सूचना एवं तकनीक के युग में विज्ञापन हमारे जीवन के अभिन्न अंग बनते जा रहे हैं, इसके प्रभाव से बच पाना हम सभी के लिए काफी मुश्किल सा हो गया है। आज समाज का हर तबका चाहे बच्चे हों या फिर बुजुर्ग, कामकाजी महिलाएं हों या गृहणी। सभी पर विज्ञापनों का प्रभाव देखा जा सकता है। विज्ञापन हमारे जीवन पर गहरी छाप छोड़ते हैं। हमारा खान-पान, रहन-सहन सब कुछ विज्ञापनों से प्रभावित हो रहा है, यहां तक कि हमारे सोचने और व्यवहार के तरीके में भी विज्ञापनों की झलक साफ नजर आने लगी है। हम यह भी कह सकते हैं कि विज्ञापन समाज के दर्पण है जिस प्रकार का समाज होगा, विज्ञापन की कॉपी तैयार करते समय इसके संवाद, चित्र, विज्ञापित उत्पाद आदि उसी प्रकार के होंगे। यह कह पाना काफी कठिन है कि समाज की छाप विज्ञापनों में नजर आती है, कि विज्ञापनों की छाप समाज में दिखायी दे रही है। आम उपभोक्ताओं को यह जानना जरूरी है कि विज्ञापन क्या होते हैं, ये हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं और कब ये विज्ञापन भ्रामक हो जाते हैं। साथ ही यह भी जानना चाहिए की इन भ्रामक विज्ञापनों की रोकथाम या नियंत्रण के लिए देश में कौन-कौन से कानून हैं। इन सभी बातों की चर्चा इन अध्याय में की गयी है ताकि उपभोक्ता जागरूक हो सकें और उसके हितों की सुरक्षा हो सके। विज्ञापन वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रचार माध्यम होते हैं, लेकिन जब विज्ञापनकर्ताओं द्वारा जानबूझ कर मिथ्या प्रचार किए जाते हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता हैं, तब यह आपत्तिजनक हो जाता है। जब कोई उत्पादक अथवा विज्ञापनकर्ता किसी उत्पाद के बारे में कोई दावा करता है, तो उसको उसे सिद्ध भी करना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता है तो इसे भ्रामक विज्ञापन माना जाएगा तथा देश के विभिन्न कानूनों के तहत उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। विज्ञापनों के सम्बन्ध में अनुचित व्यवहार की श्रेणी में निम्नलिखित बातें आती हैं : किसी उत्पाद के सम्बन्ध में उसके विज्ञापन में कही गयी बात सिद्ध न हों। विशेष उत्पाद की खरीद पर मुफ्त उपहार की बात तभी सत्य हो सकती है, जब उस उपहार की कीमत उस वस्तु में न जोड़ी गयी हो, मुफ्त उपहार की कीमत वस्तु में जुड़ी होने पर अनुचित व्यवहार माना जाएगा। त्योहार विशेष पर पुराने उत्पादों से छुटकारा पाने के लिए विशेष छूट की घोषणा कर उत्पादों को बेचना। उत्पादों के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूचना छोटे व महीन अक्षरों में विज्ञापन के साथ नीचे छापना या दिखाना जो उपभोक्ता द्वारा ठीक से पढ़ा न जा सके। विज्ञापन कब भ्रामक हो जाते हैं? निम्नलिखित स्थितियों में किसी वस्तु या सेवा के संबंध में किए जा रहे विज्ञापन भ्रामक हो जाते हैं : जब किसी उत्पाद या सेवा के विज्ञापन में विषयवस्तु की प्रस्तुति गलत ढंग से की जाए। जब विज्ञापन उपभोक्ता की सूचना प्राप्ति के अधिकार का उल्लंघन कर रहा हो। उदाहरण के लिए,-खरीददारों में विश्वास जमाने के लिए नकली कागजात का प्रयोग किया जाना, भ्रामक मूल्यों का उल्लेख किया जाना, दूसरे उत्पादों के बारे में अपमानजनक रूप से भ्रम पैदा किया जाना, आदि। जिस विज्ञापन में उपभोक्ता के सुरक्षा का अधिकार का उल्लंघन हो रहा हो। उपभोक्ता के चयन या पसंद के अधिकार का उल्लंघन हो रहा हो। बच्चों को लक्ष्य करके ऐसे विज्ञापन प्रकाशित व प्रसारित किया जाना जिससे उनमें हिंसा की भावना बलवती हो। उत्पाद या सेवा को अतिरंजित करके विज्ञापित करना। प्रलोभन सम्बन्धी विज्ञापन । समाज व स्वास्थ्य के लिए हानिकारक उत्पादों का विज्ञापन करना। भ्रामक विज्ञापनों का प्रभाव भ्रामक विज्ञापन उपभोक्ता के सूचना, सुरक्षा और चयन के अधिकारों का हनन करते हैं। भ्रामक विज्ञापनों के प्रभाव में आकर उपभोक्ता कई बार ऐसी वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रयोग कर बैठता जो उसके स्वास्थ्य एवं जीवन के लिए घातक हो सकती हैं। इसकी वजह से उसे शारीरिक और मानसिक के साथ-साथ आर्थिक क्षति भी पहुंचाती है। विज्ञापनों में दिखाए जाने वाले दृश्यों का बच्चों के मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। विज्ञापनों में दिखाए जाने वाले हिंसक और उत्तेजक दृश्य बच्चों के दिमाग में इस तरह से बैठ जाते हैं, कि वह इसकी नकल करने लगते हैं। समाचार पत्रों एवं टेलीविजन में यदा-कदा हमें इस तरह के समाचार सुनने, देखने को मिलते हैं, कि फलां जगह पर बच्चे ने सुपर मैन की नकल करते हुए छत से छलांग लगा दी और अपनी जान गवां बैठा। अतः इस प्रकार के विज्ञापनों पर कड़ाई से रोक लगाने की जरूरत है। भ्रामक एवं मिथ्या विज्ञापनों की श्रेणियाँ भ्रामक एवं मिथ्या विज्ञापनों की मुखयतः दो श्रेणियाँ होती हैं। पहली श्रेणी में ऐसे विज्ञापन आते हैं जो उपभोक्ता के सूचना एवं चयन के अधिकार का हनन करते हैं और उनको आर्थिक हानि व मानसिक पीड़ा पहुंचाते हैं। वहीं कुछ विज्ञापन ऐसे होते हैं जो अनिश्चित चिकित्सा एवं औषधियों का प्रचार करते हैं अथवा झूठमूठ के स्वास्थ्य संबंधी उपकरणों को बेचने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार के विज्ञापन और अधिक खतरनाक व घातक होते हैं, भ्रामक एवं मिथ्या विज्ञापन की श्रेणियाँ ऐसे विज्ञापन जो अनिश्चित चिकित्सा एवं दवाओं का प्रचार करते हैं या गलत स्वास्थ्य सम्बन्धी उपकरणों को बेचने का प्रयास करते हैं। ऐसे विज्ञापन जो उपभोक्ता को सूचना एवं चुनाव के अधिकार से वंचित करके आर्थिक हानि व मानसिक पीड़ा पहुंचाते हैं। क्योंकि वे उपभोक्ता के स्वास्थ्य और शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले होते हैं। कई बार ऐसी औषधियों के सेवन से लोगों की जान तक चली जाती हैं। ऐसे विज्ञापन दूसरी श्रेणी के होते हैं। विज्ञापनों को नियंत्रित करने वाले नियम कानून एवं संहिताएँ भारत सरकार अनेक नियम, कानून, तथा संहिताओं के माध्यम से व्यापारिक गतिविधियों को नियंत्रित करने की कोशिश करती है। सरकार द्वारा बनाए गए कई नियम, कानून एवं संहिताएँ ऐसी हैं, जिनमें भारत में विज्ञापनों को नियंत्रित करने के प्रावधान हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश इनका ठीक से पालन नहीं हो पाने से भ्रामक विज्ञापनों पर पूरी तरह से रोक नहीं लग पा रही है। उपभोक्ताओं की जागरूकता के लिए यहां कुछ प्रमुख नियम, कानून एवं संहिताओं का विवरण दिया जा रहा है। जो निम्नलिखित हैं : भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 वस्तु बिक्री अधिनियम, 1930 दवा एवं कास्मेटिक अधिनियम, 1940 आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 खाद्य अप-मिश्रण उन्मूलन अधिनियम, 1955 ट्रेड तथा मार्केन्डाइज अधिनियम, 1958 माप-तौल मानक अधिनियम, 1976 कालाबाजारी अवरोधक एवं आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1980 एकाधिकार एवं अवरोधक व्यापार व्यवहार, (एमआरटीपी) अधिनियम, 1969 केबल, टेलीविजन, नेटवर्क नियंत्रण अधिनियम, 1995 औषधि एवं चमत्कारिक चिकित्सा अधिनियम, 1954 शिशु दुग्ध एवं शिशु आहार अधिनियम, 1992 कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 58 मोटर वाहन कानून, 1956 प्रतियोगिता अधिनियम, 2002 फूड सेफ्टी एण्ड स्टैंडर्ड एक्ट, 2006 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 इसके अतिरिक्त भी अनेक नियम, कानून एवं आचार संहिताएं भारत सरकार द्वारा बनायी गयी हैं जो उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा करती हैं। कुछ नियामक प्राधिकरण जिन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में विज्ञापनों पर नियंत्रण का अधिकार है भारतीय रिजर्व बैंक भारतीय चिकित्सा परिषद भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड भारतीय दूर संचार नियामक प्राधिकरण बीमा नियामन विकास प्राधिकरण भारतीय विज्ञापन मानक परिषद द्वारा आत्मनियंत्रण भारतीय विज्ञापन मानक परिषद, उत्पादकों विज्ञापन एजेंसियों एवं संचार माध्यमों की एक स्वयंसेवी संस्था है। मानक परिषद अपने सदस्यों को आत्मनियंत्रण का सुझाव देता है, उसका मानना है कि यदि आत्मनियंत्रण नहीं होगा तो कोई अन्य नियंत्रण करेगा। मानक परिषद द्वारा तैयार नियमावली के मूलभूत सिद्धान्त निम्नानुसार है : विज्ञापन के कथन में सत्य एवं ईमानदारी का समावेश करके भ्रामक प्रचार से बचाना। यह सुनिश्चित करना है कि विज्ञापन समाज की शालीनता की मान्यताओं को ठेस न पहुँचाए। ऐसे विज्ञापनों से बचाना जो समाज व व्यक्तियों के हितों के विपरीत हों व मानव मात्र को अमान्य हों। यह सुनिश्चित करना कि विज्ञापन व्यापार के प्रतियोगिता पक्ष का पालनकरें जिससे कि उपभोक्ता के चुनाव एवं विवेक में बाधक न बने तथा इस प्रतियोगिता से उत्पादकों एवं ग्राहकों दोनों को लाभ हो। कोई भी उपभोक्ता अथवा औद्योगिक संस्थान इस नियमावली का उल्लंघन करते हुए किसी अन्य संस्थान को देखे, तो इसकी शिकायत परिषद से कर सकता है। शिकायत प्राप्त होने पर परिषद, विज्ञापन देने वाली संस्था से दो सप्ताह के अन्दर जवाब मांग कर शिकायत प्रकोष्ठ के सम्मुख निर्णय हेतु प्रस्तुत करती है। यदि निर्धारित अवधि में विज्ञापन देने वाली संस्था की ओर से कोई जवाब न मिले तो परिषद को अधिकार है कि वह उस संस्था के खिलाफ एकतरफा निर्णय दे सकती है। आचार संहिता का उल्लंघन पाए जाने पर प्रकोष्ठ विज्ञापन हटाने या उसे बदलने हेतु कहता है और परिषद के सदस्य इस निर्णय को मानने के लिए बाध्य हैं। समय-समय पर परिषद स्वयं भी विज्ञापन करके लोगों को मिथ्या, भ्रामक तथा अनैतिक विज्ञापनों की शिकायत करने की प्रेरणा देती है। उपभोक्ता को भ्रामक विज्ञापनों से हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति दिलाने वाले कानून वैसे तो उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए अनेकों नियम, कानून एवं संहिताएं विद्यमान हैं। इनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। लेकिन इनमें शामिल दो ऐसे कानून हैं जो उपभोक्ताओं को मिथ्या एवं भ्रामक विज्ञापनों से होने वाली हानि के लिए क्षतिपूर्ति दिला सकते हैं। यह कानून निम्न हैं : एकाधिकार एवं अवरोधक व्यापार व्यवहार (एम. आर. टी. पी.)अधिनियम, 1969 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, १९८६ एकाधिकार एवं अवरोधक व्यापार व्यवहार अधिनियम,1969 इस अधिनियम को एकाधिकार एवं अवरोधक व्यापारिक पद्धतियों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था। 80 और 90 के दसक में इस अधिनियम का काफी प्रभाव था। सन् 1984 में अनुचित व्यापार पद्धतियों से संबंधित कुछ और प्रावधान इसमें जोड़ दिए गये। बाद में एक अन्य संशोधन में आर्थिक शक्ति के संचयन संबंधित एक भाग के कुछ प्रावधानों को वर्ष 1991 में हटा लिया गया। इसके बाद इस अधिनियम की शक्तियां काफी कम हो गयी। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम,1986 और भ्रामक विज्ञापन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 को उपभोक्ताओं के हितों को बेहतर तरीके से संरक्षित करने के लिए लागू किया गया है। यद्यपि इसके पहले भी अनेकों कानून देश में मौजूद थे, लेकिन कोई ऐसा कानून नहीं था जो उपभोक्ताओं को हुई हानि के लिए क्षतिपूर्ति दिलाए। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा तीन में प्रावधान किया गया है कि अधिनियम की विभिन्न व्यवस्थाएं तत्कालीन किसी कानून की व्यवस्थाओं के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उसकी पूरक हैं। इस अधिनियम की विशेषताओं एवं व्यवस्थाओं के बारे में पूर्व के अध्यायों में विस्तृत जानकारी दी जा चुकी है। अधिनियम में यह व्यवस्था दी गयी है कि यदि किसी भ्रामक विज्ञापन के प्रभाव से किसी उपभोक्ता को शारीरिक, मानसिक या आर्थिक क्षति पहुंची है तो वह उपभोक्ता न्यायालय में शिकायत दर्ज करा सकता है। उपभोक्ता अदालतें सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद पीड़ित को उचित मुआवजा दिला सकती हैं तथा ऐसे भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाने या इसे पुनः संशोधित कर विज्ञापित करने का आदेश भी दे सकती हैं। अधिनियम के अन्दर अनुचित व्यापारिक व्यवहार से संबंधित गतिविधियों पर रोक लगाने की शक्तियां विद्यमान हैं। उपभोक्ता अदालतों द्वारा निर्णित विभिन्न मामलों में यह बात स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं। अतः लोगों को चाहिए कि वे जागरूक उपभोक्ता की तरह ऐसे किसी भी गतिविधि या क्रियाकलापों के खिलाफ आवाज बुलंद करें जो आम उपभोक्ता के लिए घातक सिद्ध हो सकती हैं। वस्तु या सेवा में किसी प्रकार की खराबी या कमी होने पर पहले अपने स्तर पर उसे दूर करने की कोशिश करें और यदि ऐसा नहीं हो पाता है, तो उपभोक्ता न्यायालयों में इसकी शिकायत की जा सकती है। सुझाव उपभोक्ताओं को विज्ञापनों में कही जाने वाली बातों पर आँख मूंद कर विश्वास नहीं कर लेना चाहिए, उस विषय में पूरी जानकारी करने के बाद ही विज्ञापित वस्तु या सेवा का प्रयोग करना चाहिए। विज्ञापनों क स्वरूप मात्र से ही प्रभावित होना ठीक नहीं है। ऐसे झूठे विज्ञापनों के प्रति अन्य उपभोक्ताओं, उपभोक्ता समूहों तथा गैर सरकारी संस्थाओं का ध्यान आकर्षित कराना चाहिए ताकि उसके खिलाफ आवाज उठायी जा सके। अपने मुहल्ले, स्कूल अथवा कार्यालय में एक छोटा उपभोक्ता क्लब स्थापित करके भ्रामक विज्ञापन पर चर्चा किया जाना चाहिए तथा ऐसे मिथ्या और भ्रामक विज्ञापनों का संबंधित एजेंसियों से शिकायत करनी चाहिए। किसी दूरसंचार सेवा सम्बन्धी अनुचित विज्ञापनों की शिकायत भारतीय दूरसंचार नियामक आयोग से की जा सकती है। केबल टेलीविजन नेटवर्क अधिनियम का उल्लंघन करने वाले विज्ञापनों की शिकायत केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को की जा सकती है। भ्रामक विज्ञापनों की सूचना दिये गये पते पर दी जा सकती हैं। भारतीय विज्ञापन मानक परिषद,205, बॅाम्बे मार्केट, ताड़देव रोड,मुम्बई - 400034 स्त्रोत: भारतीय लोक प्रशासन संस्थान,नई दिल्ली।