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प्रमाणित बीज उत्पादन कार्यक्रम

प्रमाणित बीज उत्पादन कार्यक्रम

प्रमाणित बीज

प्रमाणित बीज जानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि बीज क्या है? सुसुप्त भ्रूण को बीज कहते है। यदि इसे विस्तार दे तो ऐसा परिपक्व सुसुप्त भ्रूण जिसमें उसके प्रारंभिक पोषण के लिए भोजन सामग्री बीज पत्रों या एंडोस्पर्म के रूप में आवरण में हो और अनुकुल दशाओं में एक स्वस्थ पौधे को जन्म दे, बीज कहलाता है। ऐसा बीज जो भारत सरकार द्वारा निर्धारित भारतीय न्यूनतम बीज प्रमाणीकरण मानकों की पालन करते हुए राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा प्रमाणित किये जाते हैं, वेह प्रमाणित बीज कहलाते हैं। केन्द्रक बीज, प्रजनक बीज, लेबल बीज, टेस्ट स्टाक बीज प्रमाणित नहीं होते बल्कि सभी वैधानिक रूप से लेबल बीज होते है।

प्रमाणित बीज की गुणवत्ता

प्रमाणित बीज तैयार करने में बीज की गुणवत्ता को निम्न प्रकार सुनिश्चित किया जाता हैं-

1. अनुवांशिक शुद्धता – अनुवांशिक शुद्धता का अर्थ हैं, किस्म विकास के समय जनक प्रजनक द्वारा बताये गुणों वाले पौधों के अलावा एनी प्रजाति के बीज, खरपतवार, रोगी पौधों की छटाई करना और गुणों में बदलाव को रोकना हैं,यह कार्य बीज प्रमाणीकरण अधिकारी और बीज उत्पादकों द्वारा किया जाता है। अनुवांशिक शुद्धता निम्न क़दमों से सुनश्चित की जाती है –

  • कृषक का चुनाव – बीज उत्पादन में ऐसे कृषक का चुनाव करते हैं। जो कृषि ज्ञान और बीज उत्पादन की पृष्ठ भूमि का हो और ऐसा न हो कि कृषक की ना समझी के कारन बीज में किसी स्तर पर मिलावट हो जाएँ।
  • किस्म का चुनाव – प्रमाणित बीज तैयार करते समय ऐसी किस्म का चुनाव करते हैं जिसमें अधिकतम उत्पादन देने एवं अधिकतम रोगरोधी क्षमता हो। किस्म में स्थायित्व एक रूपता और विलक्षणता के लक्षण हो।
  • बीज का स्त्रोत – प्रमाणित बीज उत्पादन के लिए आधार बीज या प्रजनक बीज प्रयोग करते है और वह भी किसी विश्वविद्यालय या प्रमाणीकरण संस्था द्वारा तैयार किया गया हो। राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था प्रमाणित बीज उत्पादन का कार्यक्रम स्वीकार करते समय और निरक्षण के समय स्त्रोत की जांच करती है।
  • छटाईं – कृषक खड़ी फसल में दूसरी जाती के पौधे, खरपतवार, रोगी पौधों की छटाईं करता है। और बीज प्रमाणीकरण अधिकारी खड़ी फसल का निरिक्षण करता है और मानक की पुष्टि न होने पर निरस्त भी कर देता है।
  • आइसोलेशन – किस्मों में अवांछित परागण से मूल लक्षणों में परिवर्तन न आये उसके लिए प्रत्येक किस्म को निर्धारित आइसोलेशन (पृथकीकरण) अंतर पर लगाते है। अत: शुद्धता बनी रहती है जैसे बाजरा में 200 मी., अरहर में 250 मी.,भिन्डी में 250 मी. आदि।
  • बीज निकालना – बीज निकालने और गोदाम में लाने तक ध्यान रखा जाता है। ताकि बीज में किसी प्रकार मिलावट न हो। स\थ्रेशिंग की मशीन साफ़ हो और गोदामों में प्रत्येक किस्म का बीज अलग लगाते हैं, बोरियां (थैले) उलटे करके साफ़ भरे जाते हैं और हर बैग पर किस्म का नाम लिखा होता है।
  • ग्रो आउट टेस्ट – बीज तैयार होने पर वितरण से पहले भी पुन: बीज को उगा कर देखा जाता है और चैक किया जाता है की किस्म के गुणों में कोई परिवर्तन तो नहीं आया है और शुद्ध बीज ही अगले सीजन में बीजाई के लिए वितरित किया जाता है।

2. भौतिक शुद्धता – बीज की भौतिक शुद्धता के लिए निम्न उपाय किये जाते हैं-

  • बीज की चमक – यद्यपि बीज प्रमाणीकरण में चमक (लस्टर) प्रभावित बीज लेने की मनाही नहीं है परन्तु फसल का रॉ सीड प्रोसेसिंग प्लांट पर लेने से पूर्व इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि बीज की चमक प्रभावित न हो और बीज भींगा और उगा हुआ न हो।
  • छनाई – ग्रेडिंग – रॉ सीड की मात्र का राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा सत्यापन करने के बाद भारत सरकार द्वारा निर्धारित जालियों में स्कैलपर और ग्रेडर तथा ग्रेविटी सेपेरटर मशीनों में गुजर कर बारीक बीज, खरपतवार बीज, रेट मिटटी से अलग किया जाता है।
  • कपास की डीलिटिंग – कपास बीज की डीलीटिंग कर रोएं रहित किया जाता है, यह डीलिंटर मशीन या गैस या तेजाब द्वारा की जाती है और डीलिंट किये हुए बीज में कच्चा, कीटों से प्रभावित, छोटा बीज नहीं रहता और अंकुरण अधिक होता है।
  • बीज परिक्षण – प्रभावित बीज ग्रेडिंग के बाद लॉटवॉइज परिक्षण हेतु बीज परिक्षण प्रयोगशाला में भेजे जाते है। और वहां उनकी अंकुरण, भौतिक शुद्धता, रोग रोधी बीज टेस्ट किये जाते है। और न्यूनतम मानकों को पूरा करने पर ही लॉट पैक किये जाते है।
  • पैकिंग – पैकिंग सामग्री बीज की सुरक्षा को प्रभावित करती है। अत:कपडा या जुट सामग्री प्रयोग में लेट हैं और वाष्परोधी सामग्री में पाउच पैकिंग, एल्युमीनियम फॉयल, टिन बॉक्स प्रयोग में लाते है। प्रत्येक बैग पर अंकुरण, भौतिक शुद्धता,लॉट न0, वर्ग आदि सूचनाओं सहित हरे रंग के लेबल और नीले रंग के टैग लगाये जाते है। पैकिंग सामग्री का चुनाव करते समय ध्यान रखते हैं कि लम्बे समय तक भण्डारण करने पर बीज का अंकुरण प्रभावित न हो।
  • नमी प्रतिशत – बीज पैक करते समय प्रभावित बीजों को न्यूनतम बीज प्रमाणीकरण मानकों में दी गयी नमी प्रतिशत से ज्यादा नहीं रखते हैं जैसे दाल वाली फसलों की अधिकतम नमी 9 प्रतिशत तथा खाद्यानों की 12 प्रतिशत होती हैं।

3. कार्यकीय शुद्धता – प्रमाणित बीज उत्पादन में बीज की ओज टेस्ट कराकर बीज विक्रय हेतु जारी किया जाता है क्योंकि अच्छी बीज ही खेत में स्वस्थ फसल दे पाती है।

4. स्वास्थ्य शुद्धि – प्रमाणित बीज करते समय ध्यान रखा जाता हैं की रोगी बीज कृषक के खेत में न जाएँ। इसके लिए रोग रोधी किस्मों का चुनाव किया जाता है। रोगरोधी पौधों की खडी फसल में छटाई मशीनों द्वारा ग्रेडिंग कर रोगी बीज निकल दिया जाता है। बीज परिक्षण शाला में रोगग्रस्त बीज पाए जाने पर लॉट निरस्त हो जाता है। इसके अलावा मानी स्तर तक रोग-ग्रस्त बीजों को उपचार करके पैक किया जाता है। कीटों द्वारा भण्डारण में क्षति को रोकने हेतु समय-समय पर कीटनाशकों का स्प्रे तथा फ्युमिगेष्ण कर बीज को स्वस्थ रखा जाता है।

बीज प्रमाणीकरण का उद्देश्य

बीज प्रमाणीकरण का उद्देश्य फसलों की अधिसूचित किस्मों का केन्द्रीय बीज प्रमाणीकरण मंडल द्वारा निर्धारित बीज प्रमाणीकरण के सामान्य नियमों तथा विभिन्न फसलों के विशिष्ट मानकों के अंतर्गत प्रमाणीकरण करना है, एवं उच्च गुणवत्ता के बीज की सामयिक उपलब्धता सुनिश्चित करना है।

प्रमाणीकरण हेतु फसलों/किस्मों की पात्रता

प्रमाणीकरण हेतु केवल वे ही फसलें/किस्में जो बीज अधिनियम -1996 की धारा-5 के अंतर्गत अधिसूचित की गयी हो, बीज प्रमाणीकरण की पात्रता रखती है।

बीज :- फसल उत्पादन बढ़ाने केलिए स्वस्थ एवं अनुवांशिक रूप से शुद्ध बीज एक महत्वपूर्ण साधन है।

बीजों की श्रेणी एवं स्त्रोत

बीजोत्पादन कार्यक्रम में प्रजनक से आधार, आधार से प्रमाणित एवं प्रमाणित – 1 से प्रमाणित – 2 श्रेणी के बीजों का ही पंजीयन होगा।

उन्नत बीज की चार प्रमुख श्रेणी है

1. केंद्रीय बीज (nucleus seed) – केंद्रीय बीज प्रजनक (वैज्ञानिक) द्वारा स्वयं तैयार किया जाता है। जो अनुवांशिक रूप से 100% शुद्ध होता है।

2. प्रजनक बीज (breeder seed) – केंद्रीय बीज से प्रजनक बीज स्वयं प्रजनक (वैज्ञानिक) के देख रेख में तैयार किया जाता है। यह केन्द्रीय बीज की संतति होती है। यह बीज भौतिक एवं अनुवांशिक रूप से 100 शुद्ध होता है। प्रजनक बीज के बोरे में पीले रंग का टैग लगा होता है।

3. आधार बीज (foundation seed) – इसका उत्पादन बीज प्रमाणीकरण संस्था की निगरानी में होता है। यह प्रजनक बीज की संतति होती है। आधार बीज के थैली पर प्रमाणीकरण संस्था का सफ़ेद रंग का टैग लगा होता है।

4. प्रमाणित बीज (certified seed) – यह बीज आधार बीज से तैयार किया जाता है। अतः यह आधार बीज की संतति होती है। प्रमाणित बीज उत्पादन बीज प्रमाणीकरण संस्था की देख रेख में किया जाता है। यह भी भौतिक एवं अनुवांशिक रूप से शुद्ध होता है। इसके बोरे/थैली पर प्रमाणीकरण संस्था का नीले रंग का टैग लगा होता है। परगित फसलों में बीज दो पीढ़ी तक मानी किया जा सकता है।

प्रमाणित बीज का महत्व

  • प्रमाणित बीज अनुवांशिक एवं भौतिक रूप से शुद्ध होते है, तथा इन पौधों में एकरूपता, गुणों में समानता एवं पकने की अवधि एक पाई जाती है।
  • बीज की अंकुरण क्षमता मानकों के अनुरूप होती है।
  • बीज की जीवन क्षमता उत्तम होती है। तथा पुष्ट भरा एवं चमकदार होता है।
  • प्रमाणित बीज के उपयोग से सामान्य बीज की उपेक्षा उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है।

पंजीयन शुल्क

बीज उत्पादन कार्यक्रम लेने वाले कृषकों को छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम, कृषि महाविद्यालय या मान्यता प्राप्त संस्थान के वितरण केन्द्रों से बीज उत्पादन हेतु आधार या प्रमाणित – 1 श्रेणी का बीज क्रय करना होता है, एवं फसल का छत्तीसगढ़ राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था में करने हेतु निर्धारित शुल्क समय सीमा में जमा करना होता है।

पंजीयन हेतु आवेदन पात्र के साथ बीज क्रय किये गए संस्थान के देयक, कैश मेमो तथा टैग आदि संलग्न करना आवश्यक है।

निर्धारित समय सीमा

  • खरीफ – बोनी के 20 दिनों के अंदर या 31 अगस्त तक
  • रबी – बोनी के 20 दिनों के अंदर या 31 दिसम्बर तक

प्रमुख फसलों के पंजीयन हेतु निर्धारित शुल्क का विवरण

फसल का नाम

पंजीयन शुल्क प्रति/मौसम प्रति कृषक

निरीक्षण शुल्क प्रति/हे.

बीज परीक्षण शुल्क

बीज स्वास्थ्य शुल्क

ग्रो आउट परीक्षण शुल्क

(आधार बीज लॉट)

धान,गेंहू एवं स्वपरागित फसलों पर

50

300

75

30

350

परागित एवं सब्जी वाली फसलें

50

350

75

-

350

संकर कपास

50

950

75

30

450

गन्ना

50

650

-

-

-

 

प्रमाणीकरण हेतु फसल स्थिति एवं शस्य क्रियाएं

बीज प्रमाणीकरण के लिए फसल उगाते समय प्रत्येक उत्पादक कृषक के लिए यह आवश्यक है, की वेह बताये गए कृषि सम्बन्धी कार्य विधियों का पालन करें :

जैसे :-

  • खेत में बोई गयी फसल एक ही किस्म की हो। मिश्रित खेती स्वीकृत नहीं होगी।
  • खेत में एक ही श्रेणी तथा एक ही वंशानुगत पीढ़ी का बीज बोया गया हो।
  • पूरे खेत में फसल की आयु एवं बाढ़ समान हो।
  • अन्य फसलें अथवा किस्मों के क्षेत्र के बीज बिर्धरित मानक अनुसार पर्याप्त पृथककरण दूरी पर बोई गयी हो।
  • संकर किस्मों के बेजोत्पदन में नर एवं मादा पौधों की अलग अलग पंक्तियाँ लगायी जाएँ तथा निर्धारित अनुपात (4:2) होना चाहिए।
  • फसल को यथासंभव रोग एवं कीटों से सुरक्षित रखें।
  • अन्य बातें जो बीज के स्तर पर बुरा प्रभाव दल सकती हैं, उनका हर संभव निराकरण करने का प्रयास करें ताकि बीज वांछित गुणवत्तापूर्ण स्तर का प्राप्त हो सके।
  • फसलों के पुष्पन अथवा कटाई पूर्व, खरपतवार एवं विभिन्न पौधों को खेत से पृथ्यक करना आवश्यक है।

कटाई, गहाई एवं ढुलाई

बीज फसल की कटाई, गहाई एवं ढुलाई के समय किसकी तरह मिश्रण हो जाएँ तो उच्च कोटि के बीज तैयार करने के उद्देश्य से किया गया सम्पूर्ण परिश्रम व्यर्थ हो सकता है।

प्रमाणीकरण संस्था के अधिकारी जहाँ आवश्यकता हो पूर्ण/आंशिक रूप से कतई गहाई एवं ढुलाई इत्यादि का समय समय पर जांच करते हैं, किन्तु संस्था के लिए यह संभव नहीं है की प्रत्येक कार्य की जांच कर सकें।

अत: बीज उत्पादक कृषक को प्रत्येक कार्य पूरी जिम्मेदारी व ईमानदारी के साथ करना नितांत आवश्यक है। तथापि बीज उत्पादकों को चाहिए कि वे बीज खेत की कटाई, गहाई, ढुलाई आदि की तिथि निश्चित कर संस्था के सम्बंधित अधिकारी को कार्य प्रारंभ करने के कम से कम तीन दिन पूर्व सूचित काना चाहिए, जिससे संस्था अगर आवश्यक समझे तो अपने प्रतिनिधि को निरीक्षण हेतु भेज सके

कृषकों को इन कार्यों में निम्न सावधानियां बरतनी चाहिए :-

  • कटाई – कटाई हार्वेस्टर से करने बीजों के मिश्रण की सम्भावना अधिक होती है। सोयाबीन बीज दो दालों में परिवर्तित हो जातें हैं जिससे गुणवत्ता प्रभावित होती है, और बीज कट जाते है। हार्वेस्टर के इस ड्रम को कटाई के पहले अच्छी तरह साफ़ करना चाहिए, यह सावधानी आवश्यक रूप से रखना चाहिए।
  • गहाई – यही उत्पादन कत्यक्रम एक से अधिक किस्मों का लिया गया हो तो गहाई करते समय अलग-अलग किस्मों के ढेर पर्याप्त दूरी पर अलग-अलग रखें तथा एक किस्म की गहाई पूरी हो जाये तो उत्पादित बीज को बोरों में भर कर खलिहान से हटा लिया जाये। उसके बाद खलिहान की अच्छी तरह से सफाई कर दूसरी किस्म अथवा फसल की गहाई करें। इससे फसल मिश्रण की सम्भावना खत्म हो जाती है।
  • ढुलाई – खलिहान से बीज बोरों में भर कर बोरों पर अपना नाम एवं पंजीयन संख्या तथा फसल, किस्म लिखकर बोरों का मुहं बंद कर प्रक्रिया केंद्र पर लाकर उसकी तुलाई आधी करवाकर प्रक्रिया प्रभारी से मात्रा की रसीद प्राप्त कर लें, यह ध्यान रखें कि बीज के साथ फसल निरीक्षण का अंतिम निरीक्षण प्रतिवेदन के बिना आपकी बीज प्रक्रिया प्रभारी स्वीकार नहीं होगा।

पृथक्करण दूरी

फसल की अनुवांशिक शुद्धता बनाये रखने के लिए बीज उत्पादन कार्यक्रम लेने वाले खेत एवं उसी फसल जाती की अन्य फसल बीज में पृथक्करण दूरी रखना आवश्यक है।

विभिन्न फसलों के न्यूनतम पृथक्करण दूरी निम्नानुसार रखना आवश्यक है :

क्र.

फसल का नाम

किस्म

पृथक्करण दूरी

आधार बीज उत्पादन

प्रमाणित बीज उत्पादन

1

धान

समस्त

3 मी.

3 मी.

2

रामतिल

-

400 मी.

200 मी.

3

मूंगफली

-

3 मी.

3 मी.

4

सोयाबीन

-

5 मी.

3 मी.

5

उड़द/मूंग

-

10 मी.

5 मी.

6

तिल

-

100 मी.

50 मी.

7

गेंहू

-

3 मी.

3 मी.

8

चना

-

10 मी.

5 मी.

9

सूर्यमुखी

-

400 मी.

200 मी.

10

अलसी

-

50 मी.

25 मी.

11

मक्का

-

400 मी.

200 मी.

12

मसूर

-

10 मी.

5 मी.

13

मटर

-

10 मी.

5 मी.

14

कुसुम

-

400 मी.

200 मी.

15

भिन्डी

-

400 मी.

200 मी.

16

कपास

संकर

50 मी.

30 मी.

17

गन्ना

-

3 मी.

3 मी.

 

विभिन्न फसलों के अंकुरण का माप दंड

क्र.

फसल का नाम

अंकुरण प्रतिशत

1

धान – अलसी,रामतिल,तिल,बरसीम

80

2

गेंहू,चना,राई,सरसों

85

3

मक्का (संकर)

90

4

अरहर, उड़द,मूंग,मसूर,बरबटी

75

5

मूंगफली, सोयाबीन, सूर्यमुखी,(संकर)

70

6

कपास

65

 

नोट:

  • मानक स्तर से कम अंकुरण होने पर बीज को काम में न लायें।
  • यदि बीज की कमी हो तो बीज की मात्रा बढ़ाकर बोनी चाहिए।

 

विभिन्न फसलों में मानक आद्रता

क्र.

फसल का नाम

आद्रता प्रतिशत

विशेष

1

अनाज वाली फसलें

12 प्रतिशत

मानक स्तर से अधिक आद्रता नहीं होनी चाहिए।

2

दलहनी फसलें

9 प्रतिशत

3

तिलहनी फसलें

8 प्रतिशत

 

 

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

 



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