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रोजगार

गृह आधारित उत्पादन

भारत में घरेलू उद्योगों का दयारा गाँवों व शहरों दोनों क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसमें विभिन्न तरह के उत्पादन, कृषि, गैर कृषि आदि शामिल हैं। घरेलू उद्योग पुराना उद्योग है लेकिन नई आर्थिक नीतियों ने इसे प्रोत्साहित किया है। कृषि क्षेत्र में बढ़ रही अरुचि और गाँवों में रोजगार के सीमित साधनों ने भी इस उद्योग को बढ़ावा दिया है।

घरेलू कामगार अधिकतर महिलाएं व लड़कियाँ ही होती हैं। समाज में एक महिला की भूमिका उसके घरेलू कार्यों से ही आंकी जाती है। उस पर बच्चों की देखभाल और घर परिवार की सेवा का दायित्व होता है। इसलिए भी घरेलू उद्योग उसके अनुकूल रहता है। क्योंकि घर में रहते हुए आर्थिक गतिविधियों से जुड़ने पर उसके घरेलू, सामाजिक दायित्व ज्यादा प्रभावित नहीं होते। मिसाल के तौर पर एक बीड़ी लपेटने का काम करने वाली महिला अपना यह काम करते हुए छोटे बच्चे को स्तनपान भी करा सकती है। सामाजिक प्रचलन भी महिला को घर बैठ कर काम करने को बढ़ावा देते हैं। चूँकि इसमें पारिश्रमिक उजारती ‘पीस रेट’ के आधार पर दिया जाता है। इसलिए ये महिलाएं अपनी बच्चियों से भी यही काम करवाने लगती हैं। अधिकतर लड़कियाँ को बचपन में ही स्कूल से इसलिए निकाल दिया जाता है ताकि वे घर बैठकर घरेलू कामकाज करें और घरेलू आथिक गतिविधियों से जुड़ कर पैसा भी कमायें। बीड़ी लपेटने, पेपर बैग बनाने, लेबल चिपकाने व कटिंग के काम में लाखों बालिका पायीं जाती हैं।

ठेकेदार व नियोजक (मालिक, उयोगपति) नई महिलाओं व बालिका कामगारों का भरपूर आथिक शोषण करते हैं। वे इन्हें नियमित काम नहीं देते। कम मजदूरी पर काम करवाते हैं। अधिकतर काम पीस रेट पर होता है। ज्यादा मुखर होने पर काम न देने की धमकी मिलती है। वे चुपचाप काम करती रहती हैं क्योंकि घर से बाहर निकलने पर उन्हें अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

घरेलू कामगारों से हमारा तात्पर्य उन लोगों से है जो घर बैठकर वस्तुओं का निर्माण करते हैं  और मालिक द्वारा प्रति दर्जन अथवा सैकड़ा या हजार के हिसाब से भुगतान पाते हैं। इसके लिए कई बार वे कच्चा माल स्वयं खरीदते हैं और कभी-कभी कच्चा माल मालिक द्वारा भी प्रदान किया जाता है। घरेलू कामगारों में अधिकाश संख्या महिलाओं एवं छोटी लड़कियों की है। महिलाओं अपने दैनिक कामों जैसे खाना बनाना, कपड़े धोना, बर्तन साफ करना आदि को करते हुए साथ-साथ ये काम भी करती है जिससे उनके परिवार की आर्थिक मदद हो सके।

घरेलू कामगारों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। 1- जो कच्चा माल स्वयं खरीदते हैं व उत्पादित वस्तु की बिक्री से पैसा कमाते हैं २- जिन्हें कच्चा माल मालिक द्वारा दिया जाता है और प्रति दर के हिसाब से भुगतान किया जाता है। यह भुगतान वस्तुओं के वजन, संख्या एवं आकार पर आधरित होता है। इन्हें ठेके पर काम करने वाले कामगार भी कहा जा सकता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि मालिकों द्वारा दिया गया कच्चा माल ये कामगार अपने घर ले जाते हैं। वस्तु के निर्माण के समस्त प्रक्रियाएं वे अपने घर पर ही करते हैं और उत्पादित वस्तुओं मालिक को वापस कर देते हैं। बीड़ी बनाना, अगरबत्ती बनाना, अनाज साफ करना, पापड़ बेलना आदि इस तरह के उत्पादन के अच्छे उदाहरण हैं।

ठेके पर काम करने वाले कामगारों को वस्तुओं का उत्पादन करते समय अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है जैसे एक दिन में 15 घंटे काम करने पर भी बहुत कम मजदूरी पाना। जरी जैसा महीन काम करने वाले कामगार दिन में 8 घंटे काम करने पर भी पांच रूपये से ज्यादा मेहनताना नहीं पाते। उनका रोजगार सुरक्षित नहीं। व्यस्तता समय में उन्हें दिन में 16 घंटे काम करना पड़ता है। वहीं मंदी के समय उन्हें तीन महीने हाथ पर हाथ रखकर बैठना पड़ता है। एक नई तकनीक आने से हजारों की संख्या में कामगार बेकार हो जाते हैं। उनका कार्य स्थल उनका घर होता है। अतः स्थानाभाव के कारण कई बार परिवार के सदस्यों को घर से बाहर रहना पड़ता है। बीड़ी बनाने जैसे कार्यों में तम्बाकू के उड़ने से महिलाओं तथा बच्चो के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उनके लिए किसी भी प्रकार के संगठन का निर्माण हुआ है। इनकी सामाजिक आर्थिक दशा भी शोचनीय है। घरेलू कामगारों की इस दयनीय स्थिति का कारण यह है कि समाज में ये कामगार अप्रत्यक्ष रूप में विद्यमान हैं और सामान्यतः घर में रहकर ही अपना काम करते हैं अतः वे राष्ट्रीय आंकड़ों में स्थान नहीं पाते।

घरेलू उत्पादन में नियोजकों की भूमिका

घरेलू कामगारों को नियोजक ऐसा काम देते हैं जिनके लिए भारी मशीनों की जरुरत नहीं पड़ती। पर वह काम लबें व थकान भरे होते हैं। कम्पनी उत्पादित वस्तुएं प्राप्त करके उन पर अपनी कम्पनी का ब्रांड लगाती है। मालिक द्वारा काम या तो प्रत्यक्ष रूप में कामगारों को दिया जाता है यह फिर कान्ट्रेक्टर के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप में काम दिया जाता है। श्रम कानून के अंतर्गत न आने के कारण मालिकों द्वारा इन कामगारों को बहुत कम मजदूरी दी जाती है, वे इनके लिए कोई भी कल्याणकारी कार्य नहीं करते।

आवश्यकता इस बात की है कि इस प्रकार के शोध कार्य किये जाए जिनसे इन कामगारों का अस्तित्व, उनकी दशा एवं अर्थव्यवस्था में उनका योगदान स्पष्ट रूप से सामने आये। उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाए। उनके लिए कल्याणकारी कोष का निर्माण किया जाये तो समस्त घरेलू कामगारों को क्रोच, चिकित्सा, भविष्य निधि आदि सुविधाएँ उपलब्ध करवाएं। घरेलू श्रमिकों की भूमिका को अधिकृत करना होगा। इसके लिए पहचान पत्र भी जारी किये जा सकते हैं। इस उत्पीड़ित वर्ग का विकास पूर्णतया राजनितिक इच्छा पर निर्भर करता है।

घरेलू कामगारों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रवर समिति नियुक्त की जाये और साथ ही ऐसे अध्ययनों को समर्थन देना चाहिए जो इन कामगारों पर आधारित हों।

घरेलू उत्पादन वाली इकाइयां

इन इकाइयों का अधिकांश दारोमदार बाल श्रमिक पर ही है। इसमें मुख्यतः घर के बच्चों को ही काम पर लगाया जाता है। इनमें बीड़ी, जरी, सिलाई, कढ़ाई, पहनने के कपड़े, हाथ से छपाई, बुनाई आदि आते हैं। देश की आज की आर्थिक परिस्थिति में घरेलू उद्योगों का कितना महत्व हो यह कहने की जरुरत नहीं है। कुटुबों की दो श्रेणियां हैं। एक वह जिनके पास अपनी जमीन, पशु औजार आदि उत्पादन साधन है और दूसरी वह जिनके पास ये साधन नहीं हैं। दोनों प्रकार के कुटुबों में बच्चे एक से काम करते दिखाई देंगे घर की चाकरी जिसकी कोई मजदूरी नहीं दी जाती। परम्परागत शील्पों और देहाती उत्पादनों में बच्चे उन उत्पादन-इकाइयों का एक अविभाज्य अंग है। ठेठ बचपन से ही ऐसे कामों में बच्चों का लग जाना एक आम बात है। अक्सर, ऐसे उद्योगों और परम्परागत शिल्पों को सीखने के लिए, कुछ तयशुदा शर्तों पर, बच्चों को रखा भी जाता है। 1971 की जनगणना के अनुसार कुल बाल श्रमिकों का 3:14 प्रतिशत भाग घरेलू उद्योगों में लगा हुआ था। (आधिकृत आंकड़ों के अनुसार) इस क्षेत्र में बाल श्रमिक कुल मजदूरों के 5.3 प्रतिशत थे जब ये उत्पादन बाजार के शिकंजें में आ जाते हैं जहाँ भाव तय करने का तंत्र बाहर के लोगों के हाथ में होता है, तब उस उत्पादन-व्यवस्था के साथ बच्चों का जुड़े रहना एक समस्या बन जाता है।

जिन कुटुबों के पास अपने उतपादन-साधन नहीं है, या जिन्हें कुछ अतिरिक्त आय के लिए, दूसरे किसी धंधे में लगने की मजबूरी है, उन्हें कच्चा माल और साधन एंजेंसी से लेना पड़ता है, और बना माल भी उसी के हवाले करना होता है। बीड़ी बंधना, कतीदा काटना, कागज के थैले बनाना, सिलाई आदि उद्योग इसके उदाहरण हैं। मतलब यह कि जब भी समाज की अर्थव्यवस्था में कोई फर्क आता है और उसका असर घरेलू उद्योगों की स्थिति और भूमिका पर पड़ता है, तब घरेलू धंधों में बच्चों का लगना समस्या बनता है। पिछले जमाने के बिल्कुल विपरीत, आज काम का संगठन, कार्य पद्धति, मजदूरी की दर और आखिर में उत्पादन को उसकी मंजिल तक पहुँचाना सब बाहरी लोगों के हाथ में चला जाता है। ऐसी पद्धति में, जहाँ कि श्रमिकों के हित की रक्षा के परम्परागत तरीके खत्म हो जाते हैं, बच्चों के श्रम का सार्थक उपयोग करना समस्या बनता है।

आज भारी संख्या में बच्चे घरेलू धंधों में लगे हुए हैं। विकाशील देशों में इसे ‘स्वयं रोजगार’ कहते हैं। इसके कुछ उदाहरण हैं बूट पालिश, कार की सफाई, झाड़ू लगाना या कबाड़ व रद्दी बटोर कर बेचना, खौमचा लगाना आदि। लेकिन यह भी सच है कि ऐसे काम करने वाले अधिकांश बच्चे स्वयं रोजगार नहीं है। वे दूसरों के लिए काम करते हैं। (चाहे वे घर के अपने हों या बराबर के)। ये दूसरे लोग उन्हें उनके काम के लिए या तो कोई निश्चित राशि या उनकी कमाई का अमुक एक प्रतिशत रकम देते हैं।

बच्चों के काम के कारणों की जाँच करने पर, यह तथ्य सामने आता ही कि ‘गृहस्थी’ की आय में हाथ बढ़ाना ही सबसे बड़ा कारण है। हालांकि कई बच्चे अपने खुद के गुजारे के लिए काम करते हैं। (लीला दुबे, 1981:194) काम पर लगाने के बारे में प्रायः ऐसा होता है कि बच्चों को उनके माता-पता के रजामंदी के बिना ही काम पर लगा लेते हैं। भवन-निर्माण के काम में ठेकेदार लोग घर की मुखिया से बात करते हैं, क्योंकि यहाँ पूरे घर को एक इकाई मानते हैं। परम्परागत हस्तशिल्प के उद्योगों में बच्चे अपने माता-पिता या रिश्तेदारों के साथ मिलकर काम करते हैं और कभी-कभी प्रशिक्षार्थी के रुप में काम करते हैं (एस.बेनजी 1969)

बच्चों के श्रमिक बनने की जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कारण गिनाये गए हैं, उनकी सूची काफी लम्बी है विवध है। उनमें कुछ ये हैं- घर के बड़े लोग या तो बेरोजगार हैं यह उनकी आय कम पड़ती है, परिवार बड़ा होता है, कमाई करने वाले सदस्य की मौत हो जाती यह वह गाँव छोड़कर चला जाता है, बड़ों की आय का कोई पक्का भरोसा नहीं होता, पढ़ाई-लिखाई का ठीक प्रबंध नहीं होता. अनिवार्य शिक्षा योजना है नहीं, यदि है भी तो उस पर कड़ाई से अमल नहीं होता, माता-पिताओं की दृष्टि में बच्चों के शिक्षण का कोई महत्व नहीं है, आदि। बच्चों को काम पर लगाने के पीछे जो कारण है उनमें कुछ ये हैं बच्चे सस्ती मजदूरी पर मिल जाते हैं और भरपूर संख्या में मिलते हैं, असंगठित क्षेत्र तक कानून और प्रशासन के लोग आसानी से पहुँच नहीं पाते है, यह क्षेत्र ही ऐसा है कि इसमें श्रमिक ज्यादा लगते हैं आदि।

जो भी, कुला मिलाकर इस असंगठित (अनौपचारिक) क्षेत्र में कई कारणों से बच्चों के शोषण की बड़ी भयंकर स्थिति है और यह सब आम लोगों की आँखों की ओट में चलता है।

भारत में कुछ इस प्रकार की विशिष्ट वस्तुएं हैं जो मुख्यतः इन घरेलू कामगारों द्वारा ही निर्मित की जाती है। जैसी बीड़ी बनाना, वस्त्रोद्योग, जरी का काम तथा डिब्बा बंद आचार-मसाले एवं अन्य खाद्यान आदि। इन कामों में अत्यधिक संख्या महिलाओं की है बल्कि यह कहा जाए कि महिलाओं से अधिक संख्या छोटी लड़कियों (6-14) साल की है, जिनकी गिनती है नहीं की जाती है। तो अतिशयोक्ति न होगी। ऐसा कहा जाता है कि वे तो अपने शौक के कारण यह काम करती है। अधिकांशतः कौशल का कार्य तो महिलाओं द्वारा ही किया जाता है किन्तु यह सच नहीं है। घरेलू उद्योग धंधों में ऐसी कई प्रक्रियाएं शामिल हैं जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक है आईये यहाँ हम सबसे पहले एक नजर बीड़ी उद्योग पर डालेंगें।

स्रोत:- जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची।



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