चरखा और खादी-विज्ञान की महत्ता बीसवीं सदी के प्रारंभ में गाँधीजी ने अपने ‘हिन्द स्वराज’ में ‘मानव कल्याण’ एवं ‘स्वरोजगार’ की भावी योजना बनायी थी। इसमें उनहोंने पश्चिमी भौतिकवादी सभ्यता को बुलंदी से ललकारा था और मानवीय मूल्यों पर आधारित पुनर्निर्माण का कार्यक्रम प्रस्तुत किया था। इसमें उन्होंने व्यक्ति और समाज के निर्माण, रचना, परिवर्तन एवं संघर्ष की तकनीक दी थी। गाँधी की इसी तकनीक ने खादी, ग्रामदान, भूदान आदि कई रचनात्मक कार्यक्रमों को जन्म दिया। चरखा और खादी-विज्ञान गाँधीजी की मौलिक उपज है। यह सही है कि राष्ट्रीय स्तर पर गाँधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम का प्रयोग नहीं हुआ, फिर भी कागज पर जनता की चेतना में वह जीवित है। विनोबा और जे.पी. के दो बड़े आन्दोलन हुए जिनके अनुभव मौजूद हैं। स्वयं आन्दोलन से पैदा होने वाली समस्याओं का सही समाधान भी आन्दोलन नहीं ढूंढ सका और फिर आन्दोलन अपने ही कारणों से सूख गया। फिर भी, देश भर में रचनात्मक कार्य के रूप में कुछ प्रवृत्तियाँ आज भी चल रही हैं जिनकी सम्भावनाएं आंकी जा सकती हैं यदपि वे इस समय जिसतरह से चल रही है उनमें मूल विचार की झलक या दिशा नहीं है। खादी जीवन – दर्शन है खादी-विज्ञान का सम्पूर्ण दर्शन बापू एक छोटे से वाक्य में छोड़ गये हैं – ‘कातो, समझ-बुझकर कातो, जो कातें वे पहनें और जो पहनें वे अवश्य कातें!’ जब बापू ने यह विज्ञान दिया, तो हमने इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया। हमने यह नहीं समझा कि खादी मिल के कपड़े के स्थान पर हाथ का बना कपड़ा मात्र नहीं है; बल्कि यह जीवन-दर्शन है। प्रारम्भ में खादी देश के सामने स्वदेशी-धर्म के रूप में आया। बाद में विदेशी कपड़े के बहिष्कार के साधन के रूप में। कालान्तर में करोड़ों बेकार, अध्-भूखे लोगों के राहत के रूप में। वस्त्र स्वावलम्बन की बात तो उसमें थी ही। झारखंड में खादी ग्रामोद्योग विज्ञान का गौरवमय इतिहास रहा है। जिस समय जमशेदजी नसरवानजी टाटा (जे.एन. टाटा) लौह नगरी जमशेदपुर में लौहे और इस्पात का निर्माण कार्य में तल्लीन थे उसी समय इस लौह नगरी में भारत के भावी प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद खादी-विज्ञान का प्रचार-प्रसार कर रहे थे। टाना भगत समुदाय ने खादी को आत्मसात किया छोटानागपुर का ‘टाना भगत समुदाय’ गाँधीजी के खद्दर (खादी) विज्ञान से प्रभावित था और यह समुदाय आज भी खादी-विज्ञान को आत्मसात कर जीवन जी रहे हैं। इसी प्रकार झारखंड का चिक-बड़ाईक आदिवासी समुदाय गाँधीजी के मार्ग पर चलकर स्वदेशी जीवन जी रहे हैं। जैसे-जैसे राष्ट्रीय आन्दोलन बढ़ा, वैसे-वैसे एक राष्ट्रीय झंडे की जरूरत महसूस होने लगी। झंडा कैसा हो, इस विषय में सूचनाएँ आने लगीं। प्रतीक के तौर पर हिन्दुओं के लिए लाल, मुसलमानों के लिए हरा और दूसरी सब जमातों के लिए सफेद, इस प्रकार तीन रंगों का खादी के कपड़े का झंडा बनाना तय हुआ। सन 1929 के अप्रैल महीने में चरखा चिन्ह्नांकित तिरंगी झंडे का उदय हुआ। झंडे में खादी और चरखे के आने के कारण भी खादी-विज्ञान को काफी बढ़ावा मिला। राष्ट्रीय झंडा 1921 से खादी का ही बनता रहा और चरखा-संघ द्वारा उसे बनाने व बेचने का काम होता रहा। आजादी के बाद झंडा केवल जनता तक न रह कर वह सरकार के अधिकार-क्षेत्र में चला गया। झारखण्ड में – यह कार्य झारखण्ड राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के मार्गदर्शन में होता रहा। स्वरोजगार हेतु भावी योजना का निर्माण करें झारखंड, भारत का 28वां संधीय गणतन्त्र राज्य है। झारखंड की कुल आबादी (3.29 करोड़, 2011) का 64 प्रतिशत कार्यशील मानवशक्ति कोष 15-59 उम्र-वर्ग की श्रेणी में आते है। इसमें से 54 प्रतिशत की आबादी 25 वर्ष की नीचे की बतायी जाती है। अर्थात झारखंड राज्य को 1.75 करोड़ युवकों/युवतियों के लिए स्वरोजगार हेतु भावी योजना का निर्माण कर उसके क्रियान्वयन की जरूरत है। बेकारी की समस्या किस हद तक दूर करने में खादी ग्रामोद्योग समर्थ हो सकता है, यह प्रश्न जिज्ञासा के रूप में सामने आता है। ऊपर हमने जो विचार व्यक्त किए है, उस संदर्भ में हमारी मान्यता है कि खादी और ग्रामोद्योग आर्थिक क्षेत्र में एक सार्वभौम भूमिका अदा कर सकता है। इसका कुछ सक्रिय प्रयोग संस्थागत खादी ग्रामोद्योग के तत्वावधान में झारखंड के कुछ सघन क्षेत्रों में किया गया है, जिसका परिणाम आर्थिकी एवं सामाजिक दृष्टि से प्रेरक सिद्ध हुआ है लेकिन कई अनिवार्य कारणों एवं परिस्थितियों के कारण उस दिशा में सातत्य नहीं बरता जा सका जिस कारण आगे की प्रगति अवरुद्ध हो गई। समाज, संस्थागत खादी संस्थाएँ, और झारखण्ड राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड की तरफ से योजनाबद्ध कार्यक्रम अगर अपनाये जाएँ तो विश्वासपूर्वक यह कहने में कोई हिचक नहीं होगी कि खादी और ग्रामोद्योग में वह शक्ति एवं संभावनाएँ मौजूद हैं जो लोगों को काम तो दे ही सकता है, साथ ही ऐसा समाज बनाने में काफी सहायक भी सिद्ध हो सकता है, जिस समाज की कल्पना गाँधी जी ने की थी और जिसकी आवश्यकता आज भी हमारे अर्थशास्त्री, समाज-वैज्ञानिक और सरकार में बैठे राजनेता महसूस करते हैं। काश, हम अपने द्रष्टा स्व. नेता पूज्य बापू की सनक को सही रूप में समझ पाते। लेखक: प्रो. (डॉ.) अनिरुद्ध प्रसाद, जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची