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मधुमक्खी पालन ने दिया जीने का सहारा

मधुमक्खी पालन ने दिया जीने का सहारा

परिचय

श्री सिंह राम गाँव खालसा करनाल का रहने वाला एक सीमांत किसान था सन 1992 में कृषि विज्ञान  केंद्र, राष्ट्रीय डेरी अनुसन्धान करनाल से मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लिया था उसी वर्ष वकील 5 कॉलोनियों के साथ इस व्यवसाय का आरंभ किया। सन 1993 में 10,000 रूपये का और खर्चा का कॉलोनियों की संख्या 25 कर ली। इसके बाद मधुमक्खी कॉलोनियों का विभाजन कर इनकी संख्या बढ़ाता गया तथा वर्ष 2005 के अंत तक इनकी संख्या 145 हो गई।

मधुमक्खी पालन बना जीने का सहारा

वर्ष 1993 में 25 मधुमक्खी कलोनोयों से ब शहद का उत्पादन जो वर्ष 2005 में 146 मधुमक्खी कॉलोनियों से बढ़कर 32.35 क्विंटल हो गया  इसे 42 रूपये प्रति कि.ग्रा. के भाव से बेचकर किसान को लगभग 1.35 लाख रूपये कि आमदनी हुई।  इसके अलावा इसी वर्ष  45 मधुमक्खी कॉलोनियों को 720 रूपये प्रति चार फ्रेम के साथ बेचकर 32.400 रूपये की आय प्राप्त की। किसान का मधुमक्खी कॉलोनियों को स्थानान्तरण करने व चीनी तथा दवाइयों आदि पर आने वाला कुछ खर्चा 27,000 रूपये था। इस प्रकार खर्चे निकालकर श्री सिंघ राम न वर्ष 2005 में 1.40 लाख रूपये की शुद्ध आय प्राप्त की।

खेती के साथ मधुमक्खी पालन द्वारा होने वाली आय को देखते हुए मधुमक्खी पालक मनोबल तो बढ़ा ही है साथ में आर्थिक एवं सामाजिक दशा में भी सुधार आया। वेश 2005 में इन कॉलोनियों को 200 तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इस कार्य को देखते हुए में दो अन्य किसानों ने भी मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लेकर इस व्यवसाय का आरंभ में दिया गया।

 

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार



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