सामाजिक समानता जाति प्रथा, भारतीय समाज के लिए अभिशाप है। जाति प्रथा भारतीय समाज को साम्प्रदायिक समूहों एवं श्रेणियों में बांटती है। संस्कृति एवं सभ्यता के विकास के बावज़ूद जाति प्रथा अब भी हमारे समाज में एक प्रबल भूमिका निभाती है। अनुसूचित जातियां एवं अनुसूचित जनजातियां (SC/ST) शब्द, अस्पृश्यों एवं जनजातियों की पहचान के लिए सरकारी दस्तावेज़ों में प्रयुक्त किए जाने वाले आधिकारिक शब्द हैं। लेकिन 2008 में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने "दलित" शब्द के स्थान पर आधिकारिक रूप से "अनुसूचित जाति" शब्द का इस्तेमाल कर रहा है है। साथ ही, उसने राज्य सरकारों को सरकारी दस्तावेज़ों में वर्णित ‘दलित’ शब्द हटाकर तथा उसके स्थान पर "अनुसूचित जाति" शब्द इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया। जाति प्रथा कि जड़ें प्राचीन काल तक जाती हैं। जबकि एक नज़रिया उनके मूल के आधार पर जातियों में उच्च एवं निम्न का भेदभाव करती है, दूसरा नज़रिया जातियों के मूल को वामों तक ले जाता है जो जाति प्रथा को कार्यों के आधार पर वर्गीकृत करता है। तब से यह पाया गया था कि समुदाय में दबंग हिस्से के लोगों द्वारा वर्चस्व के आधार पर अनुचित लाभ उठाया जा रहा था, जिसके फलस्वरूप समुदाय के कमज़ोर हिस्सों को भेदभाव एवं शोषण का शिकार होना पड़ रहा था। अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लोग, जिन्हें ‘अस्पृश्य’ कहा जाता है, भारत की जनसंख्या का छठा भाग अर्थात् 16 करोड़ हैं, जो भेदभाव के शिकार हैं। प्रथा के नकारात्मक रूप अस्पृश्यता कई ग्रामीणों को जाति के आधार पर समाज से अलग किये गये हैं तथा वे ऊंची जाति द्वारा खींची गई बंटवारे की रेखा को पार नहीं कर सकते। वे उन कुओं से पानी नहीं ले सकते या उन दुकानों पर चाय नहीं पी सकते जहां ऊंची जाति के लोग जाते हों। भेदभाव निचले जाति के रिहाइशी इलाकों में अक्सर बिजली, शौचालयों या पानी के पम्पों की सुविधा नहीं होती। उन्हें ऊंची जाति के लोगों के समान बेहतर शिक्षा, घर एवं चिकित्सा सुविधाओं की सुगमता की सुविधा नहीं होती। मज़दूरी का विभाजन वे कुछ पेशों तक सीमित हैं जैसे साफ-सफाई, रोपाई, चर्मकारी, सड़कों की सफाई आदि। गुलामी कर्ज़, परम्पराओं आदि के नाम पर पीढ़ियों से उनसे मज़दूर की तरह या निम्न कोटि के कार्य कराकर उनका शोषण किया जाता है। भारत सरकार ने अस्पृश्यता समाप्त करने के लिए कानून बनाए हैं तथा समाज के कमज़ोर हिस्सों के जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिए कई सुधार लाए हैं। उनमें से कुछ हैं : संवैधानिक रूप से मूल मानव अधिकारों की गारंटी 1950 में अस्पृश्यता की समाप्ति अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों पर रोक) कानून, 1989 शैक्षणिक संस्थाओं, रोज़गार के अवसरों आदि में आरक्षण का प्रावधान समाज कल्याण विभागों तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के कल्याण हेतु राष्ट्रीय आयोगों की स्थापना सरकार द्वारा उठाए गए इन कदमों ने समाज के कमज़ोर हिस्सों को कुछ हद तक राहत दी है। शहरी क्षेत्रों ने अच्छे असर तथा कुछ बेहतरी दिखाए हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अभी भी अत्यधिक भेदभाव का सामना करते हैं। जातिगत आधार पर तथा संविधान में निहित भावनाओं के अनुसार भेदभाव समाप्ति तथा उन्मूलन के लक्ष्य हासिल करने के लिए अभी भी हमें एक लम्बा रास्ता तय करना है। अब यह हमारे प्रयासों पर निर्भर करता है तथा हमारे रुख में बदलाव से लगातार बदलाव होना तय है, जिससे सभी के लिए बराबरी लाई जा सकेगी।