<div id="MiddleColumn_internal"> <h3>परिचय</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-right" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/social-welfare/91794d93093e92e940923-91793094092c940-90992894d92e942932928/90692f93593094d92694d927915-91792493f93593f92793f92f93e901/silk1.jpg" width="248" height="172" /></p> <p style="text-align: justify;">रेशम एक मूल्यवान वस्त्र है, जिसका सौन्दर्य पहनने वाला ही महसूस कर सकता है। यह अहसास ही रेशम के मूल्यवान होने का कारण भी है। रेशम और उससे बनने वाले उत्पाद अपने ऊँचे मूल्य के कारण अपने निर्मंताओं के लिए आय के अच्छे स्रोत होते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">भूमिका</h3> <p style="text-align: justify;">एक लाभदायक रोजगार है रेशम उत्पाद के लिए ऐसी सिंचित भूमि होना आवश्यक है जिस पर शहतूत के पौधों को रोपती किया जा सके। एक उद्यमी के लिए लगभग डेढ़ एकड़ रकबा काफी है।</p> <p style="text-align: justify;">शहतूत के पौधों की खासियत यही है कि इन्हें कहीं भी लगाया जा सकता है। इन पौधों को न तो किसी विशेष किस्म की मिट्टी की जरूरत होती है न ही कुछ विशेष आबोहवा की।</p> <p style="text-align: justify;">इस पेड़ की पत्तियाँ रेशम के कीड़ों का मुख्य भोजन होती है। शहतूत में यह पत्तियाँ एक निश्चित अनुपात में निरंतर उगती रहती है अत: कीड़ों के लिए भोजन की कोई समस्या नहीं रहती है।</p> <p style="text-align: justify;">रेशम उत्पादन-औसतन 1000 कि. ग्रा. फ्रेश कोकून सुखाने पर 400 कि. ग्रा. के लगभग रह जाता है जिसमें से 385 कि. ग्रा. में प्यूपा 230 कि. ग्रा. रहता है और शेष 155 कि. ग्रा. शेल रहता है। इस 230 कि.ग्रा. प्यूपा में से लगभग 120 कि. ग्रा. कच्चा रेशम तथा 35 कि.ग्रा. सिल्क वेस्ट प्राप्त होता है।</p> <p style="text-align: justify;">इस कच्चे रेशम से रेशम को चरखे/तकली द्वारा रोल किया जाता है जिसे रीलिंग कहते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">रेशम तभी बिक्री योग्य होता है, जब उसको कपड़े के रूप में बुन लिया जाए। बुनाई हेतु कई साधन आजकल प्रचलन में है फिर भी हथकरघा पर बने हुए रेशम का अच्छा बाजार मूल्य मिलता है। कुछ हथकरघा जैसे सेवाग्राम करघा, नेपाली करघा, चितरंजन करघा आदि प्रमुखता से उपयोग किये जाते हैं। हथकरघा आदि के लिए उद्यमी अपने क्षेत्र के प्रबंधक खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड से परामर्श ले सकते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">रेशम उत्पादन हेतु सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनायें</h3> <p style="text-align: justify;">इस भाग में सरकार के रेशम उत्पादन विभाग द्वारा चलायी जा रही अनेक योजनाओं का उल्लेख किया गया है।</p> <h4>कल्पवृक्ष सामान्य विस्तार</h4> <p style="text-align: justify;">इस योजना का मुख्य उद्देश्य रेशम कृमि पालन कार्य द्वारा सभी वर्गों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध करवाना जिसमें कृषकों की स्वयं की एक एकड़/आधा एकड़ सिंचित भूमि में शहतूती पौध रोपण कराया जाता है तथा कृमिपालन के लिए समस्त तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण दिया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">वर्तमान में ग्वालियर, भिंड और दतिया को छोड़कर सम्पूर्ण प्रदेश योजना का कार्य क्षेत्र है।</p> <p style="text-align: justify;">योजनांतर्गत लाभार्थी का चयन रेशम विभाग के अधिकारीयों के सहयोग से स्थानीय पंचायत करती है। चयनित लाभार्थी को ट्रायसेम योजना के कृमिपालन के लिए पूर्ण तकनीकी मार्गदर्शन और रेशम कृमि के अंडे उपलब्ध कराये जाते हैं। साथ ही शहतूत पौधारोपित क्षेत्र के संधारण के लिए नाबार्ड द्वारा स्वीकृत पैकेज की राशि का ऋण बैंकों के माध्यम से उपलब्ध कराये जाने के लिए आवश्यक सहयोग दिया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">उत्पादित कोकून को गुणवत्ता के आधार पर खरीद लिया जाता है। इस हेतु “ मध्यप्रदेश स्टेट सेरीकल्चर डेवलपमेंट एंड ट्रेडिंग को –ऑपरेटिव फेडरेशन का गठन किया गया है जिसका मुख्य उद्देश्य सहकारिता के माध्यम से रेशम उत्पादकों का आर्थिक उन्नयन करना है। यह संस्था म.प्र. सिल्क फेडरेशन के नाम से भी जानी जाती है। यह कोकून उत्पादन, धागाकरण व वस्त्र निर्माण का मूल्य प्राप्त करने हेतु विपणन आदि की व्यवस्था करती है।</p> <h4>मलबरी स्वावलंबन योजना</h4> <p style="text-align: justify;">इस योजना के अंतर्गत रेशमा संचालनालय द्वारा पूर्व में चलाए जा रहे रेशम केन्द्रों में उपलब्ध शहतूत पौधारोपण में से एक एकड़ क्षेत्र का भागीदारी रेशम कृषकों को दिया जाता है ताकि उनमें स्वरोजगार की भावना जागृत हो। इसके साथ ही इन लाभार्थियों को केंद्र पर उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं का उपयोग करने की स्वतंत्रता दी गयी है तथा आवर्ती व्यय की पूर्ति के लिए राशि रू. 6,200 प्रति व्यक्ति/ लाभार्थी प्रति एकड़ की दर से चक्रीय राशि उपलब्ध कराई जाती है ताकि खाद इत्यादि कार्य करने के लिए उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।</p> <p style="text-align: justify;">वर्तमान में प्रदेश के 3 जिले –ग्वालियर, भिंड और दतिया को छोड़कर सम्पूर्ण प्रदेश योजन का कार्यक्षेत्र है। योजना के क्रियान्वयन के साथ यह शर्त भी है कि जिन जिलों में शासकीय रेशम केंद्र पर लाभार्थी उत्पादन का काम पूरी रुचि और लगन से नहीं कर रहे हैं, उनके स्थान पर अन्य इच्छुक लोगों को बदला जा सकेगा।</p> <h4>अन्य योजनाएँ</h4> <p style="text-align: justify;">इसके अतिरिक्त अन्य योजनाएँ भी शासन द्वारा चलायी जा रही हैं जैसे –</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>मलबरी रेशम विकास एवं विस्तार कार्यक्रम</li> <li>रेशम विकास एवं विस्तार कार्यक्रम</li> <li>विदिशा इनोवेटिव योजना (सिरोंज/लहेरी)</li> <li>राजगढ़ रेशम परियोजना</li> <li>विदिशा रेशम परियोजना (नटेरन)</li> </ul> <h3>रेशम उत्पाद बिक्री एवं विपणन</h3> <p style="text-align: justify;">रेशम के बेहतर विपणन हेतु आवश्यक है कि रेशम में बेहतरीन चमक, मुलायामपन और लचीलापन हो इसलिए रेशम का धागा बुनने हेतु तकली/चरखा श्रेष्ठ है क्योंकी इनसे बुनाई करने के लिए कोकून केक को नाम करना पड़ता है जिससे रेशम में उपरोक्त गुण उत्पन्न होते हैं। वस्त्र बाजार में रेशम अपनी मांग के अनुरूप उत्पादित नहीं हो पाता है, इसलिए रेशम का बाजार मूल्य काफी ऊँचा रहता है। साथ ही रेशमी उत्पाद का विदेशों में भी अच्छा बाजार होने से निर्यात के संभावनाएं काफी उज्ज्वल है।</p> <p style="text-align: justify;">स्रोत : जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची।</p> </div>