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जलकुंभी का जैवकीय नियंत्रण

जलकुंभी का जैवकीय नियंत्रण

जलकुंभी क्या है?

जलकुंभी गर्म देशों में पाया जाने वाला एक जलीय खरपतवार है जो वार्षिक या बहुवर्षीय एवं स्वतंत्र रूप से तैरने वाला पौधा है। यह जलीय पौधों की फेमली पोंटेडरिएसी का सदस्य है। ब्राजील में जन्मा यह पौधा यूरोप को छोड़कर सारी दुनिया में पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम “आइकोर्निया क्रेसिपस” है पर हिन्दी भाषी क्षेत्रों में इसे “जलकुंभी”, “पटपटा” या “समुद्र सोख” के नाम से जाना जाता है। भारत में यह पौधा उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में सर्वप्रथम कोलकत्ता में एक फूल वाले पौधे के रूप में लाया गया था। भारत की नम एवं गरम् हवा इस पौधे को बेहद रास आई। यह पौधा भारत में लगभग 4 लाख हेक्टेयर पानी के स्त्रोतों में फैला हुआ है और जलीय खरपतवारों की सूची में इसका स्थान सबसे ऊपर है।

जलकुंभी कैसे फैलती और प्रजनन करती है?

जलकुंभी मुख्यत: बाढ़ के पानी, नदियों और नहरों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलती है। मिट्टी में दबे बीजों द्वारा भी इसका फैलाव होता है। इसका प्रजनन बीजों या पौधे की बढ़वार द्वारा होता है। एक पौधा 5000 तक बीज उत्पन्न कर सकता है। इसके बीज पानी के नीचे मिट्टी में कई वर्षो तक दबे पड़े रह सकते है जो अनुकूल परिस्थिति आने पर उग जाते हैं। मुख्य पौधे से कई तने (नाल) निकल आते हैं जो छोटे-छोटे पौधों को जन्म देते हैं तथा बड़े होने पर मुख्य पौधे से टूटकर अलग हो जाते हैं। इसमें प्रजनन की इतनी अधिक क्षमता होती है कि एक पौधा 9-10 महीनों में एक एकड़ पानी के क्षेत्र में फ़ैल जाता है। अनुकूल परिस्थितियों में जलकुंभी सिर्फ 10-12 दिन में अपनी संख्या दुगनी कर लेते हैं।

जलकुंभी से होने वाले नुकसान

जलकुंभी से पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे मछलियों की वृद्धि के अलावा अन्य जलीय वनस्पतियों और जीवों का दम घुटने लगता है। यह पानी के बहाव को 20 से 40% तक कम कर देती है। बड़े बांधों में जलकुंभी बिजली उत्पादन को प्रभावित करती है। जलकुंभी की उपस्थिति के कारण पानी के “वाष्पोत्सर्जन” की गति 3 से 8 प्रतिशत तक अधिक बढ़ जाती है। जिससे पानी का जल स्तर तेजी से कम होने लगता है। जलकुंभी से ग्रसित पानी के क्षेत्र मच्छरों के लिए स्वर्ग है।

जलकुंभी के नियंत्रण के उपाय

तालाबों और सिंचाई नहरों की जलकुंभी को श्रमिकों द्वारा निकलवाया जा सकता है। पर यह विधि बहुत मंहगी है और सिर्फ छोटे स्थानों के लिए ही संभव है। झीलों और बड़ी नदियों की जलकुंभी को मशीनों द्वारा निकलवाना सस्ता पड़ता है पर थोड़े समय बाद उन्हीं स्थानों पर जलकुंभी फिर से उग जाती है। कुछ शाकनाशी जैसे कि 2-4 डी, ग्लाइफोसेट या पेराक्वाट द्वारा जलकुंभी का अच्छा और तेजी से नियंत्रण होता है परन्तु भारत जैसे देश में रासायनिक विधियां मंहगी होने के कारण कारगर साबित नहीं हो पाती। ये विधियां पर्यावरणीय कारणों के कारण भी कम प्रचलित हैं।

जलकुंभी का जैवकीय नियंत्रण

जैवकीय नियंत्रण विधि में जीवों जैसे कीट, सूतकर्मी, फफूंद, मछली, घोंघे, मकड़ी आदि का उपयोग खरपतवारों को नष्ट करने में किया जाता है। यह बहुत सस्ती और कारगार विधि है। यह एक स्वचालित प्रक्रिया है और इसे एक बार करने के बाद बार-बार नहीं अपनाना पड़ता है। इस विधि में पर्यावरण एवं अन्य जीवों एवं वनस्पतियों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है।

जैविक कीटों और चिचड़ी (माइट) का भारत में आयात

ब्राजील आदि देशों में जो जलकुंभी के मूल उत्पत्ति क्षेत्र हैं, 70 से भी अधिक कीट एवं चिचड़ी आदि प्रजाति के जीव जलकुंभी का भक्षण करते हुए पाए गए परन्तु मात्र 5-6 कीटों और माइट की प्रजातियों को ही जैवकीय नियंत्रण के लिए उपयुक्त माना गया। इनमें से कुछ सुरसरी और शलभ प्रजातियों को जलकुंभी के जैवकीय नियंत्रण के लिए आस्ट्रेलिया, अमेरिका, सूडान आदि देशों में छोड़ा गया जहां इन्होंने जलकुंभी को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई। दूसरे देशों में इन जैविक कीटों की सफलता से प्रभावित होकर भारत में भी 3-4 कीटों और एक चिचड़ी (माइट) की प्रजाति को 1982 में फ्लोरिडा और आस्ट्रेलिया से बंगलोर में आयात किया गया। संघरोघ प्रयोगशालाओं में सघन वर्णात्मक परीक्षणों के बाद भारत सरकार ने सुरसरी की दो प्रजाति क्रमश: नियोकोटीना आइकोर्नी एवं नि.ब्रुकी (कोलियोप्टरा; कुरकुलियोनिडि) को 1983 एवं माइट की प्रजाति “ओर्थोगेलुमना टेरेब्रा” को 1985 में बाहर के वातावरण में छोड़ने की अनुमति दे दी। आज ये कीट भारत में हर प्रदेश में फ़ैल चुके हैं। जहां ये जलकुंभी का कम या अधिक स्तर पर जैवकीय नियंत्रण कर रहे हैं।

सुरसरी का जीवन चक्र

सस्सरी तौर पफ देखने से सुरसरी की दोनों प्रजातियाँ एक जैसी दिखती हैं पर इन्हें लक्षणों के आधार पर अलग-अलग पहचाना जा सकता है। दोनों ही प्रजातियाँ जलकुंभी पर एक समय में ही साथ-साथ मिल सकती हैं। वयस्क सुरसरी जलकुंभी की पत्तियों को खुरच-खुरच कर खाती हैं। खुरचन के निशानों से जलकुंभी पर इनकी उपस्थिति का आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है। मादा सुरसरी जलकुंभी के तने या पत्ती की सतह के नीचे अपने अंडे देती है जो सफेद रंग के और ¾ मिमी. लम्बे होते हैं। 7-14 दिनों में अण्डों से लार्वा (ग्रव) निकल आते हैं जो 75 से 90 दिन बाद कायांतरण करने के लिए ग्रव जलकुंभी की सूक्ष्म जड़ों को अपने चारों ओर लपेटकर एक सुरक्षित गाँठनुमा स्थान बना लेते हैं और प्यूपेशन में चले जाते हैं। जहां ये 14-20 दिन में वयस्क बन जाते है। वयस्क सुरसरी 30 से 200 दिन तक ज़िंदा रह सकती है। एक मादा अपने जीवन काल में 150 से 800 अंडे तक दे सकती है। सबसे अधिक अंडे मादा सुरसरी अपने जीवन काल के दूसरे-तीसरे सप्ताह में देती है। नि:ब्रुकी प्रजाति नि.आइकोर्नी से आकार में थोड़ा बड़ी होती है और पीठ के बीचों बीच इस पर एक हल्के गहरे रंग का धब्बा सा होता है।

कीट जलकुंभी को कैसे नष्ट करते हैं?

सुरसरी के जातक अण्डों से निकलकर तने में छेद कर इसमें घुस जाते हैं और धीरे-धीरे उत्तकों को खाकर तने को खोखला कर देते हैं जिससे जलकुंभी ऊपर से सूखने लगती है। वयस्क सुरसरी द्वारा पत्ती को खरच-खुरच कर खाने के कारण पत्ती में हरित लवक की कमी होने लगती है। वयस्क सुरसरी कोमल और बिना खुली पत्तियों को काफी पसंद करती है जिस कारण जलकुंभी का पौधा इनके आक्रमण से छोटी अवस्था में ही कमजोर हो जाता है। ग्रव उत्तकों को खा-खाकर तना खोखला कर देते हैं जिससे उनमें पानी भरने लगता है और धीरे-धीरे पौधा सूखकर पानी में ही सड़-गल डूब जाता है।

साल दर साल यह प्रक्रिया चलती रहती है। जिससे कुछ वर्षो में ही ऐसे जलाशयों में जलकुंभी का पूर्णतय: नियंत्रण हो जाता है। ये कीट नदियों या नहरों की जलकुंभी की अपेक्षा झीलों और तालाबों की जलकुंभी, जहां पानी ठहरा हुआ रहता है, अधिक सक्रिय रहते हैं। अत: झीलों और बड़े-बड़े जलाशयों में जलकुंभी का जैवकीय नियंत्रण आसानी से किया जा सकता है।

चिचड़ी (माइट) के बाए में

मादा माइट पत्ती की निचली सतह पर अंडे देती है। इनके अंडे बहुत ही सूक्ष्म होते हैं और बिना सूक्ष्मदर्शी के देखना संभव नहीं है। एक मादा 50 से 60 अंडे दे सकती है। अंडे से पूर्ण वयस्क बनने में 22-25 दिन लग जाते हैं। माइट के जातक पत्तियों में छोटी-छोटी असंख्य गलियाँ बना कर उसका भक्षण करते हैं। यह सच है कि अपने अकेले डीएम पर, माइट जलकुंभी को नष्ट नहीं कर पाते परन्तु सुरसरी के साथ मिलकर ये जलकुंभी को जल्दी नष्ट कर देते हैं।

जलकुंभी को जैविक विधि से नियंत्रण करने में कितना समय लगता है?

कीटों द्वारा जैविक विधि में जलकुंभी का नियंत्रण समुद्र या जलाशयों में उत्पन्न होने वाली लहरों के समान होता है। जैसे लहरें एक ऊँचाई ग्रहण करने के बाद खत्म हो जाती है और इस लहर के बाद फिर दूसरी लहर आती है इसी प्रकार एक बार कीटों द्वारा जलकुंभी नष्ट करने के बाद कीटों की संख्या भी कम हो जाती है। जलकुंभी का घनत्व फिर बढ़ने लगता हैजिसके अनुपात में ही कीटों की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ने लगती है और इतनी अधिक हो जाती है कि जलकुंभी को फिर नष्ट कर देती है। सामान्य तौर पर जलकुंभी को पहली बार नष्ट करने में कीटों द्वारा 2 से 4 साल तक लग जाते हैं। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि कीट उस जलाशय में कितनी मात्रा में छोड़े गये हैं। अधिक कीट छोड़ने पर, नियंत्र शीघ्र होता है। दूसरी और अन्य बार जलकुंभी का नियंत्रण होने में सामान्यत: कम समय लगता है। एक बड़े तालाब या झील में इस प्रकार साल दर साल, जलकुंभी का कीटों द्वारा नियंत्रण किया जाता है, जिससे धीरे-धीरे वहां कई वर्षो से जमा होने वाले बीजों का भी घनत्व कम होने लगता है और 7-8 लहरों के बाद वहां से जलकुंभी पूरी तरह से नष्ट हो जाती है। जबलपुर में कई जलाशयों की जलकुंभी 6 से 8 सालों में कीटों द्वारा पूरी तरह नियंत्रित हो गई। मणिपुर, बंगलौर एवं हैदराबाद आदि शहरों में भी इन कीटों द्वारा जलकुंभी को नियंत्रण करने में अपार सफलता मिली। सीमित मात्रा में शाकनाशी का जैविक कीटों के साथ प्रयोग करने से जलकुंभी का नियंत्रण और जल्दी किया जा सकता है।

कीटों को कब छोड़े?

वैसे तो वयस्क सुरसरी जलकुंभी पर कभी भी छोड़ी जा सकती है। परन्तु छोटे और जलकुंभी की बढ़वार के समय कीटों को छोड़ना अधिक फायदेमंद होता है क्योंकि कोमल पत्तियों को खाकर मादा अधिक तेजी से प्रजनन करती है। जिससे कीटों को स्थापित होने में कम समय लगता है। कीटों को मानसून खत्म होने पर छोड़ना अधिक उपयुक्त रहता है क्योंकि वर्षा ऋतु में बाढ़ आदि आने का खतरा बना रहता है जिससे छोड़े गए कीट पानी के साथ ही बहकर कहीं और जा सकते हैं।

कीटों को कहां छोड़ना चाहिए?

कीटों को ऐसे जलाशयों में छोड़ना चाहिए जहाँ पहले के कीट न हो और अगर हों तो कम मात्र में हों। यदि पत्ती की सतह पर खुरच-खुरच कर खाने के निशान है तो कीट उक्त जलाशय में है। अगर निशान अधिक हैं तो उसी मात्रा में कीटों की संख्या भी अधिक होती है।

कम पानी वाले जलाशयों में कीटों को छोड़ने से अधिक फायदा नहीं होगा क्योंकि गर्मियों में उक्त जलाशय सूख जाते हैं जिससे जलकुंभी की जड़े मिट्टी पकड़ लेती हैं। क्योंकि कायांतरण के लिए लार्वा का प्यूपेशन जड़ों में होता है अत: ऐसी अवस्था में उचित स्थान न मिलने के कारण कायांतरण की प्रक्रिया बाधित हो जाती है और कीटों की संख्या में आशातीत वृद्धि नहीं हो पाती है। अत: कीटों को जलकुंभी को नष्ट करने के लिए ऐसे जलाशयों में ही छोड़ना चाहिए जहाँ पानी पर्याप्त मात्रा और गहराई में हो। ऐसा भी देखने में आया है कि ऐसी जगहों पर भी कीटों द्वारा आंशिक सफलता मिलती हैं जहाँ जलाशय का क्षेत्रफल तो अधिक होता है पर कम क्षेत्र ही गहरा होता है। ऐसे जलाशयों में बरसात होने पर तो पानी काफी एकत्र हो जाता है और जलकुंभी भी काफी फ़ैल जाती है पर गर्मी आते ही पानी तेजी से सूखने लगता है जिससे जलकुंभी की जड़ें मिट्टी में दबने लगती हैं और पौध सूखने लगते हैं। ऐसा होने पर उचित कायांतरण के लिए स्थान न मिलने के कारण कीटों की संख्या नहीं बढ़ पाती जिसे जैविक नियंत्रण में सफलता नहीं मिलती।

कितने कीट छोड़े?

जैविक नियंत्रण की जल्दी और अच्छी सफलता के लिए जितने अधिक कीट छोड़े जायेंगे, उतना ही अधिक लाभ होगा। उदाहरण के लिए एक एकड़ क्षेत्रफल की जलकुंभी में 4-5 महीने में ही नियंत्रण करने के लिए लगभग एक लाख कीटों की आवश्यकता होगी। पर इतने अधिक कीट पालन और छोड़ना संभव नहीं हो पाता है। अत: कम से कम इतने कीट छोड़ने की कोशिश करना चाहिए कि छोड़े गये कीट वहां प्रजनन कर अपनी संख्या स्वत: ही बढ़ा लें और जलकुंभी को नष्ट कर दें। एक एकड़ क्षेत्रफल के जलाशय में कम से कम 500 से 1000 वयस्क कीट छोड़ना  चाहिए। जलाशय को कई भागों में बाँट कर एक भाग में कम से कम 100 कीट छोड़ने से पूरे जलाशय में कीट समान रूप से वृद्धि कर जलकुंभी का जैविक नियंत्रण करते हैं।

सुरसरी कीटों को संक्रमित स्थानों से पकड़कर नये स्थानों में छोड़ने के लिए कैसे भेजें?

नई जगहों पर छोड़ने के लिए कीटों को पहले से संक्रमित स्थानों से आसानी से पकड़ा जा सकता है। नई जगहों पर ले जाने के लिए कीट की वयस्क अवस्था ही सबसे उपयुक्त है। दिन में सुरसरी जड़ और तने के मध्य पत्तियों और डंठलों के बीच अधिक रहती हैं जहां से इन्हें आसानी से पकड़ा जा सकता है। अगर कीटों को खिन दूर ले जाना या भेजना हो तो छोटी-छोटी पत्तियों को 4-8 सेमी. डंठल के साथ तोड़कर इसका गुलदस्ता बना लें। इन डंठलों को रूई या स्पंज में पानी डालने के बाद एक पोलीथिन में रखकर रबर बैंड से इस प्रकार बाँधना चाहिए कि पानी बाहर न निकल सके। इस प्रकार के 2-3 गुलदस्ते बनाकर, एक उचित प्रकार की बड़ी एवं मोटी पोलीथिन में रख देना चाहिए। हवा के आवागमन के लिए इसमें छोटे-छोटे छेद कर देना चाहिए। कोरियर या डाक द्वारा भेजने के लिए इन पोलीथिन के थैलों को मजबूत गत्ते के डिब्बे में रखकर भेजा जा सकता है। हवा के लिए ऐसे डिब्बों में भी छेद कर देना चाहिए या लचीली पीतल या जाली को काटे हुए स्थानों पर सिल देना चाहिए। ऐसे प्रत्येक गुलदस्ते में 100 से 150 तक वयस्क सुरसरी रखी जा सकती हैं और एक बड़ी पोलीथिन में ऐसी 2 से 5 तक छोटी थैली गुलदस्ते के साथ रखी जा सकती है। इस विधि से रखे गये वयस्क 7-10 दिन तक की यात्रा आसानी से कर सकते हैं।

सुरसरी को पालकर संख्या बढ़ाना

छोटे प्लास्टिक या सीमेंट के टबों में 20-25 छोटे आकार की जलकुंभी को रखकर इनमें 40-50 वयस्क छोड़ देते हैं। मादा वयस्क पत्तियों या डंठलों के उत्तकों में छेदकर उनमें अंडे देना शुरू कर देते हैं। 7 से 10 दिन बाद इन वयस्क सुरसरी को इन पौधों से निकालकर पुन: अंडे देने के लिए ताजे जलकुंभी के पौधों पर छोड़ देना चाहिए। इन वयस्कों को 5-6 बार अंडे देने के लिए उपयोग में ला सकते हैं। इसके बाद नये निकले वयस्कों का प्रयोग करना चाहिए। अण्डों से युक्त जलकुंभी को बड़े टब में दाल देते हैं। ये बड़े टब फाइबर या सीमेंट के होते हैं। करीब 80 सेमी. घेरे वाले और 90 सेमी. गहरे टब में 150 जलकुंभी के पुष्ट पौधे आ जाते हैं। टबों में पानी का स्तर बराबर बनाये रखना चाहिए। जलकुंभी के पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए टबों में 200 ग्राम गोबर, 40 ग्राम सुपर फास्फेट और 10 ग्राम यूरिया प्रति क्यूविक मीटर के हिसाब से मिलाना चाहिए। लगभग तीन महीनों बाद इन पौधों से सुरसरी के वयस्क बनना शुरू हो जाते हैं। हर 15 दिन के अंतर से इन टबों से वयस्क सुरसरी दूसरी जगहों में डालने के लिए या भेजने के लिए निकालते रहना चाहिए। समय-समय पर बड़े टबों से पुराने पौधे निकालकर ताजे पौधे डालते रहना चाहिए।

स्त्रोत: कृषि विभाग, भारत सरकार



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