प्रस्तावना राष्ट्रीय ग्रामीण पयेजल कार्यक्रम के अंतर्गत 40 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन (एलपीसीडी) के साथ भारत के लगभग 76% ग्रामीण बसावटों ने प्रूवन रूप से कवर (एफसी) स्थिति प्राप्त कर ली है परन्तु यह कवरेज मुख्यतः हैं हैंडपपों के माध्यम से की गई है और यह स्थायी तथा उत्तम गुणवत्ता सेवा तंत्र नहीं है। लगभग 70,000 बसावटों जल गुणवत्ता की समस्याओं से ग्रस्त हैं और १७० मिलियन से अधिम ग्रामीण बसावटों में से केवल 54% के पास नल जल उपलब्ध है। प्रमुख फिजियो-रासायनिक संदूषणों में आर्सेनिक, प्लोराइड, लौह, लवणता तथा नाइट्रेट शामिल हैं जिनमें से आर्सेनिक और फ्लोराइड आरी क्रिटिकल हैं क्योंकि ये अन्यों की तुलना में तत्काल स्वास्थ्य समस्या उत्पन्न करते हैं। आर्सेनिक तथा पलोराइड से प्रभावित बसावटों की राज्य-वार सूची निम्नलिखित है- तालिका 1: दिनांक 18 अगस्त, 2016 की स्थिति के अनुसार मंत्रालय के आईएमआईएस के अनुसार प्लोराइड तथा आर्सेनिक संदूषण से प्रभावित राज्य आर्सेनिक (>0.01 एमजी/एल) पलोराइड (>1.5 एमजी/एल) क्र. सं. राज्य बसावटें आबादी बसावटे आबादी आंध्रप्रदेश - - 419 2,92,899 असम 3,226 12,94,077 147 67,272 बिहार 1,049 16,61,190 994 12,50,0976 छत्तीसगढ़ - - 72 25,656 हरियाणा 45 1,42,944 196 4,96,238 झारखण्ड 128 1,20,443 980 5,06,801 कर्नाटक 15 33,755 951 5,20,493 केरल - - 35 84,320 मध्यप्रदेश - - 87 39,814 महाराष्ट्र - - 51 1,27,730 ओडिशा - - 62 21,609 पंजाब 492 5,96,632 285 3,39,117 राजस्थान - - 5,432 36,74,810 तेलगांना - - 972 13,32,480 उत्तरप्रदेश 225 2,91,212 162 2,78,738 पश्चिम बंगाल 6,765 93,40,063 860 5,40,961 कुल 11,945 134,80,316 11,705 95,99,914 आर्सेनिक एक कैंसर कारक तत्व हैं और जो त्वचा, फेफड़ों, पित्त की थैली, गुर्दे और लीवर कैंसर से जुड़ा हुआ है। चर्म रोग संबधी, विकास संबधी, तंत्रिका संबधी, श्वास-प्रश्वास संबंधी, हृदयवाहिनी, प्रतिरक्षा सबंधी, तथा अंतः स्रावी संबधी प्रभाव भी सामने आए हैं। प्लोरोसिस, एक जन स्वास्थ्य समस्या है जोलंबी अवधि तक पेयजल/खाद्यय पदार्थ/औद्योगिक प्रदूषकों के जरिये अत्यधिक प्लोराइड का सेवन करने से भी हो सकती है। इससे बुढापे के अलावा गंभीर स्वास्थ्य संबधी सम्शय भी होती है जैसे दंत्य प्लोरोसिस. कंकालीय प्लोरोसिस और गैर-कंकालीय प्लोरोसिस। चूँकि या हानिकारक प्रभाव स्थायी तथा स्थिर प्रकृति के होते हैं, इसलिए व्यक्ति तथा समुदाय के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं परिणामस्वरुप देश की वृद्धि, विकास, अर्थव्यवस्था तथा मानव संसाधन विकास प्रभावित होता है। सुदूर कवरेज के मुद्दे के हल करने के लिए तथा सभी बसावटों से आर्सेनिक और प्लोराइड की समस्या को दूर करने के लिए पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय ने आर्सेनिक था प्लोराइड पर फोकस करते हुए एक कार्यक्रम प्रस्तावित किया है। इस कार्यक्रम का लक्ष्य वर्ष 2020 तक जल गुणवत्ता के अंतरार्ष्ट्रीय मानकों के प्रति भारत को एक कदम आगे बढ़ाना है। पेयजल गुणवत्ता मानकों की परिभाषा भारतीय मानक ब्यूरो ने पेयजल के लिए पाने आईएस10500-2012 मानकों में विनिर्देश निर्धारित किये हैं तथापि, ये मानक केवल स्वैच्छिक प्रवृत्ति के हैं प्रवर्तन के लिए विधिक रूप से समर्थित नहीं हैं। इन मानकों की दो सीमाएं है: वांछनीय सीमाएं अधिकतम अनुमत अथवा अस्वीकृति सीमा के कारण। यदि कोई पैरामीटर, अस्वीकृति सीमा के कारण से अधिक हो जाता है तो जल संदूषित समझा जा सकता है। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि जल संदूषित तभी हो सकता है यदि वह जैविक रूप से संदूषित हो (सूक्ष्म जीवों जैसे शैवाल, प्राणी प्लवक, प्लैजिलेट्स, ई-कोली आदि की उपस्थिति) अथवा रासायनिक संदूषण अनुमत सीमाओं से अधिक हों (जैसे अत्यधिक प्लोराइड (>1.5 मी. ग्राम/लीटर) लवणता अर्थात् कुल विघटित ठोस पदार्थ (टीडीएस) (>२,000 मी. ग्राम लीटर), विघटित लौह (>0.3 मी. ग्राम लीटर), आर्सेनिक (>0.01 मी. ग्राम लीटर), नाइट्रेट(>45 मी. ग्राम लीटर), आदि ग्रामीण क्षेत्रों में 85% से अधिक पेयजल के स्रोत भू-जल आधारित हैं और अल्प-अवधि में भूजल में रासायनिक तत्व अधिक नहीं बदलते हैं अतः वर्ष में एक बार रासायनिक संदूषणका परीक्षण पर्याप्त है। प्रत्येक मौसम में एक बार अर्थात् वर्ष में 4 बार जैविक स्न्दुषणों का परीक्षण अनुशंसित है। तथापि, प्रतिवर्ष कम से कम दो बार अर्थात् मानसून पूर्व मानसून पश्चात मौसम में इसे करना चाहिए। पेयजल गुणवत्ता की समस्याओं को हल करने के लिए एनआरडीडब्ल्यूपी के अंतर्गत वर्तमान वित्तपोषण देश के ग्रामीण क्षेत्रों में जल गुणवत्ता समस्याओं को हल करने के लिए और जल गुणवत्ता प्रभावित बसावटों के कवरेज के लिए राज्यों को आबंटित निधियों का 67% तक उपयोग किया जस सकता है। इसके अलावा जापानी एनसेफलाइटिस/उग्र एन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम (जेई/एई) प्रभावित उच्च प्राथमिकता वाले जिलों और रसायन संदूषण के लिए एनआरडीडब्ल्यूपी निधियों का 5% भी चिन्हित तथा आबंटित है। इसके अतिरिक्त, जल गुणवत्ता मॉनिटरिंग तथा निगरानी हेतु भारत सरकार, राज्यों को 3% एनआरडीडब्ल्यूपी निधियां भी उपलब्ध कराती हैं जिसमें नया बातों के साथ-साथ जिला/उप जिला गुणवत्ता जाँच प्रयोगशालाओं का नए ढंग से उन्नयन करने संबधी स्थापना कार्य, प्रयोगशालाओं में रसायन तथा उपभोज्य सामग्री उपलब्ध कराना, ग्राम पंचायतों के क्षेत्र जांच किट/ रिफिल उपलब्ध कराना आदि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, राज्स्यों को आबंटित एनआरडीडब्ल्यूपी निधियों का 10% तक भू-जल के कृत्रिम पुनर्भंडारण अथवा अन्य तरीकों से पयेजल स्रोतों के स्थायित्व के लिए उपयोग किया जा सकता है जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ एक्विफायर में संदूषण के स्तर को पानी मिलकर करना शामिल है। पेयजल संदूषण को हल करने के लिए अब तक उठाये गए कदम/अल्प-कालिक उपाय मंत्रालय ने निधियों की उपलब्धता की स्थिति में, दीर्घकालीन स्थायी उपाय के रूप में वर्ष 2022 तक सतही जल आधारित नल जलापूर्ति सकीमों को प्राथमिकता देते हुए देश की 90% ग्रामीण आबादी को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए एक कार्यनीति योजना बनाई है। मंत्रालय ने सभी राज्यों को प्रोत्साहन दिया है कि ये दीर्घकालीन उपाय के रूप में सभी जल गुणवत्ता प्रभावित बसावटों में सतही जल आधारित नल जल आपूर्ति स्कीमें संस्थापित कर्रें। सभी राज्यों को सलाह दी गई हैं कि वे मार्च, 2007 तक सूचित आर्सेनिक तथा प्लोराइड प्रभावित बसावटों में सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र स्थापित करें क्योंकि यह नल जलापूर्ति स्कीमों की संस्थापना की तुलना में जल्दी संभव है। मात्र पीने तथाखाना पकाने के लिए 8-10 एलपीसीडी (लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन) स्वच्छ जल उपलब्ध कराने के लिए यह अल्पकालिक तात्कालिक उपाय के रूप में किया जा रहा है। चूँकि वर्ष 2015-16 के दौरान मंत्रालय का आबंटन घट गया था, अतः निति आयोग ने इस कार्य हेतु एक बार की केन्द्रीय सहायता के रूप में 1000 करोड़ रूपये जारी किए हैं, जिसमें राजस्थान तथा पश्चिम बंगाल में जो पेयजल में प्लोराइड तथा आर्सेनिक संदूषण में सबसे अधिक प्रभावित है, में लास्ट माइल कनेक्टिविटी हेतु नल जलापूर्ति स्कीमों के लिए निधियां शामिल है। राष्ट्रीय जल गुणवत्ता उप मिशन क्यों हो? प्रस्तावित कार्यक्रम राष्ट्रीय जल गुणवत्ता उप मिशन के लिए वारंटी देता है जिसे मार्च, 2020 से पूर्व मिशन मोड में पूरा कर लिया जाएगा क्योंकि: मामला महत्वपूर्ण और तत्कालिकहैं। प्रचालनात्मक प्रभावोउत्पाद्कता में पर्याप्त वृद्धि की आवश्यकता। इनके लिए अतिरिक्त निधियां, इनकी मजबूत मॉनिटरिंग तथा निगरानी की आवश्यकता। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विशेष तकनीक, जन-शक्ति तथा कार्यनीति की आवश्यकता। लक्ष्य सभी आर्सेनिक तथा प्लोराइड प्रभावित बसावटों में सुरक्षित तथा पीने योग्य जल उपलब्ध कराना जल गुणवत्ता उप-मिशन में तीन चरण होंगे नामत: लाक्षणिक चरण अद्यतन और प्रमाणिक आंकड़ों के आधार पर कार्य योजना का सही रूप में निर्धारण करना। कार्यान्वयन चरण-दिशानिर्देशों के आधार पर क्षेत्र विशिष्ट स्कीमों को चलाना। स्थायी चरण-पर्याप्त मॉनिटरिंग तथा निगरानी सहित यह सुनिश्चित करना कि स्कीमें सफलतापूर्वक चल रही हों। तीन प्रकार की स्कीमें जो सुरक्षित तथा पीने योग्य जल उपलब्ध कराने के लिए राज्य शुरू कर सकते हैं: सतही जल आधारित नल जलापूर्ति स्कीम सुरक्षित भू-जल आधारित नल जलापूर्ति स्कीम और शुद्धिकरण तकनीक सहित भू-जल आधारित स्कीम/सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र (सीडबल्युपीपी) राष्ट्रीय जल गुणवत्ता उप मिशन के तहत न्यूनतम सेवा देना अवश्य सुनिश्चित किया जाए: सतही जल आधारित नल जलापूर्ति स्कीम: 40 एलपीसीडी सुरक्षित भू-जल आधारित नल जलापूर्ति स्कीम: 40 एलपीसीडी तथा शुद्धिकरण तकनीक सहित भू-जल आधारित स्कीम/सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र (सीडबल्युपीपी) 8-10 एलपीसीडी परियोजना को चलाने के कदम सभी राज्य द्वारा अधिकतम दो पृष्ठों एक एक्शन प्लान पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को 15 जुलाई, 2017 तक भेजा जाएगा। इस एक्शन प्लान में लगभग 28000 आर्सेनिक/प्ल्रोराइड प्रभावित बसावटों में स्पष्ट समय-सीमा, प्रस्तावित स्कीमों और तदनुरूप ग्राम, कवरेज, स्कीमवार निधियन आवश्यकताओं, निधियन के संभावित स्त्रोतों और अगले चार वर्षों में पूरा किए जाने वाले कार्यों का उल्लेख होगा। बसावटों की पहचान करना: परियोजना के तहत मंत्रालय की आईएमआईएस पर राज्यों द्वारा दी गई सुचना(18 अगस्त 20 16- आईएमआईएस फोर्मेंट एफ-18 को स्थिर किए गये आंकड़े) के अनुसार आर्सेनिक और प्लोराइड प्रभावित बसावटों की पहचान की जाएगी। इन बसावटों को भविष्य के सभी उपयोगों के लिए जीयो टैग्ड किया जाएगा। वास्तविक मॉनिटरिंग के लिए जीयो-टैग्ड स्थल, मोबाईल एप्लीकेशन, एकीकृत प्रबन्धन सूचना प्रणाली (आईएमआईएस) पर सुलभ होंगे। प्राथमिकताएँ निम्नलिखित हो सकती है बसावटें, जो केंद्र अथवा राज्य सरकार की किसी अन्य मौजूदा/चालू दीर्घकालीन कार्यक्रम में कवर न हों। बसावटों, जिनमें आईएमआईएस आंकड़ों के अनुसार संदूषण की उच्च डिग्री हो। 3. स्रोत की पहचान: राज्य को निम्नलिखित पैरामीटरों के आधार पर स्रोत की पहचान, जीयो-टैग और चयन करना है। क) स्रोत/एक्विफर मूल रूप से स्थायी होने चाहिए। ख) स्रोत/उप सतह) आर्थिक रूपसे सर्वाधिक व्यवहार्य (न्यूनतम जीवन चक्र लागत) विकल्प होना चाहिए जिसमें स्वच्छ पेयजल प्रदान करने की असीम क्षमता हो। 4. स्रोत की गुणवत्ता जांच:राज्यों को पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय द्वारा प्रकाशित और व्यापक रूप से वितरित समरूप पेयजल मॉनिटरिंग प्रोटोकॉल का चालन करना होता है। 5. स्कीमों की तैयार्यी/कार्यान्वयन की प्रक्रिया: बसावट और स्रोत की पहचान के आधार पर राज्यों को एक प्रस्ताव तैयार करना होता है। अनिवार्य आवश्यकताएं: सभी मेगा स्कीमों को कार्य की सुपुर्दगी की तिथि से 36 माह के भीतर संस्थापित कर लिया जाए। वित्तपोषण हेतु प्रस्तावित स्कीमों के लिए राज्य स्तरीय स्कीम संस्वीकृति समिति (एसएलएसएससी) अनुमोदन समय-सीमा के साथ-साथ विस्तृत चरण-वार कार्यक्रम सभी मेगा जलापूर्ति स्कीमें के जल शुद्धिकरण संयंत्रों (डबल्यूटीपी) में फिल्टर बेड वाश्ड वॉटर का पुनः चक्रण/पुनः उपयोग हो। स्कीम में ऑनलाइन बूस्टर क्लोरिकारक संयंत्र सहित पर्याप्त क्षमता/संख्या में क्लोरीनेशन संयंत्र उपलब्ध हो ताकि उपयोगकर्ता तक शोधित/शुद्ध जल पहुँच सके। सभी मेगा जलापूर्ति स्कीमों में समर्पित तीन चरण वाली इलेक्ट्रिकल बिजली आपूर्ति हो। मेगा जलापूर्ति स्कीमों के सभी जल शुद्धिकरण संयंत्रों (डब्ल्यूटीपी: में मुलभुत स्तर की जल गुणवत्ता जाँच प्रयोगशाला आवश्य हो। स्कीम में नगरं पंचायत/बसावट में प्रवेश से पहले बल्क जल मीटर का प्रावधान हो। आर्सेनिक तथा प्लोराइड प्रभावित बसावटों के लिए जारी केन्द्रीय अंशदान के समरूपी राज्य अंशदान और मार्ग में आये गैर-आर्सेनिक/गैर प्लोराइड प्रभावित बसावटों, नगरों/शहरों तथा उद्यमों से समरूपी संपूर्ण अंशदान के लिए राज्य की प्रतिबद्धताएं। राज्य-वार विवरण (स्कीम-वार विवरण राष्ट्रीय जल गुणवत्ता उप-मिशन पोर्टल पर ऑनलाइन अपलोड किया जाएं, यूजर आईडी तथा पासवर्ड आईएमआईएस के समान है) स्कीम का नाम आईएमआईएस के अनुसार बसावटों की कुल संख्या आईएमआईएस (एफ-18) के अनुसार आर्सेनिक प्रभावित बसावटों की संख्या आईएमआईएस (एफ-18) के अनुसार प्लोराइड प्रभावित बसावटों की संख्या आईएमआईएस के अनुसार कुल आबादी आईएमआईएस (एफ-18) के अनुसार आर्सेनिक प्रभावित आबादी आईएमआईएस (एफ-18) के अनुसार प्लोराइड प्रभावित आबादी परियोजना.स्कीम की प्रति व्यक्ति लागत: सेवा स्तर (एलपीसीडी) आईएमआईएस (एफ-18) के अनुसार प्लोराइड/आर्सेनिक प्रभावित बसावटों की पुष्टि (18 अगस्त 20 16 को स्थिर किया गया फोर्मेट एफ-18) स्त्रोत स्थायित्व; संबंध प्राधिकारण से प्रस्ताव के साथ जल निकासी की अनुमति सुरक्षित भूजल आधारित नल जलापूर्ति स्कीम वित्तपोषण हेतु प्रस्तावित स्कीमों के लिए राज्य स्तरीय स्कीम संस्वीकृति समिति (एसएलएसएससी) अनुमोदन विस्तृत चरण-वार तथा समयबद्ध योजना आर्सेनिक तथा प्लोराइड प्रभावित बसावटों के लिए जारी केन्द्रीय अंशदान के समरूपी राज्य अंशदान और मार्ग में आये गैर-आर्सेनिक/गैर प्लोराइड प्रभावित बसावटों, नगरों/शहरों तथा उद्यमों से समरूपी संपूर्ण अंशदान के लिए राज्य की प्रतिबद्धताएं इन बसावटों में मनरेगा, आईडब्ल्यूएमपी, आरकेवीआई, पीएमकेएसवाई तथा राज्य की अन्य जल संरक्षण उपाय कर सकते हैं और यह सुनिश्चित करें कि भूजल का पर्याप्त पुनर्भंड़ारण हो/ इसमें स्कीम के स्थायित्व पर ध्यान रखा जाएगा। राज्य –वार विवरण (स्कीम वार विवरण, राष्ट्रीय जल गुणवत्ता उप-मिशन पोर्टल पर ऑनलाइन अपलोड किया जाएं, यूजर आईडी तथा पासवर्ड आईएमआईएस के समान है) स्कीम का नाम आईएमआईएस के अनुसार बसावटों की कुल संख्या आईएमआईएस (एफ-18) के अनुसार आर्सेनिक प्रभावित बसावटों की संख्या आईएमआईएस (एफ-18) के अनुसार प्लोराइड प्रभावित बसावटों की संख्या आईएमआईएस के अनुसार कुल आबादी आईएमआईएस (एफ-18) के अनुसार आर्सेनिक प्रभावित आबादी आईएमआईएस (एफ-18) के अनुसार प्लोराइड प्रभावित आबादी परियोजना.स्कीम की प्रति व्यक्ति लागत: सेवा स्तर (एलपीसीडी) आईएमआईएस (एफ-18 अगस्त, 2016 फ्रिज कर दिया गया) के अनुसार प्लोराइड/आर्सेनिक प्रभावित बसावटों के बारे में पुष्टिकरण भूजल सोत्र निरंतर उपलब्धता के संबध में राज्य रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर/राष्ट्रीय रिमोट सेंसिग सेंटर (एनआरएससी) से प्रमाणीकरण जिला जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशाला से जल गुणवत्ता पर जाँच रिपोर्ट हाइडो जीयो मॉफोलॉजिकिल मानचित्रों का बड़े पैमाने पर उपयोग के बारे में सोचा जा सकता है। शोधन प्रौदियोगिकी सहित भूजल आधारित स्कीम/सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र (सीडबल्युपीपीएस): निधियन हेतु प्रस्तावित स्कीमों के लिए राज्य स्तरीय स्कीम स्वीकृति समिति (एसएसएलएसएससी) का अनुमोदन विस्तृत चरणवार समयबद्धयोजना संयंत्र की क्षमता इतनी होनी चाहिए कि यह बसावटों को कम से 8-10 एलपीसीडी सुरक्षित पयेजल (पीने एवं रसोई प्रयोजन के लिए) मुहैया करा सके। राज्य, विशिष्ट संदूषण को दूर/कम करने के उद्देश्य से प्रौद्योगिकी की उपयुक्तता की स्म्मुचित जाँच करते हुए एक पारदर्शी प्रक्रिया के जरिये निजी डेवलपर को परियोजना का टेंडर देगा और 10 वर्ष के लिए ओएंडएम दायित्व भी निजी डेवलपर द्वारा ही पूरी की जाएगी। विशिष्ट संदूषण के शोधन के लिए प्रौद्योगिकी विकल्प का निर्णय राज्यों के ऊपर छोड़ दिया जाता है। तथापि, प्रौद्योगिकियों का आवश्यक रूप से अनुवीक्षणप्रतिष्ठित संगठनों जैसे, सीएसआईआर प्रयोगशाला, एनईईआरआई- नागपुर,सीएसएमसीआरआई- भावनानगर, बीएआरसी-मुंबई, भारतीय मानक ब्यूरो, पेयजल एंव स्वच्छता मंत्रालय द्वारा गठित उच्च स्तरीय तकनीकी समिति, पेयजल गुणवत्ता प् काम कर रहे आईआईटी तथा अन्य राष्ट्र स्तरीय प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा किया जाएगा। ओएंडएम् लागत ( बिजली प्रभार, केयर टेकिंग, मेम्ब्रेन बदलने आदि) पूरा करने के लिए निजी डेवेलपर को वर्ष 1 से 3 के लिए 10 पैसे प्रति लिटर, चौथे से छठे वर्ष के लिए २- पैसे प्रति लीटर और 7-10 वर्ष के लिए 3- पैसे प्रति लीटर प्रभार लेने की अनुमति होगी। वह प्रचालन एवं अनुरक्षण लागत को पूरा करने के लिए इस जमा राशि को अपने पास रख सकता है। राज्य यह सुनिश्चित करेंगे कि जल प्रभार के भुगतान की इच्छुक ग्राम पंचायतों उन संयंत्रों का स्वामित्व लेगी। नियुक्त/चयनित ठेकेदार ट्रायल रन अवधि सहित प्रचालन के पहले दिन से ओएंडएम कार्य आरंभ कर देगा और 10 वर्षों तक जारी रहेगा। यह सुनिश्चित करने के लिए 10 वर्षों की ओएंडएम अवधि में संतोषजनक ढंग से काम करे, ठकेदार द्वारा 100% पूंजीगत लागत के लिए २ वर्षों की अवधि के लिए वैधबैंक गांरटी दी जाएगी। अति दोहित ब्लोकों में राज्य भूजलबोर्ड/एजेंसी से जल उपलब्धता के बारे में राज्य अवश्य प्राप्त की जाए। राज्य इन बसावटों में अन्य कार्यक्रमों जैसे मनरेगा, आईडब्ल्यूएमपी, आरकेवाई, पीएमके एसवाई और अन्य राज्य जल संरक्षण कार्यक्रमों आदि के साथ विलय से जल संरक्षण उपाय करें और भूजल का पर्याप्त रूप से पुनर्भरण सुनिश्चित करे। इससे स्कीम स्कीम की निरंतरता बनी रहेगी। वर्ष २०१६-17 के दौरान, भारत सरकार ने आर्सेनिक और प्लोराइड प्रभावित बसावटों में सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्रों (सीडब्ल्यूपीपीएस) की संस्थापन के लिए 800 करोड़ रु० जारी किए हैं। अतः राष्ट्रीय जल गुणवत्ता उप मिशन के अंतर्गत सीडब्ल्यूपीपीएस का प्रस्ताव करते समय बसावटों का कोई दोहरापन नहीं होगा। यदि किसी भी मामले में, किसी बसावट को एक अथवा अधिक सीडबल्युपीपीएस दिया जाता है तो उस बाबत उपयुक्त औचित्य का उल्लेख करना होगा। एडवाइजरी प्रचालन एवं अनुरक्षण लागत को न्यूनतम करने और बिजली बचाने के लिए जहाँ भी आवश्यकता हो सौर ऊर्जा/सोलर पैनल/सौर रौशनी जैसे पुनर्विकरणीय ऊर्जा का उपयोग करने की सलाह दी जाती है। रीयल टाइम मॉनिटरिंग के लिए सभी मेगा स्कीमों में सुवाइजरि कंट्रोल तथा डाटा एक्युजीशन (एससीएडीए) की उपयोगिता को तलाशा जाए। स्कीम में पर्याप्त संख्या में फ्लो मीटर लगाने के सलाह दी जाती है। यह उचित है की ऐसी स्कीमें तैयार की जाएँ ताकि इनसे न्यूनतम ऊर्जा खपत हो। सलाह दी जाती है कि भविष्य में आव्ह्य्क विस्तार का प्रावधान हो। सलाह दी जाती ही एक उपयुक्त वॉटर टेरिफ प्लान लाया जाए यदि पहले से यह मौजूद न हो। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को प्रस्ताव भेजना राष्ट्रीय जल गुणवत्ता उप मिशन पोर्टल पर स्कीमवार व्यौरा ऑनलाइन उपलोड किया जाना चहिए, यूजर आईडी और पासवर्ड आईएमआइएस जैसे ही होंगे। स्कीम प्रस्ताव, उपर्युक्त जी-5 के अनुसार अपेक्षित सभी सहायक दस्तावेजों के साथ प्रस्तुत किये जाने चहिए। शीर्ष समिति राज्यों को राज्य स्तरीय स्कीम स्वीकृति समिति (एसएलएसएससी)द्वारा अनुमोदित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट मंत्रालय को भेजनी होती है ताकि इसे शीर्ष समिति से अनुमोदित कराया जा सके। शीर्ष समिति सदस्य का व्यौरा निम्नलिखित है: क्र सं. समिति 1 सचिव, पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय अध्यक्ष २ वित्तीय सलाहकार, पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय सदस्य 3 संयुक्त सचिव (जल) पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय सदस्य 4 निति आयोग प्रतिनिधि सदस्य 5 व्यय विभाग से प्रतिनिधि सदस्य 6 संख्याकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय से प्रतिनिधि सदस्य 7 स्वस्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से प्रतिनिधि सदस्य 8 निदेशक (जल) पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय सदस्य 9 उप सलाहकार (डब्ल्यूक्यू) पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय संयोजक अनुवीक्षण एवं निगरानी राज्यों में संस्थागत व्यवस्था मिशन मोड में कार्यक्रम का कार्यान्वयन करने के लिए प्रत्येक राज्य चीफ इंजीनियर स्तर पर एक राज्य उप मिशन समन्वयक नियुक्त करेगा जो निम्नलिखित के लिए जवाबदेह होगा: राज्य स्तरीय कार्यक्रम की योजना, तयारी और निधि प्रबन्धन राज्य स्तर पर कार्यक्रम का यथासमय कार्यान्यवन निरंतर मॉनिटरिंग, निगरानी, यथासमय डाटा संग्रहण, ऑनलाइन प्रणाली पर अद्यतनीकरण और विश्लेषण सुनिश्चित करना। राज्य स्तर पर कार्यक्रम की तकनिकी, वित्तीय और समग्र निरंतरता सुनिश्चचित करना केन्द्रीय स्तर पर संस्थागत व्यवस्था केंद्र में मिशन मोड में कार्यक्रम के कार्यन्वयन हेतु पेयजल एंव स्वच्छता मंत्रालय राष्ट्रीय उप मिशन समन्यवक/परियोजना निदेशक के रूप में उप सलाहकार- जल गुणवत्ता नियुक्त करेगा जो निम्नलिखित के लिए जबाबदेह होगा। राज्यों के साथ यथासमय समन्वयन कार्यक्रम का यथासमय कार्यान्वयन केन्द्रीय स्तर पर कार्यक्रम की निरतंर मॉनिटरिंग, निगरानी, आंकड़ा एकत्रण तथा विश्लेषण। राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम का तकनीकी, वित्तीय तथा समग्र स्थायित्व सुनिश्चित करना। उपसलाहकार (डब्ल्यूक्यू ) राष्ट्रीय कार्यक्रम मॉनिटरिंग यूनिट (एनपीएमयू) की अध्यक्षता कर्रेगे जिसमें दो सहायक सलाहकार सहायता करेंगे। विस्तृत परियोजना रिपोर्टों (डीपीआर) का तकनीकी क्न्सक्तेट्स की सहायता एनपीएमयू द्वारा की जाएगी।एनपीएमयू की अध्यक्षता राष्ट्रीय उप-मिशन समन्वयक/परियोजना निदेशक द्वारा की जाएगी जो एमओडीडब्ल्यूएस के संयुक्त सचिव/सचिव को रिपोर्ट करेंगे। राज्यों को वास्तविक एवं वित्तीय प्रगति के बारे में एकीकृत प्रबन्धन सूचना प्रणाली पर नियमित रूप से रिपोर्ट भेजनी होती है। राज्यों को स्रोत बिंदु और सुपुर्दगी बिंदु के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) कोओर्डिनेटस इस मंत्रालय की आईएमआईएस पर रिपोर्ट करनी होती है। राज्यों को एमआरडब्ल्यूक्यूएस मोबाईल ऐप पर नियमत रूप से फोटोग्राफ अपलोड करनी होती है। इस कार्यक्रम की जिला स्तर पर मॉनिटरिंग संसद सदस्य (एम.पी) की अध्यक्षता में ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा हाल में गठित जिला विकास समन्वय एवं मॉनिटरिंग समिति (दिशा) द्वारा की जाएगी। सभी स्कीमों को माईल स्टोन संबंध निधियन प्राप्त होगा। सभी स्किकों में जीयो टैंगिंग सुविधा होगी। कार्यान्वयन की कार्य प्रणाली: प्रोसेस फ्लो: सभी, राज्य, राष्ट्रीय, जल गुणवत्ता उप मिशन के अंतर्गत निधियन हेतु राष्ट्रीय जल गुणवत्ता पोर्टल पर ऑनलाइन फोर्मेंट में परियोजना प्रस्ताव भरेंगे। उप मिशन के दिशा निर्देशों और अनुमोदन ढाँचे के अनुसार, स्कीम से जुडी सभी सूचनाएं और सहायक दस्तावेज, समीक्षा एवं अनुमोदन हेतु पोर्टल पर अपलोड कर दिए जायेंगे। प्रोजेक्ट प्लानिंग सतही जल आधारित नल जल आपूर्ति स्कीम और सुरक्षित भूजल आधारित नल जल आपूर्ति स्कीम: तकनीकी एवं आर्थिक रूप से सर्वाधिक व्यवहार्य और लागत प्रभावी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर० तैयार करने के लिए राज्य सरकार का इंजीनियर-इन-चीफ/चीफ इंजीनियर ही सतही तथा सुरक्षित बहुल आधारित स्कीमों के लिए उत्तरदायी होगा। डीपीआर तैयार करते समय इंजीनियर जिला प्रशासन और जिला पंचायत की सहायता से सभी संबधित सिद्धांत: अनुमोदन प्राप्त कर लें। डीपीआर टियर करने के बाद इसे राज्य स्तरीय स्कीम स्वीकृति समिति (एसएलएसएससी) के समक्ष रखने से पहले राज्य तकनीकी एंजेंसी द्वारा इसका तकनीकी पुनरीक्षण किया जाएगा। राज्यों को राज्य स्तरीय स्कीम स्वीकृति समिति (एसएलएसएससी)द्वारा अनुमोदित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट मंत्रालय को भेजनी होती है ताकि शीर्ष समिति द्वारा परियोजना का मूल्यांकन किया जा सके। शोधन प्रौद्योगिकी सहित भूजल आधारित स्कीम /सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र (सीडब्ल्यूपीपीएस) असुरक्षित भूजल का शोधन करने हुए उपयुक्त प्रौद्योगिकी का चयन करने के लिए एन्जिनिय्त इन चीफ/चीफ इंजीनियर ही उत्तरदायी होगा। राज्यों को राज्य स्तरीय स्वीकृति समिति (एसएलएसएससी) द्वारा अनुमोदित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट मंत्रालय को भेजनी होती है ताकि शीर्ष समिति द्वारा परियोजना का मुल्यांकन किया जा सके। तकनीकी एवं प्रशासनिक स्वीकृति तकनीकी स्वीकृति, राज्य में सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रदान की जाएगी। तकनीकी मंजूरी के आधार पर एसएलएसएससी द्वारा प्रशासनिक मंजूरी प्रदान की जाएगी। राज्य में सक्षम प्राधिकारी द्वारा वित्तीय स्वीकृति प्रदान की जाएगी और शीर्ष समिति में प्रस्ताव का मुल्यांकन प्राप्त करना होगा। निधियन पैटर्न किसी भी राज्य को केन्द्रीय सहायता की अधिकतम राशि 45000 करोड़ रु. होगी। लाभार्थी राज्य को मंत्रालय से उपलब्ध निधियों का दावा प्रस्तुत करने के लिए मिशन दिशानिर्देश के अनुरूप 15 जुलाई, 2017 तक प्रस्ताव करना है। उसके बाद राज्यों को निधियां ;पहले आएं पहले पाएं’ के आधार पर उपलब्ध होंगी। मंत्रालय की आईएमआईएस पर राज्यों द्वारा उपलब्ध कराई गिया सूचना के अनुसार (एफ-18- दिनांक 18 अगस्त, 2016 को स्थिर किए गये आंकड़े) आर्सेनिक/प्लोराइड से प्रभावित 28,000 बसावटें इस परियोजना (चालू तथा नई स्कीमें) के अंतर्गत विधाराधीन होंगी। सतही जल/भूजल आधारित नल जल आपूर्ति स्कीमें- केंद्र और राज्य के बीच निधियों का बंटवारा पूर्वोत्तर/ हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 और अन्य सभी राज्यों के लिए 50:50 के अनुपार में होगा। ये निधियां केवल आर्सेनिक एवं प्लोराइड प्रभावित बसावटों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी और राज्यों को आर्सेनिक एवं एवं प्लोराइड प्रभावित बसावटों के लिए केन्द्रीय शेयर की रिलीज के अनुरूप राज्य मैचिंग शेयर और रूट में आने वाली गैर-आर्सेनिक/गैर प्लोराइड प्रभावित बसावटों, शहरों/नगर और उद्योगों के अनुरूप संपूर्ण शेयरप्रदान करना होगा। शोधन प्रौद्योगिकी सहित भूजल आधारित स्कीम /सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र (सीडब्ल्यूपीपीएस) पूर्वोत्तर/ हिमालयी राज्यों के लिए केंद्र एवं राज्य के बीच निधि शेयरिंग पैटर्न 90:10 और अन्य सभी राज्यों के लिए 50:50 होगा। अनुदानों की प्रस्तावित रिलीज शीर्ष समिति के अनुमोदन के आधार पर पयेजल एंव स्वच्छता मंत्रालय द्वारा राज्यों को अनुदान जारी किये जाएँगे । किस्तों की संख्या का निर्णय शीर्ष समिति करेगी। दूसरी और बाद की किस्तें, उनके कार्य-निष्पादन तथा मंत्रालय को सौंपे गए अपेक्षित वास्तविक और वित्तीय दस्तावेज पर आधारित होंगी। राष्ट्रीय जल गुणवत्ता उप मिशन के अतंगर्त कुल पात्र निधियां पर फार्मूला, आईएमआईएस में यथा प्रविष्ट वर्तमान आर्सेनिक/प्लोराइड प्रभावित x1.3x शीर्ष समिति द्वारा यथा निर्णित प्रति व्यक्ति लागत के अनुसार होगा। केंद्र और राज्य के बीच शेयरिंग पैटर्न पुर्वोत्तर/हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 और अन्य सभी राज्यों के लिए 50:50 का होगा। डिजाइन अवधि 30 वर्ष में आबादी में वृद्धि के लिए कारक 1;3 पर विचार किया जाता है। सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्रों के मामले में, प्रत्येक वर्ष तीसरेपक्ष द्वारा सत्यापन कराया जाएगा। रिपोर्ट के आधार पर निधियां जारी की जाएंगी। आवर्ती व्यय: यह उचित है कि राज्य अपने अधिकार क्षेत्र में प्रचालन एवं अनुरक्षण आरंभ करने के लिए 14वें वित्तीय आयोग की निधियों का उपयोग करेगा। यह संबधित राज्य सरकार का यह समग्र दायित्व है कि वह आवर्ती व्यय का वहन करे। यह ग्राम पंचायत का दायित्व है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र में प्रचालन एवं अनुरक्षण (ओएंडएम) का स्वामित्व लेकर इसे आरंभ करें, जबकि जल शोधन संयत्रों (डब्ल्यूटी पी) सहित सभी शीर्ष कायों का ओएंडएम दायित्व ग्रामीण जल आपूर्ति का काम देखने वाले राज्य विभाग/उपक्रम पास होगा। सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयत्रों केमामले में, नियुक्त/चयनित ठेकेदार, ट्रायल रन अवधि सहित प्रचालन की तारीख के पहले रखा जाएगा। ओएंडएम कार्यकलाप आरंभ कर देगा और इसे 10 वर्षों तक जारी जाएगा। ओएंडएम अवधि के बाद, ग्राम पंचायत संयंत्रों के प्रचालन एंव अनुरक्षण (ओएंडएम) का कार्य अपने हाथ में लेगी और आरंभ करेगी। सूचना, शिक्षा एवं संप्रेषण (आईईसी) कार्यकलाप: आर्सेनिक एंव प्लोराइड पर विस्तृत जागरूकता अभियान ग्राम पंचायत स्तर पर आयोजित किया जाना चाहिए। स्कीम कार्यान्वयन इंजीनियरों को प्रौद्योगिकी/प्रशिक्षण/प्राविधि और क्रियाविधि समझाने के लिए विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं में आवधिक कार्यशाला आयोजित की जानी चाहिए। इस कार्यक्रम के द्वारा राज्यों और सामुदायिक संगठनों को शामिल करते हुए विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण को अपनाने के साथ-साथ पोतेबिलिटी, पर्याप्तता, सुविधा, सामर्थ्य और समता के रूप में स्थाई आधार पर जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है। स्त्रोत: पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय, भारत सरकार