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झारखण्ड राज्य के वर्तमान परिपेक्ष्य में सहकारिता के उभरते मुददे

झारखण्ड राज्य के वर्तमान परिपेक्ष्य में सहकारिता के उभरते मुददे

परिचय

झारखण्ड राज्य के निर्माण के पीछे संघर्ष का एक लम्बा इतिहास रहा है।  यह संघर्ष की बुनियाद सिर्फ अधिकारों के लिए – अधिकार सिर्फ अपने ही स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों की और मूलवासी आदिवासियों एवं दलित समुदायों की पारम्परिक एवं सांस्कृतिक पहचान एवं अस्मिता की रक्षा करना। इस नये झारखण्ड के अर्तमान परिदृष्य को देखकर कुछ सवाल सामने खड़े हो जाते हैं- क्या झारखण्ड के मुख्य निर्माता, यहाँ के ग्रामीण समुदाय के किसान वर्ग, मजदूरों एवं महिलाओं की विपन्नता का दृश्य ही नव-निर्माण राज्य की परिकल्पना थी?  यहाँ के ग्रामीण जो मुख्यत: कृषि उत्पादन के उपभोग एवं वाणिज्य पर जीवन स्तर निर्भर करते हैं उन्हें भी अपने उत्पादन के मूल्य एवं विपणन पर कोई नियंत्रण नहीं हैं।  परन्तु यदि हम इस नव-निर्माण राज्य के दूसरे पहलू को देखेंगे तो इसमे विकास की काफी संभावनाएँ हैं।  राज्य में विकास की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमे हमारा समाज अपनी बुनयादी जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर न हो बल्कि स्थानीय संसाधनों एवं परस्पर सहयोग पर आधरित हो।  झारखण्ड की वन संपदा, उर्वरक जमीन एवं परिश्रमी कृषकों के होते हुए भी किसान तर्कसंगत जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

सहकारिता के वर्तमान परिपेक्ष्य

झारखण्ड में सब्जी उत्पादन की अपार संभावनाएँ हैं जहाँ उन्नत किस्म की सब्जियों का उत्पादन होता है।  राज्य के कृषक वर्ग नकदी फसल, फलों एवं मौसमी सब्जियों की ओर भी अग्रसर हुए हैं।  यदि राज्य के कृषि उत्पादकों को संगठित किया जाए एवं उचित तकनीकी हस्तक्षेप से उपलब्ध संसाधन मुहैया कराया जाए तो उद्यान क्षेत्र में काफी परिवर्ण लाया जा सकता है।

वर्तमान परिपेक्ष्य में उभरते सामाजिक, आर्थिक विकास में किसका योगदान रहा है इसका सटीक आंकलन कर पाना असंभव है।  राज्य में अपनाए गए विकास प्रयासों में न ही वांछित परिणाम हासिल हो सके हैं और न ही सामाजिक, आर्थिक सफलता तथा सततता जैसे मुद्दों को सुलझाए जा सके हैं।  गत वर्षों में नवनिर्मित झारखण्ड की ज्यों की त्यों  स्थिति को देखते हुए यहाँ के सामाजिक एवं आर्थिक हित के लिए बड़े पैमाने पर सामूहिक संघर्ष की आवश्यकता और संभावना पैदा हो सकती है।

आज सब्जी उत्पादक कई समस्याओं से उलझे हुए हैं।  एक किसान जो अधिकतर समय खेतों में जी तोड़ मेहनत करता है उसे क्या अपनी मेहनत की पूरी कीमत मिल पाती है?  ऐसी संदर्भ में सहकारिता के महत्त्व को समझा जा सकता है, जिसके माध्यम से नई क्रांति लाई जा सकती है और जहाँ सब्जी उत्पादकों द्वारा ही फसलों की देखभाल, द्ब्जियो की खरीद-बिक्री, बीज एवं कीटनाशकों का वितरण, मूल्य निर्धारण एवं बाजार पर नियंत्रण हो पाएगा।

एक ओर जहाँ लोगो की केन्द्रीयता का सवाल महत्त्वपूर्ण बना है वहीं दूसरी ओर लोगों को विकास प्रक्रियाओं से जोड़ने की दिशा में कई महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहें हैं।

हमारे देश ने भूमंडलीकरण भूमंडलीकरण एवं वैश्वीकरण द्वारा स्वैच्छिक संगठनों, महिला वर्ग एवं जन साधारण के लिए नए द्वार खोल दिए हैं। समाज के आर्थिक, सामाजिक विकास जनता की तमाम विकास कार्यों को अकेले राज्य ही अंजाम नहीं दे सकती। ऐसी मान्यता के आधार पर गत दशकों में विकास के नमूनों में महत्त्वपूर्ण बदलाव आया है।  अंतत: विकास की प्रक्रिया में महिलओं द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह की भूमिका को महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।  वर्तमान में राज्य में १३,००० स्वयं सहायता समूह है जो निष्क्रिय हैं।  सहकारी प्रयास द्वारा वे अपने बचत रकम को गतिशील कर अपने समाज की भलाई के लिए योगदान कर सकती है।  गरीब लोगों को गरीबी की दलदल से बाहर निकालने एवं विकास प्रक्रिया की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए स्वयं सहायता समूह को विकल्प के रूप में अपनाया जा रहा है।  महिलाओं द्वारा अपने क्षेत्र में कृषि संबंधी सहकारी हस्तक्षेप द्वारा कृषकों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।  इन संगठनों का सहकारिता के माध्यम से ग्रामीण भारत के आर्थिक रूपान्तरण में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

झारखण्ड में सब्जी निर्यात की अपार संभावनाएँ हैं परन्तु असंगठित बाजार नीति के कारण कृषकों को उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है जिसके कारण बिचौलियों द्वार शोषित हैं।  इन्हीं संभावनाओं को ध्यान रखकर सरकार ने केन्द्रीय बजट २००४ में घोषणा की थी कि ऐसे राज्यों को उद्यान क्षेत्र के विकास के लिए विशेष प्रावधान दिए जाने चाहिए।  इनमें मुख्यत: हैं :-

- नेशनल होर्टिकल्चर टेक्नोलाजी मिशन

- कृषि एक्सपोर्ट जोन

यह एक सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा नई तकनीकियों, अवधारणाओं एवं सोच कस्मयोजं किया जा सकेगा जिससे कृषि क्षेत्र में आवश्यक विकास प्रयास किया जाएगा।

नेशनल होर्टिकल्चर मिशन के लिए छ: राज्यों में से झारखण्ड का भी चयन हुआ है।  नेशनल होर्टिकल्चर मिशन के प्रारंभ करने से कृधि उत्पादकों को वाणिज्य हेतु कृषि उत्पादनों में प्रोत्साहन मिल पाएगा।  झारखण्ड राज्य का नेशनल होर्टिकल्चर टेक्नोलाजी मिशन के लिए चयन होने पर इस क्षेत्र में विकास के नए आयाम खुलने लगेंगे जिसके फलस्वरूप राज्य स्तर पर लाभान्वित हो सकेंगे:

- आधारभूत संरचना निर्माण

- संगठित क्रिची उत्पादक

- कुशल एवं क्षमता विकास प्रशिक्षण

राज्य के कई क्षेत्र ऐसे हैंजो विशेष रूप से सब्जी उत्पादन में अग्रणी हैं।  ऐसे क्षेत्रों को कृषि एक्सपोर्ट जोन के लिए चिन्हित किया जाएगा जिनमें मुख्य रूप से हजारीबाग, लोहरदगा एवं रांची क्षेत्र है।  देशभर में ४८ कृषि एक्सपोर्ट जोन है जबकि राज्य में अबतक एक भी एक्सपोर्ट जोन नहीं है।

वर्तमान संदर्भ में विकास के बदलते स्वरूप के साथ ही महिलाओं कि क्षमता वृद्धि को एक महत्त्वपूर्ण मुद्दे एवं आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है ।  कृषि सहकारी क्षेत्र में भी सतत विकास कि प्रक्रिया में स्वयं सहायता समूह कि महिलाओं कि भूमिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।  ये संगठन गाँव स्तर पर स्वयं सहायता समूह द्वारा, प्रखण्ड स्तर क्लस्टर द्वारा एवं जिला स्तर पर फेडरेशन कि माध्यम से सब्जियों का उत्पादन, ग्रेडिंग, संग्रहण, पैकेजिंग एवं वजर प्रबंधन कि देखरेख कर सकती है।  मार्केटिंग के तहत आवश्यक वस्तु कि मांग, खरीद-बिक्री कि प्रकिया एवं लाभांश वितरण में पारदर्शिता सुनिश्चित करने से इस दिशा में एक अच्छी पहल होगी।

यद्यपि वचनबद्धता समानान्तर रूप से सरकारी संस्थाएँ एवं स्वयं सेवी संस्थाओं दोनों कि ओर से होना चाहिए परन्तु स्वैच्छिक संगठनों का जुडाव, संवेदनशीलता, परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं कि समझ स्थानीय लोगों से ज्यादा है।  ऐसे में जरूरत है कि स्वैच्छिक संस्थाएँ स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से को-ओपरेटिव चलाएँ एवं किसानों को उनके उत्पादन का उचित मूल्य दिलाने का सतत प्रयास करें।

सहकारिता के असफलता के कारण

१. सहकारिता को चलाने के लिए योग्य नेताओं कि कमी।

२. सदस्य लोग सहकारी समितियों को सरकारी समितियाँ समझते हैं।

३. एक सहकारी समिति में विभिन्न जातियों कि सदस्यता जिससे आपसी तालमेल को न होना।

४. स्वयं सेवी संस्था जो आदिवासियों के बीच काम करते हैं पर वे सहकारिता कानून के तहत निबंधन नहीं है।  अत: इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते हैं जिससे लोगों को सहकारिता के बारे में समझाने में कठिनाइयाँ होती हैं।अत: लोग सहकारी समितियों में नहीं जुड़ पाते हैं।

५. बहुत सरकारी समितियाँ बहुमुखी सेवाएँ देने में असमर्थ हैं।  अत: सदस्यों के जरूरतों को पूरा नहीं कर पाने के चलते समितियाँ विघटित हो जाति हैं।

६. ग्रामीणों को सहकारिता के नियम कानून कि जानकारी न होना।  साथ ही साथ नया सहकारिता कानून के बारे में सरकारी विभाग जैसे सहकारिता विभाग, आदिवासी कल्याण विभाग, वन विभाग, विपणन विभाग आदि को पूर्ण जानकारी का अभाव।

७. महिलाओं कि भागीदारी में कमी – यह देखा गया है कि महिला सहकारिता केवल २ प्रतिशत है जब कि जनसंख्या की दृष्टि से ५० प्रतिशत महिलाएँ हैं।

८. अत्यधिक सूद दर – यह देखा गया है कि सहकारिता ऋण पर सदस्यों से १६ प्रतिशत सूद लेता है।  यह सदस्यों के बचत पर केवल ५ प्रतिशत सूद देता है।

९. सहकारिता में कृषक को समय पर खाद, बीज आदि कि अनुपलब्धता।

१०. सदस्यों द्वारा ऋण समय पर वापसी न कर पाना/न करना।

११. अधिकतर सहकारिता सरकारी दबाव से बनाये जाते हैं ने कि स्वेच्छा से।

१२. सहकारिता को आन्दोलन का रूप न दिया जाना।

१३. सहकारी समितियों में अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप का होना।

१४. सरकारी घोषणाओं से सहकारी विभाग के पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों में असन्तुष्टि।

 

स्त्रोत: हलचल, ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान



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