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संथाल जनजाति

परिचय

संथाल झारखंड राज्य की एक प्रमुख अनूसूचित जनजाति है, जो मुख्य रूप से संथाल परगना प्रमंडल एवं पश्चिमी व पूर्वी सिंहभूम, हजारीबाग, रामगढ़, धनबाद तथा गिरीडीह जिलों में निवास करती है। इसकी कुछ आबादी बिहार राज्य के भागलपुर पूर्णिया, सहरसा तथा मुंगेर प्रमंडल में भी पायी जाती थी। संथाल जनजाति पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, मध्यप्रदेश तथा असम राज्यों में भी वास करती है। इस जनजाति को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के साओत क्षेत्र में लंबे अर्से तक रहने के कारण साओंतर कहा जाता था, जिसे कालान्तर में चल कर संथाल कहा जाने लगा। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक के दौरान संथाल जनजाति बेलपट्टा में यथेष्ट संख्या में आकर बस गयी।

संथाल परगना में संथालों के बसने के पहले सौरिया तथा माल पहाड़िया जनजाति राजमहल के पहाड़ी क्षेत्र में रहा करती थी। संथालों के इस क्षेत्र में आगमन के पश्चात् वर्षों तक संथाल तथा पहाड़िया जनजाति के बीच पुश्तैनी दुश्मनी बनी रही। इनकी आपसी संघर्ष की समस्या के निदान के लिए भागलपुर के तत्कालीन संयुक्त दंडाधिकारी सदरलैंड ने 1819 ई. में सरकार से इनके लिए एक पृथक प्रदेश बनाने की सिफारिश की, जिसके आधार पर 1932-33 में सरकार द्वारा दामिन – ई. कोह प्रदेश की स्थापना की गयी, जो संथाल परगना जिले के राजमहल, पाकुड़, गोड्डा तथा दुमका अनुमंडल के लगभग 1, 338  वर्ग मील में फैला हुआ था। दामिन – ई. कोह का पर्वतीय भू – भाग पहाड़िया जनजाति के लिए आवंटित किया गया, जबकि पर्वतीय भू – भाग के आगोश में फैला लगभग पांच सौ वर्ग मील का क्षेत्र संथाल जनजाति के बसाव के लिए निर्धारित किया गया, जो पश्चिम बंगाल के बीरभूम तथा अन्य जगहों से आकर यहाँ बसी थी। संथालों का यह प्रदेश जंगलों से भरा पड़ा था, जिसे संथालों ने शीघ्र ही साफ कर कृषि योग्य बना डाला। 1851 ई. तक दामिन – ई – कोह प्रदेश के 1, 473 गाँवों में लगभग 82, 795 संथाल रहने लगे थे।

जनसंख्या

संथाल झारखंड की सबसे अधिक आबादी वाली अनुसूचित जनजाति है, जिसकी जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 27,54,723 (पुरूष – 13,71,168 तथा महिला – 13,83,555) है, जो झारखण्ड की कुल जनजाति आबादी का 31, 86 प्रतिशत है। तालिका – 1 में झारखंड की संथाल जनजाति की जनसंख्या कुछ प्रमुख जिलों में (1901 से 2011 तक) दर्शायी गयी है।

तालिका – 1

संथाल जनजाति की जनसंख्या

(1901 से 2011 तक)

जनगणना वर्ष

कुल जनसंख्या

संथाल परगना

हजारीबाग प्रमंडल

रांची जिला

धनबाद जिला

सिंहभूम जिला

1901

9,51,801

6,70,535

69,245

544

90,306

56,768

1911

9,17,261

6,68,149

78,379

706

88,241

-

1921

10,58,777

6,76,459

98,736

802

10,9,585

81,458

1931

12,43,910

7,54,804

1,29,103

601

15,95,589

94,805

1941

13,92,744

7,97,829

1,45,752

1,293

1,93,317

90,976

1951*

 

 

 

 

 

 

1961

15,41,345

8,27,485

1,73,780

614

1,02,343

2,14,918

1971

18,01,304

10,03,819

2,03,165

1,407

1,26,163

2,65,536

1981

20,60,730

11,03,511

54,255

3,388

1,53,848

3,06,809

1991

20,67,039

-

-

-

-

-

2001

24,10,509

-

-

-

-

-

2011

27,54,723

-

-

-

-

-

 

संथाल जनजाति संथाली बोली बोलती है, जिसका संबंध आस्ट्रो – एशियाई भाषा परिवार से है। संथाली बोली की लिपि ओलचिकी है।

प्रजातीय तत्व की दृष्टि से संथाल जनजाति का कद मध्यम, रंग काला या गहरा भूरा, कपाल दीर्घ, बाल काले व सीधे, परंतु कभी – कभी घुंघराले, नाक मध्यमाकर तथा जड़ से दबी सी, आंखे मध्यम आकार की तथा काली मुंह बड़ा एवं होठ मोटे व लटके हूए, शारीर पर बालों की संख्या नगण्य तथा दाढ़ी विरल होती है। हट्टन संथाल जनजाति को प्रजातीय वर्गीकरण को दृष्टिकोण से पूर्व – द्रविड़ियन, गुहा प्रोटोओस्ट्रोलॉयड, शिमट आस्ट्रो –एशियाटिक तथा रगेरी ओस्ट्रोलॉयड – वैदिक मानते हैं।

वास स्थान

संथाल जनजाति गॉवों में प्राय: दूसरी जनजातियों तथा जातियों के साथ निवास करती है। इनके गाँव का आकार छोटा होता है, जिसमें प्राय: 10 से 50 विभिन्न गोत्र के संथाल परिवार निवास करते हैं। इनके मकान लंबी कतारों में बने होते हैं। मकान प्राय: मिट्टी से निर्मित होते हैं, जिन पर फूस या खपरैल की छावनी की गयी होती है। इनके मकान के चारों तरफ प्राय: एक चौड़ा चबुतरा होता है। कमरे बांस तथा लकड़ियों से बने मचाननुमा छत होते हैं। जिनपर अनाज तथा अन्य सामग्रियां रखे जाते हैं। ओसारे इन मकान के अनिवार्य हिस्से होते हैं। इनके मकान की दीवारें प्राय: चारकोल के काले रंग से होने के कारण आकर्षक दिखती हैं। संथाल महिलाऐं अपने घर को साफ सुथरा रखने में गर्वान्वित महसूस करती हैं। वे अपने घरों की अभिव्यक्ति है। इन दिनों संथाल जनजाति के कुछ लोग अपना मकान ईंट तथा सीमेंट की सहायता से भी बनाने लगे हैं।

पोशाक तथा आभूषण

संथाल जनजाति के परंपरागत पोशाक कुपनी, कांचा. पंची, पारहांड, दह्ड़ी, पाटका इत्यादि आधुनिक पोशाकों से विस्थापित हो चले हैं। इन दिनों संथाल पुरूष धोती – कुर्ता के साथ – साथ पेंट – शर्ट भी पहनते हैं। संथाल महिलायें साड़ी, पेटीकोट, तथा ब्लाउज के साथ  - साथ ब्रेसियर भी पहनने लगी है संथाल महिलाऐं अपने जुड़े को गोलाकार रूप में एक विशेष ढंग से बांधती हैं। इनके हाथ – पैर तथा गले में गोदना चिन्ह भी देखने को मिलते हैं, किन्तु गोदना का रिवाज अब धीरे – धीरे विलुप्त होता जा रहा है। संथाल युवतियों तथा महिलाएं प्राय: शंख, कांसे, पीतल, तांबे तथा चांदी से निर्मित आभूषण पहनती हैं। हाथों में शंख निर्मित सांखा, कांसे पीतल या चांदी के बने सकोम, बांह में खागा, गले में हंसली तथा सकड़ी तथा कानों में सोने व चांदी से निर्मित पानरा, नाक में मकड़ी, पांवों में कांसे की बांक – बंकी तथा पांव की अंगुलियों में बटरिया इनके सामान्य आभूषण हैं। युवकों के आभूषण – हाथों में चांदी के टोडोर, बांहों में खांगा तथा कानों में कूंडल हैं। इनके अलावे फूल तथा पत्तियों से भी वे अपने शरीर को सजाया करते हैं।

वाद्य – यंत्र

संथाल संगीत व नृत्य के बड़े ही प्रेमी होते हैं। बंसी, ढोल, नगाड़े, केन्दरा (वॉयलिन) इत्यादि इनके प्रमुख वाद्य यंत्र है। विवाह तथा अन्य उत्सवों पर वे संगीत तथा नृत्य में विभोर हो जाते हैं। इसके लोक संगीत कर्णप्रिय तथा लोक गीत जीवन के अनुभवों में पगे होते हैं। नगाड़े के थाप पर इनके लोक नृत्य जीवन की मधुरिमा बिखेरते हैं।

सामाजिक जीवन

संथाल जनजाति की लगभग 97 प्रतिशत आबादी गाँवों में निवास करती है। इस जनजाति के परिवार का स्वरुप पितृसतात्मक, पितृवंशीय तथा पितृस्थानीय है। पैतृक संपति पर पहला अधिकार पुत्रों का, फिर अविवाहित पुत्रियों का तब पट्टीदारों का होता है। इनके बीच एकाकी तथा संयुक्त दोनों प्रकार के परिवार देखने को मिलते हैं। पिता ही परिवार का मुख्य होता है। संथाल महिलाओं की दैनिक चर्याओं में नारी स्वंत्रता की झलक दृष्टिगोचर होती है। संथाल महिलाऐं सरल तथा काफी परिश्रमी होती है। बच्चों का लालन – पालन, खाना बनाने, पानी लाने तथा कृषि तथा अन्य व्यवसायी कार्यों के संपादन में संथाल महिलाओं की प्रमुख भूमिका होती है। हाटों में वस्तुयें बेचने तथा आवश्यक चीजों की खरीददारी करने में संथाल महिलाऐं काफी प्रवीण होती हैं। किन्तु संथाल महिलाऐं शिकार, पूजा – अर्चना तथा पंचायत की बैठक में हिस्सा नहीं ले सकती हैं। इसी तरह संथाल महिलाओं द्वारा हल जोतने, छप्पर छाने  इत्यादि जैसे कार्यों पर पाबंदी होती है।

कन्या जब तक अविवाहित होती है, अपने पिता की संपति मानी जाती है तथा विवाह के समय उसे प्राप्त करने के लिए पोन (वधू मूल्य) चुकाना पड़ता है। विवाह के बाद वह अपने पति की संपति मानी जाती है। संथाल महिलाऐं अपने परिवार में सलाहकार के रूप में प्राय: स्वीकार की जाती हैं। परित्यक्ता तथा विधवा महिलाओं का स्थान समाज में अपेक्षाकृत निम्न माना जाता है। बूजूर्ग महिलाओं तथा पुरूषों को समाज में आदर प्रदान किया जाता है।

जन्म संस्कार

संथाल जनजाति में प्रसव के समय घर या पड़ोस की बुजूर्ग महिलाऐं प्राय: दाई के रूप में कार्य करती है। नवजात शिशु का नाल तीर के नुकीले हिस्से से काटे जाने का प्रचलन है।

संथाल जनजाति में शिशु के जन्म के अवसर पर छठ्ठी मनाये जाने की परंपरा है। बेटा के जन्म पर जन्म के पांचवे दिन तथा बेटी के जन्म पर जन्म के तीसरे दिन जानम छठियार मनाया जाता है। इस अवसर पर गाँव के मांझी तथा कुदम नायके सहित अन्य लोग नाई द्वारा अपने बाल मुड़ाते हैं। फिर बच्चे का मुंडन किया जाता है तथा उसके काटे गये बालों को एक दोने में रखा जाता है। फिर हल्दी तथा तेल लगाकर सभी स्त्री पुरूष स्नान करते हैं। बच्चे के कटे बाल को घाट पर नहाते समय बहा दिया जाता है। घर पर जच्चे – बच्चे को भी नहलाया जाता है। स्नान करके लौटने के बाद दाई चावल के चूर्ण को पानी में घोल कर सबों पर बारी – बारी से छिड़काव करती है जिससे छूतक का दूर होना समझा जाता है। इसके बाद दाई हास्य व विनोद के वातावरण में बारी – बारी से सभी को प्रणाम करते हुए बच्चे के नाम की घोषणा करती है। प्राय: पहली संतान को दादा या दादी तथा दूसरी को नाना या नानी के नाम पर नामकरण किया जाता है। इस अवसर पर नीम की पत्तियों के साथ पकाई गई खिचड़ी या मांडी लोगों के समक्ष खाने के लिए परोसी जाती है, जिसे नवजात शिशु की ओर से उपहार माना जाता है। लोग इसे ग्रहण कर अपने – अपने घर लौट जाते हैं। इस अवसर पर लड़का होने पर दाई को एक साड़ी, एक मन धान तथा कंगन और लड़की होने पर एक साड़ी, आधा मन धान तथा कंगन देने की प्रथा रही है।

विवाह के पूर्व बच्चों का चाचो छठियार मनाया जाता है। इसके लिए कोई उम्र या दिन सुनिश्चित नहीं होते।  इस संस्कार के द्वारा ही संथाल जनजाति में उत्पन हुए शिशु जनजाति प्राप्त होती है। इसलिए जिस शिशु की मृत्यु उसके चाचो छठियार के पूर्व हो जाती है, उसका न तो शव दाह किया जाता है और न श्राद्ध ही। इस अवसर पर गांव के बड़े बूढ़े इकट्ठे होते हैं, जिन्हें तेल हल्दी लगाई जाती है। फिर हड़िया की छाक ढाली जाती है। इस अवसर पर वृद्ध लोग सृष्टि से लेकर आज तक के भ्रमण का वर्णन अपनी जानकारी के आधार पर किया करते हैं।

विवाह

विवाह परिवार की आधारशिला होती है। जिसके आधार पर समाज की निरंतरता कायम रहती है। विवाह के अंतर्गत धार्मिक, कानूनी तथा सामाजिक स्वीकृति सन्निहित होती है, जो यौन एवं आर्थिक उत्तरदायित्व के निर्वाहन का अधिकार प्रदान करता है। झारखंड की संथाल जनजाति एक अन्तर्विवाही जनजाति है, जिसके बीच समगोत्रीय विवाह निषिद्ध है। संथाल जनजाति में एक विवाह की प्रथा प्रचलित है

ईसाई धर्म के प्रचार, औद्योगिकरण तथा शहरीकरण के परिणामस्वरूप  इनके बीच इन दिनों अंतर्जनजातीय तथा गैर – जनजातीय विवाह का भी छिट – पूट उदाहरण देखने को मिलता है। इनके बीच बाल विवाह का प्रचलन नहीं हैं। साली तथा देवर विवाह सामाजिक रूप से मान्य है। विधवा विवाह का भी इनके बीच प्रचलन है। बाँझपन, चरित्रहीनता, एक साथ रहने की अनिच्छा, डायन होने की आशंका इत्यादि के आधार पर तालक भी लिया जाता है। तालाक होने पर वधू मूल्य लौटा दिया जाता है।

झारखण्ड की संथाल जनजाति में जीवन साथी प्राप्त करने के तरीकों के आधार पर निम्नलिखित प्रकार के बापला (विवाह) देखने को मिलते हैं

सादाई बापला

इस प्रकार के विवाह प्राय: वर वधू के पंसद के आधार पर ही सुनिश्चित होते हैं। इसके पहले घर देखी, तिलक चढ़ी तथा टाका चाल की रस्में पूरी की जाती है। टाका चाल में वधू के लिए वर के परिवार की ओर से उसके पिता को पोन (वधू मूल्य) दिया जाता है। जो प्राय: 12 रूपये का होता है। विवाह के एक, तीन या पांच दिन पूर्व वर तथा वधू पक्ष के यहाँ बारात जाती है। बारात के भोजन के खर्च वर पक्ष वहन करता है। सिंदूर दान विवाह का प्रमुख संस्कार होता है। बारात के लोग नाचते गाते वधू के परिवार के दरवाजे पर जाते हैं। वधू को हल्दी से रंगे नए कपड़े में एक टोकरी में बैठा कर दरवाजे पर कंधे पर उठा कर लाया जाता है। वधू घूँघट में होती है। वर को भी अपने कंधे पर उठाया जाता है। इसी अवस्था में वर वधू का घूँघट हटा कर उसके मांग में पांच टीका (सिन्दूरदान) करता है। हरि बोल शब्द एक उच्चारण के साथ विवाह संपन्न हो जाता है। सिंदूरदान के दूसरे दिन वधू की विदाई होती है, जिसके साथ उसका भाई  तथा उसकी सहेलियां भी जाती हैं।

विवाह के छट्ठे दिन वधू अपने भाई तथा पति के साथ नैहर आती है तथा साथ में हड़िया तथा चिवड़ा का संदेश भी लाती है। दो दिन के बाद नवदंपति अपना घर लौट आते हैं। तथा दांपत्य जीवन का प्रारंभ किया जाता है।

गोलाइटी बापला

इस प्रकार के विवाह में जिस परिवार में बेटी ब्याही जाती है उसी परिवार से पतोहू लायी जाती है। इस प्रकार के विवाह में भी पोन नहीं लिया जाता है। वधू मूल्य से बचने के लिए दो परिवार के लड़के लड़कियों का बिना पोन दिए विवाह कर दिया जाता है।

टूनकी दिपिल बापला

इस प्रकार के विवाह प्राय: गरीब लोगों के बीच संपन्न किये जाते हैं। कन्या को वर के घर लाकर सिंदूर देकर शादी रचा दी जाती है।

घरदी जावायं बापला

इस प्रकार में विवाह में पूत्रहीन व्यक्ति वर के गाँव जाकर उसे ले आता है। वधू के लिए पोन देना पड़ता है तथा शादी के बाद उसे ससुराल में ही रहना पड़ता है।

अपगिर बापला

लड़के लड़की में जब प्रेम हो जाता है तो पंचायत उनके माता – पिता को विवाह संपन्न कराने के लिए कहती है। यदि शादी के लिए तैयार हो जाते हैं, तो दोनों की गाँव के मांझी एवं पंचायत के सदस्यों के सामने सिंदूर लगाकर शादी संपन्न हो जाती है। इस अवसर पर लड़के के पिता को गाँव वालों को भोज देना पड़ता है।

इतुत बापला

जब लड़की माता – पिता उसके पसंद के लड़के के साथ विवाह के स्वीकृति प्रदान नहीं करते तो लड़का मेले या अन्य अवसर पर लड़की के माथे पर सिंदूर लगा देता है। लड़की के माता पिता को जब इस बात की सूचना मिलती है, तो वे लड़के के गाँव जाते हैं तथा कन्या मूल्य प्राप्त कर लेने पर विवाह संपन्न करा दिया जाता है।

निर्बोलक बापला

इस प्रकार के विवाह में लड़की हठकर अपने पसंद के लड़के के साथ रहने लगती है। लड़का या उसके परिवार के सदस्य बल का प्रयोग कर लड़की को अपने घर से बाहर निकलने की चेष्टा करते है, फिर भी यदि लड़की घर में ही बैठी रहती है तो सूचना जोगमांझी को दी जाती है, जो इनका विवाह संपन्न करा देता है।

बहादूर बापला

इस प्रकार के विवाह में लड़का लड़की जंगल में भाग जाते हैं तथा एक दुसरे को माला पहनाते हैं और पुन: घर लौट कर अपने को एक कमरे में बंद कर लेते हैं। इसके बाद उनका विवाह संपन्न माना जाता है।

राजा – राजी बापला

इस प्रकार के विवाह में लड़का लड़की गाँव के मांझी के पास जाते हैं। मांझी उन्हें लड़की के घर ले जाता है तथा गांव के वयोवृद्ध लोगों के समक्ष वह औपचारिक रूप से दुल्हन की सहमती प्राप्त कर लेते है। लड़का लड़की माथे पर सिंदूर लगा देता है। इस प्रकार उनका विवाह संपन्न हो जाता है।

सांगा बापला

इस प्रकार के विवाह में विधवा या तलाकशुदा स्त्री का विवाह विधुर या तलाक दिए गए व्यक्ति के साथ संपन्न होता है। वर वधू स्वयं ही अपना विवाह निश्चित करते हैं। कुछ कन्या मूल्य भी दिए जाते है। किसी निश्चित तिथि को वधू को वर के घर लाकर शादी संपन्न करा दी जाती है।

कीरिंग जावायं बापला

जब लड़की दुसरे पुरूष से गुप्त से गर्भवती हो जाती है तो इस लड़की से शादी के लिए इच्छुक व्यक्ति को कुछ धनराशि देकर शादी करा दी जाती है। वधू के माता पिता द्वारा उसे वैवाहिक जीवन प्रारंभ करने के लिए गाय, बैल तथा धन भी प्रदान किये जाते हैं।

मृत्यु संस्कार

संथाल जनजाति में मरणोपरांत शव संस्कार, अस्थि प्रवाह तथा श्राद्ध की रस्में पूरी की जाती हैं। शव संस्कार प्राय: शव को जला कर या दफना कर करने की प्रथा है। मृतक की निजी उपयोग में लायी जाने वाली वस्तुयें, जैसे – बर्तन, धनुष, वाण, लाठी, वाद्य यंत्र, कपड़े इत्यादि शव को सौंप दी जाती हैं। संथालों में यह विश्वास है कि मृत व्यक्ति की आत्मा मायामयी दुनिया में चली जाती है, जहाँ उसे इस दुनिया की वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है। एक मुर्गी का बच्चा, हल्दी, छप्पर का थोडा पुवाल तथा बिनौले के लावा के साथ मुर्दे को नए कफन में ढक कर अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जाता है। जलाते समय चिता उत्तर दक्षिण की ओर बनाई जाती है। मृतक का सिर दक्षिण की ओर रखा जाता है। शव को चिता में रखने के बाद चिता की खूंटी पर मुर्गी का बच्चा की बलि चढ़ाई जाती है। मृतक का प्रथम उत्तराधिकारी उसके मूंह में अग्नि देता है। मुखाग्नि देने का अधिकार मृतक के क्रमश: पुत्र, पौत्र, पिता, भ्राता, भतीजा और चाचा को है। महिलाएं मुखाग्नि नहीं दे सकती। मुखाग्नि देने बाद मृतक के उपस्थित पट्टीदारों में सभी एक - एक लकड़ी या एक – एक मुठ्ठी मिट्टी चिता या कब्र में डालते हैं फिर चिता प्रज्वलित कर दिया जाता है या कब्र को भर दिया जाता है। इसके बाद घाट पर सभी लोग बाल मुड़वाते हैं तथा स्नान करते हैं। शव दाह के बाद राख को जल में बहा दिया जाता है। मृत्यु के पांचवें दिन तेल नहान किया जाता है। इस अवसर पर गाँव के सभी बूजूर्ग व्यक्ति पुन: मृतक के घर पर बाल मुड़वाकर स्नान करने जाते हैं। फिर आत्मा, पितर तथा मरांग बूरू के नाम से तीन व्यक्ति के मृतक घर पर झूमते हैं। लोग उनसे उनके मौत का कारण पूछते हैं तथा भविष्य की बिघ्न बाधाओं से मुक्ति पाने की आग्रह करते हैं। शाम को एक छोटे स्तर पर भोज का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर एक मुर्गा की बलि दी जाती है तथा बिना नमक की खिचड़ी पकाई जाती है। मृतात्मा को भी खिचड़ी का भोग चढ़ाया जाता है।

भाण्डान (श्राद्ध) मृतात्मा का अंतिम संस्कार माना जाता है। जब तक भाण्डान नहीं होता, तब तक परिवार और गाँव में अशुद्धता माना जाता है। इस बीच परिवार के सदस्य किसी सामाजिक या धार्मिक समारोह में हिस्सा नहीं लेते हैं। वे न तो सिन्दूर का प्रयोग करते है और न किसी देवता को हड़ियार्पण करते हैं। भाण्डान के लिए कोई निश्चित तिथि नहीं होती। भाण्डान के अवसर पर मृतात्मा का श्राद्ध तथा कुटूम्ब लोगों को भोज दिया जाता है। इस अवसर पर बकरे की बलि दी जाती है। भाण्डान का भोज रात्रि को दिया जाता है। इस अवसर पर हड़िया पी जाती है तथा लोग नाचते गाते भी हैं। भाण्डान का भोज संथाल समाज द्वारा अशुद्धता से मृतक के परिवार वालों की मुक्ति की स्वीकृति मानी जाती है।

गोत्र

संथाल जनजाति वहिर्विवाही गोत्रों में विभक्त है। इनके गोत्र गोत्रार्ध या सिव में बंटे होते हैं। संथाल अपने गोत्र तथा सिव में विवाह नहीं करते। वे अपने माता के सिव में विवाह कर सकते हैं। संतान पिता का गोत्र पाती है, माता का नहीं। लड़की शादी के बाद अपने पति का गोत्र धारण कर लेती है। प्रत्येक गोत्र का अपना गोत्र का अपना गोत्र चिन्ह होता है। यह गोत्र चिन्ह किसी पशु – पक्षी या पौधे के नाम पर होता है। गोत्र चिन्ह को मारना, कष्ट पहुँचाना या खाना निषेधित माना जाता है। गोत्र चिन्ह के प्रति भय सामूहिक जीवन को नियंत्रित करने में सहायता प्रदान करता है। गोत्र चिन्ह के नाम पर ही गोत्र का नामकरण होता है। विवाह इत्यादि जैसे विशेष अवसरों पर गोत्र चिन्ह की पूजा – अर्चना भी की जाती है। गोत्र वंश का ही एक विस्तृत रूप होता है। गोत्र का संगठन एक सामान्य पूर्वज की कल्पना पर आधारित होता है, जो वास्तविक भी होता है और काल्पनिक तथा पौराणिक भी। एक गोत्र के सभी सदस्य अपने को एक सामान्य पूर्वज की संतान मानते हैं। इसलिए वे आपस में एक दूसरे के भाई बहन होते हैं। संथाल जनजाति के बीच पितृवंशीय गोत्र पाए जाते हैं। संथाल जनजाति विभिन्न गोत्रों में विभाजित है, जैसे – हंसदाक, मूर्मू, किस्कू, हैम्ब्रम, मरांडी, सोरेन, टूडू, बेसरा, पौड़िया, बसके, चोड़े इत्यादि। संथालों में इन गोत्रों के अतिरिक्त डेढ़ – दो सौ खूंट (उप – गोत्र) भी पाए जाते हैं, जो मुख्य रूप से देवी – देवताओं की पूजा – अर्चना से संबंधित हैं।

नातेदारी

समाज द्वारा स्वीकृत जिन विशिष्ट सामाजिक संबंधों द्वारा मानव बंधा होता है, नातेदारी कहलाता है। संथाल जनजाति के बीच रक्त तथा विवाह संबंधों पर आधारित नातेदारी व्यवस्था पायी जाती है। संथाल जनजाति के बीच समरक्त तथा वैवाहिक दोनों प्रकार के संबंध देखने को मिलते हैं। समरक्त संबंध माता – पिता, भाई – बहन, दादा – दादी, मामा, नाना – नानी, चाचा, बुआ इत्यादि के रूप में देखने को मिलते हैं। संथाल जनजाति में निसंतान दंपति द्वारा गोद ली गयी संतानों को भी अपनी संतान जैसा ही लालन – पालन करने का प्रचालन है।

इनके वैवाहिक संबंध सास – बहू, ससुर – बहू, पति – पत्नी, जीजा – साली, देवर – भाभी, ननद – भौजाई, साला – बहनोई, मामी – भांजा, भतीजा – फूफा के रूप में मान्य है।

संथाल जनजाति के बीच नातेदारी को कुछ रीतियाँ भी प्रचलित हैं। संथाल जनजाति के बीच परिहास संबंध भी देखने को मिलते हैं। इस जनजाति में भैंसुर तथा जेठसास को देवता स्वरुप माना जाता है तथा उनसे छुआया नहीं जाता तथा उनकी चारपाई पर बैठा भी नहीं जाता है। यदि भूल से कभी स्पर्श हो जाय तो इनके बीच आरूप जांगा की रस्म पूरी करने की प्रथा है। संथाल महिलाऐं सर पर घूँघट नहीं डालतीं, किन्तु गुरूजनों के समक्ष वे अपने बालों को खुला नहीं छोड़तीं।

संथाल जनजाति में भाभी – देवर, छोटी ननद - भाभी, जीजा – छोटी साली, जीजा – छोटा साला, दादा – दादी और पोता – पोती, नाना – नानी और नाती – नाती, समधी – समधिन या समधिन – समधिन, समधी – समधी के बीच परिहास संबंध पाया जाता है। देवर – भाभी तथा छोटी साली – बहनोई में तो विवाह या पुनर्विवाह भी होता है।

संथाल जनजाति के बीच पति के बहन को आदरसूचक शब्दों से संबोधित किया जाता है और उन्हें ब्राह्मणतुल्य माना जाता है। यह पितृश्वश्रेय संबंध का उदाहारण है।

बिटलाहा

संथाल एक अन्तर्विवाह जनजाति है, जिसके बीच समगोत्रिय यौन संबंध निषिद्ध है। जब कभी को निषिद्ध यौन संबंध की मर्यादा का उल्लंघन करता है, तो वैसे अपराधियों को बिटलाहा यानि जाति से अलग कर दिये जाने के प्रथागत कानून के अंतर्गत दंडित किया जाता है। अनैतिक यौन संबंध को संथाल ईश्वरीय कोप मानते हैं। बिटलाहा द्वारा अपराधी को दंड देकर वे अपने देवताओं को प्रसन्न करते हैं, क्योंकि ईश्वरीय कोप से अकाल, अतिवृष्टि, महामारी इत्यादि फैलने का उन्हें डर होता है।

पी. ओ. बोडिडंग (1930 : 311) द्वारा प्रतिपादित संथाल के शब्दकोष में बिटलाहा का शाब्दिक अर्थ निर्वासित, बहिष्कृत विधि बहिष्कृत इत्यादि बताया गया है।

सामाजिक बहिष्कार की यह सजा अपराधियों संथाल पंचायत के निर्देशानुसार निर्धारित की जाती है। जब कोई संथाल महिला अपने ही गोत्र या निकट के संबंध के किसी पुरूष या किसी गैर – संथाल पुरूष के यौन सहवास में आसक्त पकड़ी जाती है या इस आशय की सूचना प्राप्त होती है, तो ऐसी यौन अपराध की सजा सुनिश्चित करने के लिए गाँव का मांझी (मुखिया) अपने सहयोगियों के साथ पारस्परिक विचार – विमर्श तथा जाँच पड़ताल कर बिटलाहा संबंधी सजा का निर्धारण करने के लिए अधिकृत होता है। किन्तु यौन अपराध सिद्ध न होने की स्थिति में अफवाह फ़ैलाने वालों को कड़ी सजा दिए जाने का भी प्रावधान है। बिटलाहा संबंधी निर्णय लिए जाने के पहले यथासंभव यह प्रयास किया जाता है कि यह मामला आपसी सहमति से गाँव स्तर पर ही निपटा दिया जाय, क्योंकि बिटलाहा करने पर अपराधी, उसके परिवार तथा संबंधियों व ग्रामवासियों को काफी कष्ट सहना पड़ता है। बिटलाहा किए जाने वाले लोगों को पुन: समाज में शामिल किये जाने का भी प्रावधान (जातिजोम) है, बर्शते कि अपराधी क्षमा याचना कर एक बड़े भोज का आयोजन करने में सक्षम हो (बोडिंडग , 1930:311 – 12)।

संथाल प्रथागत कानून के अंतर्गत गैर – संथालों के साथ यौन अपराध के लिए सजा अपेक्षाकृत सबसे अधिक जटिल समस्या है। यह प्रक्रिया एक समुदाय का दुसरे समुदाय के प्रति जनाक्रोश का एक सर्वोत्तम उदाहारण है, जिसके अंतर्गत संथाली मूल्यों के नकारात्मकता के प्रति जनजातीय सामुदायिक भावात्मकता परिलक्षित होती है। गैर – संथालों के साथ संथाली महिलाओं का यौन या वैवाहिक संबंध संथाली एकात्मकता के लिए खतरे की स्थिति उत्पन्न कर सकता है। संथाल जनजाति के प्रसंग में यही डर संथाली संस्कृति के अंतर्गत बिटलाहा जैसी प्रक्रिया का उद्भव तथा आरोपण के लिए जिम्मेवार है। संथालों के बीच यह मान्यता है यदि कोई संथाल महिला गैर – संथालों के साथ खाती – पीती है, तो वह न केवल स्वयं को बल्कि सम्पूर्ण संथाल जनजाति को प्रदूषित करती है और यदि वह गैर – संथालों के साथ यौन संबन्ध रखती है तो अपने जनजातीय समुदाय को विघटित करती है यही कारण है कि ऐसी स्थिति में संलिप्त संथाल युवती तथा गैर संथाल युवक को पकड़ कर पीटा जाता है तथा ग्राम सभा में लाकर सजा दी जाती है (आर्चर – 1984)।

निषिद्ध यौन संबंध की घटना प्रमाणित हो जाने की स्थिति में गाँव का मांझी पड़ोस के कम से कम पांच गाँव के मांझी के साथ विचार विमर्श कर बिटलाहा करने का निर्णय लेता है, जिसकी अंतिम स्वीकृति परगनैत द्वारा दी जाती है। बिटलाहा सुनिश्चित किए जाने के बाद गाँव का जोग मांझी या कोई एक अन्य व्यक्ति अपने साथ पत्तियों सहित एक साल की टहनी में जितनी पत्तियां लगी होती हैं, बिटलाहा उतने दिनों के बाद किया जाता है साल की टहनी की पत्तियों की गणना कर लोग बिटलाहा किस दिन किया जाएगा, इस बात का अनुमान लगा लेते हैं (विश्वास, 1956 : 94-95)। कहीं – कहीं साल की टहनी के साथ – साथ नगाड़ा बजाकर बिटलाहा की सूचना प्रचारित की जाती है। बिटलाहा की कार्रवाई के दौरान गाँव तथा पड़ोसी गाँव के मांझी तथा परगनैत के अलावे पड़ोसी गाँव के सभी नवयुवक तथा पुरूष शामिल होते हैं।

कालान्तर में बिटलाहा की कार्रवाई के दौरान अनुमंडलाधिकारी या किसी दंडाधिकारी को भी कानून तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए प्रतिनियुक्त किया जाने लगा। बिटलाहा के लिए निश्चित किये गये दिन को सुबह 8-9 बजे गाँव तथा पड़ोसी गाँव के नवयुवक तथा अन्य पुरूष सकवा (भैंस के सिंग से निर्मित बाद्ययंत्र), बांसुरी, ढोलक, नगाड़ा, तीर तथा धनुष के साथ गाँव के निकट खाली स्थान में एकत्रित होते हैं तथा अभियुक्त को समझा – बुझाकर बिटलाहा की प्रक्रिया को टालने की कोशिश करते हैं। किन्तु अभियुक्त द्वारा न माने जाने पर ही बिटलाहा संबंधी अंतिम निर्णय ले लिये जाते हैं। इसके बाद उस गली के छोर पर जहाँ अभियुक्त का घर होता है, लोग एकत्रित होते हैं। इस भीड़ के लोगों के द्वारा अभियुक्त के नाम तात्कालिक तौरपर अश्लील गीत रचे जाते हैं। ढ़ोल तथा नगाड़े पर इस तरह के जोरदार थाप लगाये जाते हैं, ताकि मीलों तक उसकी नाद सुनाई पड़े। एकत्रित भीड़ में लोग अपने साथ तीर व धनुष लेकर ठहाका लगते हुए तथा जोरों से नगाड़े, ढ़ोल व बांसुरी बजाते हुए तथा अश्लील गीत गाते हुए आगे बढ़ते हैं तथा गली के इस छोर से उस छोर तक दो – तीन बार चक्कर लगाते हैं। इस अवसर पर संथाल दुगर नृत्य करते हैं। इस समय गाँव की महिलाऐं अपनी प्रतिष्ठा को ध्यान में रखतें हुए दूसरी जगह चली जाती हैं। या किसी एक घर में एकत्रित हो जाती हैं। अपराधी के घर की गली में प्रवेश द्वार पर गाँव का मांझी (मुखिया), जो अपने हाथ में जल भरा एक लोटा लिए होता है, को देखते ही लोग अश्लील गीत गाना बंद कर लेते हैं।

जब भीड़ अभियुक्त के घर में पहूँचती है तो लोग अभियुक्त के घर के आंगन के प्रवेश द्वार पर एक जला हुआ लकड़ी का टुकड़ा (मर जाने का प्रतीक), एक पुराना झाडु तथा कुछ उपयोग किया गया जूठा पत्तल (देवता का भाग जाने का प्रतीक) बांस के एक लंबे लट्ठ में बाँध कर गाड़ देते हैं। भीड़ शामिल लोग घर के अंदर के चूल्हे, घड़े तथा अन्य चीजों को तोड़ डालते हैं। घर में रखे अनाज को तितर - बितर कर देते हैं। यहाँ तक कि कभी – कभी घर को तोड़ने की कोशिश करते हैं। भीड़ में शामिल लोग नग्न होकर उस घर को अपने मूत्र तथा शौच से अपवित्र कर देते हैं (ओ’ मैली, 1984:112)। समाज से बहिष्कृत अभियुक्त तथा उसके परिवार के सदस्यों को दुसरे लोगों के साथ उठने – बैठने, भोजन करने, कुँआ से पानी भरने तथा अन्य सामाजिक सहवास पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है। उस परिवार के लोगों के साथ शादी – विवाह भी निषेद्ध का दिया जाता है तथा जो व्यक्ति उन्हें शरण देता है उसे भी जनजाति से बहिष्कृत कर दिया जाता है। इस तरह अभियुक्त का बहिष्कृत परिवार सामाजिक रूप से मृत हो जाता है। इस दौरान चूंकि बहिष्कृत परिवार के साथ – साथ गाँव के लोग भी काफी कष्ट महसूस करते हैं, इस लिए गांव के लोग इस बहिष्कृत परिवार को इतना परेशान करते हैं कि बहिष्कृत परिवार या तो गाँव छोड़कर अन्यत्र चला जाता है, जहाँ उसके विषय में कोई नहीं जानता या फिर वह समाज में पुन: शामिल होने का प्रयास करता है।

गैर संथालों के साथ यौन अपराध करने वाले अभियुक्तों को संथाल जनजाति में पुन: प्रवेश नहीं दिया जाता है, इसलिए वे लोग गाँव छोड़कर अन्यत्र पलायन कर जाते हैं। उदाहरणार्थ यदि कोई संथाल लड़की गैर संथाल पुरूष के साथ यौन अपराध के लिए अपराधी पाई जाती है, तो वह लड़की उस गैर संथाल के साथ गाँव से बाहर चली जाती है, किन्तु उसके परिवार के लोग उस लड़की को मृत मान कर लोगों को उसकी अंत्येष्टि भोज देकर संथाल जनजाति में शामिल हो जाते हैं। किन्तु अंतर्जनजातीय निषिद्ध यौन अपराध करने वालों को जो क्षमा याचना कर अपने समाज में पुन: शामिल होना चाहते हैं, उसे संथाल जनजाति के अंतर्गत शामिल कर लिया जाता है। संथाल जनजाति के अंतर्गत पुन: वापसी के लिए अभियुक्त गाँव के मांझी से निवेदन करता है। गाँव का मांझी जिले के परगना तथा बाद में यह अन्य परगना जो वास्तव में पूरा जनजातीय क्षेत्र होता है, को सूचित करता है। इस समारोह (जातिजोम) के लिए एक तिथि सुनिश्चित की जाती है तथा जो व्यक्ति, जिसे शामिल किया जाना होता है, एक बड़े भोज का आयोजन करता है। जब इस समारोह की पूरी तैयारी कर ली जाती है, तो बहिष्कृत व्यक्ति गाँव की गली के अंतिम छोर पर अपनी गर्दन में एक कपड़ा लपेट कर हाथ में जल भरा एक लोटा लेकर दयनीय स्थिति में निगाहें नीची कर खड़ा हो जाता है। सबसे अधिक श्रद्धेय परगना अपने सहयोगियों तथा गाँव के मांझी से कहता है – आयें हमलोग इसे सांत्वना दें। यह दया का पात्र है। फिर इसके बाद वह उस पश्चत्तापी पापी की ओर बढ़ता है, जो यह स्वीकार करता है की उसने घोर पाप किया है और अब उस पर दया दिखाई जाए। श्रद्धेय परगना उस अभियुक्त के हाथ से लोटा ले लेता है तथा सूर्य के समक्ष अपना सिर झुकाता है तथा बहिष्कृत व्यक्ति से कहता है – चूंकि तुम अपना अपराध स्वीकार कर चुके हो, इसलिए हमलोग तुम्हें वापस ले लेते हैं। इसके बाद वह लोटा से थोड़ा जल लेकर अपना मुंह धोता है तथा उस लोटा को अन्य व्यक्तियों के बीच आगे बढ़ा देता तथा सभी व्यक्ति उस लोटा के जल से अपना मुंह धोते हैं। इसके बाद वे लोग गाँव में प्रवेश करते हैं तथा अभियुक्त के आँगन में जाते हैं, जहाँ अभियुक्त व्यक्तिगत तौर से परगैनतों तथा मांझियों के पैर धोता है। इसके बाद उन्हें पंक्तिबद्ध रूप से भोजन  करने के लिए बैठाया जाता है। उनके समक्ष पत्तल लगाये जाते हैं। प्रत्येक परगना तथा गाँव के मांझी के पत्तल पर पांच – पांच रूपये तथा अन्य मांझी के पत्तल पर एक रूपये रखे जाते हैं। फिर अभियुक्त स्वयं चावल तथा सालन लोगों के पत्तल पर परोसता है।

इस भोज के बाद वृद्ध परगनैत कहता है कि आज से इस आदमी को अपने समाज में पुन: ले लिया जाता है तथा इसके सभी दोष धो दिए गये हैं। आज से हमलोग इसके यहाँ हुका – पानी पी सकते हैं तथा शादी – विवाह कर सकते हैं। अब हमलोगों ने इसे छने हुए नदी तथा झरने की पानी की तरह स्वच्छ तथा परिशुद्ध बना दिया है। यदि आज से कोई इस विषय में बात करेगा या इसे बुरा कहेगा तो उसे हमलोग एक सौ रूपये का जुर्माना करेंगे तथा भोज लेंगे। इसके बाद वे लोग एक छोटा गड्ढा खोदते हैं, जिसमें गोबर का एक पिंड गाड़ते हैं, जिसके उपर एक पत्थर रख दिया जाता है जो इस बात का घोतक है कि यह मामला हमेशा के लिए दफना दिया गया है। इस प्रकार अभियुक्त पुन: संथाल जनजाति में शामिल कर लिया जाता है (ओ’मैली 1984:114)।

आर्चर (1984) ने अपनी पुस्तक ट्राइबल लॉ एंड जस्टिस में कई संथाल युवती तथा विवाहित महिलाओं के साथ गैर संथाली तथा मुस्लिम, हिन्दू युवक तथा विवाहित पुरूषों के साथ यौन संबंध का उदाहारण देते हुए यह स्पष्ट किया है कि अब बिटलाहा संबंधी सजा में काफी शिथिलता आई है। तथा सजा के स्वरुप काफी बदल गये हैं। अब प्राय: संथालों में बिटलाहा की प्रक्रिया विशेष स्थिति में जुर्माना न देने के बाद ही अपनाई जाती है।

23 जून 1956 को गोड्डा जिले का पाकुड़ अनुमंडल के महेशपुर थाना के अंतर्गत एक गैर संथाल व्यक्ति के साथ एक संथाल युवती के यौन संबंध होने के साथ बिटलाहा किया गया था, जिसमें लगभग 20 हजार संथालों ने भाग लिया था। अपराधी संथाल युवती के पिता के घर का बिटलाहा किया गया था। इस क्रम में उसकी पूरी संपत्ति लूट ली गई। इस अवसर पर पुलिस ने समूचे गाँव को घेर लिया था तथा उसे विवश होकर गोली चलानी पड़ी थी, जिसमें दस संथालों की मृत्यु हो गई थी।

22 नवंबर 1959 को दुमका जिले के रामगढ़ थाना के अंतर्गत खागरशीश गाँव में स्वगोत्रिय विवाह के कारण बिटलाहा किया गया था।

1960 ई. में गोड्डा जिले के गोड्डा प्रखंड के लोबन्धा गाँव में सगोत्री विवाह करने के कारण बिटलाहा किया गया था। बिटलाहा के बाद संथाल लड़का तथा लड़की दोनों गाँव छोड़ कर बाहर चले गये तथा वापस नहीं लौटे।

1977 ई. में दुमका जिले के दुमका प्रखंड के हरिपुर गाँव के एक अविवाहित संथाल युवती का दुमका के एक कान्दू जाति के अविवाहित युवक के साथ यौन संबंध होने के कारण संथाल युवती के परिवार वालों को बिटलाहा किया गया था। दो साल बाद बिटलाहा किये गये परिवार को भोज देने के बाद संथाल समाज में मिला लिया गया।

समय के बदलाव के साथ संथाल जनजाति के बीच भी सामाजिक परंपरागत प्रथाओं में काफी परिवर्तन हुए हैं। शिक्षा के प्रसार तथा औद्योगिकरण के कारण औद्योगिक तथा अन्य रोजगार केन्द्रों में संथाल महिलाओं के कामगार के रूप में नियोजन तथा संथालों की बदलती मनोवृतियों के कारण बिटलाहा जैसे प्रक्रिया अब धीरे - धीरे अब विलुप्त होने के कगार आ खड़ी है। संथालों के बीच ईसाई धर्म के प्रचार होने के कारण ईसाई संथाल एवं गैर संथालों या एक गोत्र तथा निकट के संबंधियों के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित होने लगे हैं। स्वतंत्रता के बाद कुछ वर्षों तक बिटलाहा के प्रक्रिया छिटपुट रूप से चलती रही, किन्तु अब प्रशासन के विस्तार तथा पुलिस हस्तक्षेप के कारण पहले की तरह बिटलाहा नहीं किये जाते हैं। नर्मदेश्वर प्रसाद (1961:79) के मतानुसार संथालों के बीच प्रचलित बिटलाहा का स्वरुप काफी बदल गया है तथा पुलिस प्रशासन लागू किए जाने के बाद उसकी प्रबलता तथा विधि में यथेष्ट नरमी आई है।

दुमका तथा गोड्डा जिले के संथाल समुदाय के अध्ययन (1993) से पता चलता है कि संथाल युवकों तथा युवतियों द्वारा गैर संथालों के साथ विवाह संबंध कायम करने पर अब बिटलाहा जैसे प्रक्रिया नहीं के बराबर व्यवहार में लाई जाती है।

दुमका जिला के गोपीकंदर थाना के दुर्गापुर गाँव के सुरेन्द्र गुप्ता के द्वारा उसी गाँव की संथाल युवती सुशीला हांसदा के साथ विवाह किए जाने पर बिटलाहा जैसी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। इस दम्पति ने 1988-89 ई. में जिला कल्याण पदाधिकारी दुमका से अन्तर्जातीय विवाह अनुदान के रूप में पांच हजार रूपये प्राप्त किये।

दुमका के सदर अस्पताल के सुरेन्द्र सोरेन नामक संथाल युवक ने सदर अस्पताल की एक गैर – संथाल युवती उषा कुमारी के साथ विवाह किया तथा 1988-89 ई. में जिला कल्याण पदाधिकारी, दुमका से अन्तर्जातीय विवाह अनुदान के रूप में पांच हजार रूपये की धनराशि प्राप्त की।

दुमका जिला के दुमका प्रखंड के विजयपुर गाँव, जो अब दुमका शहर का एक हिस्सा बन चुका है, में 6 – 7 संथाल युवतियों द्वारा यादव जाति के युवकों द्वारा शादी कर लिए जाने के कारण युवती के परिवार का बिटलाहा नहीं किया गया। विजयपुर गाँव के संथालों ने केवल उन पर इतना ही प्रतिबन्ध लगाया कि ये लड़कियां शादी के बाद अपने माता – पिता के घर कभी नहीं आयेंगी। विजयपुर गाँव में एक उदाहरण ऐसा भी देखने को मिला कि एक संथाल युवती यादव युवक के साथ विवाह कर लेने के बाद भी अपनी बच्ची के साथ अपने संथाल माता – पिता के साथ ही रहती है तथा अपने यादव जाति के पति के घर नहीं जाती।

चूंकि गैर – संथालों का बिटलाहा करने का प्रावधान संथाल संहिता में नहीं है, अत: गैर – संथालों द्वारा ऐसे मामले में अदालती मुकदमा दयार किये जाने के भी छिटपुट उदाहरण मिलते हैं। यौन संबंध में मामलों को अब संथाल भी अदालतों में लाने लगे हैं।

शिक्षा

झारखंड की संथाल जनजाति की जीवन शैली को अनौपचारिक शिक्षा संस्थागत प्रक्रिया के रूप में परंपरागत तौर प्रभावित करती रही है। यद्यपि इनके बीच युवागृह जैसी संस्था का अभाव रहा है, हो युवक – युवतियों को सामाजिक कर्त्तव्य तथा दायित्व संबंधी प्रशिक्षण प्रदान कर सके। किन्तु परिवार, पड़ोस तथा गाँव की पृष्ठभूमि में संथाल बच्चों को साक्षरता – पूर्व काल के दौरान अनौपचारिक ढंग से प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया निरंतर अस्तित्व में बनी रही है। संथाल युवा तथा युवतियों के आचरण संबंधी नैतिक शिक्षा के लिए जोग मांझी की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

ईसाई मिशनरियों के आगमन के पश्चात् गिरजाघरों की स्थापना के साथ ही इनके बीच औपचारिक शिक्षा का सूत्रपात हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकारी स्तर पर इनके बीच शिक्षा के फैलाव के लिए विद्यालय तथा महाविद्यालय खोले गये। तकनीकी शिक्षा प्रदान करने के लिए औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान तथा पोलिटेक्निक संस्थाएं भी उपलब्ध करायी गयी। दुमका स्थिति प्राक प्रशिक्षण केंद्र के अंतर्गत टंकन तथा आशुलिपि की परीक्षाओं के लिए झारखण्ड सरकार के कल्याण विभाग द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए।

राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम के तहत 15 – 35 आयु वर्ग के निरक्षरों को साक्षर बनाने तथा कार्यात्मक शिक्षा प्रदान करने के लिए वयस्क शिक्षा केंद्र खोले गये। समेकित बाल विकास सेवा योजना के अंतर्गत आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से 3 – 6 वर्ष की आयु के बच्चों को विद्यालय पूरे अनौपचारिक शिक्षा प्रदान की जा रही है। फिर भी संथाल जनजाति के बीच शिक्षा प्रसार की गति धीमी है। संथाल जनजाति के बीच साक्षरता दर 1981 की जनगणना के अनुसार 12.55 प्रतिशत थी, जो 1991 की जनगणना के समय बढ़कर 16.75 प्रतिशत हो गई थी। 2001 की जनगणना के अनुसार संथाल जनजाति के बीच साक्षरता दर 27.31 प्रतिशत थी।

संथाल जनजाति के बीच नारी तथा उच्च शिक्षा का भी समुचित प्रसार नहीं हो पाया है, जिसके लिए सरकारी तथा सामाजिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है (वर्मा, 2009:149-51)।

धार्मिक जीवन

संथाल जनजाति का धार्मिक जीवन अनेक देवी देवताओं तथा प्रेत आत्माओं में विश्वास तथा पर्व त्योहारों से जुड़ा हुआ है। यही कारण है की संथाल के धर्म को यूरीपीय विद्यावानों ने प्रेतवाद की संज्ञा प्रदान की है। सनातन संथालों को बोंगा होड़ कहा जाता है।

सनातन संथालों का विश्वास है कि किसी व्यक्ति, परिवार या गाँव की कुशलता उनके बोंगा गुरू तथा हापड़ामको (पितरों तथा देवी देवताओं) की दया पर ही निर्भर करता है। आकाल, महामारी इत्यादि उन्हीं के क्रोध का प्रतिफल है। अत: उन्हें प्रसन्न रखने के लिए उनकी आराधना करना तथा उन्हें बलि हड़िया या भोग चढ़ाना आवश्यक है। संथालों का सबसे बड़ा देवता सिंगा बोंगा (सूर्य) सिंग बोंगा के बाद मरांग बूरू उनका दूसरा सबसे बड़ा देवता है। इस जनजाति के अन्य बोंगा हापड़ामको, गोसाई एरा, मोंडेको, तुईको, जाहेर एर, मांझी हड़ाम बोंगा, ओड़ाक बोंगा, अवगे बोंगा (गृह देवता), अवगे बोंगा (परिवार का देवता) तथा पूर्वज बोंगा का निवास घर के अंदर होता है।

प्रत्येक संथाल गाँव के बीच में एक चौकोर चबुतरा होता है, जिसे मांझीथान कहा जाता है। इस जगह गाँव के मांझी के पितर पत्थर के टुकड़ों के रूप में प्रतीकात्मक रूप में संस्थापित होते हैं। गाँव की पंचायतें, प्राय: मांझीथान में ही बैठा करती है। जाहेरथान गाँव से थोडा हट कर साल या महुए के पौधों के बीच उपस्थित होता है, जिनके बीच संथाल जनजाति के प्रमुख देवी देवता निवास करते हैं। संथाल जनजाति में भिन्न - भिन्न देवताओं के लिए भिन्न – भिन्न उच्चारती करने के बाखेड़ (मंत्र) तथा विधियाँ होते हैं। मांझीथान तथा जाहेरथान में साधारणता संथाल महिलाऐं प्रवेश नहीं करती है। संथाल जनजाति भूत प्रेत तथा जादू टोना में भी विश्वास रखती है। इनके बीच ओझा तथा डायन भी होते हैं। ओझा लोगों को बिमारियों तथा अलौकिक संकटों से मुक्त करता है। डायन को हानि कारक तथा समाज विरोधी समझा जाता है। इन दिनों संथाल जनजाति के बीच कुछ हिन्दू देवी देवता जैसे शिव, दुर्गा इत्यादि की भी पूजा की जाने लगी है, जिन्हें बलि तथा चढ़ावा चढ़ाया जाता है।

कालान्तर में चल कर संथाल जनजाति के बीच कई आचार्यों का प्रादुर्भाव हुआ, जिनमें एक भागीरथ बाबा भी थे, जिनके प्रयास से संथाल जनजाति में साफाहोड़ या खरवार आंदोलन का सूत्रपात हुआ।

साफाहोड़ (शुद्ध संथाल) संप्रदाय संथालों के परंपरागत धार्मिक एवं संस्कृतिक सुधारवादी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप पुनर्जागरण के रूप में उभरा। साफाहोड़ संप्रदाय के केवल एक ईश्वर पर विश्वास कर उसकी आराधन की जाती है। इस संप्रदाय के लोग भूत - प्रेत में  विश्वास नहीं रखते। साफाहोड़ संप्रदाय द्वारा संपादित किये गए धार्मिक कृत्यों में बलि तथा मदिरापान के लिए कोई स्थान नहीं हैं। इनका पुजा विधान पूर्णरूपेण सात्विक होता है, जिसके अंतर्गत प्रार्थना का एक विशिष्ट स्थान है। आचरण की शुद्धता, निरामिष आहार, मद्यनिषेध, अहिंसा तथा नियमित ईश्वर उपसना इसकी प्रमुख धार्मिक विशेषताओं में है। वे शिव, सरस्वती, ब्रह्मा तथा अन्य हिन्दू देवताओं की भी आराधना करते हैं। किन्तु इस संप्रदाय के लोगों ने अपनी जातिगत संस्कारों तथा पर्व त्योहारों का पूर्णत: त्याग नहीं किया है। वे बलि तथा हड़िया के स्थान पर फल फूल, मिष्ठान, दुध, तुलसी दल का उपयोग किया  करते हैं झारखंड में जकल साफाहोड़ लोगों की संख्या हजारों में हैं। साफाहोड़ धीरे – धीरे अन्तर्विवाही समूह के रूप में विकसित होते जा रहे हैं।

झारखंड के संथाल जनजाति के बीच ईसाई धर्मावलम्बियों की आबादी 1981 की  जनगणना के अनुसार 3.29 प्रतिशत थी। ईसाई संथालों को उम होड़ कहा जाता है। ईसाई संथाल अपने परंपरागत धर्म में विश्वास नहीं रखते है। वे पूर्णत: संबंधित ईसाई धर्म से प्रभावित होते है। किन्तु वे लोग शिक्षा के मामले में परंपरागत संथालों से बढ़े हुए हैं। शिक्षा के बल पर सरकारी तथा अन्य नौकरियों में भी उनकी संख्या अधिक है।

1981 की जनगणना के अनुसार झारखंड की संथाल जनजाति की 0.02 प्रतिशत आबादी इस्लाम धर्म, 0.02 प्रतिशत आबादी सिख धर्म तथा 0.02 आबादी जैन धर्म का भी अनुपालन करती थी।

औद्योगिककरण तथा शहरीकरण  की प्रक्रिया के कारण अब संथाल जनजाति के धार्मिक मूल्यों के परिवर्तन आ रहे हैं। इनके बीच धार्मिक कट्टरता की जगह धार्मिक सहिष्णुता की भावना अंगड़ाई लेने लगी है। परंपरागत अंधविश्वासों के स्थान पर तार्किकता को महत्व दिया जाना लगा है। किन्तु यह परिवर्तन फ़िलहाल अधिक दूरी तय नहीं कर पाया है।

त्यौहार

संथाल जनजाति के जीवन में पर्व त्योहारों का विशेष महत्व है। इनके बीच सभी त्यौहार सामूहिक तौर मनाये जाने की परंपरा है। गाँव का नायके (पुजारी) गाँव के सभी लोगों की ओर से व्रत रखता है तथा पूजा अर्चना करता है। उत्सव मनाने के सिलसिले में आयोजित नाच गान में सभी संथाल पुरूष महिलायें समान रूप से हिस्सा लेते हैं। संथाल जनजाति के त्योहारों का शुभारम्भ आषाड़ मास से होता है। एरोक, हरियाड़, जापाड़, सोहराई, साकरात,  भागसिम, बाहा इत्यादि संथाल जनजाति के प्रमुख पर्व है।

एरोक पर्व

यह पर्व आषाढ़ माह में मनाया जाता है। इस अवसर पर गाँव के जाहेरथान में देवी देवताओं के नाम से मुर्गी की बलि दी जाती है तथा भली भांति बीज उगने के लिए प्रार्थना की जाती है। एरोक पर्व अवसर पर लोगों के बीच खिचड़ी का प्रसाद वितरित किया जाता है।

हरियाड़ पर्व

सावन मास में धान की फसल में हरीतिमा आ जाने पर यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्व में अच्छी फसल के लिए प्रार्थना की जाती है।

जापाड़ पर्व

यह पर्व अगहन में मनाया जाता है। इस अवसर पर जाहेरथान में सुअर की बलि चढ़ाई जाती है तथा खेतों व खलिहानों के संवृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है।

सोहराई पर्व

यह पर्व पूस माह में धान की फसल की कटाई के बाद मनाया जाता है। यह संथाल जनजाति का सबसे बड़ा त्यौहार है। इस अवसर पर धान की नई फसल घर में आने के उपलक्ष्य में देवी देवीताओं, पितरों तथा गोधन की पूजा अर्चना की जाती है। पर्व के पहले दिन गाँव के बड़े बूढ़े नायके के साथ स्नान कर जाहेरएरा तथा गोधन का आह्वान करते है। इस अवसर पर एक मुर्गा की बलि तथा हड़िया चढ़ाए जाते हैं तथा कोई बीमारी तथा आपसी कलह न होने की मन्नत मांगी जाती है। इस अवसर पर गाँव के मांझी द्वारा सोहराई पर्व मनाने के लिए सबकी सहमति प्राप्त कर ली जाती है तथा गाँव के युवक युवतियों को जोग मांझी के नेतृत्व के नाचने गाने तथा हंसने बोलने की स्वंत्रता प्रदान की जाती है। रात्री में संथाल युवक - युवती का दल गाँव के प्रत्येक गृहस्थ के यहाँ गो पूजा के लिए जाता है। पर्व के दुसरे दिन गोहाल पूजा की जाती है। इस अवसर पर गोहाल (गौओं का वास स्थान) साफ सुथरा कर सजाया जाता है तथा गाय के पैर धोये जाते हैं उनके सींगों पर तेल सिन्दूर लगाया जाता है। इस अवसर पर पितरों तथा देवी देवताओं के नाम मुर्गे या सुअर की बलि दी जाती है तथा हड़िया चढ़ाया जाता है। पर्व के तीसरे दिन गाँव के मांझी से लेकर साधारण गृहस्थ तक अपने – अपने बैलों या भैंसों को धान की बालों, मालाओं इत्यादि से सजा कर खुंटते हैं तथा वाद्य यंत्रों के साथ उन्हें भड़काते हुए घंटे दो घंटे तक नाचते कूदते हैं। फिर बैलों और भैंसों को खोलकर गोहाल में ले जाया जाता है तथा हड़िया की छांक लगाईं जाती है। पर्व के चौथे दिन गाँव के युवक युवतियों का दल प्रत्येक गृहस्थ के यहाँ नाच – गा कर थोड़ा सा चावल, दाल, नमक तथा मसाले एकत्रित करता है तथा पांचवें दिन जोगमांझी के निगरानी में इन एकत्रित चीजों से खिचड़ी तैयार की जाती है तथा सहभोग का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर हड़िया भी ढाली जाती है तथा युवक युवतियों को हंसने गाने की स्वंत्रता वापस ले ली जाती है तथा इस पर्व का समापन हो जाता है।

साकरात

सोहराय के पश्चात संथाल जनजाति द्वारा पूस माह के अंतिम दिनों में साकरात का पर्व मनाया जाता है। यह दो दिनों का पर्व है। पहले दिन गाँव के इर्द – गिर्द मछलियों, केकड़ों या चूहों का तथा दुसरे दिन किसी जंगली पशु – पक्षियों का शिकार किया जाता है, जिसके गोश्त का भोग, पकवान तथा हड़िया का साथ मारांग बुरू एवं पितरों को लगाया जाता है तथा परिवार की कुशलता के लिए उनसे प्रार्थना की जाती है।

भाग सिम

यह पर्व माघ माह में मनाया जाता है। इस उपलक्ष्य में किसी  तालाब के किनारे देवी – देवीताओं के नाम मुर्गी की बलि दी जाती है। इस अवसर पर गाँव के ओह्देदारी को अगले एक वर्ष के लिए अपने – अपने ओहदे की स्वीकृति प्रदान की जाती थी। किन्तु यह रिवाज अब खत्म होती जा रही है।

बाहा

फाल्गुन माह में साल वृक्ष पर फूल आते ही मनाया जाने वाला यह पर्व संथाल जनजाति का दूसरा सबसे बड़े पर्व है। यह पर्व मुंडा तथा उराँव के सरहुल पर्व के समान है। इस पर्व के पहले दिन गाँव के नायके स्नान तथा भोजन  का संयमपूर्वक पवित्रता का पालन करता है। दुसरे दिन जहेरथान के देवी – देवीताओं की पूजा - अर्चना की जाती है तथा इस अवसर पर हड़िया, महुआ तथा सखुआ के फूलों की भेंट तथा मुर्गियों की बलि चढ़ायी जाती है। इस अवसर पर खिचड़ी पकायी जाती है। लोगों में प्रसाद वितरित किये जाते हैं तथा गाँव की कुशलता के लिए देवी – देवताओं से प्रार्थना की जाती है। इस अवसर पर नाच – गान का भी आयोजन किया जाता है। पर्व के तीसरे दिन नायके का गाँव के प्रत्येक गृहस्थ के दरवाजे पर पाँव धोया जाता है। बदले में नायके प्रत्येक गृहस्थ को साल की मंजरियों को गुच्छा प्रसाद स्वरुप प्रदान करता है। इसके बाद शुद्ध जल की होली खेली जाती है। लोग एक - दुसरे पर पानी का बौछार डालकर आपसी बैर – द्वेष को भूल जाते हैं। हंसी – मजाक के रिश्तों के अनुसार पानी से भींगने – भिंगाने की धमाकचौड़ी शाम तक चलती रहती है।

बंधना पर्व

यह त्यौहार चैत या बैशाख महीने में मनाया जाता है। इस अवसर पर सभी देवी – देवताओं की पूजा – अर्चना की जाती है तथा उन्हें बलि चढ़ायी जाती है। इस त्यौहार के अवसर पर लोग मित्रों तथा सगे – संबंधियों के साथ एक सप्ताह या उससे अधिक दिनों तक खाते – पीते, नाचते – गाते तथा खुशी मानते हैं।

इस प्रकार संथाल जनजाति के पर्व प्रकृति, कृषि तथा अलौकिक शक्तियों से संबंधित हैं। यही कारण है कि इनके पर्वों का समय मौसम तथा कृषि आवश्यकताओं के अनुसार सुनिश्चित होते हैं।

राजनितिक जीवन

झारखंड की संथाल जनजाति का परंपरागत राजनैतिक जीवन काफी सुसंगठित तथा व्यवस्थित रहा है। इस जनजाति के परंपरागत राजनैतिक का अपना एक विशिष्ट स्वरुप रहा है, जिसके माध्यम से संथाल जनजाति के जनजातिगत प्रतिमानों तथा मूल्यों के अनुरूप व्यवहार करने पर बल दिए जाने के कारण संथाली एकात्मकता को अक्षुन्य बनाये रखे जाने में काफी सहायता मिली है। प्रत्येक संथाल गाँव में एक पंचायत होती है, जिसके मांझी, परामानिक, जोग मांझी, जोग परामानिक तथा गोरेत सदस्य होते हैं।

संथाल जनजाति में राजनैतिक संगठन इसी गाँव पंचायत से प्रारंभ होता है, जिसका प्रधान मांझी कहलाता है। मांझी का सहायक जोग मांझी कहलाता है। मांझी की अनुपस्थिति में ग्राम परिषद की अध्यक्षता परामानिक करता है। परामानिक का सहायक जोग परामानिक कहलाता है। मांझी का कार्य विवाह संबंध स्थापित करने के लिए अनुमति देना तथा ग्राम पंचायत के द्वारा गाँव के निवासियों के झगड़े का निपटारा करना है। जोग मांझी का प्रमुख कार्य अपनी जनजाति के लोगों के आचरण का ध्यान रखना एवं विवाह संबंधी समस्याओं को सुलझाना है। जन्म एवं विवाह के अवसर पर जोग मांझी के सलाह से ही कार्य सम्पन्न किए जाते हैं।

गाँव का पुजारी नायके कहलाता है, जो धार्मिक अनुष्ठान तथा समारोह के संपादन के लिए उत्तरदायी होता है। नायके के सहायक कदम नायके कहलाता है, जिसका कार्य जंगल तथा पहाड़ियों के भूत – प्रेत को प्रसादित करना है। गाँव संवाद वाहक गोरैत कहलाता है, जिसका कार्य मांझी तथा परामानिक की आज्ञा का पालन करना एवं बैठक तथा उत्सव के अवसर पर ग्रामवासियों को एकत्रित करना है।

परंपरागत ग्राम पंचायत के सभी उपर्युक्त पदाधिकारी जनजाति व्यवस्था के अनुसार अपने कार्यों का संपादन करते हैं। संथाल के ग्राम सरकार का स्वरूप लोकतान्त्रिक होता है तथा गणतंत्रीय आधार पर कार्यों का संपादन किया जाता है। गाँव के परिवार विभाजन, संपति का बंटवारा, विवाह, विवाद, तलाक, अत्याचार, बलात्कार, कन्या अपरहण, जमीन विवाद, निषिद्ध यौन संबंध. भूत तथा डायन का विवाद, पालतु पशुओं से फलों की रक्षा इत्यादि, संबंधी विवाद परंपरागत ग्राम पंचायत में रखे जाते हैं, जिसका फैसला मांझी के नेतृत्व में ग्राम  परिषद सभा द्वारा किया जाता है। ग्राम पंचायत के सभी इसके बाद ये सभी पद वंशानुगत रूप से पिता से बड़े पुत्र को प्राप्त होने लगे। यदि ग्राम पंचायत को कोई पदाधिकारी अयोग्य तथा स्वार्थी होता है, तो गाँव में से किसी दुसरे योग्य व्यक्ति को उसके स्थान पर चुना जाता है। पहले मांझी, जोग मांझी तथा नायके को लगानमुक्त जमीन दी जाती थी।

प्रत्येक संथाली गाँव, एक बड़े राजनीतिक संगठन जिसे परगना कहा जाता है।, की एक इकाई होता है। प्राय: दस – बारह गांवों को मिलकर एक परगना होता है। परगना के प्रधान का चुनाव गाँव पंचायत के मांझियों में से किया जाता है, जिसे परगनैत कहा जाता है। परगनैत का एक सहायक होता है, जो देश मांझी कहलाता है। देश मांझी संदेश वाहकों की नियुक्ति करता है, जिसे चाकलादार कहा जाता है। परगना में शामिल सभी गाँव का मांझी परगनैत परिषद के सदस्य होते हैं, परगनैत परिषद में अंतर्ग्राम के झगड़ों का निपटारा किया जाता है। परगनैत ही परगनैत परिषद की अध्यक्षता करता है तथा दोषी व्यक्ति को सजा देता है। दोषी व्यक्ति पर लगाये गये जुर्माने में से कुछ हिस्सा परगनैत को भी प्राप्त होता है। परगनैत अपने क्षेत्र के सभी गांवों के सामाजिक कार्यों का अभिरक्षक होता है। इसकी अनुमति के बिना कोई विवाह संपादित नहीं कर सकता है। बिटलाहा जैसी सामाजिक बहिष्कार की प्रक्रिया को सुनिश्चित करने में परगनैत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

संथाल जनजाति में सेंदरा वैसी (शिकार परिषद) की भी परम्परा रही है, जिसके प्रधान को दिहरी कहा जाता है। सेंदरा बैसी को संथालों का उच्च न्यायालय भी माना जाता रहा है, जिसे अंतर्गत मांझियों तथा परगनैतों के फैसलों की अपीलें की जाती थी। इसकी बैठक वर्ष में एक बार शिकार के समय आयोजित की जाती थी।

कालान्तर में चलकर संथाल जनजाति के परंपरागत राजनैतिक संगठन में काफी परिवर्तन आया। अंग्रेजी शासन के दौरान जमींदारी प्रथा के कारण संथालों की परंपरागत राजनैतिक संगठन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी शासकों ने कड़ा प्रशासन लागू करने तथा ज्यादा से ज्यादा कर की वसूली करने के लिए संथालों की स्वायत शासन व्यवस्था में तब्दीली लाया (वर्मा, 1991:243)। मांझी को वृति देकर उन्हें अंग्रेजी सरकार का वफादार बना दिया गया। परगनैत के कार्य क्षेत्रों में अंग्रेजों शासन दखलंदाजी करने लगी। बिटलाहा के अवसर पर कानून – व्यवस्था बनाए रखने के लिए दंडाधिकारी प्रतिनियुक्ति किए जाने लगे।

ईसाई मिशनरियों के द्वारा ईसाई के प्रचार के परिणामस्वरुप भी संथाल जनजाति के परंपरागत राजनैतिक संगठन के विघटन को बल मिला।

स्वतंत्रता प्रापर्ट के बाद पंचायती राज्य व्यवस्था लागू किये जाने के कारण संथाल के गांवों में वैधानिक पंचायतों की स्थापना की गई, इसके फलस्वरूप भी संथाल जनजाति की परंपरागत राजनैतिक संगठन में ह्रास के लक्षण उत्पन्न हुए। लोकतांत्रिक प्रक्रिया तथा शिक्षा के प्रसार के कारण अब संथाल जनजाति के परंपरागत शक्ति संरचना पर प्रदत्त पतिस्थिति के साथ पर अर्जित प्रस्थिति की महत्ता बढ़ने लगी है। वैधानिक न्यायालयों पंचायतों स्थापना के कारण संथाल जनजाति के परंपरागत पंचायतों का स्वरुप कमजोर पड़ने लगा है, किन्तु राजनैतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में ये परंपरागत पंचायतों जनजाति के आधार पर संगठित होने के कारण वर्तमान समय में भी चुनावी शक्ति का प्रमुख स्रोत बनी हूई है लोकसभा तथा विधान सभा के चुनाव के अवसरों पर आज भी संथाल जनजाति के परंपरागत राजनीतिक संगठनों का महत्व बढ़ जाता है। नवीन जनजातीय शक्ति संरचना में राजनैतिक दलों की भूमिका अधिक प्रभावशाली बनती जा रही है। प्रत्येक राजनैतिक दल संथाल गाँव की जनजातीय संरचना को जनसंख्या शक्ति के आधार पर संथाल जनजातीय समूह को बदली हूई शक्ति सरंचना में सर्वोच्च स्थान प्राप्त होने लगा है। संथाल जनजाति की परंपरागत शक्ति संरचना अपने परंपरागत स्वरूप से हट कर नूतनता को आत्मसात करने लगी है, जिसके कारण अनुवांशिकता, जनजाति, धर्म तथा संरचना कुछ बाह्य परिवर्तनों के बावजूद आज भी अपने परंपरागत स्वरुप के अक्षुण बनाए हुए है।

आर्थिक जीवन

झारखण्ड की संथाल जनजाति का आर्थिक जीवन मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है। यह जनजाति स्थायी गांवों में निवास करती है, जहाँ हल – बैल की सहायता से इस जनजाति द्वारा खेती की जाती है। कृषि मुख्य रूप से मॉनसून पर निर्भर करती है। कुछ कृषि क्षेत्र की सिंचाई कुँआ, तालाबों तथा नदी – नालों की सहायतासे भी की जाती है। धान संथाल जनजाति की प्रमुख फसल है। धान के अलावे यह जनजाति गेहूं., मकई, बाजरा, कोदो, मडुवा, अरहर, सूतनी, कुलथी, घंघरा, सरसों, सरगुजा, सब्जियों इत्यादि भी उपजाती है। सिंचाई के साधनों का अभाव तथा कृषि में वैज्ञानिक प्रतिविधियों के उपयोग ने किए जाने के कारण, कृषि उत्पादन पर्याप्त नहीं होता है। संथाल जनजाति द्वारा पशुपालन भी किया जाता है। यह जनजाति बैल, गाय, भैंस, भेड़, बकरी, मुर्गी, सूअर  इत्यादि पालती है, जो उनकी आय के पूरक स्रोत होते हैं। पहले वे गाय के दूध को छूना या दूहना वर्जित मानते थे, किन्तु अब वे धनोपार्जन के लिए दूध बेच भी लेते हैं।

संथाल जनजाति वनों से लघु वन पदार्थ जैसे – आम, जामुन, कटहल, शरीफा, केंद, पियार इत्यादि के फल, महुआ के फूल, सेमल की रूई, कंद – मूल, पत्तियाँ, जंगली साग, दतवन, शहद, ईंधन की लकड़ियाँ इत्यादि का भी संकलन कर स्थानीय हाटों में बेचकर अर्थोपार्जन करती है। जंगलों में यह जनजाति खरहे, चूहे, गीदड़, जंगली सुअर, जगंली पक्षियों इत्यादी का शिकार करती है। प्राय: बैशाख – जेठ माह में संथाल महिलाऐं साग तोड़ने व सीप – घोंघें चुनने के लिए खेतों, जंगलों तथा तालाबों में जाया करती हैं। सीप व घोंघे के मांस बड़े चाव से खाए जाते हैं।

संथाल जनजाति नदी – नालों, झरनों, तालाबों तथा पानी से भरे खेतों में मछली भी पकड़ा करती है। प्राय: सायरा, टापा, जाल, गिरगिरा तथा हाथों से मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। कभी – कभी किता, चोरचो, कुमीर, इत्यादि पौधों की छाल, फल या कंद पानी में डालकर मथ दिया जाता है, जिससे मछलियाँ अधमरी सी होकर पानी के उपर तैरने लगती है तथा आसानी से पकड़ में आ जाती है।

आजकल संथाल जनजाति के सदस्य परंपरागत व्यवसायों में ह्रास के कारण कल - कारखानों, खदानों, चाय बागानों, ईंट भट्ठों, गृह, बांध तथा सड़क निर्माण कार्यों, वृक्षों रोपण इत्यादि क्षेत्रों में संलग्न देखे जाते हैं। गाँव में आजीविका के सीमित आयाम होने के कारण संथाल जानजाति के लोग अपने गांव से दूर राज्य के अन्य स्थानों या राज्य के बाहर देश के विभिन्न हिस्सों में जीविकोपार्जन हेतु जाते हैं। यद्यपि यह प्रवास प्राय: अस्थायी होता है, किन्तु कुछ लोग नियमित तथा मनोनुकूल रोजगार मिलने के कारण वहाँ स्थायी तौर से बस भी जाते हैं। रोजगार की तलाश में अपने गाँव से पलायन की दशा ने संथालों की संस्कृति को कुछ हद तक प्रभावित किया है, जिसके कारण उनके खान – पान, पहनावा तथा सामाजिक रस्म रिवाजों में परिवर्तन देखने को मिलते हैं।

सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था होने के कारण संथाल जनजाति के लोग सफेदपोश नौकरियों में शामिल किये गये हैं। कुछ संथाल विभिन्न कार्यालयों, कल कारखानों, अस्पतालों तथा व्यवासायिक संस्थानों में काम किया करते हैं। कुछ संथाल जनजाति के सदस्य अपने निजी व्यापारिक धंधो में भी संलग्न हैं।

कृषि के परंपरागत तरीके, कृषि में अवसंरचनात्मक सुविधाओं का अभाव सिंचाई, कृषि प्रशिक्षण, यातायात, विपणन तथा विस्तार सेवाओं की कमी, मॉनसून की अनिश्चितता, मिट्टी के अम्लीय संलक्ष, जंगलों का ह्रास, ऋणग्रस्तता, मद्यपान, असामान आर्थिक विकास, बढ़ती जनसंख्या का दबाव इत्यादि के कारण संथाल जनजाति कि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। सरकारी स्तर पर अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिए चलाये जा रहे विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं, जैसे समेकित जनजातीय विकास योजना, माडा कार्यक्रम वन विकास निगम, आदिवासी सहकारी विकास निगम, ट्राइसम योजना, समेकित बाल विकास योजना, विशेष पशुधन उत्पादन कार्यक्रम इत्यादि से संथाल जनजाति के सदस्यों को अशिक्षा, रूढ़िवादिता, स्वस्थ्य नेतृत्व का अभाव, गुटबंदी इत्यादि के कारण समुचित लाभ नहीं मिल पाता है। संथाल परगना टेनेंसी एक्ट (पूरक अधिनियम) 1947 के द्वारा इनकी भूमि का हस्तांतरण की प्रक्रिया को रोकने में मदद मिलती हैं।

1981 की जनगणना के अनुसार संथाल जनजाति की 36.95 प्रतिशत जनसंख्या कार्यशील थी। इसकी जनसंख्या का 24.59 प्रतिशत कृषक के रूप में कृषि कार्यों में संलग्न थे,  जबकि 8.83 प्रतिशत आबादी कृषि श्रमिक के रूप में कार्यरत थी। खनिज तथा खदानों में इस जनजाति की लगभग 0.98 प्रतिशत आबादी संलग्न थी, जबकि व्यापार वाणिज्य में मात्र 0.12 प्रतिशत। इनकी आबादी के 9.64 लोगों का अस्तित्व सीमांत कामगार के रूप में थी। संथाल महिलाओं का लगभग 65.70 प्रतिशत जनसंख्या अकार्यशील है। कृषि तथा इससे संबंध कार्यों को छोड़कर शेष कार्यों में संथाल महिलाओं की सहभागिता नगण्य है। संथाल महिलाओं को प्रशिक्षित कर गृह उद्योगों में लगाया जाना इनकी आर्थिक समृद्धि के लिए अति आवश्यक है।

आज झारखण्ड की संथाल जनजाति विकास की नई राह पर अग्रसर है। नियोजित विकास योजनाएं इनके बीच सामाजिक, राजनैतिक तथा आर्थिक परिवर्तन के प्रमुख उत्प्रेरक रहे हैं। आजकल इनके सामाजिक संरचना के अंतर्गत परंपरागत प्रभाव क्षीण होने लगा है। परिवहन व संचार माध्यम धर्मनिरपेक्ष शिक्षा, प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रसार, औद्योगीकरण, शहरीकरण तथा पर – संस्कृति ग्रहण की प्रक्रिया के कारण इनकी परंपरावादी जीवनशैली प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाई है। किन्तु यह परिवर्तन ग्रामीण संथालों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में निवास करने वाले संथालों के बीच ज्यादा स्पष्ट दिखलाई पड़ता है।

स्त्रोत: कल्याण विभाग, झारखण्ड सरकार

 



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