मुस्लिम विवाह मुस्लिम विवाह(निकाह) मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) के तहत होता है । शिया और सु्न्नी समुदायों के लिए कई प्रावधान अलग-अलग हैं । मुस्लिम विवाह में यह जरुरी है कि एक पक्ष विवाह का प्रस्ताव रखे और दूसरा उसे स्वीकार करे।(इजब व कबूल)प्रस्ताव और स्वीकृति लिखित और मौखिक दोनों दी जा सकती है ।हनफी विचारधारा के मुताबिक सुन्नी मुस्लिमों में दो मुसलमान गवाहों(दो पुरुष या एक पुरुष और दो महिलाएं) की मौजूदगी में होना जरुरी है ।मुस्लिम विवाह की वैधता के लिए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है ।कोई पुरुष अथवा महिला 15 वर्ष की उम्र होने पर विवाह कर सकते हैं ।15 साल से कम उम्र का पुरुष या महिला निकाह नहीं कर सकते हैं।हालांकि उसका अभिभावक (पिता या दादा अथवा पिता का रिश्तेदार, ऐसा संभव नहीं होने पर मां या मां के पक्ष का रिश्तेदार) उसकी शादी करा सकता है । लेकिन बाल विवाह होने की वजह से यह कानूनी रुप से दंडनीय है।लड़की का निकाह यदि 15 साल से कम उम्र में उसके पिता अथवा दादा के अलावा अन्य किसी ने काराया हो तो वह उस निकाह से इनकार कर सकती है कि इसके बाद उसके पति के साथ संभोग नहीं हुआ है । सुन्नी मुसलमान पुरुष का दूसरे धर्म की महिला से विवाह पर पाबंदी है । लेकिन सु्न्नी पुरुष यहूदी अथवा ईसाई महिला से विवाह कर सकता है ।मुसलमान महिला गैर मुसलमान से निकाह नहीं कर सकती ।शिया मुसलमान गैर- मुस्लिम महिला से अस्थाई ढंग से विवाह कर सकता है । जिसे मुक्ता कहते हैं ।शिया महिला गैर मुसलमान पुरुष से किसी भी ढंग से विवाह नहीं कर सकती है ।वर्जित नजदीकी रिश्तों में निकाह नहीं हो सकता है । मुस्लिम पुरुष 1। अपनी मां या दादी से 2। अपनी बेटी या पोती से 3।अपनी बहन से 4।अपनी भांजी,भतीजी या भाई अथवा पोती या नातिन से 5।अपनी बुआ या चाची या पिता की बुआ चाची से 6।मुंह बोली मां या बेटी से 7।अपनी पत्नी के पूर्वज या वंश से शादी नहीं कर सकता है ।कुछ शर्तें पूरी नहीं होने पर मुस्लिम विवाह अनियमित माना जाता है । इसे बाद में नियमित अथवा समाप्त किया जा सकता है पर यह अपने आप रद्द नहीं हो जाता है ।स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत मुसलमान व गैर मुसलमान में विवाह हो सकता है ।एक मुसलमान की चार पत्नियां हो सकती हैं । यह कानूनी स्थिति है। साथ ही धार्मिक आदेश है कि पति को सभी पत्नियों के साथ एक सा व्यवहार करना होगा और यदि यह संभव नहीं है तो उसे एक से अधिक पत्नी नहीं रखनी चाहिए।मुसलमान महिला के एक से अधिक पति नहीं हो सकते हैं ।चाइल्ड मैरिज रेस्ट्रेन एक्ट 1929 के अंतर्गत 21 वर्ष से कम आयु के लड़के तथा 18 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह संपन्न कराना अपराध है , इस निषेध के भंग होने का विवाह की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं है। मुस्लिम विवाह में तलाक तलाक देने की दो विधियां तलाक-ए-सुन्ना(मान्य विधि) - अहसन पद्धति में पति दो ऋतुकालों (माहवारी के बीच) की अवधि तुहर के बीच एक बार तलाक देता है और इद्दत (तलाक के बाद के करीब तीन महीनों की अवधि) में पत्नी से संभोग भी नहीं करता, तो इद्दत की अवधि खत्म होने पर तलाक हो जाता है ।हसन पद्धति में पति तीन तुहरों के दौरान तीन बार तलाक देने के अपने इरादे की घोषणा करता है और पत्नी से संभोग भी नहीं करता , तीसरी बार तलाक कहने पर विवाह विच्छेद हो जाता है । तलाक-उल-बिद्दत(अमान्य विधि) - तलाक- उल- बिद्धत में पति एक ही तुहर में एक वाक्य कहता है कि मैं तुम्हें तीन बार तलाक देता हूं या तीन बार (तीन बार मैं तुम्हें तलाक देता हूं ) अलग-अलग भी कह सकता है ।अगर पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे को तलाक देने को राजी हो जाएं , तो वह तलाक मान्य होगा। ऐसे तलाक के लिए दो शर्तें पूरी होनी जरुरी हैं – पहला दोनों तलाक के लिए राजी हों और दूसरा धन या जाएदाद के रुप में पत्नी को कुछ जरुर दें ।मुस्लिम पति अपनी पत्नी को तीन बार तलाक कहकर उससे तलाक ले सकता है ।जबकि शिया कानून में तलाक दो गवाहों की मौजूदगी में कहा जाना चाहिए।मुस्लिम पुरुष तलाकनामा लिखकर भी पत्नी को तलाक दे सकता है ।मुस्लिम पुरुष अदालत में मुकदमा दर्ज करके भी तलाक हासिल कर सकता है ।रचनात्मक तलाक-‘इला’ में पति कम से कम चार महीनों तक शारीरिक संभोग न करने की शपथ लेता है और जब शपथ पूरी हो जाती है तो इसे तलाक माना जाता है ।रचनात्मक तलाक-‘जिहर’ में पति पत्नी की तुलना विवाह के लिए वर्जित श्रेणी की किसी स्त्री से करता है (जे पत्नी की तुलना मां से करना) पति की ऐसी उद्घोषणा के बाद , पत्नी को अदालती तलाक का हक मिल जाता है , अगर वह प्रायश्चित नहीं करता है ।मुसलामान पुरुष द्वारा धर्म बदलते ही उसकी पिछली शादी तुरंत समाप्त हो जाती है ।यदि तीन बार तलाक कहने से तलाक हुआ हो तो पति उसी महिला से तब तक दोबारा शादी नहीं कर सकता जब तक वह महिला किसी दूसरे पुरुष विवाह न करे और वह दूसरा पुरुष उस महिला को तलाक न दे या मर न जाए।मुस्लिम पत्नी पति की रजामंदी से तलाक हासिल कर सकती है ।मुस्लिम पत्नी कुछ प्रतिफल के बदले भी तलाक हासिल कर सकती है ।भविष्य में किसी घटना के होने या न होने की स्थिति में भी दंपति तलाक के लिए रजामंद हो सकते हैं ।खुला’ (पत्नी की ओर से तलाक) के द्वारा मुस्लिम पत्नी अपने पति को तलाक दे सकती है , इसके लिए शर्त यह है कि पत्नी को पति से जो मेहर (इवद) मिली है वह उसे लौटा दे ।’मुबारात’ पति या पत्नी की ओर से तलाक दिया जा सकता है ।डिस्योलूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939 के तहत मुस्लिम पत्नी किसी भी उचित न्यायालय में तलाक के लिए पति पर मुकदमा चला सकती है ।मुस्लिम विवाह -विच्छेद अधिनियम 1939 के मुताबिक मुसलमान पत्नी नौ वजहों से अपने पति को तलाक दे सकती है। यदि उसका पति चार साल से लापता हो, दो साल से उसका भरण पोषण नहीं कर रहा हो, सात साल से जेल की सजा काट रहा हो, तीन साल से वैवाहिक दायित्व नहीं निभा रहा हो, नपुंसक हो, पागल हो, कुष्ठ रोग या रतिजन्य रोगों से ग्रस्त हो, क्रूरता का व्यवहार करता हो नाबालिग (पंद्रह साल से कम उम्र) अवस्था में शादीशुदा स्त्री बालिग होने पर शादी को अस्वीकार कर दे मुस्लिम कानून के तहत पत्नी को सुलभ अन्य आधार।मु्स्लिम महिला के धर्म बदलने से उसका विवाह समाप्त नहीं होता है ।तलाक के बाद पति या पत्नी दूसरा विवाह कर सकते हैं। तलाक के बाद भरण-पोषण तलाक के बाद , मुस्लिम कानून के तहत पति को पत्नी की इद्दत के समय तक उसका भरण-पोषण करना होता है। क्या उचित है तलाक की यह प्रक्रिया ? क्या महज तीन बार तलाक शब्द के उच्चारण के साथ ही जीवनभर का बंधन टूट जाता है? क्या इस्लाम में महिलाओं का दर्जा दोयम है? शायद इसीलिए पुरुष को तो मनमानी का अधिकार है और महिलाओं का जीवन और भविष्य उनकी जुबान से तीन बार निकलने वाले इस कड़वे शब्द पर ही निर्भर है। जब सऊदी अरब और पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों में इस पर पाबंदी लगा दी गई है तो भारत जैसे धर्मनिरपपेक्ष देश में इसे जारी रखने की क्या तुक है? इस मुद्दे पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और सुप्रीम कोर्ट की तकरार के बाद पूरे देश के साथ पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर इलाके में भी उक्त सवालों पर बहस शुरू हो गई है। इस मुद्दे पर मुस्लिम समाज बंटता नजर आ रहा है। ज्यादातर मौलाना, उलेमा और अल्पसंख्यक संगठन तीन बार बोल कर तलाक देने की प्रथा को जारी रखने के पक्ष में हैं तो महिलाएं और उनके हितों के लिए काम करने वाले संगठन इस प्रथा को पक्षपातपूर्ण करार देते हुए इसके खात्मे के पक्ष में। यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि जम्मू-कश्मीर के बाद मुस्लिमों की आबादी के मामले में असम और पश्चिम बंगाल का स्थान आता है। असम की आबादी में लगभग 34 फीसदी मुस्लिम हैं तो बंगाल में 30 फीसदी। एक गैर-सरकारी संगठन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की ओर से हाल में किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि इस तबके की 92.1 फीसदी महिलाएं तीन बार बोल कर तलाक की इस प्रथा पर पाबंदी के पक्ष में हैं। देश के 10 राज्यों में किए गए इस अध्ययन में शामिल ज्यादातर महिलाएं आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े तबके की थी। उनमें से लगभग आधी महिलाओं का विवाह 18 साल की उम्र से पहले हो गया था और उनको घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ा था। इस अध्ययन में महाराष्ट्र, बिहार और झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल की महिलाएं भी शामिल थीं। अब तो ईमेल, स्काईप, मोबाइल मैसेज और व्हाट्सऐप जैसे सोशल प्लेटफॉर्म के जरिए भी कोई भी पति तीन बार तलाक लिख कर अपनी पत्नी से नाता तोड़ सकता है। ईसाईयों का विवाह भारत में ईसाई विवाह भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक संपन्न होते हैं । ईसाई विवाह पादरी अथवा मिनिस्टर अथवा चर्च द्वारा नियुक्त व्यक्ति अथवा विवाह रजिस्ट्रार द्वारा संपन्न करवाया जाता है ।इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872 के तहत ईसाई किसी गैर-ईसाई से विवाह कर सकती या सकता है । ईसाई विवाह की शर्तें इन शर्तों का पालन नहीं करने पर विवाह रद्द माना जायेगा।वर और वधू में से किसी का भी पहले से जीवित पत्नी या पति न हो।उनका विवाह ऐसा न हो जिनमें विवाह वर्जित हो ।दोनों में कोई भी पागल, मूर्ख या नपुंसक न हो। ईसाई विवाह में तलाक ईसाई तलाक कानून में पति या पत्नी में से कोई भी तलाक के लिए याचिका दाखिल कर सकता है ।पति और पत्नी दो साल तक अलग रहने के बाद आपसी रजामंदी से भी तलाक ले सकते हैं ।व्यभिचार, क्रूरता अथवा दो साल तक छोड़ देने, दूसरी महिला से विवाह तथा धर्म- परिवार्तन अथवा वर्जित रिश्तों में शारीरिक संबंध या बलात्कार या अप्राकृतिक यौन व्यवहार के आधार पर महिला तलाक मांग सकती है ।जिस महिला के साथ क्रूरता हुई है या जिसे छोड़ा गया है , उसे तलाक के लिए पति द्वारा व्यभिचार भी सिद्ध करना होगा।पति व्यभिचार के आधार पर पत्नी से तलाक के लिए अदालत में जा सकता है ।पत्नी भी , पति द्वारा दूसरी महिला से विवाह कर लेने और व्यभिचार के आधार पर तलाक का मुकदमा कर सकती हैतलाक की पहले अस्थायी डिक्री मिलती है । स्थायी डिक्री के लिए आवेदक को 6 महीने बाद अदालत से फिर आग्रह करना होगा। पारसी विवाह पारसी विवाह दो पुरोहितों द्वारा दो गवाहों की मौजूदगी में ‘आशीर्वाद’ की रस्म पूरी होने से संपन्न होता है ।विवाह का प्रमाणपत्र जारी किया जाता है , जिस पर वर, वधू , पुरोहित तथा गवाहों के हस्ताक्षर होते हैं ।पुरोहितों का यह दायित्व है कि विवाह को विवाह रजिस्ट्रार के पास पंजीकृत कराएं ।यह विवाह तभी विधिमान्य होगा यदि 1। वर या वधू में से किसी का भी पहले से कोई पत्नी या पति न हो। 2। उनका रिश्ता ऐसा न हो कि विवाह वर्जित हो।अगर वर या वधू में से कोई भी 21 वर्ष से कम उम्र का हो तो विवाह से पहले उसके माता-पिता अथवा अभिभावक से सहमति लेना जरुरी है । कम उम्र वाले वर या वधू की ओर से माता-पिता अथवा अभिभावक को विवाह प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर करने होते हैं। विवाह के बाद तलाक पारसी विवाह विच्छेद इन कारणों से किया जा सकता है: विवाह के बाद भी एक साल तक संभोग से इनकार करना पागलपन विवाह पूर्व गर्भाधारण व्यभिचार, बलात्कार, पूर्व पति या पत्नी का जीवित होना या अप्राकृतिक अपराध शिकायत करने वाले पक्ष को गंभीर चोट पहुंचाना , यौन-रोग लगना या पत्नी को वेश्यावृत्ति के लिए विवश करना सात साल की सजा होना तीन सालों तक पति या पत्नी एक-दूसरे से दूर रहें दांपत्य संबंधों को फिर से स्थापित करने के अदालती आदेश को न मानना और धर्म परिवर्तन की वजह से विवाह विच्छेद हो सकता है ।विवाह के निष्प्रभावी होने , टूटने , अलगाव अथवा तलाक का मुकदमा पारसी वैवाहिक अदालत में किया जा सकता है । मुंबई, कोलकाता , चेन्नई तथा कुछ अन्य शहरों में ऐसी अदालतें हैं । स्त्रोत: अल्पसंख्यक कार्यों के मंत्रालय, भारत सरकार