प्रदान करते हैं बायोमास सह बिजली उत्पादन प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. बायोमास और सह उत्पादन में बिजली उत्पादन के लिए क्या-क्या बायोमास सामग्री उपयोग किए जाते हैं ? उत्तर : विद्युत उत्पादन करने के लिए खोई, चावल की भूसी, पुआल, कपास का डंठल, नारियल के आवरण, सोया की भूसी, डी-तेल से सना हुआ केक, कोफी की अपशिष्ट, जूट की अपशिष्ट, मूंगफली के छिल्के, सॉ डास्ट इत्यादि बायोमास सामग्री उपयोग किए जाते हैं । प्रश्न 2. बायोमास और सह-उत्पादन परियोजनाओं के लिए लागू ब्याज की दर क्या है ? उत्तर : बायोमास विद्युत परियोजना के लिए लागू ब्याज की दर 12.5% से 13.25% के बीच है तथा सह-उत्पादन के लिए लागू ब्याज दर 12% से 12.65% के बीच में है । इसकी विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इरेडा की वेबसाइट देखें । प्रश्न 3. क्या बायोमास और सह-उत्पादन परियोजनाओं को अधिग्रहण करने के लिए इरेडा द्वारा वित्तीयन किया जाता है ? उत्तर : हॉं, इरेडा के द्वारा इरेडा की वित्तीयन मार्गदर्शिका, उद्योग की जोखिम अवधारणा की प्रकृति और हरेक प्रकरण की पृष्ठभूमि के अनुसार बायोमास और सह-उत्पादन परियोजनाओं के अधिग्रहण के लिए वित्तीयन किया जाता है । प्रश्न 4. बायोमास और सह-उत्पादन परियोजनाओं की स्थापना करने के लिए नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय से किसी प्रकार की सब्सिडी उपलब्ध है ? उत्तर : हॉं, बायोमास और सह-उत्पादन परियोजनाओं के लिए एमएनआरई की पूंजी सब्सिडी उपलब्ध है, इस सब्सिडी की विस्तृत जानकारी एमएनआरई की वेबसाइट पर उपलब्ध है । प्रश्न 5. ऋण स्थगन क्या है और इस बायोमास एवं सह-उत्पादन परियोजनाओं में उपलब्ध अधिकतम ऋण स्थगन अवधि कितनी है ? उत्तर: ऋण स्थगन अवधि के दौरान उधारकर्त्ताओं द्वारा ऋण के लिए केवल ब्याज की चुकौती किए जाते हैं तथा बायोमास और सह-उत्पादन परियोजनाओं के कमीशन होने के उपरांत उपलब्ध अधिकतम ऋण स्थगन अवधि एक वर्ष तक है । प्रश्न 6. बायोमास और सह-उत्पादन परियोजनाओं के लिए उपलब्ध अधिकततम कंस्ट्रक्सन अवधि कितनी है ? उत्तर : बायोमास और सह-उत्पादन परियोजनाओं के अधिकतम कंसट्रक्सन अवधि सामान्यत: तीन वर्षों के लिए होती है । प्रश्न7.बायोमास एवं सह उत्पादन परियोजनाओं के लिए उपलब्ध अधिकतम चुकौती अवधि कितनी है ? उत्तर : बायोमास और सह-उत्पादन परियोजनाओं के लिए अधिकतम चुकौती अवधि दस वर्ष के लिए होती है । प्रश्न 8. बायोमास और सह-उत्पादन परियोजनाओं के लिए इरेडा द्वारा वित्तीय सहायता दिया जाने का अधिकतम प्रतिशतता कितनी है ? उत्तर : इरेडा द्वारा बायोमास और सह-उत्पादन परियोजनाओं के लिए कुल परियोजना लागत का 70% तक वित्तीयन किया जाता है । प्रश्न 9. खोई आधारित सह-उत्पादन परियोजनाओं के वित्तीयन के लिए सुगर प्लांट की अपेक्षित न्यूनतम क्षमता कितनी है ? उत्तर : खोई आधारित सह-उत्पादन परियोजनाओं के वित्तीयन के लिए सुगर प्लांट की अपेक्षित न्यूनतम साइज 2500 टीसीडी होनी चाहिए । प्रश्न 10. बायोमास प्रत्यक्ष दहन विद्युत परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिए अपेक्षित सुगर प्लांट की न्यूनतम क्षमता क्या है ? उत्तर : इरेडा द्वारा 7.5 मेगावाट क्षमता से अधिकतम 10 मेगावाट क्षमता तक के बायोमास प्रत्यक्ष दहन विद्युत परियोजनाओं के लिए वित्तीयन किया जा सकता है, जोकि सावधानीपूर्वक निरीक्षण, विशेष रूप से बायोमास की उपलब्धता, इस क्षेत्र में अन्य बायोमास विद्युत/बायोमास सह-उत्पादन परियोजनाओं की मौजूदगी, ऑफ सीजन ईंधन के लिए लिंकेज, पानी की उपलब्धता इत्यादि के शर्तों के आधार पर विभिन्न मामले पर विचार किया जाएगा । प्रश्न 11. किसी एक जिला में इरेडा द्वारा कितनी परियोजनाओं के लिए वित्तीयन किया जाता है? उत्तर : अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा वित्तपोषित किसी एक जिला में कैप्टिव बायोमास/खोई आधारित सह-उत्पादन को छोड़कर एक स्वतंत्र बायोमास विद्युत परियोजना से अधिक परियोजना के लिए इरेडा द्वारा वित्तीयन नहीं किया जाएगा । प्रश्न 12. एसडीएफ सहायता प्राप्त खोई आधारित सह-उत्पादन परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त/ब्रिज ऋण स्कीम क्या है ? उत्तर : भारत सरकार के निर्देशानुसार सभी एसडीएफ समर्थित खोई आधारित सह-उत्पादन परियोजनाओं के लिए इरेडा द्वारा परियोजना लागत का 40% तक की प्रोमोटर अंशदान के रूप में एसडीएफ ऋण दिया जा सकता है तथा परियोजना लागत का कुल इरेडा द्वारा विनिवेश का 90% तक एसडीएफ ऋण सीमा के बराबर इरेडा द्वारा अतिरिक्त/ब्रिज ऋण प्रदान किया जाता है, बशर्तें, पिछले तीन वित्तीय-वर्षों के दौरान यह सुगर कम्पनी लाभ अर्जित कर रहा है । प्रश्न 13. एसडीएफ समर्थित खोई आधारित सह-उत्पादन परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त/ब्रिज ऋण स्कीम हेतु न्यूनतम पात्रता क्या है ? उत्तर : इरेडा द्वारा पिछले तीन वित्तीय वर्षों से वर्तमान में, लाभ अर्जित करनेवाली सुगर कम्पनी को अतिरिक्त/ब्रिज ऋण उपलब्ध किया जा सकता है । प्रश्न 14. न्यूनतम लागू बॉयलर प्रेसर बायोमास एवं सह उत्पादन परियोजनाएं क्या है ? उत्तर : बायोमास एवं सह-उत्पादन परियोजनाओं के लिए न्यूनतम लागू बॉयलर बायलर प्रेसर 63 किलोग्राम/सेंटीमीटर 2 हो जाएगा । यद्यपि, लघु स्केल सह-उत्पादन के लिए (सुगर उद्योग को छोड़कर) 5.0 मेगावाट तक संस्थापित क्षमता न्यूनतम लागू बॉयलर प्रेसर 42 किलोग्राम/सेंटीमीटर 2 होगा । बायोमास सह विद्युत् उत्पादन पर अद्यतन जानकारी धान के भूसे से बिजली नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) द्वारा धान की भूसी सहित विभिन्न कृषि अवशिष्टों से विद्युत के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। एमएनआरई द्वारा 12वीं योजना अवधि के लिए बायोमास विद्युत परियोजनाओं की 400 मेगावाट क्षमता तथा चालू वित्त वर्ष अर्थात् 2014-15 के लिए 100 मेगावाट के लक्ष्य निर्धारित किए गए है। बायोमास विद्युत परियोजनाओं के लिए त्वरित मूल्यहास, रियायती सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क से छूट, 10 वर्षों के लिए करावकाश तथा अधिमान्य शुल्क-दर जैसे राजकोषीय प्रोत्साहन दिए जाते है। इसके अतिरिक्त, एमएनआरई द्वारा बायोमास विद्युत परियोजनाओं की संस्थापना करने के लिए प्रति परियोजना 1.50 करोड़ रुपए की अधिकतम सीमा के साथ विशेष श्रेणी के राज्यों में प्रति मेगावाट 25.0 लाख रुपए तथा अन्य राज्यों के लिए प्रति मेगावाट 20.0 लाख रुपए की केन्द्रीय वित्तीय सहायता दी जा रही है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय(एमएनआरई) ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की आपूर्ति मांग को पूरा करने के लिए बायोमास गैसीफायर प्रणाली के माध्यम से धान की भूसी सहित कृषि अपशिष्टों से विद्युत उत्पादन को बढावा दे रहा है। (एमएनआरआई गांव की सीमा में वितरण नेटवर्क स्थापित करने के लिए १५,००० रू. प्रति किलोवाट की दर से केंद्रीय वित्तीय सहायता (सीएएफ) प्रदान करता है, इसके अलावा अधिकतम तीन कि.मी. के लिए १.० लाख रू. प्रति कि. मी. वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है। परियोजनाओं के लिए राज्य सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों, ग्राम स्तरीय संगठनों, संस्थाओं,निजी उद्यमियों आदि को सहायता दी जाती है। अगस्त 2014 तक , मुख्य रूप से बिहार में लगभग २०० गांवों बस्तियों में बिजली देने के लिए प्रत्येक में ३२ किलोवाट के हिसाब से लगभग ७० बायोफायर प्रणालियों की सहायता दी गई है। प्रत्येक प्रणाली से लगभग २००-२५० घरों को बिजली मिल सकती है तथा अन्य छोटे व्यावसायिक भार प्रतिदिन शाम को ५ से ६ घंटे तक और २५-३० किलोवाट कुल भार उपलब्ध हो सकता है। बारहवीं पंचवषीर्य योजना के दौरान बायोमास विद्युत परियोजनाओं के लिए 400 मेगावाट का लक्ष्य निर्धारित किया गया है जबकि चालू वित्त वर्ष अर्थात 2014-15 के लिए यह लक्ष्य 100 मेगावाट है। राज्यसभा में बिजली राज्यमंत्री और कोयला तथा नवीकरणीय ऊर्जा विभाग के (स्वतंत्र प्रभार) श्री पीयूष गोयल ने यह जानकारी दी कि देश में बायोमास विद्युत परियोजनाओं के लिए तीव्र मूल्य ह्रास, रियायती सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क छूट, 10 वर्ष के लिए आय कर छूट और प्राथमिकता अनुकूल दरों जैसे वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाते हैं। इसके अलावा विशेष श्रेणी वाले राज्यों में प्रति मेगावाट 25 लाख रुपये और अन्य राज्यों में प्रति मेगावाट 20 लाख रुपये की केन्द्रीय वित्तीय सहायता दी जाती है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय बायोमास विद्युत परियोजनाओें की स्थापना के लिए यह सहायता प्रदान करता है और इसकी अधिकतम सीमा प्रति परियोजना डेढ़ करोड़ रुपये है। इसके अलावा पंजाब में किसानों को उपकरण खरीद के लिए भी वित्तीय सहायता दी जाती है। अब तक स्थापित बायोमास विद्युत परियोजनाओं का राज्य वार विवरण निम्निलिखित है। 31 जनवरी 2015 तक चालू राज्य वार बायोमास विद्युत परियोजनाएं- क्रम सं. राज्य परियोजनाओं की संख्या बायोमास विद्युत (मेगावाट) 1 आंध्रप्रदेश 41 288.00 2 छत्तीसगढ़ 29 249.90 3 गुजरात 4 30.50 4 हरियाणा 2 13.50 5 कर्नाटक 15 107.50 6 मध्य प्रदेश 4 26.00 7 महाराष्ट्र 20 198.00 8 ओडि़शा 1 20.00 9 पंजाब 8 68.50 10 राजस्थान 10 101.00 11 तमिलनाडु 24 211.70 12 उत्तर प्रदेश 4 54.00 13 पश्चिम बंगाल 3 26.00 कुल 165 1394.60 अपशिष्ट सह विद्युत् उत्पादन शहरी एवं औद्योगिक अपशिष्टों को उपचारित (ट्रीटमेंट) करके ऊर्जा या विद्युत उत्पन्न करने के लिए विभिन्न प्रौद्योगिकियों को अपनाकर भारत में उपरोक्त अपशिष्टों से 1000 मेगावाट से अधिक समकक्ष विद्युत का उत्पादन किया जा सकता है। ठोस अपशिष्टों को उपचारित करने के लिए कुछ बुनियादी प्रौद्योगिकियां निम्नलिखित हैं : · इनसिनरेशन इनसिनरेशन दहनशील सामग्री वाले अपशिष्टों एवं अवशेषों को जलाने के लिए नियंत्रित दहन की प्रक्रिया है। इसका उपयोग सामान्यतया ठोस अपशिष्टों को जलाने के लिए किया जाता है। इनसिनरेशन के दौरान उत्पन्न ऊष्मा को पुन: प्राप्त कर लिया जाता है और इसका उपयोग वाष्प के उत्पादन जल को गर्म करने एवं विद्युत उत्पादन के लिए किया जाता है। · पेलेटाइजेशन पेलेटाइजेशन, गैस अपशिष्टों से पेलेट ईंधन का उत्पादन करने की प्रकिया है। पेलेट ईंधन को रिफ्यूज व्युत्पन्न ईंधन (आरडीएफ) भी कहा जाता है। 100 टन ठोस अशिष्टों को उपयोग में लाकर प्रतिदिन औसतन 30 टन पेलेट ईंधन का उत्पादन किया जा सकता है। पेलेट ईंधन में लगभग 3500 से 4000 के सी एल/किग्रा का कैलोरी वेल्यू है और इसका उपयोग वाष्प पैदा करने के लिए पादप बायलर आदि को गर्म करने हेतु ईंधन के रूप में किया जा सकता है जिसका फिर विद्युत उत्पादन में उपयोग किया जा सकता है। · पायरोलाइसिस/गैसिफिकेशन पायरोलासिस/गैसिफिकेशन प्रक्रिया में पृथक किए गए दहनशील तत्व को सुखाया/पानी से रहित किया जाता है और उसके बाद इसे हैमर मिल में टुकड़ों में काटा जाता है। अंतिम उत्पादन में प्रोड्यूसर गैस नामक दहनशील गैस शामिल है जिसका उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जा सकता है। · बायोमिथेनेशन बायोमिनिशन प्रौद्योगिकी में, ठोस अपशिष्टों के आर्गेनिक तत्व को पृथक किया जाता है और पृथक्करण के बाद इसे बायो रिएक्टर में ले जाया जाता है जिसमें मिथेनोजेरिक बैक्टरिया की उपस्थिति एवं अनॉक्सी स्थिति के अंतर्गत भंजन की प्रक्रिया होती है और बायोगैस उत्पन्न होता है जिसका उपयोग विद्युत का उत्पादन करने के लिए बायोगैस इंजिन में किया जा सकता है। इस क्षेत्र में प्रोत्साहन पारंपरिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय से निम्नलिखित सब्सिडी योजनाएं उपलब्ध है। वाणिज्यिक परियोजनाओं के लिए सब्सिडी सब्सिडी योजना के बारे में और अधिक जानकारी के लिए पारंपरिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय की वेबसाइट को देखें। क्षेत्र विशिष्ट अपेक्षायें राज्य नोडल एजेंसी/राज्य सरकार से मंजूरी · प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) · राज्य विद्युत बोर्ड से अनापत्ति प्रमाण पत्र · विद्युत क्रय करार · नगरपालिकाओं से अपशिष्टों की आपूर्ति के लिए जल करार करने हेतु सिंचाई/भूजल विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी)। अपशिष्ट सह विद्युत् उत्पादन पर प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. नगर पालिका ठोस अपशिष्टों में विद्युत उत्पादन के लिए भारत में उपलब्ध सफल प्रौद्योगिकियां कौन सी हैं? उत्तर: 1. पेलेटाइजेशन एवं दहन ; 2. अनाक्सी पाचन प्रश्न 2. औद्योगिक क्षेत्र के अंतर्गत पात्र अपशिष्ट क्या है? उत्तर: औद्योगिक क्षेत्र का कोई भी जैव अपशिष्ट (धान की भूसी, बगास, डंठल, तिनका) इस क्षेत्र के अंतर्गत पात्र हैं। प्रश्न 3. क्या विद्युत उत्पादन के लिए औद्योगिक अपशिष्टों के साथ कोयले को मिलाने की अनुमति है? उत्तर: नहीं। तथापि, विद्युत उत्पादन के लिए 25 प्रतिशत तक अन्य बायोमास अपशिष्टों को औद्योगिक अपशिष्टों के साथ मिलाने की अनुमति है। जैव ईंधन (इथेनॉल/जैव डीजल) इथेनॉल के उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकी इथेनॉल (डिहाइड्रेटेड/एनहाइड्रस अल्कोहल) के उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकी में अल्कोहल/रेक्टीफायड स्प्रिट का विशेष प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) करना होता है। रेक्टीफायड स्प्रिट/अल्कोहन से डिहायड्रेटेड इथेनाल के उत्पादन के लिए तीन वाणिज्यिक माध्यम हैं। ये निम्नलिखित हैं : · एजियोट्रापिक डिस्टिलेशन प्रौद्योगिकी · मोलकूलर सिव प्रौद्योगिकी · मेम्ब्रेन प्रौद्योगिकी एजियोट्रापिक डिस्टिलेशन प्रौद्योगिकी एजियोट्रापिक डिस्टिलेशन प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके रेक्टीफायड स्प्रिट से इथेनॉल उत्पादन संबंधी प्रौद्योगिकी भारत में सुस्थापित है क्योंकि इस देश में इस प्रौद्योगिकी में तृतीय घटक के रूप में बेंजीन के प्रयोग से डिस्टिलेशन प्रणाली निष्पादित की जाती है और यह दूसरे विश्व युद्ध से भारत में प्रयोग में है।इस प्रौद्योगिकी के लिए आरम्भिक पूंजीगत लागत (परियोजना लागत) मोलकूलर सिव प्रौद्योगिकी की तुलना में कम है किन्तु अधिक ऊर्जा बैंजीन या ऐसे ही अन्य तीसरे घटक जैसे कि सायकोटैक्सेन की अत्यधिक खपत के कारण उत्पादन की लागत अधिक है। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि तृतीय घटक से वायु प्रदूषण एवं जल प्रदूषण पैदा हो सकता है विशेष कर बैंजीन जैसे घटक अत्यधिक कार्सिनोजेनिक के रूप में जाने जाते हैं। मोलकूलरसिव प्रौद्योगिकी यह पहली प्रौद्योगिकी है जो वाणिज्यिक रूप से लोकप्रिय, वित्तीय रूप से अर्थक्षम एवं पर्यावरण हितैषी है जो 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में सामने आई है। यह एक स्वच्छ प्रौद्योगिकी है जिसमें मोलकूलर सिव द्वारा जल को हटाया जाता है तथा डिहायड्रेटेड अल्कोहल/इथेनॉल प्राप्त किया जाता है। इस प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हुए डिहाइड्रेशन प्रक्रिया या तो द्रव अवस्था में या वाष्प अवस्था में की जा सकती है। छोटे संयंत्रों के लिए और कम जल के अंश को हटाने के लिए द्रव अवस्था प्रौद्योगिकी पर्याप्त है और प्राय: इसका प्रयोग किया जाता है। तथापि, बड़े संयंत्रों के लिए जहां इथेनाल का प्रयोग पेट्रोल के साथ मिलाने के लिए किया जा रहा है, विश्व भर में वरीयता प्राप्त प्रौद्योगिकी इथेनाल के वाष्प अवस्था डिहायड्रेशन पर आधारित है। यद्यपि इस प्रौद्योगिकी में पूंजीगत लागत एजियोट्रापिक डिस्टिलेशन से अधिक है, तथापि उत्पादन की लागत कम है। दूसरा लाभ यह है कि इससे कोई प्रदूषण विशेषकर जल प्रदूषण पैदा नहीं होता है जैसा कि एजियोट्रापिक डिस्टिलेशन प्रौद्योगिकी के मामले में होता है, जिसमें बैंजिन एवं अन्य विषाक्त रसायनों से स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो गया है। मेम्ब्रेन प्रौद्योगिकी मेम्ब्रेन प्रौद्योगिकी वाणिज्यिक स्तर पर सफल नहीं रही है क्योंकि मेम्ब्रेन की लागत अधिक होती है और यह बहत ही कम समय तक प्रयोग की स्थिति में रह पाता है। इससे उत्पादन की लागत अधिक हो जाती है तथापि, नए प्रकार के मेम्ब्रेन का प्रयोग करने वाली प्रौद्योगिकियों, जो अपेक्षाकृत लम्बे समय तक प्रयोग में रह सकती हैं और इसलिए उत्पादन की लागत कम होती हैं, को विकसित देशों में विकसित किए जाने की सूचना है। इस प्रौद्योगिकी के अब तक कोई प्रमाणित पिछला रिकार्ड नहीं है। कच्ची सामग्री/तत्व कई कच्ची सामग्री से अल्कोहल बनाया जा सकता है जिनकी तीन प्रमुख श्रेणियां हैं। चीनी आधारित स्टार्च आधारित सेलुलोज आधारित चीनी आधारित इस श्रेणी में मुख्य फसल गन्ना (गन्ने का रस, सीरा), चुकन्दर (चुकन्दर का रस एवं सीरा) मीठा जवार हैं। स्टार्च आधारित गेहूं, चावल, मक्का, जौ, माल्ट आदि सहित सभी प्रकार के अन्न इसमें शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, ट्यूबर अर्थात आलू, कसावा (टेपियाको) आदि भी स्टार्च आधारित हैं। सेलुलोज आधारित इस श्रेणी में कृषि अपशिष्ट, कृषि अवशेष बगास, धान की भूसी, डंठल, नारियल के सल, काठ के टुकड़े, बुरादा, नगरपालिका कार्बनिक अपशिष्ट आदि शामिल हैं। परियोजना वित्तपोषण क्र. सं. वित्तपोषण योजनाएं ब्याज दर वापसी अदायगी की अधिकतम अवधि (वर्ष) ऋण स्थगन की अधिकतम अवधि (वर्ष) प्रवर्तक का न्यूनतम अंशदान इरेडा से सावधि ऋण अभ्युक्ति 1. क. बायोमास/गन्ने का रस/सीरा से इथेनॉल उत्पादन 12.75 8 2 30 परियोजना लागत के 70 प्रतिशत तक इरेडा का ऋण केवल तेल उत्सर्जन एवं ट्रांसेस्टेरिफिकेशन प्रक्रिया के संयंत्रों के लिए उपलब्ध है ख. जैव-डीजल उत्पादन 12.75 8 2 30 परियोजना लागत के 70 प्रतिशत तक इरेडा का ऋण केवल तेल उत्सर्जन एवं ट्रांसेस्टेरिफिकेशन प्रक्रिया के संयंत्रों के लिए उपलब्ध है विशिष्ट सांविधिक अपेक्षाएं इथेनॉल के उत्पादन के लिए केन्द्रीय/राज्य उत्पाद शुल्क विभाग से स्वीकृति · प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से परियोजना की मंजूरी · वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार से औद्योगिक उद्यमी ज्ञापन (आई ई एम) जैव ईंधन (इथेनॉल/जैव डीजल) पर प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. जैव ईंधन क्या है? उत्तर: जैव ईंधन कई रासायनिक/जैविक प्रक्रियाओं द्वारा जैविक सामग्री से व्युत्पन्न अक्षय द्रव्य र्इंधन है। प्रश्न 2. जैव रसायन के क्या लाभ हैं? उत्तर: प्रकृति में अक्षय पर्यावरण हितैषी जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम कृषि अर्थव्यवस्था एवं ग्रामीण रोजगार में वृद्धि है। प्रश्न 3. इरेडा द्वारा वित्तपोषित किए जा रहे संभावना वाले जैव ईंधन कौन से हैं? उत्तर: इथेनॉल (मुख्य रूप से पेट्रोल के साथ मिलाने के लिए )जैव डीजल (डीजल के साथ मिलाने के लिए) प्रश्न 4. जैव ईंधन के उत्पादन के लिए कौन सी कच्ची सामग्री का प्रयोग किया जाता है? उत्तर: इथेनॉल इथेनॉल के उत्पादन के लिए प्रयुक्त कच्ची सामग्री की तीन श्रेणियां हैं : - 1. चीनी आधारित – गन्ना, चुकन्दर, मीठा जवार आदि 2. स्टार्च आधारित – सभी प्रकार के अन्य जिनमें गेहूं, चावल, मक्का, जौ, माल्ट आदि तथा ट्यूबर जैसे कि आलू एवं कसावा आदि शामिल हैं। 3. सेलुलोज आधारित – कृषि अपशिष्ट, जैव अवशेष, बगास, धान की भूसी, पुआल आदि। जैव डीजल : खाद्य एवं अखाद्य तेल एवं पशु वसा भारत में जैव डीजल की संभावना वाले स्रोत जैसे कि जेट्रोफा कूरकास (रतन जोट), पॉगमिया पिनाटा (करंज) आदि जैसे पादप प्रजातियों से प्राप्त अखाद्य तेल हो सकते हैं। प्रश्न 5. क्या इरेडा ने अब तक किन्हीं जैव ईंधन परियोजनाओं का वित्तपोषण किया है? उत्तर: हां, इरेडा ने कुछ इथेनॉल परियोजनाओं का पहले ही वित्पोषण किया है। स्रोत: पत्र सूचना कार्यालय, इरेडा, विकिपीडिया व भारत सरकार का नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय।