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मृदा सुधार के क्षेत्र में नैनो प्रौद्योगिकी का महत्व

नैनोटेक्नोलॉजी-मृदा सुधार के नए रास्ते

विकासशील देशों में नैनो प्रौद्योगिकी ऊर्जा, पर्यावरण, स्वास्थ्य एवं कृषि से संबंधित अन्य क्षेत्रों में क्रांतिकारी तकनीक के रूप में उभर रही है। नैनो प्रौद्योगिकी किसी तकनीक को नैनो पैमाने पर दर्शाती है जिसका विभिन्न क्षेत्रों में अलग-2 महत्व होता है। जब किसी पदार्थ का आकार 1–100 नैनोमीटर के बीच में होता है तो उसे नैनो कणों के रूप में जाना जाता है। किसी भी पदार्थ के गुण नैनो पैमाने पर उसके असली स्वरूप से बिल्कुल भिन्न होते है, इन्हीं गुणों के कारण, नैनो कणों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नए रास्ते खोल दिए हैं। यह प्रौद्योगिकी 21वीं सदी में हमारी अर्थव्यवस्था और समाज पर गहरा प्रभाव उत्पन्न कर रही है। दवा, रसायन विज्ञान, पर्यावरण, ऊर्जा, सूचना एवं संचार, भारी उद्योग और उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्रों के अलावा इस प्रौद्योगिकी ने मृदा एवं जल के सुधार में भी कई प्रकार की भूमिका निभाई है। यद्यपि नैनो शब्द एक नया शब्द प्रतीत होता है लेकिन यह क्षेत्र पूरी तरह से नया नहीं है। जब से धरती पर जीवन का प्रारम्भ हुआ तभी से निरंतर 3.8 अरब वर्षों से विकास के माध्यम से प्रकृति में परिवर्तन हो रहा है। प्रकृति में ऐसी कई सामग्री, वस्तुएँ एवं प्रक्रियाएँ हैं जो बड़े से लेकर नैनो पैमाने तक कार्य करते हैं ।

नैनो कणों के बारे में कुछ तथ्य नैनो कणों की संश्लेषण प्रक्रियाएँ आम तौर पर दो सिद्धांतों पर काम करती हैं:
→ ऊपर से नीचे (टॉप-डाउन) विधि
→ नीचे से ऊपर (बॉटम-अप) विधि

पहली विधि प्रगति की उन प्रक्रियाओं से संबंधित है जो एक बड़ी आधारभूत/बुनियादी इकाई को छोटी तथा विशेष

नैनो कणों का संश्लेषण दृष्टिकोण और उनके सतह क्षेत्र में घटित बदलाव को दर्शाया गया है:

NanoTechnology

नैनो इकाईयों में रूपांतरित करती है। जबकि दूसरी विधि नैनो कण निर्माण के उस दृष्टिकोण पर आधारित है जिसमें नैनो पैमाने पर बुनियादी इकाईयाँ रासायनिक या भौतिक बल के उपयोग से इकट्ठा होकर एक व्यापक ढाँचे की संरचना करती है।

नैनो कणों का मृदा सुधार में उपयोग

दूषित मृदा सुधार के लिए अनेक प्रकार की जाँच एवं शोध कोर्य किए गए हैं। नैनो प्रौद्योगिकी की एक विशेष प्रासंगिकता यह है कि इसमें नैनो कृणों को दूषित मृदा में डाल दिया जाता है। इससे रासायनिक प्रक्रियाएँ उत्पन्न होती है जो प्रायः प्रतिक्रियाशीलता एवं अवशोषण सिद्धांत पर कार्य करती हैं जिसके फलस्वरूप मृदा में विद्यमान

तालिका : मृदा सुधार के लिए प्रयुक्त नैनो कण

संश्लेषित नैनो कण

उपयोग

शून्य संयोजनयुक्त (वैलेंट) नैनो कण

क्रोमियम स्थिरीकरण

लैकेट संशोधित शून्य वैलेंट नैनो कण

पेंटाक्लोरोफिनोल के डिहेलोजिनेशन व डाईनाइट्रोटोल्यूएंस में

स्टार्च स्थिर चुंबकीय नैनो कण

आर्सेनेट का स्थिरीकरण

शून्य वैलेंट नैनो कण और लैड/आयरन

पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफिनाइल की हाइड्रोडिक्लोरीनेशन में

लैड/शून्य वैलेंट नैनो कण

Y-HCH की गिरावट

शून्य वैलेंट नैनो कण

इबुप्रोफेन की गिरावट

शून्य वैलेंट नैनो कण और कैल्शियम ऑक्साइड

पोलीक्लोरोनेटेड डाइबेनजेनो पी-डाईआक्साइन एंड डाइ बेंजोफुरनास

एपेटाइट नैनो कण

शून्य वैलेंट नैनो कण

पोलीसेकराइड स्थिर फेरस-मैंगनीज ऑक्साइड नैनो कण

लेड रिथरीकरण

डीडीटी की गिरावट

सेंनिक ॥ का स्थिरीकरण

विषाक्त तत्व अत्यंत अघुलनशील होकर पौधे को हानि नहीं पहुँचा पाते हैं।

मृदा सुधार के लिए पारंपरिक संसाधनों का प्रयोग करने की बजाय नैनो सामग्री का प्रयोग अधिक लाभकारी है, छोटा आकार तथा अत्यधिक विशिष्ट सतह क्षेत्र होने के कारण नैनो कणों का मृदा में वितरण काफी सरल है जिसके फलस्वरूप इनकी रासायनिक प्रतिक्रिया दर बढ़ जाती है। जो मृदा सुधार के लिए उच्च क्षमता तथा उच्च दर को दर्शाता है। छोटा आकार स्थानिक (इनसीटू) प्रयोग में आसान तथा वितरण के लिए फायदेमंद है। मृदा सुधार के लिए अच्छी क्षमता वाले कुछ नैनो कण जैसे जियोलाइट्स, सल्फाइड इत्यादि का प्रयोग शामिल है। इनका उपयोग एवं विस्तारपूर्वक विश्लेषण निम्नानुसार है:

जियोलाइट्स

जियोलाइट्स क्रिस्टलीय क्षार (सोडियम या पोटेशियम) और पृथ्वी के क्षारीय धनायनों (कैल्शियम या मैग्नीशियम) के हाइड्रेटेड अलुमिनो सिलिकेट होते हैं। संरचना में किसी बड़े परिवर्तन के बगैर इनकी जलीय/निर्जलीकरण तथा जलीय विलयन में अपने घटक धनायनों के आदान-प्रदान करने की क्षमता होती है। कृषि क्षेत्र में इन जियोलाइट्स को दूषित मृदा के लिए मृदा कंडीशनर,उर्वरक और सुधारक के रुप में प्रयोग किया जा सकता है।

सूखे की समस्या को सुधारने के लिए जियोलाइट्स मिट्टी में एक बाती (केपिलरी) सामग्री के रूप में कार्य करता है और उथले भूजल को पौधे की जड़ क्षेत्र तक पहुँचाता है तथा पौधों की वर्षा या सिंचाई पर निर्भरता को कम करने में सहायता करता है। जियोलाइट्स को मिट्टी में मिलाने से इसकी धनायन विनियम क्षमता और पीएच मान में वृद्धि दर्ज की गई है जिससे मिट्टी की पोषक तत्वों को धारण करने की क्षमता बढी है। रेतीली मिट्टी में 10 प्रतिशत सी.जी.–1 जिओलाइट के प्रयोग से धनायन विनियम क्षमता में 0.08 से 15.59 सी.मोल.सी./कि.ग्रा. और पीएच मान में 5.4–6.6 की वृद्धि आंकी गई।

नैनो उर्वरक

जियोलाइट्स वर्धित उर्वरकों के अलावा कुछ ऐसे और भी नैनो कणों को खोजा गया है जो उर्वरक के रूप में उपयोगी है। नैनो प्रौद्योगिकी के उपलब्ध विकल्पों में से एक कृषि क्षेत्र में उर्वरक विकास के लिए सिफारिश है जिससे दुनिया की बढ़ती आबादी को खिलाने के लिए फसल उत्पादन में वृद्धि हो सके। जियोलाइट्स को कृषि के क्षेत्र में नाईट्रोजन उर्वरकों के निक्षालन से होने वाले नुकसान एवं पौधों में अमोनिया विषाक्तता को कम करने तथा कृषि पैदावार बढ़ाने के लिए प्रभावी ढंग से प्रयोग किया जा सकता है। जबकि अम्लीय मृदा पर जियोलाइट के 10 प्रतिशत प्रयोग का वर्षा के सतही प्रवाह तथा मृदा अपरदन से होने वाले नुकसान का परीक्षणों में मृदा स्थिरता तथा भौतिक दशा में सुधार पाया गया है।अतः नैनो कणों से सतही अप्रवाह तथा अपरदन से होने वाला मृदा नुकसान को कम किया जा सकता है।

शून्य वैलेंट आयरन

नैनो पैमाने पर शून्य वैलेंट आयरन तकनीक 1990 के दशक में शुरू हुई। तब इस तकनीक को विषाक्त हैलोजीनेटेड हाइड्रोकार्बन यौगिकों और अन्य पैट्रोलियम किया गया था क्योंकि गैस टैंक रिसाव में कार्बनिक विलायक फैलाव के माध्यम से भूजल वातावरण में प्रवेश करते हैं। ये धात्विक आयरन के नैनो कण अत्यधिक सक्षम रेडुसिंग एजेंट के रूप में काम करते हैं और ये स्थिर जैविक प्रदूषक को नष्ट करके सौम्य यौगिकों में परिवर्तित करने में सक्षम है। इस प्रकार के नैनो कण क्लोरीनयुक्त मीथेन, क्लोरीनयुक्त बैंजीन, कीटनाशक, पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफिनाइल और नाइट्रो-एरोमैटिक यौगिक आदि प्रदूषकों के नुकसान को कम करने में सक्षम होते हैं।

आयरन ऑक्साइड के नैनो कण

आयरन/लौह मिट्टी का एक महत्वपूर्ण घटक है जो पौधों और जानवरों के लिए आवश्यक पोषक तत्व के रूप में पृथ्वी में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध तत्वों में चौथे स्थान पर विद्यमान है। आयरन ऑक्साइड मृदा में प्रायः नैनो क्रिस्टल के रूप में पाया जाता है जिसका व्यास (5–100 नैनो मी.)है। इसकी सतह विभिन्न प्रकार के अकार्बनिक और कार्बनिक अवयवों को अवशोषित करने में क्रियाशील होती है। विषाक्त पदार्थो के प्रति प्रमुख अवशोषण क्षमता और पर्यावरण के प्रति अनुकूल विशेषताओं के कारण, आयरन ऑक्साइड नैनो कणों के कई रूपों का निर्माण किया गया है तथा मिट्टी और पानी के सुधार के लिए स्थानिक अनुप्रयोगों में सफलतापूर्वक उपयोग किया गया है। इन नैनो कणों को दूषित मृदा में कम कीमत पर पम्प द्वारा या सीधे तौर पर फैला सकते हैं क्योंकि इनसे द्वितीय प्रदूषण का खतरा नहीं होता है। औद्यौगिक अवशिष्ट पदार्थ जिनमें आयरन ऑक्साइड प्रचुर मात्रा में विद्यमान होते हैं उन्हें आजकल मृदा में धातु स्थिरीकरण के लिए प्रयोग किया जा रहा है। जलीय माध्यम में किए गए शोध कार्यों से यह ज्ञात हुआ है कि आयरन ऑक्साइड नैनों कण मृदा में मौजूद हानिकारक एवं विषाक्त भारी धातु कणों की उपलब्धता एवं चालकता को अवशाषण सिद्धांत द्वारा कम कर देता है। आयरन नैनो कणों में नैनो-हैमेटाइट एवं नैनो-मैग्नेटाइट की अवशोषण क्षमता एक समान होती है।

फॉस्फेट आधारित नैनो कण

फॉस्फेट आधारित नैनो कण, शून्य वैलेंट आयरन और आयरन ऑक्साइड नैनो कणों से अलग है। ये भारी धातु द्वारा दूषित मृदा का सुधार अत्यधिक अघुलनशील और स्थिर फॉस्फेट यौगिकों के गठन द्वारा करते हैं। इसका एक विशिष्ट उदाहरण लैंड (पारा) से विषाक्त मृदा सुधार का है। एक शोध कार्य के परिणामों में दर्शाया गया है कि नैनो कणों के प्रयोग द्वारा तीन प्रकार की मृदा (कैल्शियम युक्त, उदासीन और अम्लीय) में सीसा के निक्षालन और पादप उपलब्धता में प्रभावी रूप से कमी होती है ।

आयरन सल्फाइड नैनो कण

फॉस्फेट आधारित नैनो कणों द्वारा भारी धातु स्थिरीकरण के समान ही सल्फाइड आधारित नैनो कण द्वारा मिट्टी और पानी में पारा और आर्सेनिक को खत्म करने के लिए विशेष शोध किए गए हैं। जलभराव की स्थिति वाली एवं भारी धातुओं से विषाक्त मृदा में रेडुसड सल्फर ऑक्साइड का प्रयोग किया जाता है जिसमें रेडुसड सल्फर स्थिरीकरण या सिंक के रूप में कार्य करता है तथा मृदा में विद्यमान धातु के साथ रासायनिक अभिक्रिया द्वारा अत्यधिक अघुलनशील धातु के सल्फाइड बनाकर मृदा सुधार करता है।

निष्कर्ष

नैनो कणों द्वारा मृदा सुधार पर किए गए सभी शोध कायों से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह प्रौद्योगिकी पारंपरिक संसाधनों को प्रयोग करने की बजाय ज्यादा लाभकारी है | आकार छोटा होने के कारण मृदा में आसान वितरण द्वारा मृदा सुधार की दर में भी वृद्धि दर्ज की गई है। अतः आने वाले समय में प्रदूषित जल एवं मृदा सुधार के लिए यह तकनीक कारगर साबित होगी ।

स्त्रोत: कृषि किरण,अजय कुमार एवं मनीषा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रूड़की (उत्तरांचल)  भाकृअनुप-केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल (हरियाणा)।



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