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पारम्परिक व जैविक बीज संर्वधन

परिचय

आधुनिक मानव के उदभव व उसके विकास की कहानी बीजों के संरक्षण व रखरखाव से सीधे रूप से जुडी है| मनुष्य को जीवित रखने के लिए अन्न आवश्यक है जिसका उत्पादन बीजों के बिना असम्भव है| आज खेती के आधुनिकीकरण के कारण बीजों के लिए उत्पादन बीजों कम्पनियों पर निर्भर होते जा रहे हैं व साथ ही बीजों के रखरखाव के लिए विविध प्रकार के रसायनों का प्रयोग कर रहे हैं| बीजों के लिए किसान की बीज कम्पनियों पर स्थिति में आनेवाले समय में अपने बीजों के आभाव व बाजार में बढ़ती बीजों की कीमतों की वजह से गरीब किसान बीज नहीं खरीद पायेगा या फिर वह कर्जें के दुशचक्र में फंसता चला जायेगा| इस तरह चीरे-धीरे स्वतः ही बीजों का संवर्धन किसान के हाथों से निकल कर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों में चला जा रहा है|

इस दुशचक्र में किसान को फंसने से बचाने के लिए हमें पारंपरिक देसी बीजों को बचाकर रखने व अन्न भंडारण की नई तकनीकों की इजाद करने की आवश्यकता है| किसान व बीजों को अपने पारम्परिक, प्राकृतिक तौर तरीकों व संसाधनों से अपने ही खेत खलियानों व घरों में बचा सकता है| गरीब किसानों के उज्वल भविष्य के लिए बीज बचाव के रासायनिक तौर तरीकों को बंद करना होगा| किसानों द्वारा बीज संग्रहण, संरक्षण व अन्न भंडारण के कुछ जैविक व प्राकृतिक तरीके द्वारा किसानों ने सदियों से बीजों को बचाया है, यहाँ पर प्रस्तुत किये गये हैं|

स्वस्थ एवं अच्छे बीजों का चयन

बीजों की गुणवत्ता, उनके एकत्रित करने के समय व तौर तरीकों पर निर्भर करती है| बीजों को एकत्रित करते समय यह ध्यान में रखना अति आवश्यक है कि अच्छी बढ़त वाले स्वस्थ पौधों की पहचान कर उनके ही बीज बचाए जाएँ| खड़ी फसल में निरोगी पौधों को पहचान आकर उनके ही बीज एकत्रित करें क्योंकि ऐसे बीजों में रोग से लड़ने की प्राकृतिक ताकत होती है| फल तथा सब्जियों के बीजों के लिए फल चुनाव करते समय यह ध्यान रखें की पौधा रोग ग्रसित न हो | पौधे पर फलों या फलियों की संख्या अन्य पौधों से अधिक हो व फलों का आकार बड़ा हो या फली पुर्णतः पकी हुई हों|

बीजों का संरक्षण

बीजों को साफ करके 3-4 दिन तक हल्की धुप में सुखाएं व ठंडा होने पर भण्डारण करें| सामन्यतः किसी भी प्रकार के बीज में 14% से अधिक नमी नहीं होनी चाहिए, अन्यथा बीज कीड़ों या फुफंद से ग्रसित हो जाते हैं| एक जैसे आकार के बीजों को संरक्षित करें| टूटे हुए तथा रोगग्रस्त बीजों को  चुगकर व छानकर अलग करें|  बीजों से कंकर-पत्थर, खरपतवार व अन्य फसलों के बीजों को अच्छी तरह साफ कर लें| बीजों में थोड़ा सा भूसा रहने दें| बीजों का भण्डारण कमरे में सूखे, ठन्डे व अंधरे स्थान पर नमी रहित, ठीक से बंद होने वाले शीशे, रिंगाल की टोकरी या टीन के डिब्बों अथवा मिट्टी के बर्तनों में करें ताकि बाहर के वातावरण का प्रभाव बीजों पर न पड़े| डिब्बों पर फसल का नाम, बीज कहाँ से कब एकत्रित किया गया है जरुर लिखें|

परम्परागत बीज भण्डारण

अनाज, दालों व बीजों के भण्डारण के परम्परागत तरीके निश्चित तौर से रसायनों के दुष्प्रभावों से रहित है| बीजों के भण्डारण के कुछ परम्परागत तरीके निम्न प्रकार से हैं:

नीम, डैंकण की पत्ती:  बीजों के भण्डारण के लिए मिट्टी, बांस या रिगाल के बर्तनों को नीम की पत्ती या खली की लुगदी से लीप दें| बीजों के भण्डारण के लिए उन्हें बर्तनों में भरें व भण्डारण से पहले उसे अच्छी तरह सुखाकर जिस बर्तन में अनाज रखें उस बर्तन की तली में नीम या डैंकण की सुखी पत्तियों की एक परत बिछाकर फिर बीज या अनाज डालें व बीच-बीच में इनकी एक और परत बिछाकर अनाज में सबसे ऊपर इन्हीं पत्तियों को बिछाकर तथा बर्तन का मुँह बंद कर मिट्टी या गोबर से लीप कर बंद कर दें|

नीम, डैंकण का आलावा अखरोट, आडू, टेमरू, कपूर व निर्गुड़ी (सिरोली) के पत्तों का भी प्रयोग किया जा सकता है| इन सभी पत्तियों के पाउडर को सुखाकर व बारीक़ पीसकर अच्छी तरह सूखे अनाज में मिलाने से बीज सुरक्षित रहते हैं|

नीम, डैंकण की गिरी व तेल: पत्तियों के बजाय तेल को उपयोग में लाना सरल है| दालों को सुरक्षित रखने के लिए नीम अथवा डैकण के तेल का प्रयोग करें| नीम व डैंकण के सक्रिय अवयव या तत्व, उसके बीजों अथवा गिरी में उपस्थित रहते हैं| नीम व डैंकण के बदले करंज की सुखी पत्तियों या तेल का प्रयोग कर सकते हैं|

सरसों व आरंडी के तेल सभी प्रकार के दालों के बीजों को सुरक्षित रखने के लिए प्रयोग किया जा सकता है| बीजों को तेल के साथ तब तक मिलाएं जब तक सभी दानें तेल से चमकते दिखें|

टेमरू (मिस्वाक) : टेमरू की सुखी पत्तियों का प्रयोग किसी भी तरह के अनाज को संरक्षित करने के लिए किया जा सकता है| इनकी खुश्बू से चूहे भी दूर भागते हैं व कीड़े मर जाते हैं|

हल्दी का पाउडर : इसको सूखे अनाज में मिलाने से अनाज, तिलहन व दालें सुरक्षित रहती हैं|

धान या झंगोरे के पराल का ढेर (पराल खुंभ)

पहाड़ों में धान, मडुवा या झंगोरे के सूखे पराल के ढेर को पेड़ के सहारे ऊंचाई पर बांधकर इस घास को संरक्षित करने को पराल खुंभ  कहा जाता है| ककड़ी या माल्टा के फलों को पराल के ढेर के बीच में रखकर संरक्षित किया जाता है| फलों व गुड़ को भूसे के ढेर में सुरक्षित रखा जाता है|

मसूर, चना, लोबिया की दालों एवं संतरा, माल्टा व ककड़ी आदि फलों को कोदा, झंगोरे व चौलाई के भूसे के बीच रखकर सुरक्षित रखा जा सकता है|

लकड़ी की राख या कोयला : बीजों को नमी से बचाने के लिए डिब्बे में चौथाई भाग तक लकड़ी का कोयला या राख डालकर उसे कागज से ढक दें व उस के ऊपर बीज डालें अथवा कोयले या राख की पोटली बनाकर बीजों के ऊपर से रखें| जब भी डिब्बे को खोलें राख या कोयला बदल दें| गेंहूँ व दालों के 1 कोलो ग्राम बीज को संरक्षित रखने के लिए 500 ग्राम सुखी लकड़ी की राख को बीजों के साथ मिलाएं|

लाल चिकनी मिट्टी का पाउडर:- इसे गेंहूँ के बीज में मिलाया जाता है| किसी भी बर्तन में बीज भरने के बाद लगभग 1 इंच मोटी लाल मिट्टी की परत से ढककर बर्तन के मुहं को बंद करें|

रिंगाल की बनी ऊँची टोकरी (ढक्वलि, घेल्डा): इस टोकरी को गोबर व लाल मिट्टी से लीपकर उसके छेद बंद कर दें| सूखने के बाद इसे कीटाणु रहित करने के लिए गौमूत्र व लकड़ी के धुंए की राख (कीरे) से लीपें| इस टोकरी में धान के बीजों के साथ टेमरू, अखरोट व डैकण की पत्तियाँ मिलाकर रखें व ढक्कन बंदकर उसे गोबर व गोमूत्र से लीप कर बंद कर दें| इसे बुवाई के समय ही खोलें| टोकरी की लगातार धुएं में रखने से वह मजूबत होती है| रिंगाल के अलावा बेंत की टोकरी का प्रयोग बीज भंडारण के लिए किया जाता है| टोकरी को गाय के गोबर व रेत में नीम का तेल मिलाकर लिपाई करने के बाद उसे अच्छी तरह सुखायें व फिर उसमें बीज संरक्षित करें|

लकड़ी के कोठार (बक्सा) पहाड़ों में लकड़ी की कोठार में बीज को सबसे ज्यादा सुरक्षित माना जाता है| सबसे पहले कोठार को गोबर, लाल मिट्टी व गोमूत्र से लीपकर सुखाएँ व गोबर जलाकर इसे कीटाणु रहित करें| फिर इसमें बीज भरकर टेमरू, अखरोट, नीम आदि पौधों की सुखी पत्तियों से ढककर बंद कर दें|

कचनार (मालू) के पत्तों की टोकरी: मालू के हरे पत्तों की टोकरी बनाकर इसे सुखा दें तथा इसमें बीज रखकर मालू की रस्सियों से कस कर बांध दें व इस टोकरी को चूल्हे की ऊपर टांग दें|

तोमड़ी (सुखी लौकी): लौकी को धूप में सुखाकर उसका गुदा निकालकर खोखला करें| अच्छी तरह सुखाने के बाद इसमें बीज रखकर उसके मुंह को साफ कपड़े से बंद कर उसके ऊपर से गोबर-गोमूत्र का लेप कर दें|

मालू की रस्सी व गेंहू के पराल की चटाई: मालू की रस्सी व गेंहू के पराल की चटाई बनाकर उसे एक ओर से सिल दें, जिससे उसका मुहं दोनों तरफ से खुला रहे| जितना बड़ा चटाई का मुहं होता है कमरे के अदंर उतनी जगह में गोबर, मिट्टी, गोमूत्र की मेंढ़ बना लें| मेंढ़ सूखने के बाद इसे मिट्टी व गोमूत्र से लीपकर बंद कर दें|

सब्जियों व फलीदार बीजों जैसे बैंगन, लोबिया की फलियों व मक्का के संरक्षण हेतु उसकी गुच्छी बनाकर रस्सी के सहारे घर में ऐसी जगह टांग दें जहाँ, धूप, हवा लगती रहे पर साथ ही बारिश से भी बचाव हो| यह तरीका सब्जियों के बीजों को संरक्षित करने के लिए प्रयोग किया जाता है| इसके लिए अतिरिक्त प्याज, लहसुन को संरक्षित करने के लिए इनकी गट्ठियां बनाकर हवादार स्थान पर टांगने से सुरक्षित रहते हैं| इन्हें से ऊँचा उठाकर अँधेरे कमरे में रखने से ये सड़ते नहीं हैं|

अदरक, अरबी व हल्दी के संरक्षण हेतु खेत के एक कोने में गड्ढा खोदकर उसके अंदर बीज रखकर उसे घास-फूस व मिट्टी से ढक दें| ध्यान रहे की इस गड्ढे में वर्षा या अन्य पानी नहीं भरना चाहिए|

चावल सुरक्षित रखने हेतु नमक, मिर्च व मेथी की पोटली बनाकर कोठार में चावलों के बीच अलग-अलग सतहों पर रखें|

परम्परागत तौर पर धुंआ बीज संरक्षण के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता रहा है व धुएं वाली जगह ही बीज संरक्षित किये जाते रहें हैं| माना जाता है कि इससे बीजों में नमी नहीं आती और बीज खराब नहीं होते| सामान्यतः गोबर के उपले का धूँआ किया जाता है| इसके अतिरिक्त नीम व डैकण की सूखी पत्तियां भी जलाई जाती हैं|

अनाज रखने के लिए प्रयुक्त जूट के बोरों का शुद्धिकरण

इसके लिए जुट के बोरों को 10% नीम अर्क के घोल में 15 मिनट तक डुबायें व बोरों को छाया में सुखाकर प्रयोग में लायें| यदि बोर नये हों तो उन्हें आधे घंटे तक भिगोयें| यदि बोरा बारीकी से बुना गया हो तो पतले घोल में भिगोना चाहिए पर ध्यान रहे कि बोर का कोना-कोना घोल में भींग जाए| यदि बीजों अथवा अनाज को कमरे के अंदर अथवा गोदाम में जहाँ का तापमान स्थिर हो तथा जहाँ धूप न जाती हो रखा जाये तो ऐसे में नीम उपचार माह के लिए असरकारक रहता है|

भण्डारण वाले कमरे की दीवारों में यदि मिट्टी की परत चढ़ी हो तो भंडारण से पूर्व सभी दीवारों तथा फर्श को नीम अर्क मिश्रित गोबर व लाल मिट्टी एवं गौमूत्र से लीपकर जरुरी है| यदि कमरे की दीवारें सीमेंट की हैं तो चूना अथवा नीम व गौमूत्र मिश्रित घोल का लेप करें| इसी तरह से यदि बांस या रिगाल निर्मित बर्तनों में भण्डारण करना है तो गोबर, नीम-अर्क, गौमूत्र से इस बर्तन को अच्छी तरह से लीपकर धूप में सुखा दें| अच्छी तरह से सूखने के उपरान्त ही इस बर्तन में अनाज का भंडारण करें|

यदि भंडारण के लिए बांस के बने खानों का प्रयोग किया जा रहा हो तो इन खानों पर नीम का घोल मिला हुआ वार्निस करना करना चाहिए| सूखे नीम खली पाउडर में पानी मिलाकर गाढ़ा थक्का बनाएँ व अनाज रखे जाने वाले खानों में लीपें/पोतें| यदि किसी अनाज को 6 महीने से अधिक रखना हो तो शुद्धिकरण की यह प्रक्रिया 6 माह या बरसात के बाद दोहराई जानी चाहिए|

अनाज या दाल के बीजों को अच्छी तरह नमी रहित करके सुखाने से कीड़े नहीं लगते हैं| बीज को सुखाते समय इन्हें हाथ से हिलाते रहें ताकि बीज की दोनों सतहें ढंग से सुख जाएँ| बीज या अनाज को सीधा सीमेंट के फर्श पर न सुखाएं| किसी कपड़े, तिरपाल चटाई इत्यादि में अथवा मिट्टी के गोबर से लिपे फर्श में सुखाएं| बीज या अनाज को अच्छी तरह सूखने पर इसे सूखने पर इसे कुछ समय तक ठंडा होने दें| बीज व अनाज को भण्डारण के लिए बर्तन में रखने से पहले या सुनिश्चित कर लें कि बीज गर्म न हो रात भर रखने के बाद सुबह भण्डारण करना सर्वोत्तम होता है|

 

स्रोत:  उत्तराखंड राज्य जैव  प्रौद्योगिकी विभाग; नवधान्य, देहरादून



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