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सुंगधित एवं औषधीय पौधों की खेती

सर्पगंधा

सर्पगंधा  एपोसाइनेंसी कुल पौधा है। सर्पगंधा की कई प्रजातियाँ होती है। सर्पगंधा  के जड़ औषधि केPaudha रूप में प्रयोग में लाये जाते हैं। इसके पौधे की ऊंचाई 30 से 75 सेंटीमीटर तक की होती है। इसमें 10-15 सेंटीमीटर लंबाई के हरे चमकीले रंग के पत्ते होते हैं। पत्ते 3-4 के गुच्छे में औवलोंग आकार  के तथा अग्रभाग नुकीले होते हैं,  इसमें उजले अथवा गुलाबी रंग के गुच्छे में फूल निकलते हैं। इसमें गोलाकार छोटे-छोटे गहरे बैंगन अथवा काले रंग के फल लगते हैं जिसे Drupe  कहा जाता है।

इस पौधे के नर्म जड़ से स्प्रेंन्टिंन नामक दवा निकाली जाती है। इसके अलावा जड़ में रेसरपीन, सरपेजिन, रौलवेनीन, टेटराफील्रीन इत्यादि अल्कालाइड  भी होते हैं।

औषधीय उपयोग

  1. स्थानीय लोग इसे सांप कांटने के प्रयोग में लाते हैं।
  2. गाँव में औरतें इसका उपयोग बच्चों में सुलाने में करती हैं क्योंकि इसमें सुस्ती गुण होता है। प्रसव काल में भी इसका उपयोग किया जाता है।
  3. मानसिक रोगी को रिलेक्स करने के लिए इसे दिया जाता है। इससे रोगी शांत हो जाता है।
  4. यह रक्च्चाप को कम करता है।
  5. जड़े के Extracts  को पेचिस तथा हैजा में इसका इस्तेमाल होता है।
  6. पेट दर्द तथा पेट के कीड़े मारने के लिए गोलमिर्च के साथ जड़ का काढ़ा बनाकर दिया जाता है।

जलवायु

यह एक छाया पंसद पौधा है, इसलिए आम, लीची एवं साल पेड़ के आस-पास प्राक्रतिक रूप से उगते हुए देखा जाता है। झारखण्ड के सारंडा वन (सिंहभूम) एवं बीरबुरु वना(हजारीबाग) में काफी पाया जाता है। व्यवसायिक रूप से  यह उत्तरप्रदेश, झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, पशिचम बंगाल, असम, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक  महाराष्ट्र से आपूर्ति की जाती है। यद्यपि यह छाया पंसद पौधा है, लेकिन इसकी खेती खुले में भी की जा सकती है। इसकी खेती उष्ण एवं समशीतोष्ण जलवायु में की जा सकती है। 10 डिग्री सेंटीग्रेड से 38 डिग्री सेंटीग्रेड तक का तापक्रम बढ़वार के लिए अच्छा है। जून से अगस्त तक वर्षा पर्याप्त होनी चाहिए। 1200-1800 मिलीलीटर तक वर्षा वाले क्षेत्र में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। जाड़े के दिनों में झारखण्ड क्षेत्र में पौधों से पत्तियाँ गिर जाती है।

प्रसारण: सर्पगंधा का प्रसारण बीज द्वारा, तना कलम एवं जड़ कलम द्वारा किया जा सकता है।

बीज द्वारा: इस विधि में नर्सरी में बिचड़ा तैयार करते हैं। इसके लिए ऊँचा नर्सरी बनाते हैं। बीज की बुआई वर्षा के आरंभ में न(मई-जून) में करते हैं तथा रोपाई अगस्त माह में करते हैं। एक हेक्टेयर के लिए 8-10 किलो बीज की आवश्कता होती है। बोई के पहले बीज को पानी में 24 घंटा फुला लेने पर अंकुरण अच्छा होता है। बीज अंकुरण कम (15-30%) होता है तथा 3-4 सप्ताह समय लगता है। नर्सरी में 20-25 सेंटीमीटर के फासले पर २ सेंटीमीटर गहरे कुंड में २-5 सेंटीमीटर की दूरी पर गिराते हैं। दो माह के बाद तैयार बिछड़े को (10-12 सेंटीमीटर के होने ) 45 सेंटीमीटर X 50 सेंटीमीटर दूरी पर रोपाई करते हैं।

कलम द्वारा: कलम जड़ अथवा तना दोनों से लिया जा सकता है। जड़ से कलम के लिये पेन्सिल मोटाई के २.5 से 5 सेंटीमीटर लंबाई के छोटे-छोटे टुकड़े कर लेते हैं। इसे 5 सेंटीमीटर गहराई पर पौधशाला में लगाते हैं। तीन सप्ताह बाद कल्ले आने पर तैयार खेत में रोपाई करते हैं।

तना से पौधा तैयार करने के लिए 15-20 सेंटीमीटर पेन्सिल मोटाई के कलम बनाते हैं हरेक कलम में 2-3 नोड (गाँठ) रहना जरूरी है। कलम को पौधशाला में लगाते है। 4-6 सप्ताह में रुटेड कटिंग को तैयार खेत में रोपाई करते है रुट-शूट कटिंग द्वारा भी प्रसारण किया जा सकता  है। इसमें 5 से.मी. रूट कटिंग के साथ तना का कुछ हिस्सा को (Collar Portion ) भी रखते हैं।

खाद की मात्रा: खेत को मई माह में जोताई करते हैं। वर्षा  आंरभ होने पर गोबर की सड़ी खाद 200 किवंटल प्रति हेक्टेयर देकर मिट्टी में मिला दें। लगाते समय 45 किलो फास्फेट तथा 45 किलो पोटाश दें। नाइट्रोजन की यही मात्रा (45 किलो) दो बार अक्तूबर एवं मार्च में दें।

निकाई-गुडाई एवं सिंचाई : कोड़ाई का खरपतवार निकाल दें। जनवरी माह से लेकर वर्षा काल आरंभ होने तक 30 दिन के अंतराल पर तथा जाड़े के दिनों में 45 दिन के अन्तराल पर सिंचाई दें।

कटाई एवं उपज:  सर्पगंधा डेढ़ से दो वर्ष का फसल है। जाड़े के दिनों में जब पत्तियाँ झड़ जाती हैं। तब जड़ को सावधानीपूर्वक उखाड़ना चाहिए। पौधों को छोड़ देने पर उपज बढ़ जाती है। तीन साल से पौधे में अधिकतम उपज होता है। उखाड़ते समय जड़ से छिलका नहीं हटना चाहिए। जड़ को 12-15 सेंटीमीटर दुकड़े में काटकर सुखा लिया जाता है। सूखने पर 50-60% वजन की कमी हो जाती है। औसत उपज 1000 किली होती है। बिक्री दर 70-80 रूपये प्रति किलो है। 40-50 हजार रूपये तक की आमदनी हो सकती है।

अश्वगंधा कम लागत से होनेवाला एक बहुमूल्य औषधीय पौधा है। मुख्या रूप से यह शक्तिवर्धक औषधि है शक्तिवर्धक होने के कारण इसका नाम “अश्व” से है। पौधे के कच्चे जड़ से “अश्व” जैसी गंध आती है इसलिए इसे अश्वगंधा कहते हैं। अश्वगंधा को विंटरचेरी भी कहते हैं। यह एक नगदी फसल है तथा 35,000-40,000 प्रति हेक्क्तेयर की आमदनी छः महीने में प्राप्त किया जा सकता है। अश्वगंधा एक झाड़ीदार २-3 फीट की ऊंचाई का बहुशाखीय, कांटा रहित पौधा है। एक स्वस्थ्य पौधे में लगभग 30 सेंटीमीटर लंबी, मुलायम तथा कड़वी जड़ पाई जाती है। मुख्य रूप से जड़ को औषधि के रूप में प्रयोग करते हैं। वैसे पत्तियां तथा बीज का उपयोग भी औषधि के रूप में हॉट है। इस पौधे के तने रोयेंदार, हल्के हरे तथा जड़ें मोटी एवं मुसलाधार होती है। पत्ते 6-8 सेंटीमीटर लंबे अंडाकार होते हैं।

अश्वगंधा की जद्दों में 13 प्रकार के एल्कोलाईड पाए जाते हैं। जिसमें विथेफेरीन-ए, विथेनोलिड विथानीन, टोरोन, अइ सोवलिन, विदाखमिन तथा सोमेनिन प्रमुख हैं।

औषधीय उपयोग

  1. सर्दी के दिनों में इसकी जड़ का चूर्ण बनाकर दूध के साथ बनाकर दूध के साथ सेवन करने से शारीरिक ताकत बढ़ता है।
  2. इसके सेवन से हीमोग्लोबिन एवं लाल रक्तकण की मात्रा बढ़ती है।
  3. इसकी जड़ों को कामोदीपक के रूप में सेवन करने की सलाह बैद्य देते हैं।
  4. यह खांसी में भी काम आता है। इसके लिए पत्तियों को पानी में उबालकर सेवन किया जाता है।
  5. यह गठिया एवं जोड़ों का दर्द तथा शरीर के सृजन में बहुत उपयोगी है।
  6. कैंसर में भी यह औषधि कारगर सिद्ध हो रहा है।
  7. अश्वगंधा के पत्तियों का लेप जोड़ों के सुजन के उपचार के लिए किया जाता है।
  8. कमर एवं कूल्हों के दर्द में इसके जड़ों का उपयोग किया जाता है।
  9. यह “मुड” बनाता है तथा चिंता को दूर करता है।
  10. मानसिक बीमारी में भी इसका उपयोग होता है।
  11. यह शरीर में प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाता है तथा Antibacterial  है।
  12. यह पेशाब बढ़ाता है।

अश्वगंधा की खेती राजस्थान के जावद एवं पशिचम मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के मनास नीमच क्षेत्र में लगभग 5000 हेक्टेयर क्षेत्र में खेती की जाती है। झारखण्ड के गर्म क्षेत्र गिरिडीह, कोडरमा, दुमका, देवघर, गढ़वा, गुमला इत्यादि उपयुक्त है।

जलवायु

इसके लिए गर्म जलवायु की आवश्यकता है। न्यूनतम तापक्रम 7-8 डिग्री सें, नीचे नहीं जाना चाहिए। इसकी खेती के लिए 600-800 मिलीलीटर वर्षा उपयुक्त है।  तापक्रम 20 डिग्री  से 35 डिग्री सें, तक होने से अच्छी उपज मिलती है। जाड़े के दिनों में वर्षा होना इसे जड़ का विकास समुचित होता है।

मिट्टी

अश्वगंधा की खेती बलुई दोमट, हल्की लाल मिट्टी उपयुक्त है। जहाँ सिंचाई की सुविधा नहीं है तथा फुड क्रॉप उगाना कठिन है वहाँ इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। मिट्टी की अम्लीयता 7.5 से 8.0 के बीच होना चाहिए। अम्लीय मिट्टी में चूना का प्रयोग लाभदायक होगा।

खेत की तैयारी

अश्वगंधा में कम खाद देने की आवश्यकता होती है। खेत की जुताई के वाद 20-30 किवंटल गोबर की सड़ी खाद 15-20 किलो नाइट्रोजन,25 किलो स्फुर प्रति हेक्टेयेर देने से उपज में वृद्धि होती है। गर्मी में जुताई करना लाभदायक’ होता है। वर्षा ऋतु में खेत को खाली छोड़ते हैं। जब दो तिहाई वर्षा हो जाए तो बुआई करनी चहिए। एक हेक्टेयर के लिए 5-7 किलो बीज आवश्कता होगी। बीज की बुआई मेढ पर 20-30 सेंटीमीटर के फासले पर करते हैं। बुआई के लिए २-3 सेंटीमीटर गहरा नाली बनांते हैं तथा बीज के साथ बारीक गोबर मिलाकर बुई करते हैं। बुआई के बाद बीज को हल्की खाद एवं मिट्टी से ढंक दें सामन्य रूप से 8-10 दिनों में अंकुरण हो जाता है। 25-30 पौधा रखते है। दो बार निकाई-गुड़ाई तथा 1-२ बार सिंचाई की आवश्कता होती है। बीज को पौधशाला में बुआई कर बिचड़ा भी तैयार किया जाता है। इसे 20 सें. X 15 सें. के फासले पर रोपाई करते हैं।

अश्वगंधा की डब्ल्यू.एस.आर, जवाहर अश्वगंधा-20 एवं अश्वगंधा-134 उन्नत प्रजातियाँ है। अश्वगंधा-134 अगात प्रजाति है जो १६०-१७० दिन में तैयार हो जाती है।

फसल कटाई

जूलिया में बोई गई फसल नवबर में फूलने लगती है। जड़ें 150-180 दिन में तैयार हो जाती है। जब पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाए एवं फल लाल हो जाए तब फसल परिपक्व माना जाता है। जड़ों की खोदाई जनवरी माह में की जाती है। तना को काटकर अलग कर देते हैं। जड़ को अच्छी तरह से साफ कर 8-10 सेंटीमीटर के टुकड़ों में काटकर सुखा लिया जाता है। ज्यादा मोटाई वाली जड़ें अच्छी एवं कम मोटाई वाली जड़ें निम्न कोटि की मानी जाती है।

इस प्रकार उन्नत खेती से लगभग 800-1000 किलो जड़ें एवं 40-60 किली बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त किया जा सकता है। जड़ें लगभग 60-70 रूपये प्रति किलो बिक जाता है।

सफेद मूसली खेती

सफेद मूसली एक कंदीय फसल है जिसे कमजोरी दूर करने में उपयोग किया जाता है। झारखण्ड के जगलों में यह कहीं-कहीं पाया जाता है। इसका उपयोग वात एवं पित्त के शमन हेतु, चेहरे पर निखार लाने, खांसी, अस्थमा (दमा), बवासीर, चर्म रोगों, पीलिया, पेशाब संबधी रोगों , ल्यूकोरिया आदि के उपचार के लिए भी किया जाता है। मधुमेह, यौनशक्ति एवं बलवर्धन हेतु भी यह काफी प्रभावी सिद्ध हुआ है। दिल्ली के खारी-वावली के साथ-साथ इंदौर, अहमदाबाद, मुबई, हैदराबाद में सफेद मूसली के बड़े बिक्री केंद्र है। समाज  के विशेष वर्गों में पौष्टिक आहार तथा मुड सप्लीमेंट के रूप में प्रयुक्त हो रहा है। देश के साथ विदेशों में भी इसकी मांग है।

किस्म

सफेद मूसली की कई किस्में देश में पाई जाती है। लेकिन क्लोरोफाइटम बोरीविलीएनम  का उप्तादन अधिक होता है। इसका छिलका उतारना भी आसन है। इसमें पाए जाने वाले उपयोगी  औषधीय तत्वों की मात्रा भी दूसरी किस्मों  से अधिक होती है। इस किस्मं में ऊपर से नीचे तक जड़ों या ट्युवर्स की मोटाई प्रायः एक समान होती है यानी वेलनाकार। एक साथ कई ट्युवर्स (२-50) गुच्छे के रूप में पाई जाती है ऊपर से डिस्क या क्राउन से जुडी रहती है।

जलवायु

मूलतः गर्म तथा आर्द्र प्रदेशों का पौधा है। अतः झारखण्ड के सभी जिलों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

भूमि

कंदीय फसल होने के कारण सही विकास के लिए भूमि नर्म होना चाहिए परन्तु उत्पादन की दृष्टि से रेतीली दोमट मिट्टी, हल्की लाल मिट्टी इसके विकास के लिए उपयुक्त पाई जाई है। मिट्टी का पी.एच. 6.5-8.0 होना चाहिए। जल विकास की पूरी व्यवस्था होनी चाहिए तथा भूमि में जीवाश्म की पर्याप्त मात्रा रहनी चाहिए। उत्पादन एवं गुणवत्ता की दृष्टि से एम्.डी.एच वायो 13 किस्म अच्छी है।

खेत की तैयारी

सफेद मूसली 8-9 महीने की फसल है जिसे मॉनसून में लगाकर फरवरी-मार्च में खोद लिया जाता है। अच्छी खेती के लिए यह आवश्यक है कि खेतों की गर्मी में गहरी जुताई की जाए। अगर संभव हो तो हरी खाद के लिए ढैंचा, सनई, ग्वारफली बो दें। जब पौधा में फूल आने लगे तो काटकर खेत में डालकर मिला दें।  गोबर की सड़ी खाद 250 किवंटल प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई में मिला दें। खेतों में बेड्स एक एक मीटर चौड़ा तथा एक फीट ऊँचा बनाकर 30 सेंटीमीटर की दूरी पर (कतार) 15 सें.मी. पर पौधे को लगाते हैं। बेड्स बनाने के पूर्व 300-350 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से नीम यह करंज की खल्ली मिला दें।

बीज, उसकी मात्रा

व्यवसायिक खेती के लिए ट्युवर्स की जरूरत होती है। डिस्क या क्राउन स एल्गी ट्युवर्स या फिंगर को डिस्क के कुछ भाग के साथ काट लिया जाता है। कई बार एक-एक ट्युवर्स अलग की जाती है,  कभी २-3 फिंगर साथ रखते हैं। यही डिस्क सहित कटे ट्युवर्स ही बीज के रूप में व्यवहार किये जाते हैं। प्रायः एक ट्युवर का वजन 10-20 ग्राम होता है और एक हेक्टेयर के लिए 10 विक्वंटल बीजों की जरूरत पड़ती है। वर्तमान में इनकी दरें 300 रूपये प्रति किलो है।

बीज उपचार एवं लगाने के तरीके

जैविक विधि में गोमूत्र (1:10 ) में 1-२ घंटे तक डुबोकर रखा जाता है। रसायनिक विधि में वेभिस्तीन या स्ट्रोप्टोसाईकिलन का 0.1% के घोल में रखते हैं। बुआई के लिए गड्ढे बना लिए जाते हैं। गड्ढे की गहराई उतनी होनी चाहिए  जिंतनी bi बीजों का रोपण इन गड्ढों में कर हल्की मिट्टी डालकर भर दें।

सिंचाई एवं निकाई-गुड़ाई

रोपाई के बाद ड्रिप सिंचाई द्वारा पटा दें। बुआई के 7-10 दिनों के अंदर यह उगना  प्रारंभ हो जाता है। उगने  के 75-80 दिन तक अच्छी प्रकार बढ़ने के बाद सिंतबर के अंत में पत्ते पीले होकर सूखने लगते हैं तथा 100 दिन के उपरान्त पत्ते गिर जाते है। इसी तरह से पौधों को छोड़ दिया जाता है फिर फरवरी-मार्च में जड़े उखाड़ी जाती है। फसल के उगने के बाद (20-25 दिन) बायोजाईम क्रॉप प्लस 1 मिली. 1 लिटर पानी पानी में या बायोजाईम ग्रैनुअल (20-30 ) किलो प्रति हेक्टेयर देने से अच्छे परिणाम मिलते हैं।

मूसली बरसात में लगाई जाती है। नियमित बारिस में सिंचाई  की जरूरत नहीं पड़ती। अनियमित मॉनसून में 10-12 दिन में एक सिचाई दें। अक्तूबर के बाद 20-21 दिनों पर हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए। नमी बनाए रखने के लिए मलचिंग  भी किया जाता है। जरूरत है जब तक मूसली उखाड़ न ली  जाए तब तक नमी बनाए रखें।

हार्वेस्टिंग

जबतक मुसली का छिलका कठोर न हो जाए तथा इसका सफेत रंग बदलकर भूरा न हो तबतक जीमन स इन्हीं निकालने। मुसली को उखाड़ने का समय फरवरी के अंत  से मार्च तक है।

खोदने के उपरात इसे दो कायों हेतु प्रयुक्त  किया जाता है:

  1. बीज हेतु रखना या बेचना
  2. इसे छीलकर सुखाकर बेचना

बीज के रूप में रखने के लिए खोदने के 1-२ दिन तक कंदों को छाया में रहने दें ताकि अतिरिक्त नमी कम हो जाए फिर कवकरोधी दवा से उपचारित कर रेट के गड्ढों, कोल्ड एयर, कुल्ड चैम्बर में रखें।

सुखाकर बेचने के लिए फिंगर्स को अलग-अलग कर धुप में 3-4 दिन रखा जाता है। अच्छी प्रकार सुख जाने पर बैग में पैक कर  बाजार भेज देते हैं।

उपजसाधारणतः बीज की तुलना में गीली मुसली 6-7 गुणा प्राप्त होती है। अतः प्रति  हेक्टेयर 10 किवंटल बीज से 60-70  किवंटल गीली मुसली प्राप्त होगी।

अच्छा यह होगा कि जो लम्बी और बड़ी ट्युबर्स हैं उन्हें छीलकर सुखा लिया जाए और पतली एवं छोटी ट्युवर्स को बीज  के रूप  में काम में लाया जाए। इस प्रकार एक हेक्येटर में 60 किवंटल गीली मुसली में 10 किवंटल बीज के लिए रखकर शेष 59 किवंटल सुखा दें ताकि 80% सुखकर 10  किक्वंल सुखी मूसली प्राप्त हो।

बिक्री: सुखु मुसली के प्रकार एवं बिक्री दर

‘अ’ श्रेणी- सही प्लाटिंग मैटिरियल से अच्छी तरह उगाई गई मुसली जो लंबी, मोटी,  सफेद एंव कड़क हो उसके मूल्य 800 रूपये प्रति किलो मिलते हैं।

‘ब’ श्रेणी- इस श्रेणी का मुसली  ‘अ’ श्रेणी की मुसली से कम या हल्की होती है जिसका मूल्य 600 रु. तक मिलता है।

‘स’ श्रेणी- इस श्रेणी की मुसली काफी छोटी, पतली तथा भूरे रंग की होती है जो जगलों से परिपक्व अवस्था में उखाड़ी जाती है। मूल्य 100-200 रु.किलो मिलता है।

नींबू घास की खेती

मुख्य रासायनिक अवयव

सिन्डाल: अल्फा आयोंनोन – गंध द्रव्य एवं सुगंध रसायन

बीटा आयोंनोन- विटामिन ‘ए’

उपयोग:

  • औषधियां निर्माण में
  • उच्च कोटि के इत्र बनाने में
  • विभिन्न सौन्द्रर्य प्रसाधनों में
  • साबुन निर्माण

उन्नत प्रभेद: प्रगति, प्रमाण, कृष्णा, जम्मू ग्रास, सी. के. भी 25

मिट्टी लगभग सभी प्रकार की भुमिल्यों में इसकी खेती की जा सकती है। दोमट उपजाऊ मिट्टी अधिक अच्छी होती है।  इसके अतिरिक्त यह कम वर्षा वाले लेटराइट मिट्टियों, कम उपजाऊ एवं बासनी क्षेत्रों में भी उपजी जा सकती है।

जलवायु

उष्ण एवं समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त है। उच्च तापमान, आद्रे, पर्याप्त  धूप एवं 2000-2500 मिमी. वर्षा साल भर में ।

प्रसार विधि: बीज/स्लिप

बीज दर: 4-6 किलो बीज प्रति हेक्तटेयर

2500 स्लिप्स प्रति एकड़

बीज बुआई का समय: नर्सरी:अप्रैल-मई

रोपाई की दुरी : 40 X15 सें.मी.

60 X45 सें.मी.

खाद उर्वरक एवं उसका प्रयोग

कम्पोस्ट: 20 टन  प्रति हेक्टेयर

नेत्रजन: फास्फोरस: पोटाश 150;40:40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

खेत तयारी का समय: कम्पोस्ट, स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा एवं नेत्रजन का 1/3  प्रयोग करें। नेत्रजन की शेष बची मात्रा क अदो बराबर भागों में बांटकर प्रत्येक फसल कटाई के बाद भुरकाव विधि से खेतों में प्रयोग करें।

जल प्रंबधन: रोपाई के पश्चात् भूमि गोली रहनी चाहिए। गर्मियों में 10 दिनों के अतराल पर एवं सर्दियों में 15 दिनों के अतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।

निकाई-गुड़ाई: 1-२ बार (खरपतवार नाशक पहले साल में 250 ग्राम ओक्सीफ्ज्यूरोफेन यह डयोरान प्रति एकड़ बुआई के पूर्व खेत में मिला देना चाहिए)।

फसल चक्र: नींबू घास पांच वर्षीय फसल है (उर्वरक भूमि)

तीन वर्षीय फसल (अनुपजाऊ भूमि)

फसल की कटाई: फसल लगा देने के बाद पांच वर्ष तक 60-70 दिनों के अंतराल पर कटाई की जाती है। प्रति वर्ष 4 से 5 कटाई की जा सकती है।

अनुपजाऊ भूमि में तीन वर्ष तक कटाई की जा सकती है। पौधों की कटाई भूमि से 10 -15 सेंमी, ऊपर से करनी चाहिए।

प्राप्त होने वाले तेल की मात्रा

100 किलोग्र तेल प्रति वर्ष प्रति एकड़ भूमि की चार कटाईयों से प्राप्त की जा सकती है। आने वाले वर्षों में यह मात्रा बढ़ती जाती है।

फसल सुरक्षा

शूट फ्लाई: फोरेट-10 जी. का 4-5 किलोग्र या कार्बोफ्युरान 3 जी, को 4-5 किलोग्राम प्रति एकड़

दीमक: नीम की खल्ली या फुराडॉन मिट्टी में या स्लिप को क्लोरपाईरीफॉस 0.1% से उपचारित को लगाना

श्वेत मक्की: फास्फामिड़ाइन (250 मिली. प्रति एकड़) या मोनाकोटोफ़ोस(0.05%)

चूहों का प्रकोप: जिंक फास्फाइड, बेरियम कार्बोनेट।

स्टीविया की खेती

सामान्य अवस्था में 25-30 गुणा मीठा तथा एक्सट्रट के रूप में 300 ग्राम में शक्कर से मीठा होता है।

मूल स्थान: पेरूगवे

विश्व की खेती: पेरूगवे, जापान, कोरिया, ताइवान, अमेरिका

भारत में खेती:  बगलोर, पूना, इंदौर, रायपुर

गुण: कैलोरी रहित, पूर्णतया सुरक्षित, चीनी का विकल्प, मधुमेह में उपयोग, रक्तचाप को बढ़ाने, एंटी बैक्टीरियल

जलवायु: अर्धआर्द्र तथा अर्धउष्ण किस्म की जलवायु उपयुक्त। बढ़त के लिए प्रकाश की आवश्कता। तापक्रम 10 डिग्री से. से 40 डिग्री सें. तक।

मिट्टी” पी. एच. मान: 6-8. अच्छी जल निकास वाली रेतीली दोमट मिट्टी

रोपने की विधि:  कलम से -15 सें.मी. लंबी कलमों को काटकर पालीथीन की थैली में जमा करना। कलमों को काटने के बाद पैक्लोबुटराजोल (10 पी.पी. एम.) के घोल से उपचारित करना।

रोपने का समय: फरवरी-मार्च। मेड़ों पर 6-8 इंच ऊँचे बेड्स २ फीट चौड़ी पर कतार से कतार 16 इंच तथा पौधे से पौधे 9 इंच एक बेड पर दो लाइन, एक एकड़ में 30 हजार पौधे

उन्नत किस्में: एस.आर. बी. 123, पांच कटाई, ग्लुकोसाइड 8-12%

एस.आर.बी. 128, सन फ्रूट लि. पूना द्वारा विकसित 21%  ग्लुकोसाइड

एस.आर.बी. 512,8-12% ग्लुकोसाइड, चार कटाई प्रति वर्ष

सिंचाई: नियमित रूप से प्रति सप्ताह एक बार ड्रिप विधि उपयुक्त

निकाई-गुडाई: समय-समय पर फसल की निकाई तथा गुड़ाई प्रति हेक्तेटर, एन.पी.के.” 100:50:50: किग्रा. प्रति हेक्टेयर।

फसल की कटाई:फसल लगाने के 4 माह बाद प्रथम कटाई- पत्तों की तुड़ाई या पौधे के २-3 इंच ऊपर काट लिए जाते हैं। पत्तों की तुड़ाई का ड्रायर में सुखा लेते हैं, छाया में। दूसरी यह तीसरी कटाई 3 महीने के उपरान्त

फूलों की तुड़ाई: फूलों को समय-समय पर तोड़ कर हटा देना चाहिए । रोपने के 35,45,60,85 दिनों के उपरान्त तथा हार्वेस्टिंग के समय फूलों को तोड़ना चाहिए।

विपणन: पत्ते के रूप में या पाउडर के रूप में तथा एक्स्ट्रैक्स  के रूप में भी

रोग: लीफ स्पाट: वोरेक्स का छिड़काव कीड़ों के लिए नीम तेल या ग गौमूत्र।

काली हल्दी (नरकचूर)

यह पौधा विशेषतया पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश व बिहार के वनों में जहाँ नमी अधिक होती है।, प्राकृतिक रूप से उगता पाया जाता है। सामन्य हल्दी के पत्तों की तरह इसके पत्ते होते है। इन पत्तों की मध्य में काली धारियां होने से काली हल्दी का पौधा पहचाना जा सकता है। यह एक वर्षीय पौधा है जिसका कदं सुंगधित धूसरित वर्ण का एवं चकाकार कड़ों  से युक्त होता है। यह कदं अंदर से घुसर नील वर्ण का अंत्यंत कड़ा एवं श्रृंग के समान होता है। इसकी सुग्रध कपूर के समान होती है। काली हल्दी का यह पौधा अमर कंटक एवं पाताल कोट में पाया जाता है। इसका अधिक दोहन होने के आकर्ण यह प्राकृतिक रूप से नष्ट होता जा रहा है। इसकी खेती  पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों में की जाती एवं इसका उपयोग सामने हल्की की तरह यहाँ पर करते हैं।

औषधीय गुण

सौन्दर्य प्रसाधनों में इसका उबटन पसीना लाने में, आदिवासी लोग इसका प्रयोग अनेक रोगों के निराकरण के लिए करते हैं। चोट, मोच, अंदरूनी चोटों तथा दम आदि के उपचार में करते हैं। मध्यप्रदेश के लोग इसको पवित्र मानते हैं तथा जिसके पास यह कंद होता है, उसको, कभी भी धन की कमी नहीं होती, ऐसे धारणा है। इसके कंद प्राकृतिक कपूर के श्रेष्ठ स्रोत है।  इसका उपयोग सुंगध उद्योग में किया जाता है।

खेती

उष्ण जलवायु नमी वाले क्षेत्रों में, वार्षिक वर्षा 1500 मिमी., किन्तु फसल वृद्धि के समय समान  रूप से वर्षा होना बहुत उपयुक्त है।

दोमट तथा बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए अच्छी होती है, किन्तु जल निकास वाली दोमट मिट्टी अंत्यंत ही उपयुक्त है। चिकनी मिट्टी वाली भूमि में इसके कंदों की वृद्धि नहीं हो पाती।

खेत की तैयारी

खेत की मिट्टी को दो-तीन जुताइयों से भुरभुरी कर लेना आवश्यक होता है इसके पश्चात ही रोपाई की जानी चाहिए।

रोपाई

कंदों द्वारा रोपाई की  जाती है। मुख्ततया पुराने  कदों में से  अकुरित नये कंदों को रोपण करना चाहिए। इनकी रोपाई 30 x30 सें.मी. की कतारों में जून-जुलाई माह में की जानी चाहिए।

खाद

प्रति हेक्टयेयर भूमि में गोबर की खाद 120 किक्वंटल डाली जाती है।

सिंचाई

यदि वर्षा अच्छी होती है तथा खेत में नमी  बनी हुई है, तो सिंचाई की आवश्कता नहीं रहती, किन्तु शरद ऋतु में एक दो सिंचाइयों की आवश्कता पड़ सकती है।

निराई-गुडाई खेत में कंदों के रोपण के कुछ सफ्ताह पश्चात गुडाई करके खतपतवार निकाल देना चाहिये।

उपज

फसल की पत्तियाँ पीली पड़कर सूखने लगे तब फसल पककर तैयार हो गयी है, ऐसा समझना चाहिए (9-10 माह में ) इस मही खुदाई करके कदं निकाल कर, धोकर छाया में सुखा लेते है। फसल से प्राप्त छोटे कंदों को अगली फसल की बुआई के लिए सुरक्षित रखा लेते हैं, किन्तु  सूखे कंदों का उपयोग सुगंधित तेल निकालने तथा विभिन्न औषधियों के निर्माण हेतु किया जाता है।

 

स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : समेति, कृषि एवं गन्ना विकास विभाग, झारखण्ड सरकार



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