অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

संरक्षण खेती के लिए महत्वपूर्ण प्रबंधन तकनीकियाँ

संरक्षण खेती के लिए महत्वपूर्ण प्रबंधन तकनीकियाँ

भूमि का लेजर समतलीकरण (लेजर लैंड लेवलिंग)

समान रूप से पानी का वितरण सुनिश्चित करने के लिए खेत को सावधानी पूर्वक समतल करना आवश्यक है जिससे पानी की गहराई खेत में एक समान बनी रहे। समतल खेत में जल इकट्ठा नहीं हो पाता तथा उसकी निकासी भी आसानी से हो जाती है। समतलीकरण द्वारा पादप पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग एवं उच्च जल उपयोगी क्षमता सुनिश्चित होती है। समतलीकरण के उद्देश्य को पूरा करने हेतु नवविकसित तकनीक लेजर लैण्ड लेवलर का प्रयोग अत्यधिक लाभकारी सिद्ध हुआ है।

संसाधन संरक्षण तकनीकियों से फसलों में उच्चतम् परिणाम तभी आते हैं जब किसान आवश्यकतानुसार (ग्रीसीजन) लेजर भूमि समतलीकरण के बाद खेती करता है। सतही सिंचाई क्षेत्रों में यह आवश्यक है कि सतह उपयुक्त रुप से समतल हो व उसमें उचित ढ़लान हो ताकि सिंचाई प्रक्रिया सुचारु हो। सतही सिंचित क्षेत्रों के समतलीकरण के लिए लेजर निर्देशित उपकरणों का उपयोग आर्थिक रुप से संभव हो गया है। इन सुविधाओं का किराये पर उपलब्ध होने की वजह से इनका प्रयोग छोटे किसान भी कर सकते है। लेजर भूमि समतलीकरण से क्षेत्र की असमानता 20 मिलीमीटर तक कम हो जाती है। परिणामतः सिंचित क्षेत्र में 2 प्रतिशत व फसल क्षेत्र में 3–4 प्रतिशत तक वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त जल प्रयोग व वितरण की दक्षता में 35 प्रतिशत तक सुधार होता है। सिंचाई जल उत्पादकता, उर्वरक उपयोग दक्षता एवं फसल पकाव में सुधार होता है व खरपतवार दबाव कम होता है। विभिन्न क्षेत्रों में इस तकनीकी का प्रसारण तेजी से हो रहा है जो इस तकनीक की स्वीकार्यता एवं वैधता को दर्शाता है।

बिना जुताई तथा फसल अवशेषों में बुवाई के लिए मशीनें

संरक्षण खेती करने के लिए ऐसी मशीनों की जरुरत होती है जो मृदा सतह पर फसल अवशेषों की उपस्थिति के बावजूद बुआई करने में कामयाब हों। फसल अवशेषों में अच्छी तरह से बुआई करने के लिए विभिन्न जीरो—टिल मशीनों का उपयोग किया जाता है । sanrakshanजीरो—टिल मशीनों के बिना संरक्षण खेती के बारे में सोचना बेमानी है।टबॉ–सीडर, पी. सी. आर. प्लान्टर एवं रोटरी डिस्क ड्रिल 8-10 टन/ हैक्टेयर की दर से उपरिथत खडे (एकड) एवं बिखरे (लूज़) फसल अवशेषों वाले खेत में सही ढंग से बुआई करने के लिए उपयुक्त है। खेत में फसल अवशेषों की मात्रा यदि 3-4 टन प्रति हेक्टेयर हो तो डबल डिस्क कोल्टर का प्रयोग किया जाता है। इन मशीनों में अलग-अलग फसलों की बुआई करने के लिए अलग-अलग झुकी/उध्वाधर (इन्कलाइंड) प्लेटों का उपयोग किया जाता है जिससे दो कतारों के बीच की दूरी एवं पौधे से पौधे के बीच की दूरी को नियंत्रित किया जा सकता है। फसल अवशेषों को जलाने से रोकने व इसके वातावरण व भूमि पर होने वाले कुप्रभावों से बचने के लिये जीरो-टिल पद्धति को नीतिगत स्तर पर ले जाना चाहिए।

बेड प्लान्टिंग

भूमि रुपान्तरण में परिवर्तन के रुप में बैड प्लान्टिंग को सिंचित पारीस्थितिकी में संसाधन संरक्षण तकनीक के रुप में प्रयोग किया जा रहा है। बैड प्लान्टिंग का अर्थ है वह प्लान्टिंग सिस्टम जिसमें फसल को बैड्स पर लगाया जाता है व सिंचाई कूड़ों में दी जाती है। सिमिट ने एक स्थाई फरो सिंचित रेज्ड बैड प्लान्टिंग तकनीक विकसित की है। फरो सिंचित रेज्ड बैड प्लान्टिग तकनीक ने किसानों में पकड़ हासिल की है क्योंकि यह 25-40 प्रतिशत जल, 25 प्रतिशत पोषक तत्व व 20–30 प्रतिशत बीज बचाती है। sanrakshan इसके अतिरिक्त खरपतवार नियंत्रण अधिक होता है, फसल का गिरना, कीटों एवं खरपतवारों का संकमण समतल प्लान्टिंग की तुलना में कम होता है। इन सबके अतिरिक्त यह प्लान्टिग विधि जड़ वातावरण में बदलाव लाती है और जड़ क्षेत्र में वायु संचार को सुधारती है। संरक्षण खेती में इन बैड्स को स्थायी बैड्स में बदल दिया गया है ओर जुताई के कार्यक्रम को एकल कार्य तक सीमित कर दिया है, जिसमें बुवाई, सफाई व फरो को रिशेपिंग एक साथ ही करते है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में बैड प्लान्टिंग में फसल लगाने पर फसलों की उपज में वृद्धि होती है जबकि सिंचित क्षेत्रों में उपज लगभग बराबर होती है।

धान की सीधी बुवाई में खरपतवार नियंत्रण

धान की परंपरागत खेती में मुख्य रूप से खरपतवार की वृद्धि को कम करने के लिए लगभग 5 से 7 सेंटीमीटर की गहराई का सिंचाई जल भराव किया जाता है। धान की सीधी बुवाई पद्धति के द्वारा बीजों को सीधे खेतों में बोया जाता है जिस कारण खरपतवारों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। धान की सीधी बुवाई वाले खेतों में खरपतवारों की संख्या, सघनता एवं विविधता पारंपरिक प्रतिरोपित (कद्दू) धान से काफी sanrakshanअलग होती है अतः उनके नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है। यह अंतर मृदा में नमी के स्तर में अंतर के कारण पाया जाता है। घास की किस्म जैसे सांवक (इकाइनोक्लोआ क्रुसगल्ली), छोटा सांवक (इकाइनोक्लोआ कोलोनम्), मकड़ा (ड़कटाइँलोक्टिनियम अजिपसियम), मुटमुर (इराग्रोस्टिस ज़ेपोनिक), भोयली (लेप्टोक्लोआ चाइनेसिस), बनसा (पैनिकम् प्रजाती) तथा मोथा/ ड़िल्ला (साइप्रस प्रजाती) आदि सीधी बुवाई वाले क्षेत्रों में मुख्य रूप से पायी जाती है जबकि पारंपरिक प्रतिरोपित धान में मुख्य रूप से सांवक, छोटा सांवक एवं मोथा का अधिक प्रभुत्व होता हैं।

सीधी बुवाई वाले धान में शस्य क्रियाओं तथा रासायनिक विधियों के समन्वय से खरपतवारों का परभावी ढंग से नियन्त्रण किया जा सकता है जोकि इस प्रकार है :-

स्टेल बीजशैया तकनीक

इस तकनीक का प्रयोग धान की सीधी बुवाई वाले क्षेत्रों में खरपतवार को कम करने के लिए किया जाता है। इस विधि में धान की बुवाई के एक महीने पहले एक या दो सिंचाई देकर खरपतवार के बीजों को उगने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और उसके बाद गैर चयनात्मक शाकनांशी राउंडअप या ग्लायसेल (41 प्रतिशत गलाइफ़ॉसेट) 15-20 मिलीमीटर प्रति लीटर पानी या मेरा-71 (71 प्रतिशत गलाइफ़ॉसेट) 6-10 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव बुवाई के 5–7 दिन पहले करके मार दिया जाता है। इस विधि से पिछले सत्र के स्वयंसेवक धान (वोल्यूटर राइस) एवं जंगली धान को भी नियंत्रित किया जा सकता है।

जमीन की सतह पर फसल अवशेष रखकर (मल्चिंग)

जमीन की सतह पर फसल अवशेष छोडनें से उगने वाले खरपतवारों को भौतिक बाधा उत्पन्न होती है। जीरो—टिलेज विधि (फसल अवशेषों के साथ) खरपतवारों के बीजों को खाने वाले परभक्षियों की मात्रा को बढ़ावा देती है जोकि खरपतवार के बीज भंड़ार को कम करने में सहायक होते हैं। धान के फसल अवशेष गेहूँ की फसल में मंडुसी (फलेरिस माइनर) के अंकुरण एवं वृद्धि को रोकते हैं।sanrakshan

रासायनिक नियन्त्रण

बुआई पूर्व (जीरो-टिलेज विधि से धान की सीधी बुवाई वाली स्थिति में) :- खेत में उपलब्ध बहुवर्षीय खरपतवारों को नष्ट करने के लिए बुवाई से पहले हल्की सिंचाई करने से शेष खरपतवार के बीजों का अंकुरण भी हो जाता है तथा पुरानें खरपतवारों की वृद्धि शुरु हो जाती है। इन खरपतवारों को नष्ट करने के लिए गैर चयनात्मक शाकनाशीयों का प्रयोग बुवाई से 8–10 दिन पहले करना चाहिए। जीरो-टिलेज तकनीकी से धान कि सीधी बुवाई वाली स्थिति में जमें हुये खरपतवारों को नष्ट करने के लिए राउंडअप या ग्लायसेल (41 प्रतिशत गलाइफॉसेट) 15–20 मिलीमीटर प्रति लीटर पानी या मेरा-71 (71 प्रतिशत गलाइफ़ॉसेट) 6–10 ग्राम प्रति लीटर पानी में प्रयोग करें।

फसल बुआई के बाद व अंकुरण से पहले शाकनाशीयों का प्रयोगः- धान के खेत में उगने वाले सभी प्रकार (घास एवं चौडी पत्ती वाले खरपतवार) के खरपतवारों को नष्ट करने के लिए बुआई से लेकर 3 दिन के भीतर स्टॉप (पैन्डिमीथेलीन 30 प्रतिशत) 3300 मिलीलीटर प्रति हैक्टेयर (1.0 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर) या स्टॉप एक्सट्रा (पैन्डिमीथेलीन 3870 प्रतिशत) 2580 मिलीलीटर प्रति हैक्टेयर (1.0 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर) अथवा टोप स्टार (आग्जाड़ाइरजिल 80 प्रतिशत ड्रब्ल्यू पी) 112.5 ग्राम प्रति हैक्टेयर (90 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर) की दर से छिडकाव करें।

अंकुरण के बाद शाकनाशियों का प्रयोगः- सभी प्रकार की घासों, चौडी पत्ती वाले खरपतवारों एवं मोथे को नष्ट करने के लिए बुवाई के 15-25 दिन के भीतर नोमिनिगोल्ड या अड़ोरा (बिसपाइरिबेक) की 250 मिलीलीटर प्रति हैक्टेयर (25 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर) को 300-375 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें। फिनोक्साप्रोप की 60 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के 15–21 दिन के भीतर छिड़काव करना लेप्टोकलोआ, घासों, चौडी पत्ती वाले खरपतवारों एवं मोथे के नियन्त्रण में प्रभावकारी पाया गया है। पेनोक्सुलाम का बुवाई के 15 दिन बाद 300–375 लीटर पानी में घोलकर (20 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर) छिडकाव करने से सभी खरपतवारों को नियन्त्रित कर सकते हैं। फसल पर शाकनाशीयों को छिड़कने की दर फसल की अवस्था, खरपतवार घनत्व, मृदा आद्रता, स्प्रे नोजल एवं उपस्थित मौसम आदि पर निर्भर करता है। शाकनाशीयों का प्रयोग खरपतवारों के प्रकार एवं उनकी संख्या तथा फसल की शाकनाशी के साथ चयनात्मकता के आधार पर किया जाता है (तालिका 3) ।

शाकनाशीयों को मिलाकर छिडकने से खेत में उगे हुऐ सभी प्रकार के मिश्रित खरपतवारों (घासें, चौडी पती खरपतवार एवं मोथे) का नियन्त्रण आसानी से किया जा सकता है। बिसपाइरिबेक संग अजीमसलफुरॉन का 250 मिलिलीटर + 250 ग्राम प्रति हैक्टेयर (25 एवं 175 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर) की दर से 300–375 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 15–20 दिन बाद छिड़काव करने से घासों एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के अलावा मोथा पूरी तरह नियन्त्रित हो जाता है। फिनोक्साप्रोप का इथोक्सिसलफुरॉन के साथ छिड़काव करने पर भी घासों, चौडी पत्ती वाले खरपतवारों एवं मोथे का नियन्त्रण किया जा सकता है। शाकनाशीयों के प्रयोग करते समय खेत में प्रयप्ति नमी होना आवश्यक है।

तालिका 3 : धान की सीधी बुवाई में खरपतवारों को नियन्त्रित करने वाले शाकनाशी

शाकनाशी व्यवसायिक नाम मात्रा (मिलि./ ग्राम प्रति है) छिड़काव का समय खरपतवारों पर प्रमाव/नियन्त्रण
बिसपाइरिबेक नोमिनिगोल्ड या अड़ोरा 250 मिलि. प्रति हैक्टेयर (25 ग्राम सक्रिय तत्व) बुवाई के 15-25 दिन के बाद एक वर्षीय मोथे, घासों एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का अच्छा नियन्त्रण
पेनोक्सुलाम ग्रेनाइट 93.75 मिलि. प्रति हैक्टेयर (22.5 ग्राम सक्रिय तत्व) बुवाई के 15-20 दिन के बाद व्यापक विस्तार (ब्रोड़ स्पेक्ट्रम) वाली घासों एवं चौड़ी पत्ती वाले तथा एक वर्षीय मोथेँ का अच्छा नियन्त्रणः
फिनोक्साप्रोप इथाईल + सेफनर राइस स्टार 870–1300 मिलि प्रति हैक्टेयर (60-90 ग्राम सक्रिय तत्व) बुवाई के 15-20 दिन के बाद एक वर्षीय खरपतवारों पर अच्छा नियन्त्रणं
अजीमसलफुरॉन सेगमेंट 35-70 ग्रामं प्रति हैक्टेयर (175-35 ग्राम सक्रिय तत्व) बुवाई के 15-20 दिन के बाद व्यापक विस्तार वाली घासों एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों एवं मोथें का अच्छा नियन्त्रण
इथोक्सिसलफुरॉन सनराइज 120 मिलि प्रति हैक्टेयर (18 ग्राम सक्रिय तत्व) बुवाई के 15-20 दिन के बाद चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों एवं मोथे पर प्रभावी
कारफेन्ट्राजोन एफिनिटी 20 मिलि प्रति (50 ग्राम सक्रिय तत्व) बुवाई के 15-20 दिन के बाद केवल चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर प्रभावी
2,4-ड़ी, ईथाइल ईस्टर वीड़मार 1250 मिलि प्रति हैक्टेयर (500 ग्राम सक्रिय तत्व) बुवाई के 15-25 दिन के बाद चोड़ी पत्ती वाले खरपतवारों एवं एक वर्षीय मोथे पर अच्छा प्रभावी )
बिसपाइरिबेक+अजीमसलफुरॉन - 250 मिलि. + 35 ग्राम प्रति हैक्टेयर (25+17.5 ग्राम सक्रिय तत्व) बुवाई के 15-20 दिन के बाद व्यापक विस्तार वाली घासों एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों एवं मोथें का अच्छा नियन्त्रण
बिसपाइरिबेक + पाइरेजोसलफुरॉन - 250 मिलि. + 250 ग्राम प्रति हैक्टेयर (25+25 ग्राम सक्रिय तत्व) बुवाई के 15-20 दिन के बाद व्यापक विस्तार वाली घासों एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों एवं मोथें का अच्छा नियन्त्रण
फिनोक्साप्रोप+इथोक्सिसलफुरॉन - 645 मिलि. + 120 ग्राम प्रति हैक्टेयर(60+18 ग्राम सक्रिय बाद तत्व) बुवाई के 15-25 दिन के बाद घासों एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों एवं मोथें का अच्छा नियन्त्रण, भोयली एवं मकड़े पर प्रभावी

फसल विविधिकरण एवं टिकाऊ फसल प्रणालियां

धान-गेहूँ फसल चक्र में मूंग को शामिल करके फसल प्रणाली उत्पादकता के साथ-साथ भूमि की उर्वरा शक्ति एवं खरपतवार नियंत्रण दक्षता को भी बढ़ाया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर धान के स्थान पर मक्का को लगाने से घटते भू-जलस्तर एवं मजदूरों की कमी जैसी समस्याओं से निजात पायी जा सकती है। धान-गेहूँ की स्थापन विधि में बदलाव करके धान में कद्दू करके रोपाई करने की बजाय धान की सीधी बिजाई एक लाभकारी विकल्प हो सकता है। धान आधारित फसल चक्र को अधिक लाभकारी बनाने के लिये कम अवधि के धान के बाद आलू व मक्का या सूरजमुखी को शामिल किया जा सकता है। सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में धान-गेहूँ फसल प्रणाली का अन्य फसलों के साथ सघनीकरण करने से पारम्परिक धान-गेहूँ फसल चक्र की अपेक्षा अधिक उत्पादकता व शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है। गन्नें की फसल को अक्तूबर माह में अन्तःवर्तीय फसलों (गेहूँ, सरसों, प्याज, लहसुन, धनियां व अन्य दलहनी व तिलहनी फसलें इत्यादि) के साथ सफलातपर्वृक उगाया जा सकता है। ऐसा करने से गन्नें के उत्पादन के अलावा अंत:वतॉय फसलों से अतिरिक्त आय भी प्राप्त हो जाती है। अतः गन्ने के साथ अंतःवतॉय फसलें उगाकर दोहरा लाभ प्राप्त करके गन्ना आधारित फसल चक्रों को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है।

स्त्रोत : केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान(भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद),करनाल,हरियाणा।



© 2006–2019 C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate