परिचय मानव की नैसर्गिक आकांक्षा तथा प्राकृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए उद्धेलित रहती अहि। इस प्रकार के आकांक्षा का मूल-भाव मानव के स्वतंत्र, समान और गरिमायुक्त वातावरण मेंपैदा होने में सन्निहित होता है। गरिमायुक्त वातावरण में स्त्रियों तथा पुरुषों को समान रूप से आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नागरिक और राजनैतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों को लागू कने में जातिय, धर्म, राष्ट्र एवं लिंग का विभेद करने से परिवार तथा समाज की समृद्धि प्रभावित होती है। सामाजिक समृद्धि सार्वजनिक विकास का परिचायक होती है। सामाजिक विकास मानव के लिए पौष्टिक भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रशिक्षण, लोक नियोजन का अव्स्स्र तथा प्राप्ति समाज की परम्परागत कुप्रथाओं के परित्याग से ही संभव होती है। कुप्रथा में परिणिति के कारण मानव की आकांक्षा धूमिल होने लगती है। फलतः नवयुवक तथा नवयुवतियां अपनी वयस्क अवस्था प्राप्त करने के बाद भी अपने हित के निर्णयों के लिए अपने माता-पिता, संगे सम्बन्धियों अथवा हितैशियों पर निर्भर रहते हैं और उनके द्वारा लिए गये निर्णयों को परम्परागत स्वरुप में सहजता से अंगीकार कर लेते हैं। कालान्तर में इस तरह की स्वीकारोक्ति घरेलू हिंसा को जन्म देती है, जिसके कारण मानव के मानव अधिकारों का उल्लंघन होता है।” मानव अधिकारों का लक्ष्य मानवों की अंतर्निहित गरिमा, समता और अहस्तान्तरणीय अधिकारों को प्रदत्त करना होता है। ये अधिकार स्वंतन्त्रता, न्याय और विश्व शान्ति के नींव के रूप में कार्य करते हैं।। मानव अधिकारों के माध्यम से मानवों में विश्वास, निर्भयता और उच्च आकाक्षाओं की प्रतिपूर्ति होती है। उच्च आकांक्षा के कारण मानव अपने हित से विनिश्चय स्वयं करता है। इस प्रकार के विनिश्चय में मानव को अपने जीवन साथी क चयन का अधिकार प्राप्त है। प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपनी स्वेच्छा से विधिक प्रावधानों के अधीन रहते हुए अपने हित के निर्णय ले सके। इसके साथ ही महिलाओं को विशेष रूप से यह अधिकार है कि उनके विरुद्ध किसी भी रूप की घरेलू हिंसा नहीं होनी चाहिए। यदि कसी महिला के विरुद्ध किसी प्रकार की प्रत्यक्ष तथा परोक्ष हिंसा की जाएगी तो राज्य इस प्रकार के हिंसा से महिलाओं की संरक्षा करेगा, क्योंकि प्रत्येक प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक प्रपीड़न से संरक्षा प्राप्त करना मानव का मुलभुत अधिकार है। फलतः जहाँ मानव को स्वेच्छा से विवाह करने का अधिकार है, वहीं ठीक दूसरी ओर प्रत्येक महिला को विवाह से पहले विवाह के पश्चात घरेलू हिंसा से संरक्षा प्राप्त करने का अधिकार भी प्राप्त हैं। अतः सम्बन्धित मानव अधिकारों का क्रमशः वर्णन लोक जानकारी के लिए निम्नानुसार किया जाना सम्यक एवं समीचीन जान पड़ता है। स्वेच्छानुसार विवाह करने का मानव अधिकार सम्प्रति मानव अधिकारों का मुलभूत स्रोत संयुक्त राष्ट्र संघ का चार्टर है। इसी उद्देशिका में स्पष्टतः संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने अभिव्यक्त किया है कि हम मुलभुत मानव अधिकारों, मानव की गरिमा और मानव प्राणियों की योग्यता तथा पुरुष एवं महिला के समान अधिकारों में विश्वास करते है। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के लक्ष्य के अनुरूप मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा 1948 का सृजन किया या है। इस घोषणा में मानवों के सर्वांगीण विकास के लिए सभी प्रकार के मानवीय स्वीकार करते समय संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों की संख्या मात्र 58 थी शनैः शनैः यह संख्या बढ़ती गई और उपनिवेश स्वंतत्र होते गये और आज संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों की संख्या 192 तक पंहुच गई है। विश्व स्तर पर मानव अधिकारों की सर्वांगीण घोषणा के अनुरूप अधिकारों का बिगुल निनादित हो रहा है। इन घोषनाओं का लक्ष्य मानवों को गरिमा, समता तथा अंतर्निहित अधिकाओं को मान्यता देना है। मानव अधिकार की सर्वांगीण घोषणा एवं विवाह का अधिकार- मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को समतामूलक समाज की स्थापना के लिए, सभी किए हितों के लिए तथा सभी के कल्याण के लिए घोषित किया गया है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों का दायित्व है कि वह संबंधित घोषणाओं की जानकारी, अनुपालन तथा प्रभोत्पादक के लिए कार्रवाई सुनिश्चित करें इन घोषणात्मक अधिकारों को आधार स्तम्भ मानकर सभी मानव प्राणियों के विकास के कार्यों को गति प्रदान करें। सार्वभौम घोषणा में मानवों को स्वंतत्र जीवन यापन करने के लिए सारभूत और मुलभूत अधिकारों का सृजन किया गया है। मानव को प्रत्येक की स्वंतत्रता के अंतर्गत जीवन यापन करने का अधिकार दिया गया है। इसमें स्पष्टतः उल्लेख किया गया है कि किसी व्यक्ति की एकान्तता, परिवार, घर या पत्र व्यवहार के प्रति कोई मनमाना हस्तक्षेप हो सकेगा, ऐसे हस्तक्षेपों के विरुद्ध प्रत्येक को कानूनी रक्षा का अधिकार प्राप्त है। मानव अधिकारों के इस उपबन्ध से यह अभिप्राय सुस्पष्ट होता है कि किसी भी व्यक्ति को परिवार, घर आदि में स्वंतत्रता प्राप्त है औरसम्बन्धित अधिकार में मनमाने रूप से हस्तक्षेओ तथा व्यवधान उत्पन्न नहीं किया जाएगा। परिवार को प्रांरभ करने के लिए विवाह की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता को सुदृढ़ करने के लिए मानव अधिकार के रूप में मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा ने अविछन्न स्वंतत्रताप्रदत्त कर रखी है। इसलिए परिवार की अनिवार्यता के लिए विवाह के अधिकार की पूर्ति किये जाने के लिए सम्बन्धित व्यक्ति स्वंतत्र है तथा इस अधिकार में कोई भी व्यक्ति मनमाने रूप से हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा 1948 के अनुच्छेद 16 में सुस्पष्ट तथा विस्तृत उल्लेख किया गया है कि बालिका, स्त्री-पुरुषों को बिना किसी जाति, राष्ट्रीयता या धर्म की रुकावटों के आपस में विवाह करने और परिवार की स्थापना करने का अधिकार है, उन्हें विवाह के विषय में, वैवाहिक जीवन में तथा विवाह-विच्छेद के बारे में समान अधिकार है विवाह का इरादा रखने वाले स्त्री-पुरुषों की पूर्ण और स्वतंत्र सहमति पर ही विवाह हो सकेगा। परिवार समाज की स्वाभाविक और बुनियाई सामूहिक इकाई है और उसे समाज तथा राज्य द्वारा संरक्षण पाने का अधिकार है। मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा में विवाह के अधिकार के उपबन्ध के साथ ही परिवार के अधिकार को भी मान्यता दी गई है। इससे स्पष्ट है कि परिवार अधिकार से पहले विवाह का अधिकार आवश्यक है तथा विवाह के अधिकार और परिवार के अधिकार के मध्य अविच्छेदित सम्बन्ध है। इस प्रकार मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 12 परिवार का अधिकार तथा अनुच्छेद 16 विवाह का अधिकार एक-दूसरे पूरक हैं। अंतरराष्ट्रीय सिविल और राजनैतिक अधिकारों की प्रसंविदा में विवाह के अधिकार का प्रतिबम्ब- सामाजिक संरचना के लिए परिवार प्रथमतः मूलाधिकार रूपी इकाई होती है। सामाजिक नैतिकता पारिवारिक पद्धति को बल प्रदान करती है। सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा में परिवार को समाज की नैसर्गिक तथा मूल इकाई माना गया है तथा इस इकाई को समाज और राज्य से संरक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। विवाह के योग्य पुरुष तथा महिला को विवाह का अधिकार है और परिवार को सुस्थापित करने की मान्यता विवाह करने वाले पुरुष तथा महिला को होगी कोई भी विवाह दम्पत्ति की स्वतंत्र और पूर्ण सहमति के बिना सम्पन्न नहीं होगा। प्रसंविदा के राज्य पक्षकार विवाह के लिए, विवाह के समय और इसके विघटन में दम्पत्तियों के समता और उत्तरदायित्व के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कारगर उपाय करेंगे, किसी भी बच्चे की आवश्यक संरक्षा का विधिक प्रावधान करेंगे। सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अंतराष्ट्रीय प्रसंविदा में उल्लिखित विवाह के अधिकार की तुलना मानव अधिकारों की सार्वभौम अधिकारों की घोषणा के साथ करने से विदित होता है कि मानव अधिकारों की सार्वभौम अधिकारों की घोषणा में उल्लेख किया गया है कि सम्पूर्ण आयु के पुरुष और महिला को जाति राष्ट्रीयता या धर्म के भेदभाव के बिना विवाह का अधिकार है, लेकिन सिविल और राजनैतिक अधिकारों की प्रसंविदा में जाति, राष्ट्रीयता या धर्म के भेदभाव के बिना शब्दों का लोप है। इसलिए यह कहना समीचीन होगा कि मानव अधिकारों किसी सार्वभौम घोषणा में उल्लिखित विवाह का अधिकार, सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा से व्यापक है। इसके विपरीत सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अंतराष्ट्रीय प्रसंविदा में परिवार को विधि द्वारा मान्यता देने के उपबन्ध की व्यवस्था की गिया है जबकि मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा में ऐसा कोई उपबन्ध नहीं है। विवाह के उपरान्त बच्चों के पैदा होने पर सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा के अनुच्छेद २३ (4) के अतिरिक्त अनुच्छेद 24 में भी विशेष उपबन्ध किये गये हैं। इसमें कहा गया है कि प्रत्येक बच्चों की जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राष्ट्रीय या सामजिक उदभव, सम्पत्ति या जन्म के भेदभाव के बिना अल्पवयस्क प्रास्थिति के आधार पर परिवार, समाज और राज्य से उसको आवश्यक संरक्षण के मापदंडों का अधिकार होगा। प्रत्येक बच्चे के पैदा होने के पश्चात पंजीकृत करवाने तथा नाम पाने का अधिकार होगा। प्रत्येक बच्चों को राष्ट्रीयता प्राप्त करने का अधिकार होगा। सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा में मानवीय मूल्यों को बनाए रखने तथा मानव के सामूहिक विकास के लिए परिवार के अधिकारों को मान्यता दी गई है। परिवार का प्रांरभ पुरुष तथा महिला में विवाह करने की संरक्षा से प्रांरभ होकर बच्चों के वयस्क होने तक होता है। इसलिए बच्चों की संरक्षा का दायित्त्व परिवार के साथ ही समाज तथा राज्य को भी दिया गया है। यद्यपि परिवार की परिभाषा में वृद्ध माता-पिता को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए, लेकिन प्रसंविदा में ऐसी व्यवस्था नहीं की गिया है। यह व्यवस्था प्रसंविदा की कमी को उजागर करती है। इसके अतिरिक्त इसमें मातृत्व के द्वारा जाने वाली संरक्षा की भी कोई व्यवस्था का उपन्ब्ध नहीं है। विवाह का अधिकार तथा आर्थिक, सामजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा – अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रों के लिए मापदंड निर्धारित करने के लिए आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा को संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा ने अंगीकार किया है। इस प्रसंविदा के अनुच्छेद 10 के अनुसार प्रसंविदा के राज्य पक्षकारों को परिवार को समाज की नैसर्गिक और मुलभुत इकाई के रूप में विस्तृत संभव संरक्षा और सहायता देनी चाहिए। बच्चे के जन्म की युक्तियुक्त अवधि से पूर्व और बाद में माता को विशेष सुविधा दी जानी चाहिए। इस अवधि के दौरान कामकाजी महिलाओं को वेतन सहित अवकाश या पर्याप्त सामाजिक संरक्षा का लाभ मिलना चाहिए। मातृत्व या अन्य शर्तों के भेदभाव के बिना सभी बच्चों या छोटे व्यक्तियों को विशेष संरक्षा और सहायता दी जानी चाहिए। बच्चे और छोटे व्यक्ति आर्थिक और सामाजिक शोषण से संरक्षित किये जाने चाहिए। उनकी नैतिकता या स्वास्थ्य या जीवन के लिए खतरनाक या उनके सामान्य विकास को अवरुद्ध करने वाले खतरनाक नियोजन को विधि द्वारा दंडित किया जाना चाहिए। राज्य बाल श्रम नियोजन के लिए आयु, निर्धारित करेगा, जिसमें विधि के अनुसार बालश्रम प्रतिबद्ध और दंडनीय नहीं होना चाहिए। विवाह का अधिकार, परिवार की स्थापना करने का अधिकार तथा बच्चों की सरंक्षा का अधिकार के व्यापक स्वरुप का उल्लेख आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा में मिलता है। कमोवेश ये अधिकार अंतराष्ट्रीय प्रसंविदा तथा मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा के समान ही है। महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के समापन संबंधी अभिसमय तथा विवाह का अधिकार विवाह के अधिकार में समता की महत्ता को सर्वोच्च मानव अधिकार के रूप में स्वीकार किया जाता है। समता मुलक समाज में यह आवश्यक है कि महिला और पुरुष दोनों को विवाह करने, परिवार की स्थापना करने तथा पारिवारिक मामलों में स्वंतत्र निर्णय लेने का अधिकार है। इस मुलभूत धारणा को दृष्टिगत रखते हए महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव का समापन अभिसमय के अनुच्छेद 16 में स्पष्टता कहा गया है कि अभिसमय में राज्य पक्षकार महिलाओं के विरुद्ध विवाह और परिवार से सम्बन्धित सभी मामलों में भेदभाव को समाप्त करने के लिए सभी समुचित उपाय करेंगे और पुरुषों तथा महिलाओं में इस उद्देश्य के लिए समता बनाये रखने का कार्य सुनिश्चित करेंगे। महिला और पुरुष दोनों को विवाह का समरूप अधिकार है। दम्पत्ति का चुनाव तथा अपनी स्वंतत्र और पूर्ण सहमति से विवाह करने का अधिकार है। विवाह के दौरान अर्थात दम्पत्ति की क्षमता में दोनों के समान अधिकार और दायित्व हैं तथा विवाह के विघटन पर भी दोनों के समान अधिकार और दायित्व हैं। विवाह की प्रास्थिति में माता-पिता का बच्चों के मामले के समान अधिकार और दायित्व हैं और सभी मामलों में बच्चों का हित सर्वोच्च होगा। बच्चों की संख्या तथा अंतर में दोनों समान अधिकार और दायित्व है तथा बच्चों को सूचना देने, शिक्षा उपलब्ध कराने तथा संसाधन उपलब्ध कराने के भी समान अधिकार तथा दायित्व हैं। बच्चों की संरक्षणता, अभिरक्षा, न्यायसिता तथा द्त्तकता में समान अधिकार तथा दायित्व हैं अथवा राष्ट्रीय विधि के प्रवर्तन में होने पर इस प्रकार की संस्थाओं में समान अधिकार तथा दायित्व हैं। सभी मामलों में बच्चों का हित सर्वोच्च होगा। परिवार का नाम, व्यवसाय और जीविका के चयन में पति तथा पत्नी के समान वैयक्तिक अधिकार है दोनों दम्पत्तियों को सम्पत्ति में स्वामित्व अर्जन, प्रबन्धन, प्रशासन, उपभोग और व्ययन में समान अधिकार हैं। बच्चों की सगाई और विवाह का कोई विधिक प्रभाव नहीं है और इसके लिए अनिवार्य कार्रवाई की जानी चाहिए, जिसमें विधि के सृजन द्वारा विवाह की न्यूनतम आयु और विवाह का कार्यालय पंजिका में अनिवार्य पंजीकरण भी सम्मिलित होगा। विवाह के मापदंड के लिए अंतराष्ट्रीय अभिसमय विवाह के लिए आयु का निर्धारण स्वतंत्र सहमति की अनिवार्यता तथा विवाह के पंजिकरण के लिए अंतराष्ट्रीय अभिसमय 1957 का भी सृजन किया गया है। इसके अतिरिक्त महिला और पुरुष को विवाह के कारण समान अधकारों को राष्ट्रीय अधिकार के लिए महिलाओं को राष्ट्रीयता अभिसमय का सृजन संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा 29 जनवरी 1957 में किया गया है। यह अभिसमय 11 अगस्त 1958 से प्रवर्तन में है। इस अभिसमय के राज्य पक्षकार विवाहित महिलाओं की राष्ट्रीयता के संबंध में पुरुषों के समान ही विधिक उपबन्ध का सजृन किये जाने के लिए बाध्य हैं। किसी भी महिला को पुरुष के समान ही विधिक उपबन्धों के अतर्गत स्वेच्छा से राष्ट्रीयता को ग्रहण करने अधिकार है। विवाह के आधार पर महिला का स्वतः राष्ट्रीयता का परिवर्तन नहीं होने का प्रावधान महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार का भेदभाव का समापन संबंधी अभिसमय 1979 के अनुच्छेद 19 में किया गया है। इसमें कहा गया है कि अभिसमय के पक्षकार राज्य, महिलाओं को राष्ट्रीयता प्राप्त करने, परिवर्तित करने तथा अपनी राष्ट्रीयता में बने रहने के लिए पुरुष के समान ही अधिकार प्रदत्त करेंगे। अभिसमय के पक्षकार यह आवश्वासन देंगे कि विदेशी से विवाह करने तथा पति राष्ट्रीयता के परिवर्तित होने पर पत्नी की राष्ट्रीयता परिवर्तित करने के लिए भी बाध्य नहीं किया जाएगा। राज्य पक्षकार महिलाओं को बच्चों पर राष्ट्रीयता के सम्बन्ध में पुरुष के समान ही अधिकार देंगे। महिलाओं की राष्ट्रीयता का अभिसमय 1957 के अनुच्छेद 1,२, और 3 में भी इसी प्रकार का उपबन्ध किया गया है। भारत में विवाह के अधिकार का स्वरुप विवाह के स्वंतत्रता का अधिकार व्यक्ति की गरिमा को संरक्षित किये जाने का मुलभूत लक्ष्य का उल्लेख भारत के संविधान के उद्देशिका में उल्लिखित है। इसमें कहा गया है भारत में समस्त नागरिकों में गरिमा बनाये रखने के लिए तथा सामाजिक, आर्थिक अरु राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वंतत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए हम भारत के लोग संविधान को अंगीकृत, अधिनियम और आत्मर्षित करते है। संविधान की उद्देशिका में उल्लिखित गरिमा शब्द से परिलक्षित होता है कि भारत में प्रत्येक नागरिक को प्रत्येक क्षेत्र में गरिमामय जीवन यापन करने का अधिकार है। गरिमामय जीवन के अंतर्गत व्यक्ति को स्वतत्र सहमति तथा जाति, राष्ट्रीयता और सामाजिक बन्धनों से उन्मुक्त होकर पूर्ण अवस्था प्राप्त करने के पश्चात विवाह करने का अधिकार प्राप्त है। यह अधिकार मानव की दैहिक स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है। संविधान में दैहिक स्वंतत्रता को मूल अधिकार के रूप में अनुच्छेद 21 में उल्ल्लिखित किया गया है इसमें उपबंधित है कि किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वंतत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वचित किया जाएगा, अथवा नहीं। सांविधिक सभा की बहस में संविधान सभा के सममानित सदस्य श्री काजी सैयद करिमुददीन, श्री महबूब अली बेग साहिब बहादुर, श्री चिमन लाल चक्कूभाई, श्री कृष्ण चन्द्र शर्मा, श्री एच वि पतासकर और श्री के.एम्. मुंशी अनुच्छेद 21 में विधि की सम्यक प्रक्रिया शब्दों को समाहित करना चाहते तह। यदि विधि की सम्यक प्रक्रिया शब्द को अनुच्छेद 21 में प्रतिस्थापित कर दिया गया होता तो, गरिमामय जीवन के लिए मूल अधिकार के रूप में विवाह के अधिकार अंतरराष्ट्रीय उपबन्धों में उल्लिखित प्रावधानों के समान ही अनुच्छेद 21 के भाग के रूप में प्रत्यक्षतः समाहित हो गया होता, लेकिन प्रत्यक्षतः यह संभव नहीं हो पाया, इसलिए संविधान संशोधन के लिए गठित संविधान के अनुच्छेद 21 ख को संविधान संशोधन के ली गठित संविधान पुनरवलोकन समिति ने निम्न प्रकार उल्लिखित किया है – प्रत्येक व्यक्ति को उसके निजी और पारिवारिक जीवन, घर और पत्राचार का सम्मान करने का अधिकार प्राप्त है। समिति ने अनुच्छेद 21 ख (1) उपबन्ध पर राज्य की सुरक्षा, लोक संरक्षा अथवा अव्यस्था को रोकने अथवा अपराध अथवा स्वास्थ्य की रक्षा अथवा नैतिकता अथवा दूसरों के अधिकारों और स्वंतत्रता की संरक्षा के लिए युक्तिमुक्त प्रतिबन्ध भी लगाने की भी अनुशंसा की है। संविधान पुनरावलोकन समिति की उपरोक्त अनुशंसा यदि संविधान में अनुच्छेद 21 ख (1) के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया जाता है तो यह प्रावधानों निजी, पारिवारिक जीवन, घर आदि शब्द व्यक्ति के विवाह के अधिकार को भी सम्मिलित कर लेंगे, क्योंकि इस प्रकार का प्रावधान मानव अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा 1966 के अनुच्छेद 10 और महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार का भेदभाव का समापन अभिसमय 1979 के अनुच्छेद 16 आदि में है और इनमें विस्तृत रूप से विवाह के अधिकार के भी सम्मिलित किया गया है। भारत में मानव अधिकारों की संरक्षा के लिए मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 का सृजन किया गया है। इस अधिनियम की धारा २ (घ) में मानव अधिकार की परिभाषा दी गई है, इसमें कहा है मानव अधिकार का अर्थ संविधान द्वारा प्रत्याभूत अथवा अतरराष्ट्रीय प्रसंविदा में सम्मिलित तथा भारत में न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय दैहिक स्वंतत्रता, समानता और व्यक्ति की गरिमा के अधिकार से है। मानव अधिकार की उपरोक्त परिभाषा मानवों की दैहिक स्वंतत्रता समता और व्यक्ति की गरिमा से सम्बन्धित है। विवाह का सम्बन्ध भी व्यक्ति की दैहिक स्वंतत्रता समता और गरिमा से ही है, क्योंकि यदि व्यक्ति को स्वंतत्र सहमति से बिना भेदभाव और गरिमामय वातावरण में विवाह का अधिकार होगा तो उसके मानव अधिकार की संरक्षा का अनुपालन संभव् हो पायेगा। मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धरा २ (घ) की परिभाषा का तुलनात्मक अध्ययन विवाह के साथ करने से विदित होता है कि परिभाषा में प्रयुक्त शब्द दैहिक स्वंतत्रता, समता और गरिमा के अनुरूप ही मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा 1948 के अनुच्छेद 12 तथा 16, सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1966 के अनुच्छेद 10 में विवाह के मानव अधिकार के उद्देश्य से प्रयुक्त किया हुआ माना जा सकता है। मानव अधिकारों सरंक्षण अधिनियम की धारा २ (घ) यह भी उल्लेख करती है कि अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं में सम्मिलित अधिकार भी मानव अधिकार है, सिविल तथा राजनैतिक अधिकारों की प्रसंविदा के अनुच्छेद २३ तथा आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार मानव अधिकार सरंक्षण अधिनियम 1993 के धारा २ (घ) के उद्देश्य से विवाह के अधिकार का उल्लेख उपरोक्त प्रसंविदाओं में होने के कारण यह अधिकार मानव अधिकार है। मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा २ (घ) की अनिवार्यता यह भी है कि दैहिक स्वंतत्रता, समता और व्यक्ति की गरिमा को भारत में न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय बना दिया है इस प्रकार अब यह भी मानव अधिकार है। न्यायालय द्वारा विवाह के अधिकार को मानव अधिकार के रूप में लागू करने का अनुपम उदाहरण लता सिंह बनाम उत्तरप्रदेश राज्य और अन्य है। सम्बन्धित वाद में न्यायालय ने मानव अधिकार के रूप में विवाह को स्वीकार करने का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण दिया है। इस वाद में न्यायमूर्ति मारकंडे कार्टजू ने न्यायमूर्ति अशोक मान तथा अपनी ओर से न्यायालय का विनिर्णय देते हुए कहा था कि राष्ट्र हमारे इतिहास में जटिल परिवर्तनीय अवधि से गुजर रहा है और बृहत लोक सम्बन्ध के मामलों में उच्चतम न्यायालय मौन नहीं रह सकता है, जैसा कि सम्प्रति में हो रहा है। जाति प्रथा राष्ट्र पर अभिशाप है और जल्दी ही यह अच्छाईयों को समाप्त कर देगा। तथ्यतः यह ऐसे समय में राष्ट्र को विभाजित कर रही है, जब हमें राष्ट्र की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए एक होना है। इसलिए, अंतरजातीय विवाह वास्तव में राष्ट्र के हित में है, इसके परिणाम से जाति प्रथा ध्वस्त हो जाएगी जबकि, देश के अनेक हिस्सों से क्षुब्ध करने वाले समाचार प्राप्त हो रहे हैं कि नवयुवक पुरुष और महिला जो अंतरजातीय विवाह कर रहे हैं उन्हें हिंसात्मक धमकियां मिल रही हैं अथवा वास्तव में उनके साथ हिंसा की जा रही है। इस प्रकार की हिंसा अथवा धमकियां अथवा उत्पीड़न सम्पूर्णतः अविधिक हैं और ऐसा कर रहे हैं, उनको कठोरतम दंड दिया जाना चाहिए। यह स्वतंत्र और लोकान्तात्रिक देश हैं और विवाह का सकता है। यदि विवाह करने वाली लड़की अथवा लड़के के माता-पिता इस प्रकार के अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह का अनुमोदन नहीं करते है, तो ज्यादा से ज्यादा वे अपने पुत्र और पुत्री से सामाजिक सम्बन्ध विच्छेद कर सकते है, लेकिन वे अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह करने वाले दम्पत्ति को धमकी अथवा हिंसा अथवा की उत्प्रेरण अथवा उनका उत्पीड़न नहीं कर सकते हैं। हमें कभी यह सुनाई पड़ता है कि जिन्होंने अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह किया है, उन्हें सम्मान के लिए मार दिया गया है, इस प्रकार से वध करने में किसी प्रकार के सम्मान सम्मिलित नहीं है, और वास्तव में यह कुछ नहीं है, अपितु यह निर्दयी और सामन्तवादी मस्तिष्क के द्वारा कारित बर्बर और घृणित हत्या का कार्य है। ऐसे व्यक्ति कठोर दंड के भागीदार हैं। इसी तरह हम इस घृणित कार्य को रोक सकते हैं। न्यायालय ने यह भी कहा है कि प्रशासन/पुलिस प्राधिकारी सम्पूर्ण देश में यह देखें की यदि कोई वयस्क लड़का अथवा लड़की कड़ी वयस्क लड़के अथवा लड़की से अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह विवाह करते हैं तो दम्पत्ति को किसी के दारा उत्पीड़ित नहीं किया जाना चाहिए अथवा न ही धमकी दी जानी चाहिए अथवा स्वंय अथवा किसी उत्प्रेरण के फलस्वरूप उनके विरुद्ध करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध पुलिस के द्वार आपराधिक कार्रवाई संस्थित करनी चाहिए और ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध विधि द्वारा विहित सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। उपरोक्त विनिश्चय में यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने किसी राष्ट्रीय अधिनयमित विधि अथवा अंतर्राष्ट्रीय विधिक प्रावधानों का उल्लेख नहीं किया है तथापि न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत परमादेश तथा उत्प्रेषण याचिका को स्वीकार करते हुए वयस्क दम्पत्तियों को स्वतंत्र सहमति से विवाह करने से रोकने को मूल-अधिकार का उल्लंघन माना है। परिणाम स्वरूप न्यायालय ने मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा २ (घ) की अंतिम अनिवार्यता की प्रतिपूर्ति की है। इस प्रकार भारत में विवाह करने का अधिकार सम्पूर्णतः मानव अधिकार है। उच्चतम न्यायालय ने विवाह के अधिकार के साक्ष्य को प्रबल स्वरूप प्रदत्त करने हुए सीमा बनाम अश्वनीकुमार के आमले में कहा विवाह का पंजीकरण आवश्यक है। न्यायालय का विनिश्चय न्यायमूर्ति अजीत पसायत ने देते हुए अभिनिर्धारित किया कि विवाह के पंजीकरण के विषय वस्तु संविधान के समवर्ती सूची के सूची संख्या 30 के अंतर्गत आती है इसके लिए महाराष्ट्र, गुजरा, कर्नाटका, हिमाचल प्रदेश और आंध्रप्रदेश राज्यों में विधि अधिनयमित की गई है, इसके अतिरिक्ति अन्य राज्यों में विवाह के पंजीकरण के लिए महिलाओं के विरुद्ध सभी प्राकर के भेदभाव के समापन सम्बन्धी अभिसमय 1979 के अनुच्छेद 16(२) का भी उल्लेख किया। न्यायालय ने कहा संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने इस अभिसमय को 1979 में अंगीकार किया तथा और भारत सम्बन्धित अभिसमय में 30 जुलाई 1980 में पक्षकार बना तथा उसने इसको 9 जुलाई 1993 में समंजित किया न्यायालय ने विवाह के पंजीकरण के लाभों का उल्लेख करते हुए यदि विवाह का अभिलेख रखा जाएगा। तो दो पक्षकारों में मध्य विवाह सम्पादित करने का विवाह समाप्त हो जाएगा। न्यायालय ने राष्ट्रीय आयोग के उद्धृत करते हुए कहा कि राष्ट्रीय आयोग ने ठीक ही कहा है कि अधिकतर मामलों में विवाह के पंजीकरण नहीं के होने के कारण महिलाओं को कठिनाई आती है, यदि विवाह का पंजी करण हो जाएगा तो इससे यह सिद्ध हो जाएगा कि विवाह का पंजीकरण ही पाने अप में वैघ विवाह का प्रमाण नहीं है, और विवाह की वैधता का निश्चयात्मक तथ्य नहीं है, तथापि यह बच्चों की अभिरक्षा, पंजीकृत दम्पत्तियों से बच्चों को जन्म लेने का अधिकार और विवाह के पक्षकारों की उम्र का महानतम साक्ष्य है। यदि विवाह को अनिवार्य रूप से पंजीकृत कर दिया जाता है, तो यह समाज के हित में होता । विवाह के पंजीकरण नहीं किये जाने का परिणाम यह है कि विवाहित व्यक्ति द्वारा विवाह से इंकार का कर दिया जाता है, तो यह समाज के हित में होगा। विवाह को अनिवार्य रूप से पंजीकृत कर दिया जाता है, तो समाज के हित में होगा। विवाह के पंजीकरण नहीं किये जाने का परिणाम यह है कि विवाहित व्यक्ति द्वारा विवाह से इंकार कर दिया जाता है, यदि विवाह पंजीकृत होता है, तो उसका नैसर्गिक परिणाम यह होता है कि विवाह होने की उपधारणा मान ली जाती है। इसलिए भारत में विभिन्न धर्मों को मानने वाले नागरिकों के विवाह को अनिवार्य रूप से उनके राज्यों द्वारा जहाँ उनक विवाह सम्पन्न हुआ है, पंजीकृत कर दिया जाना चाहिए। न्यायलय ने कहा इस निर्णय अर्थात 14 फरवरी 2006 से तीन महीने के अतर्गत विवाह के पंजीकरण की प्रक्रिया का विज्ञापन सम्बन्धित राज्यों द्वारा जारी कर देना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि राज्य विवाह के पंजीकरण की कार्रवाई प्रभावी नियमों में संशोधन करके अथवा नवीन नियमों का सृजन करके कर सकता है। इसकी व्यापक लोक सुचना दी जाएगी तथा आपत्तियों के लिए खुले रूप से एक माह का समय दिया जाएगा। इस अवधि की समाप्ति के पश्चात राज्य विवाह पंजीकरण की कार्रवाई प्रांरभ करेंगे। न्यायालय ने पंजीकरण में उल्लिखित किये जाने वाली आवश्यकताओं की ओर निदेश देते हुए कहा इसके लिए एक अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान संबंधित नियमों में किया जाना चाहिए और उसको विवाह के पंजीकरण के लिए समुचित रूप से प्राधिकृत किया जाना चाहिए। पंजीकरण मने विवाह के पक्षकारों की आयु ,वैवाहिक स्थिति (अविवाहित, तलाकशुदा) का स्पष्ट उल्लेख होगा। विवाह को पंजीकृत नहीं करना अथवा असत्य घोषणा करने के परिणामों का भी उल्लेख नियमों में किया जाना चाहिए। न्यायालय की स्पष्टतः यह अवधारणा थी कि इन परिस्थितियों में सम्बन्धित नियमों में दंड का प्रावधान होना चाहिए। निष्कर्ष और सुझाव विवाह के अधिकार को विकसित सामाजिक विकास का सुस्थापित और अनिवार्य स्वरूप का मापदंड अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार कर लिया गया है। सम्प्रति के परिवर्तनशील समाज में नित-नवीन परिवर्तन हो रहे हैः, मानवों की मनोकांक्षा, धारणा, सामंजस्य तथा कार्य-कलापों में परिवर्तन हो रहा है। विवाह के पवित्र बंधन को आज संविदा के रूप में आकलित किया जाने लगा है। संरक्षक अथवा माता-पिता के द्वारा पाल्य अथवा पुत्र-पुत्री के हित में किये गये विवाहों में विच्छेदन की स्थिति उत्पन्न हो रही है। जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा में बंधन के द्वारा मानव विभेद को प्रोत्साहन मिल रहा रहा है, तथा सामाजिक सौहार्दता में विभाजन हो रहा है। ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता को प्रबलता प्रदत्त करने की आवश्यकता का अनुभव किया जा रहा है। इस प्रकार के अनुभवता के पावन लक्ष्य की प्रतिपूर्ति के ली नवीन प्रयास, खोज और साधनों की खोज की जा रही है। इस प्रकार के खोज के अनुक्रम में विवाह के अधिकार को सांविधानिक तथा सांविधिक प्रास्थिति दिया जाना सभ्य राष्ट्रों की पहचान तथा अनिवार्य आवश्यकता है। अतः विवाह के अधिकार की व्यावहारिक स्वरुप में सुदृढ़ता के लिए निम्नलिखित सुझाव कारगर अथवा सहायक रूप में विचारणीय हो सकते हैं- विवाह के अधिकार को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 ‘ख’ में प्रतिस्थापित कर दिया जाना चाहिए, इस उद्देश्य के लिए संविधान पुनरीक्षित समिति की अनुशंसा सन 200२ के अनुरूप संविधान किया जाना चाहिए। मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा 1948 के अनुच्छेद 16, सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1966 अनुच्छेद २३, आर्थिक सामजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1966 के अनुच्छेद 10 तथा महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव का समापन अभिसमय 1979 के अनुच्छेद 16 प्रावधानों के अनुरूप ही विवाह के अधिकार को सर्वव्यापी और शाश्वत मानव अधिकार के रूप में व्यापक रूप से अंगीकार किया जाना चाहिए। विवाह के अधिकार के व्यावहारिक पक्ष को उजागर करने के लिए अंतरजातीय तथा अंतरधार्मिक विवाह को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। अंतरजातीय विवाह व्य्वस्क पुरुष तथा महिला द्वारा स्वतंत्र सहमति से सम्पादित किया जाने पर संबंधित दम्पत्ति को सामजिक तथा विधिक संरक्षण दिया जाना चाहिए उनको असत्य आपराधिक मामलों में फंसाये जाने पर गैर सरकारी संस्थाओं तथा सामजिक कार्यकर्त्ताओं द्वारा उनकी सहायता करनी चाहिए। विवाह के अनिवार्य पंजीकरण के लिए राज्यों के द्वारा संविधान के अनुसूची के समवर्ती सूची में संख्या 30 में उल्लिखित विषय के अनुरूप विधि का सृजन किया जाना चाहिए। इस उद्देश्य के लिए भारत संघ को भी विधि को संहिताकृत स्वरूप में परिवर्तित करना चाहिए। विवाह के पंजीकरण की सुचना में पक्षकारों द्वारा घोषित सुचना के असत्य होने अथवा छुपाये जाने और कपट पूर्ण सुचना देने पर विधिक रूप से दंड का प्रावधान होना चाहिए। विवाह के पंजीकरण के लिए प्रत्येक ग्राम सभा, ब्लॉक और जिला स्तरों पर कार्यालयों की स्थापना की जानी चाहिए अथवा इस कार्य का दायित्व क्षेत्रीय पंचायत के पदाधिकारियों को दिया जाना चाहिए। विवाह के पंजीकरण के लिए किसी भी प्रकार की शुल्क की व्यवस्था नही की जानी चाहिए। तलाक, न्यायिक पृथक्करण अथवा मृत्यु की अवस्था में भी विवाह पंजीकरण पंजिका में इनके विवरण को उल्लिखित किये जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। बाल विवाह प्रथा को समाप्त करने तथा दहेज प्रथा की कुरीति को दूर करने के लिए स्वैच्छिक स्वंतंत्र सहमति से सामूहिक अवसर अथवा सावर्जनिक रूप से पति अथवा पत्नी के चयन की व्यवस्था को बल दिया जाना चाहिए तथा चयनित किये जाने के उपरांत विशेष विवाह अधिनियम में संशोधित करके इस प्रकार के विवाह के लिए विधिक मान्यता का प्रावधान किया जाना चाहिए। सन्दर्भ संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर की उद्देशिका का द्वितीय पैरा संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर अनुच्छेद 56 के उपबन्ध के अनुरूप सदस्य राष्ट्रों ने अलग-अलग और मिलकर चार्टर के लक्ष्य के प्राप्ति के लिए कार्य करने शपथ ली। विनोद कुमार मिश्र, विकलांगों के अधिकार 2006 पृष्ठ 14. मानव अधिकारों के सार्वभौम घोषणा 1948 की उद्देशिका का सरांश मानव अधिकारों के सार्वभौम घोषणा 1948 अनुच्छेद 121। सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1966 के अनुच्छेद 17 में भी उल्लेख किया गया है कि किसी भी व्यक्ति के एक्नान्त्ता, परिवार, घर अथवा पत्राचार में किसी भी प्रकार का अविधिक हस्तक्षेप न ही किया जाएगा, नहीं किसी के सम्मान तथा प्रतिष्ठा पर हमला किया जाएगा। मानवधिकारों की सार्वभौम घोषणा1948, अनुच्छेद 16(1) तत्रैव अनुच्छेद 16 (२) तत्रैव अनुच्छेद 16 (3) डॉ. शिवदत्त शर्मा, मानव अधिकार 2005 अध्याय 3 उपशीर्षक विवाह करने तथा परिवार रखने का अधिकार सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1986 अनुच्छेद २३ (1) तत्रैव अनुच्छेद २३ (२) तत्रैव अनुच्छेद २३ (3) तत्रैव अनुच्छेद २३ (4) सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1986 अनुच्छेद २३ (२) तथा मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 16 (1) का तुलनात्मक अध्ययन तत्रैव अनुच्छेद २३ (1) बच्चे की संरक्षा के लिए मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 25 (२) में आंशिक उपबन्ध की व्यवस्था है, लेकिन सिविल और राजनैतिक अधिकारों की की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 25 (२) अजन्मे बच्चे की संरक्षा का भी उपबन्ध है, जबकि अजन्में बच्चे की संरक्षा की व्यवस्था प्रसंविदा में नहीं की गयी है। सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1986 अनुच्छेद २4(२) तत्रैव अनुच्छेद २4 (3) संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने प्रस्ताव संख्या 2200 ए (इक्कीस) 16 दिसबंर 1966 को आर्थिक, सामजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की प्रसंविदा को अंगीकार किया यह प्रसंविदा 3 जनवरी 1979 में प्रवर्तन में आई है। तत्रैव अनुच्छेद 10 (1) तत्रैव अनुच्छेद 10 (२) तत्रैव अनुच्छेद 10 (3) मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा 1948 अनुच्छेद 12, 16 सिविल और राजनैतिक अधिकारों की अतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1966 अनुच्छेद २३ तथा आर्थिक, सामजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1966 का अनुच्छेद 10 का तुलनात्मक अध्ययन महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव का समापन सम्बन्धी अभिसमय 1979 अनुच्छेद 16 (1) तत्रैव अनुच्छेद 16 (1) तत्रैव अनुच्छेद 16 (1) (क) तत्रैव अनुच्छेद 16 (1) (ख) तत्रैव अनुच्छेद 16 (1) (ग़) तत्रैव अनुच्छेद 16 (1) (घ) तत्रैव अनुच्छेद 16 (1) (ड.) तत्रैव अनुच्छेद 16 (1) (च) तत्रैव अनुच्छेद 16 (1) (छ) तत्रैव अनुच्छेद 16 (1) (ज) तत्रैव अनुच्छेद 16 (२) तत्रैव अनुच्छेद 9 (1) तत्रैव अनुच्छेद 9 (२) सी ए डी खंड सप्तम पृष्ठ 846 ए.अ आई. आर. 2002 जर्नल 353 तत्रैव --- (2006) 5 एस सीसी 475 तत्रैव सम्बन्धित मामले में याचिकाकर्ता महिला ने वयस्क आयु प्राप्त करने पर अपनी स्वतंत्र सहमति से वयस्क पुरुष से अंतरजातीय विवाह कर लिया तथा विवाह के पश्चात् याचिकाकर्ता के भाई ने याचिकाकर्ता के पति के रिश्तेदारों के विरुद्ध अपनी बहिन के खोने तथा सम्बन्धित व्यक्तियों के द्वारा गायब करने का अपराधिक मामला संस्थित किया, परिणाम स्वरुप याचिकाकर्ता के पति के रिश्तेदारों को बंदी बना लिया गया तथा इसके अतिरिक्त याचिकाकर्ता के भाइयों ने याचिकाकर्ता के पति के माता-पिता को पीटा, उन्हें बंद कमरे में तीन और चार दिन तक बिना भोजन तथा पानी के बंद कर दिया तथा उनकी खेतों की फसल नष्ट कर दी तथा उनका व्यवसाय समाप्त कर दिया और याचिकाकर्ता तथा उसके रिश्तेदाओं के विरुद्ध अपनी बहिन के अपहरण की झूठी प्रथम इतल्ला सूचना दायर कर दी। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में निर्णय देते हुए अभिनिर्धारित किया कि याचिकाकर्ता विवाह के समय वयस्क थी, इसलिए वह विवाह करने के लिए स्वंतंत्र थी अथवा जिसके साथ चाहती रहने के ली स्वंतंत्र थी। न्यायालय ने यह भी कहा कि हिन्दू विवाह अधिनियम और अन्य विधि में अंतरजातीय विवाह करने में कोई प्रतिबन्ध नहीं हिया, इसलिए हमें नहीं लगता कि याचिकाकर्ता,उकसे पतिऔर रिश्तेदारों ने कोई अपराध किया है। न्यायालय ने आगे कहा किसी ने भी कोई अपराध नहीं किया है। इसलिए याचिकाकर्ता के पति तथा रिश्तेदारों के विरुद्ध दायर आपराधिक मामले को निरस्त किया जाता है और याचिकाकर्ता के भाइयों तथा अन्य रिश्तेदारों के विरुद्ध विधि के अनुसार आपराधिक प्रक्रिया प्रारंभ की जाए। उत्प्रेषण याचिका क्षेत्राधिकार के बिना कार्य करने, अधिकारातीत कार्य करें, क्षेत्राधिकार का दुरुपयोग करने, नैसर्गिक न्याय का उल्लंघन होने, अभिलेख में स्पष्टतः प्रकट होने वाली गलती और छल के मामलों में जारी की जाती है। परमादेश याचिका लोक प्राधिकारी के विरुद्ध लोक कतर्व्य की पूर्ति किये जाने के लिए की जाती है, इसको जारी करने के आधार वहीं हैं, जो उत्प्रेषण तथ प्रतिषेध याचिका जारी करने के हैं। (2006) २ एस सी सी 578 उच्चतम न्यायालय का सम्बन्धित वाद न्यायमूर्ति अजीत पसायत तथा न्यायमूर्ति एस एस कपाड़िया ने विनिश्चित किया। महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव का समापन संबधी अभिसमय 1979 के अनुच्छेद 16 (२) में उपबन्ध किया गया है कि बच्चे की सगाई तथा विवाह का कोई विधिक प्रभाव नहीं होगा और विधि में समस्त आवश्यक कार्यवाही, विवाह की न्यूनतम उम्र और विवाह का अनिवार्य पंजीकरण का उल्लेख होगा। भारत में विवाह के लिए लड़का तथा लड़की की उम्र के लिए शारदा अभिनियम बना हुआ है। सम्प्रति लड़के की विवाह की उम्र 21 वर्ष तथा लड़की की उम्र 18 वर्ष निर्धारित की गई है। न्यायालय द्वारा सीमा बनाम अश्व्वनी कुमार (2006) २ एस सी सी 578 के मामले को विनिश्चित किये हुए (अप्रैल 2007 सम्बन्धित शोध पत्र लिखे जाने की तिथि तक) लगभग 1 वर्ष २ माह का समय व्यतीत हो चूका है। राज्य सरकारों ने इस विनिश्चय के अनुसार विवाह के पंजीकरण करवाए जाने के लिए कोई प्रक्रिया प्रारंभ नहीं की है। लेखन : डॉ एस.डी. शर्मा स्रोत: मानव अधिकार आयोग, भारत सरकार