झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने रांची के मोरहाबादी स्थित जनजातीय कल्याण शोध संस्थान में तीन दिवसीय नेशनल ट्राइबल फेस्टिवल का उद्घाटन किया. डॉ रामदयाल मुंडा के 80वें जन्म दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम में राज्यपाल ने कहा कि इस प्रकार के आयोजनों से आदिवासी सभ्यता-संस्कृति को विश्व में अलग पहचान मिलेगी. जनजातीय समाज जो उत्पाद बना रहा है, उसे बाजार मिल रहा है, महिलाएं सशक्त हो रही हैं. श्रीमती मुर्मू ने लेखकों से अनुरोध किया कि वे जनजातीय समाज की कला-संस्कृति के बारे में ज्यादा से ज्यादा लिखें, ताकि देश-विदेश के लोग जनजातीय समाज के बारे में जान सकें. तीन दिनों तक चलनेवाले इस फेस्टिवल में देश के कोने-कोने से जनजातीय साहित्यकारों ने भाग लिया. संस्थान के निदेशक श्री रणेंद्र कुमार के द्वारा बताया गया कि तीन दिन तक चलने वाले इस कार्यक्रम में आदिवासी कविता, आदिवासी कहानी, आदिवासी उपन्यास, नाटक एवं अन्य गद्य विधाएं सहित आलोचना पर साहित्यकार अपनी बात रखेंगे. इसमें विनोबा भावे विवि के कुलपति, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विवि के कुलपति, रांची विवि के कुलपति सहित अन्य गणमान्य अतिथियों का संबोधन हुआ. ‘आदिवासी साहित्य विकास परंपरा’ पर परिचर्चा हई। कार्यक्रम में अनुज लुगुन, प्रेमी मोनिका तोपनो, सुषमा असुर, नितीशा खलखो, जितराय हांसदा, भोगला सोरेन, विनोद कुमरे, डॉ मिथिलेश, प्रो एल खियांग्ते ने अपनी बात रखी। ‘आदिवासी पुरखा साहित्य’ विषय पर जोराम गेलाम नावाम, डॉ गिरिधारी राम गौंझू, निसन रानी जमातिया, सुशीला धुर्वे, मनसिंद बड़ामुद, गणेश मुर्मू, जमुना बीनी तादर, शांति खलखो, नारायण उरांव, निर्मला पुतुल, धनेश्वर मांझी, डॉ सुरेश जगन्नाधाम, डॉ जिंदर सिंह मुंडा, संतोष कुमार सोनकर वक्तव्य दिये। समारोह के दौरान ‘आदिवासी मातृ भाषाओं का साहित्य’ विषय पर परिचर्चा हुई। इसमें वाल्टर भेंगरा, डॉ महेश्वरी गावित, कविता कर्मकार, दिनकर कुमार, डॉ इग्नासिया टोप्पो, प्रमोद मीणा व बीरबल सिंह अपने विचार रखे। ‘आदिवासी साहित्य और इतिहास’ पर डॉ महेश्वरी गावित, प्रो एल खियांग्ते, डॉ सिकरादास तिर्की, कमल कुमार तांती, मेरी हांसदा, सुशीला धुर्वे, राकेश कुमार सिंह, दौलत रजवार, राहुल सिंह व नंदलाल सिंह भूमिज अपनी बात रखे. जनजातीय नृत्य, नाटक का मंचन व फिल्म का प्रदर्शन भी हुआ। इसमें देश के 12-14 राज्यों से आये आदिवासी लेखकों और रचनाकारों ने अपनी कल्पना, शिल्प,आदिवासियों की उपलब्धियां और उनकी समस्याओं को साझा किया. एक-दूसरे के साथ संवाद किया और नये उत्साह से अपने-अपने क्षेत्र में और बेहतर करने का संकल्प दोहराया. समापन दिवस पर आदिवासी साहित्य और स्त्री जीवन के संघर्ष, आदिवासी साहित्य लेखन दशा, दिशा, वैविध्य और चुनौतियां, लघु कथा वाचन और काव्य पाठ के सत्र हुए इस दौरान 30 शोध पत्र भी प्रस्तुत किये गये। कालीदास मुर्मू ने कहा कि आदिवासी लेखन की प्रेरणा का मूल स्रोत प्रकृति है. डॉ अनुज लुगुन ने कहा कि अस्मितावाद के खतरे सभी जगह हैं. डॉ मीनाक्षी मुंडा ने कहा कि आदिवासी भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में शामिल कराना जरूरी है. इस सत्र की अध्यक्षता महादेव टोप्पो ने की इस मौके पर अधिवक्ता रश्मि कात्यायन, डॉ जोसफ बाड़ा, टीआरआई के निदेशक रणेंद्र कुमार, डिप्टी डायरेक्टर चिंटू दोरायबुरु, गुंजल इकिर मुंडा, डॉ अभय सागर मिंज उपस्थित थे शाम को पाइका नृत्य, जतरा नृत्य व मुंडारी नृत्य ने समां बांधा. झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने रांची के मोरहाबादी स्थित जनजातीय कल्याण शोध संस्थान में तीन दिवसीय नेशनल ट्राइबल फेस्टिवल का उद्घाटन किया. डॉ रामदयाल मुंडा के 80वें जन्म दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम में राज्यपाल ने कहा कि इस प्रकार के आयोजनों से आदिवासी सभ्यता-संस्कृति को विश्व में अलग पहचान मिलेगी. जनजातीय समाज जो उत्पाद बना रहा है, उसे बाजार मिल रहा है, महिलाएं सशक्त हो रही हैं. श्रीमती मुर्मू ने लेखकों से अनुरोध किया कि वे जनजातीय समाज की कला-संस्कृति के बारे में ज्यादा से ज्यादा लिखें, ताकि देश-विदेश के लोग जनजातीय समाज के बारे में जान सकें.तीन दिनों तक चलनेवाले इस फेस्टिवल में देश के कोने-कोने से जनजातीय साहित्यकारों ने भाग लिया. संस्थान के निदेशक श्री रणेंद्र कुमार के द्वारा बताया गया कि तीन दिन तक चलने वाले इस कार्यक्रम में आदिवासी कविता, आदिवासी कहानी, आदिवासी उपन्यास, नाटक एवं अन्य गद्य विधाएं सहित आलोचना पर साहित्यकार अपनी बात रखेंगे.इसमें विनोबा भावे विवि के कुलपति, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विवि के कुलपति, रांची विवि के कुलपति सहित अन्य गणमान्य अतिथियों का संबोधन हुआ. ‘आदिवासी साहित्य विकास परंपरा’ पर परिचर्चा हई। कार्यक्रम में अनुज लुगुन, प्रेमी मोनिका तोपनो, सुषमा असुर, नितीशा खलखो, जितराय हांसदा, भोगला सोरेन, विनोद कुमरे, डॉ मिथिलेश, प्रो एल खियांग्ते ने अपनी बात रखी।‘आदिवासी पुरखा साहित्य’ विषय पर जोराम गेलाम नावाम, डॉ गिरिधारी राम गौंझू, निसन रानी जमातिया, सुशीला धुर्वे, मनसिंद बड़ामुद, गणेश मुर्मू, जमुना बीनी तादर, शांति खलखो, नारायण उरांव, निर्मला पुतुल, धनेश्वर मांझी, डॉ सुरेश जगन्नाधाम, डॉ जिंदर सिंह मुंडा, संतोष कुमार सोनकर वक्तव्य दिये।समारोह के दौरान ‘आदिवासी मातृ भाषाओं का साहित्य’ विषय पर परिचर्चा हुई। इसमें वाल्टर भेंगरा, डॉ महेश्वरी गावित, कविता कर्मकार, दिनकर कुमार, डॉ इग्नासिया टोप्पो, प्रमोद मीणा व बीरबल सिंह अपने विचार रखे। ‘आदिवासी साहित्य और इतिहास’ पर डॉ महेश्वरी गावित, प्रो एल खियांग्ते, डॉ सिकरादास तिर्की, कमल कुमार तांती, मेरी हांसदा, सुशीला धुर्वे, राकेश कुमार सिंह, दौलत रजवार, राहुल सिंह व नंदलाल सिंह भूमिज अपनी बात रखे. जनजातीय नृत्य, नाटक का मंचन व फिल्म का प्रदर्शन भी हुआ।इसमें देश के 12-14 राज्यों से आये आदिवासी लेखकों और रचनाकारों ने अपनी कल्पना, शिल्प,आदिवासियों की उपलब्धियां और उनकी समस्याओं को साझा किया. एक-दूसरे के साथ संवाद किया और नये उत्साह से अपने-अपने क्षेत्र में और बेहतर करने का संकल्प दोहराया. समापन दिवस पर आदिवासी साहित्य और स्त्री जीवन के संघर्ष, आदिवासी साहित्य लेखन दशा, दिशा, वैविध्य और चुनौतियां, लघु कथा वाचन और काव्य पाठ के सत्र हुए इस दौरान 30 शोध पत्र भी प्रस्तुत किये गये।कालीदास मुर्मू ने कहा कि आदिवासी लेखन की प्रेरणा का मूल स्रोत प्रकृति है. डॉ अनुज लुगुन ने कहा कि अस्मितावाद के खतरे सभी जगह हैं. डॉ मीनाक्षी मुंडा ने कहा कि आदिवासी भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में शामिल कराना जरूरी है. इस सत्र की अध्यक्षता महादेव टोप्पो ने की इस मौके पर अधिवक्ता रश्मि कात्यायन, डॉ जोसफ बाड़ा, टीआरआई के निदेशक रणेंद्र कुमार, डिप्टी डायरेक्टर चिंटू दोरायबुरु, गुंजल इकिर मुंडा, डॉ अभय सागर मिंज उपस्थित थे शाम को पाइका नृत्य, जतरा नृत्य व मुंडारी नृत्य ने समां बांधा.