परिचय रोजाना जिदंगी में कई लोग कहते सुने जाते हैं कि अमुक आदमी तो आंख रहते अंधा है या फलां आंखवाला भी अंधा ही है। दरअसल, ऐसी कटुक्तियां लोग आमतौर पर तब सुनाते हैं, जब किसी व्यक्ति से लापरवाही या अनदेखी की शिकायतें होती हैं। पर, इन आंखवाले अंधों के बीच ऐसे बिना आंखवाले लोग भी हैं, जिनके कामकाज, आचार-आचरण व जीने के तौर-तरीके आंखवालों की तुलना में सर्वथा अलग और अनुकरणीय हैं। बिहार के गया जिले के बोधगया में रहनेवाले दिलीप कुमार बिना आंख के ऐसे ही एक शख्स हैं, जिन्हें नजदीक से देखने - जाननेवाला हर व्यक्ति अपने लिए प्रेरणा स्रोत मानता है। और इसकी वजह कर्मठता, ईमानदारी, दूसरों की भलाई के लिए निरंतर प्रयासरत रहने जैसे उनके वे गुण हैं, जिनकी कमी की चर्चा आज सर्वत्र सुनी जाती है। सैकड़ों चेहरे पर मुस्कान पैदा करने की क्षमता रखनेवाले दिलीप कुमार का जब एक जनवरी, 1970 को जन्म हुआ, तो कई लोग निराश -हताश थे। परिजनों के सामने एक नयी चुनौती थी। क्योंकि , नवजात दिलीप कुमार के साथ बाकी तो सब ठीक था, पर उनकी आंखें नहीं थीं। वह जन्मांध निकले। सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे शिशु को देख कर माता -पिता की कैसी हालत होती होगी और इनके पालन-पोषण की कैसी चुनौती सामने दिखती होगी। खैर, जो होना था, हो चुका था। एक जन्मांध के रूप में दिलीप कुमार की जिंदगी की गाड़ी रेंगने लगी। कुछ बड़ा होने पर घरवालों ने उन्हें पढ़ने के लिए पटना नेत्रहीन विद्यालय में भेजा। वहीं से 1988 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। 1995 में दिल्ली के जाकिर हुसैन कॉलेज से स्नातक भी कर लिया । पढ़ाई-लिखाई यहां तक करने के बाद नौकरी के अवसर भी आने लगे। कई बार सरकारी नौकरी के अवसर मिले भी। पर, एक खास समझ ने सरकारी नौकरी में जाने से बार-बार रोक दिया। वह यह कि अगर सरकारी नौकरी में चले गये, तो जिंदगी कहीं स्वकेंद्रित हो जा सकती है। फिर दूसरे लोगों के लिए कुछ करने का स्कोप खत्म हो जायेगा। कम से कम घट तो जायेगा ही। दरअसल, दिलीप कुमार को विकलांगता के दंश का अच्छी तरह एहसास हो गया था। उन्हें अपनी तरह के नेत्रहीन लोगों की दिक्कतों व चुनौतियों की अच्छी समझ हो गयी थी। ऐसे में उन्होंने ऐसा कुछ करने का फैसला किया, जिससे नेत्रहीन या दूसरी वजहों से विकलांग हो चुके लोगों की जिंदगी में बदलाव लाने का अवसर मिले। इसी समझ के साथ उन्होंने बुद्धा विकलांग विकास संस्थान नामक एक संस्था की नींव रखी, जिसने आगे चल कर ब्लाइंड स्कूल चलाया, बाल श्रमिकों के लिए स्कूल चलाया, विकलांगों के लिए तरह- तरह के जागरूकता अभियान चलाया। आज भी ऐसे अभियान चल रहे हैं। फिलहाल श्री कुमार विकलांगों के लिए रेलवे पास की जगह जारी होनेवाले स्मार्ट कार्ड की सुविधा लोगों तक पहुंच सके, इसके लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। अफसरों के दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, ताकि दूसरे विकलांगों को ऐसे ही चक्कर न काटने पड़ें। इनके प्रयास से कई दिव्यांगों में आत्मविश्वास भी बढ़ा है। महिलाओं के लिए भी चला रहे प्रशिक्षण केंद्र दिलीप कुमार बोधगया और आसपास की बेरोजगार महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई, बुनाई आदि का प्रशिक्षण भी दिलवा रहे हैं, ताकि ये स्वावलंबी बन सकें और दूसरों पर इनकी आर्थिक निर्भरता घट सके। गया जिले के ग्रामीण अंचलों में ऐसे प्रशिक्षण केंद्र चल रहे हैं, जहां करीब 200 महिलाएं ट्रेनिंग पा रही हैं। इतना ही नहीं, उनकी संस्था इन दिनों महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार हेतु महिला व बाल विकास मंत्रालय को रिपोर्ट भेजने के लिए 18 से 35 वर्ष तक की आयु की महिलाओं के बीच एक सर्वेक्षण करा रही है। जल्दी ही यह रिपोर्ट मंत्रालय को भेजी जायेगी। उन्हें उम्मीद है कि इस काम के परिणामस्वरूप ढेर सारी गरीब-बेरोजगार महिलाओं की जिंदगी में खुशहाली आ सकेगी। बोधगया और इसके आसपास के इलाकों की महिलाएं दिलीप की मदद से अपने पैरों पर खड़ी हो गयी हैं और अपना काम कर रही हैं। इनकी दिखायी राह पर चल कर महिलाओं में आत्मबल भी आया है और वे अपने परिवार में मुखिया के रूप में उभरी हैं। इससे उनकी जिंदगी खुशहाल हुई है। हिम्मत व संकल्प से नयी राह पर चलने का लिया संकल्प, कमजोर लोगों के लिए राह आसान करने के रास्ते पर चल पड़े जब सब सुखी होंगे, तो मैं भी दुखी नहीं रहूंगा दिलीप कुमार के जीवन के सिद्धांत ढेर सारे दूसरे लोगों से थोड़े अलग हैं। वह लोकिहत के लिए कुछ भी करने को सर्वदा तैयार रहने की बात करते हैं। कहते हैं कि हर वक्त व्यक्ति ऐसा कुछ करने की बात सोचनी चाहिए, जिससे दूसरों का भला हो। वह कहते हैं कि जब पास-पड़ोस के लोग स्वस्थ, संतुष्ट व सुखी रहेंगे, तो मैं भला क्यों दुखी रहूंगा। मेरे दुखी होने की कोई वजह ही नहीं हो सकती। इसलिए हरदम वह दूसरों के भले के लिए अपना कंधा प्रस्तुत करने को तैयार रहते हैं। इनके इस प्रयास से दिव्यांगों की जिंदगी बदल गयी है। दिव्यांगों के लिए चलाया आंदोलन, गये जेल भी दिलीप कुमार कोई ऐसे-वैसे शख्स नहीं हैं। धुन के पक्के आदमी हैं। कुछ करने के लिए जिद पर उतरते हैं, तो भयानक नतीजों की भी परवाह नहीं करते। इसका उदाहरण है उनके पास। दरअसल, वह पढ़ने - लिखने के दौर में ही विकलांगों की समस्याओं पर मुखर रहने लगे थे। दिव्यांगों की बातें हर स्तर पर उठा कर उनके जीवनस्तर में सुधार की वकालत करते थे। ऐसे ही मसलों पर दो - दो बार उनका आंदोलन आमरण अनशन का रुख अख्तियार कर लिया। नतीजतन पुलिस व प्रशासन ने उनसे निबटने के लिए उन्हें जेल ही भेज दिया। श्री कुमार विकलांगों के हित में अपने आंदोलन के चलते दो जेल यात्राएं भी कर चुके हैं। लेखन : संदीप कुमार, स्वतंत्र पत्रकार