<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify;">परिचय</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-right" title="Gandhi" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/social-welfare/93893e92e93e91c93f915-93894193091594d93793e/92e93e92893593e92793f91593e930-92892f940-92693f93693e90f901/gandhi.jpg" alt="Gandhi" width="161" height="202" /></p> <p style="text-align: justify;">मानव के अधिकार एवं कर्तव्य समाज में उसकी गरिमा और प्रतिष्ठा के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं। इन्हीं अधिकारों और कर्तव्य को मद्देनजर रखते हुए विभिन्न समाज सुधारकों ने तन-मन धन मानव अधिकारों की रक्षा में न्यौछावर कर विश्व ब्धुत्व पर विशेष बल दिया जिनमें महात्मा गाँधी, राजा राममोहन राय, अब्राहम लिंकन, मदर टेरेसा, नेल्सन मंडेला के नाम प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं।</p> <p style="text-align: justify;">मानव अधिकारों के हक में लड़ी जाने वाली इस लड़ाई की शुरुआत हाड़-मांस के एक समान्य से दिखने वाले इंसान ने दक्षिण अफ्रीका में रेलगाड़ी में सफर के दौरान की और अपनी अतिम सांस तक इस लड़ाई को जारी रखा। आगे चलकर वही व्यक्ति जन-जन की चेतना बन महात्मा गाँधी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। समाज को बदलने के लिए गाँधी ने स्वयं को बदल दिया था। अहिंसा को उन्होंने बुनियादी जीवन का मूल्य माना। सत्य को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया है जिसका वार कभी निष्फल नहीं होता।</p> <p style="text-align: justify;">विश्व के विभिन्न मनीषियों, समाज सुधारकों ने के स्वर में इस बात को स्वीकार किया कि गाँधी के बिना मानवाधिकार की संकल्पना अधूरी रह जाती है। मानवाधिकार की पृष्ठभूमि गांधी की दृष्टि और दर्शन का ही परिणाम हैं।”</p> <h3 style="text-align: justify;">भारतीय समाज में अधिकार और कर्त्तव्य</h3> <p style="text-align: justify;">अधिकार और कर्तव्य की अवधारणा के बीज भारतीय समाज में प्राचीन कल से ही उपस्थित रहे हैं। चौदहवीं-पन्द्रहवी शताब्दी से ही इस संकल्पना का प्रस्फुरण तत्कालीन समाज में व्यप्त चिन्तन में दृष्टिगत होता अहि। उसकी स्थापना मनुष्य की गरिमा और प्रतिष्ठा को कायम करने के लिए की गयी थी। सत्रहवीं शताब्दी में इसके विकास के संबंध में कुछ आशा की किरण दिखाई दी अरु उन आशा किरणों ने समाज में नई क्रांति के बीज के रूप में कुछ समाज सुधारकों ने जन्म लिया और उनहोंने इस का भार अपने सबल कंधों पर लेकर विश्व में शांति और समन्वय की स्थापना के लिए एक जन आंदोलन की शुरुआत की। वैसे तो 18वीं-19वीं शताब्दी जिसे भारत के पुनरोत्थान का काल कहा जाता है, में सांस्कृतिक चिन्तन की अवधारणा के साथ-साथ मनुष्य के अधिकार और कर्तव्यों की अवधारणा के साथ-साथ मनुष्य के अधिकार और कर्तव्य की आवधारणा को भी व्यापक जनसमर्थन मिला। इस शताब्दी में ऐसे मनीषियों, विचारकों, समाज सुधारकों और राष्ट्रभक्तों का आविभार्व हुआ जिन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया। इनमें राजा राम मोहन राय, अब्राहम लिकंन, महात्मा गाँधी, नेल्सन मंडेला एंव मदर टेरेसा (18-19वीं शताब्दी में) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन सभी नें कर्मप्रधान विश्व की संरचना करने में महत्वपूर्ण अवदान किया है। इन लोगों ने जगत को विश्व बन्धुत्व का ऐसा पाठ पढ़ाया जो आज भी उतना ही प्रासंगिक और समीचीन है।</p> <p style="text-align: justify;">उपयुर्क्त पृष्ठभूमि में गांधीजी का नाम सबसे महत्वपूर्ण है। गाँधी जी के बारे में अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने कहा था कि आने वाली पीढियां इस बात पर विश्वास ही नहीं करेंगी कि हाड-मांस का ऐसा कोई इंसान इस धरती पर पहले कभी हुआ था।</p> <h3 style="text-align: justify;">गांधीजी के लिए मानवाधिकार की संकल्पना</h3> <p style="text-align: justify;">मानवाधिकार की संकल्पना बिना गाँधी के अधूरी है, क्योंकि मानवाधिकारों की सांस्कृतिक और वैचारिक पृष्ठभूमि गांधी की दृष्टि और उसके दर्शन पर ही आधारित है। अहिंसा के पुजारी गांधी जी, सभी विचारों के बीच एक ऐसा समन्वय स्थापित किया जहाँ से विश्व को व्यक्ति के मानवाधिकारों के लिए एक दिशा मिली।</p> <p style="text-align: justify;">गाँधी जी की मानवाधिकारों के लिए लड़ाई तब शुरू हुई जब दक्षिण अफ्रीका में उनके पास प्रथम श्रेणी का टिकट था, और उन्हें रेलगाड़ी में सफर नही करने दिया गया एवं उसके बाहर फ़ेंक दिया गया। तब उन्होंने वहाँ बसे भारतीय समुदाय के लोगों के मानवाधिकारों के बारे में जाच पड़ताल की। उनहोंने वहाँ बसे भारतीय समुदाय के लोगों की मदद की ताकि वे भेदभाव के शिकार न हो सकें। एक सहमे हुए भारतीय वकील ने दबे और बेसहारा तथा अधिकारहीन लोगों को उनके मानव अधिकार दिलाने में महारत हासिल कर ली। उनहोंने प्रस्तुतिकरण में आत्मविश्वास हासिल किया एवं वे सर्वोच्च नयायालय में वकालत करने लगे। आने वाले कई हफ्तों तक उनके खिलाफ हिंसात्मक प्रदर्शन एवं प्रतिरोध हुआ।</p> <p style="text-align: justify;">जब 1889 में बोर युद्ध हुआ तो उनहोंने करीब हजार लोगों का दस्ता तैयार किया जो युद्धभूमि में जाकर घायलों एंव अपंगों की देखभाल व बचाव का कार्य करता। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मदद से लगभग एक लाख भारतियों को, जो दक्षिण अफ्रीका में रहते थे, समान अधिकार दिलाने की उन्होंने पैरवी की। उन्होंने भारतियों से परमिट के नये नियम को विरोध करने को कहा। सत्याग्र व अहिसात्मक असहयोग आंदोलन उनके प्रमुख व शक्तिशाली हथियार बने। गांधी का समन्वयवादी सिद्धांत मनुष्य के विवेक की धुरी था और सत्याग्रह और अहिंसा की बुनियादी पर कायम था। गांधी ने अहिंसा के जिस सिद्धांत का प्रतिपादन किया उसकी कसौटी विश्व के सभी धर्मग्रन्थों का मूल थी। इस सन्दर्भ में बात को और अधिक प्रामाणित करने के लिए गांधीजी के कुछ उद्धरण प्रस्तुत हैं। गाँधी जी लिखते हैं अहिंसा व्यापक वस्तु है। हिंसा की होली को लपेट में आया हम पामर प्राणी है। जीवै जीव अधारा की बात गलत नहीं है। मनुष्य क्षणभर ही बाह्य हिंसा के बिना नहीं जी सकता। खाते-पीते, उठते-बैठते सब कर्मों से, इच्छा से हो या अनिच्छा से कुछ न कुछ हिंसा तो वे करता ही रहता है। उस हिंसा से निकलने का उसका महाप्रयास हो, उसकी भावना में अनुकम्पा हो। गांधी जो को कभी ये नहीं लगा कि राज्य की हिंसा निन्दीय है अरु क्रांतिकारियों की हिंसा स्वीकार्य है। इस मान्यता के लिए उन्होंने अपने जीवन में काफी लानत मलामत भी सही। इसका तात्पर्य यह है कि गांधीजी करनी और कथनी में कोई भेद नहीं था। वे जिसका विरोध करते थे उस पर मजबूती से खड़े दिखते थे। उनका जीवन प्राण जाए पर वचन नहीं जाए’ के सिद्धांत पर आधारित था।</p> <p style="text-align: justify;">अज्ञानता, अंधविश्वास से मुक्त, विवेकशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानवता को अपनाने वाले तथा हिंसा परमो धर्म: की नीवं डालने वाले महात्मा गाँधी का चिन्तन और दर्शन शान्ति, बन्धुत्व, सहिष्णुता, विकास और एकता जैसे विचारों से अनुप्रमाणित था। गांधीजी के जितने भी सिद्धांत देश व विदेश में प्रतिपादित हुए, उन सब के मूल में संकल्प का ताना-बाना हुआ था। उनका मानना था कि समाज को बदलने के लिए प्रभावित कर सकते हैं। वे व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं की एकाग्रता के सहारे सामासिक संस्कृति की बुनियादी रखना चाहते थे तथा व्यक्तित्व के विकास में इसका महत्वपूर्ण अवदान भी समझने थे। वे सकारात्मक तथा रचनात्मक कार्यों के द्वारा देश के लोगों के अह्दिकार और कर्तव्य के लक्ष्य को प्राप्त करने की धुरी समझते थे। वे विचार-विमर्श, परस्पर विनिमय तथा वैज्ञानिक तानों-बानों के सहारे प्रगतिशील विश्व की रचना करना चाहते थे जिसमें युवाओं की सकारात्मक सोच को विशेष महत्व देते थे। उनका मानना था कि हम सभी नियामक शक्ति की सत्ता के अंतर्गत निवास करते हैं इसलिए हमें कभी उस अदृश्य सत्ता के नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। वे इंसानों द्वारा मर्यादाओं को लांघते हुए प्रकृति के साथ किये जाने वाले दुर्व्यवहार के घोर विरोधी थे। वे प्रकृति और मनुष्य के बीच ऐसा अभेद संबधं स्थापित करना चाहते थे जो प्रकृति की साधना का मनुष्य की आंतरिक साधना के साथ एकात्म संबंध स्थापित करने में सफल हो सके। गांधी जी का कहना था हिंसापूर्ण समाज में हम अहिंसा को सर्वोच्च मानवीय मूल्य के तौर पर स्वीकार करने की हिम्मत रखते हैं तो हम उसमें अपने साथ-साथ दूसरों के लिए भी उसी मूल्य को स्थापित करने का प्रयास करते हैं। गांधी की अहिंसा पारम्परिक धार्मिक अहिंसा से भिन्न इस अर्थ में है कि वह किसी धार्मिक आदर्श और किसी धार्मिक मूल्य की अनुगामी नहीं है बली वह तरह-तरह के धर्माचरणों कीकसौटी पर स्वयं खड़ी दिखाई देती है। गाँधी जी के लिए अहिंसा केवल आदर्श नहीं है बल्कि बुनियादी जीवन मूल्य भी है। संयम और करुणा की व्याख्या करते हुए गाँधी जी ने लिखा है, संयम केवल दूसरे पर की जाने वाली कृपा नहीं है बल्कि खुद की जीवन को जीने के लिए बुनियादी बोध है।</p> <p style="text-align: justify;">संसार का कोई भी ऐसा धर्म नहीं है, हिंसा का उपदेश देता हो या मार्ग बताता हो। विश्व में जितने भी चर-अचर प्राणी हैं, उन सबमें एक दूसरे के प्रति सहयोग, आपसी भाई चारा, परस्पर सदभाव, सर्वधर्म समभाव का तत्व विराजमान है। गांधीजी की आंतरिक साधना और दिनचर्या में भी मानव अधिकारों की साफ झलक दिखाई पडती है। अपनी दैनिक दिनचर्या में दूसरों के अधिकारों का हनन न हो, इसका उनहोंने हमेशा ध्यान किया, चाहे वो पूजा का समय हो, चाहे वो रात्रि में सोने का समय हो, चाहे वो साधना का समय हो, सब में वे इस बाद ध्यान रखते थे कि मेरे कारण किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत एंव समष्टिगत अधिकारों का कोई उल्लंघन न हो। वे कर्म पर आधारित विश्व की संरचना को देखना चाहते थे। उन्हें भारतीय वर्ण व्यवस्था उतनी ही प्रिय थी जितनी भारतीय कर्म व्यवस्था। वे दोनों के परस्पर सहयोग से एक ऐसे विश्व की नींव रखना चाहते थे जिसमें धर्म, कर्म, जाती, उंच-नीच, सब कुछ एक में समा जाए और विश्व का अस्तित्व “सर्वे भवन्तु सुखिन” एवं ईशावास्यमिदम, सर्वम – जगन्या जगत’ के सिद्धांत पर कायम रहे। गाँधी जी उपनिषद के इस मंत्र से बहुत ही प्रभावित थे और इसे वे सार्वभौम मानवीय मूल्यों की अभिव्यक्ति का तथा ऋषियों की वाणी का अनोखा वरदान समझते थे। वे इसके घोर विरोधी थे कि ब्राह्मण के यहाँ पैदा हुआ बच्चा, पैदा होते ही कुलीन वशं का माना जाएगा। अपने आश्रम में भी इस भेद-भाव के प्रति उनका गुस्सा हमेशा फूटता रहता था और वे कभी-कभी आश्रम के लोगों को सख्त हिदायत देते रहते थे कि हामरे आश्रम में कोई भी व्यक्ति उंच-नीच की मानसिकता न रखे, परस्पर सदभाव से रहे और सब में ईश्वर का वास देखें, क्योंकि उनके दर्शन में इंसानियत को खास महत्व दिया गया है। वे इंसानियत के चश्मे से सभी धर्मों के प्रमुख ग्रथों का प्रारायण करते थे। वे कहा करते थे कि सभी जाति के इंसानों के खून का रंग का ही होता है। यदि ईश्वर के द्वारा जाति को प्रधानता दी जाती तो वे उनके लहू के रंग को भी अलग-अलग बना देते । वे हमेशा कहा करते थे, चाहे हिन्दू का हो, चाहे मुस्लिम का हो, चाहे ईसाई का हो या सिख का हो, लहू का रंग एक ही होता है। इस सबंध में वे आश्रम वासियों को हमेशा के उदाहरण देकर कहा करते थे कि जिस प्रकार कफन और हवन के धुन्धों के रगों को कोई अंतर नहीं होता है, उसी प्रकार इंसानियत के लहू के रंग में भी कोई अंतर नहीं होता है। उनका मानना था कि अँधेरा जितना घना होता है, दीपक उतना ही प्रासंगिक होता है। उनकी साधना “वसुधैव कुटुम्बकम्” के सिद्धांत पर आधारित थी, और उनकी सोच “एकम सद विप्रा वदन्ति’ पर आधारित थी।</p> <p style="text-align: justify;">वे मन, कर्म, वचन तीनों से एक थे वे कह सके कि “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। उनका कहना था कि सत्य शाश्वत है। वे सत्य के अवतार थे और अपने जीवन में वे ‘सत्यमवद, धर्ममचर’ का अक्षरशः पालन करते थे और आश्रमवासियों को भी इसी सूत्र में बंधने की सीख देते थे। वे गीता के कर्म एवं ज्ञान योग के सिद्धांत के प्रबल समर्थक थे। वे केवल इसके समर्थक ही नहीं उसे अपने जीवन में ज्यों का त्यों अपनाते भी थे। वे विश्व के सभी धर्म ग्रथों में मावनीय संवेदना मानवाधिकारों, मावनीय गरिमा के सूत्र को खोजते रहते थे, और जो जहाँ जिस रूप में मिलता तथा उसे वे अपने जीवन में उतारने की कोशिश करते। इन सूत्रों पर संवाद और बहस भी खूब करते थे। वे उपनिषदों की विचारधारा से विरोध प्रभावित थे तथा उसे ज्ञान की गंगा मानते थे। गाँधी जी आदर्श एंव व्यवहार की शिक्षा के प्रति हमेशा सजग थे और वे कर्म की शिक्षा को सर्वोपरि महत्व देते थे। वे भारतीय चिन्तन धारा के उस मार्ग के अनुयायी थे, जिसमें ज्ञान, कर्म एवं भक्ति की त्रिवेणी बहती है। वह अनुभवजन्य ज्ञान की शलाका के ऐसे तीर्थोदक थे, जिसके स्पर्श मात्र से हो लोग प्रभावित हुए बिना नही रहते थे। उनकी वाणी में राष्ट्र भक्ति और जनकल्याण की अजस्त्र धारा निरंतर बहती थी।</p> <h3 style="text-align: justify;">गाँधी – दर्शन से शांति और मानव अधिकार स्थापित होगा</h3> <p style="text-align: justify;">उपरोक्त तत्थों के आलोक में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि गाँधी-दर्शन के बिना शान्ति और मानव अधिकारों के संकल्पना बेमानी होगी क्योंकि गांधी जी ने जिस इंसानियट की बुनियादी अवधारणा का बीज बोया उसकी आधारशिला सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, शारीरिक श्रम, सादगी और सत्याग्रह पर आधारित थी। सत्याग्रह की व्याख्या करते हुए, गांधीजी ने लिखा है सत्याग्रह का अर्थ है अपने घोर विपक्षी के सत्य में भी, उसकी संभावना में भी आस्था रखना। विश्व में यदि कहीं भी मानव अधिकारों की अवधारणा के संबंध विमर्श व् बहस होगी टी उनमें गांधीजी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से जिक्र अवश्य होगा। यह सर्वदित है कि गांधी जी का जीवन स्वयं अपने लिए नहीं था, बल्कि दूसरों के लिए समर्पित था। जिसका जीवन हमेशा दूसरों के लिए रहा हो, उससे अधिक परमार्थ व मानव अधिकार की बात करने वाला दूसरा कोई व्यक्ति हो नहीं सकता। उनके जीवन-दर्शन की मूल संकल्पना में व्यक्ति की गरिमा, प्रतिष्ठा और उसके सम्मान की बातें कूट-कूटकर कर भरी थीं। गाँधी जी मनुष्य के उर्प में अग्रेजों से भी प्राणी होने के कारण प्रेम भाव रखते थे। उन्हें भारत में ही नहीं अपितु विश्व में शान्ति का अग्रदूत, दलितों का मसीहा तथा सेवाभाव को प्रेरित करने वाले जननायक के रूप में जाना जाता है। गाँधी जी मानते थे कि शरीर सेवा के लिए प्राप्त है और ह्रदय आत्म दर्शन के लिए। गाँधी जी ने अपने जीवन में केवल सत्य का प्रयोग ही नहीं किया बल्कि उसको जीया भी। उनका विचार था केवल सत्य बोलने से ही मनुष्य एंव विश्व का कल्याण नहीं होगा बल्कि अपनी अंतरात्मा में रखते हुए सत्य को जीने की कला लानी होगी। ज्ञान और कर्म की साधना करने वाले तथा गीता के दर्शन को पाने जीवन की बुनियाद बनाने वाले गाँधी की विचारधारा की जड़ में मानवाधिकारों की संकल्पना का बीज स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बत होता है। अहिंसा और सर्व-धर्मसमभाव की गांधी जी की अवधारणा मानव अधिकारों की आधार शिला है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>लेखन : अंशु गुप्ता</strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong>स्रोत: <a class="ext-link-icon" title="अधिक जानकारी के लिए " href="http://www.nhrc.nic.in/" target="_blank" rel="noopener">मानव अधिकार आयोग</a>, भारत सरकार</strong></p> </div>