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उद्दीपन

परिचय

उपयुक्त उद्दीपन की सहायता से बच्चे का विकास बेहतर हो सकता है। अत: गहन देखरेख में बच्चे को वाटर वेड्स, जिसमें माँ के गर्भ जैसा कृत्रिम परिवेश होता है, उसमें रखकर गति उत्पन्न किया जाता है। इसके अतिरिक्त आकर्षक मोबाइल, हृदय गति रिकार्ड किया हुआ टेप, मधुर संगीत एवं माँ की आवाज प्रस्तुत कर बच्चे को उद्दीपन प्रदान किया जा सकता है। अनूसंधान इस प्रक्रिया की उपयोगिता की पुष्टि करते हैं। इस प्रक्रिया के उपयोग करने के पश्चात शिशु, जन्म के आरम्भिक सप्ताह में शीघ्र भर वृद्धि, बेहतर, निद्रा संरूप एवं अधिक एकग्रता पायी गयी (कर्नेल एवं गाटफ्रिड, 1976, शेफर एवं अन्य, 1980)।

 

भूमिका

स्पर्श एक प्रमुख उद्दीपन का कार्य करता है। इसकी उपयुक्तता मानव एवं मानवेतर शिशुओं पर प्रमाणित की गयी है। फ्रिड एवं एवं सहयोगयों ने प्रदर्शित किया की बार- बार मालिश करने से बच्चों के में शीघ्रता से वृद्धि पायी गयी। कई विकसित देशों में त्वचा से त्वचा कंगारू शिशु देखरेख विधि माँ शिशु को कपड़े ढंककर अपने शरीर से पूर्णत: सटाकर उद्दीपन प्रदान करती है, इसे गहन देखरेख के लिए माँ को प्रोत्साहन अथवा जानकारी देने के साथ साथ, उसे बच्चे के प्रति अधिक लगाव के लिए प्रेरित करते हैं। इस ढंग के परामर्श का उत्साहवर्धक एवं धनात्मक परिणाम पाये गए हैं।

विकसित एवं विकासशील देशों में निम्न जन्म भार एवं शिशु मृत्युदर के बीच उच्च धनात्मक सहसंबंध पाया गया है। परन्तु उपयुक्त प्रयासों की सहायता से इस समस्या को दूर करके ऐसे शिशु को सामान्य स्वास्थ्य से संपन्न बनाया जा सकता है। यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि जन्म संबंधी जटिलताओं के सन्दर्भ में क्या कोई ऐसा सामान्य सिद्धांत है, जिसकी सहायता से पता लगाया जा सके कि ऐसे बच्चों का जीवन एवं विकास की संभवाना किस स्तर की होती है। हावर्ड विश्वविद्यालय में किये गए अनूसंधान के आधार पर महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं। वार्नर एवं स्मिथ (1955) ने कवाई समुदाय के 670 शिशूओं पर दीर्घकालीन अनूसंधान किया। शिशूओं में आंशिक, मध्यम – स्तरीय और तीव्र जन्मगत समस्याएँ विद्यमान थी। जाति एवं वर्ग के आधार पर इन्हें सुमेलित किया गया। इस अध्ययन को दो लक्ष्य थे:

(1) जन्मगत जटिलताओं के दीर्घ कालिक प्रभावों की जाँच एवं

(2) बच्चे के पूर्ण विकास में पारिवारिक वातावरण के सहयोग का आंकलन। परिणामों में पाया गया कि तीव्र जन्मगत समस्याओं वाले समूह में विकास संबंधी दोष होता है। 18 वर्ष की आयु में इस समूह के अन्य शिशूओं की तुलना में दोगुनी मानसिक मंदता, पांच गुनी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ एवं दो गुनी शारीरिक विकलांगता पायी गयी। परंतु निम्न एवं मध्यम जटिलता वाले समूहों में उपयुक्त पारिवारिक वातावरण का धनात्मक प्रभाव पाया गया। गरीबी, असंगठित पारिवारिक वातावरण एवं मानसिक रोग से ग्रस्त माता – पिता एवं शिशु के बीच के असंतुलित संबंध का प्रभाव बच्चे के विकास पर ऋणात्मक पड़ा। इन प्रभावों के कारण वाल्यावस्था एवं किशोरावस्था में अधिगम जटिलता, व्यवहारगत समस्याएं तथा संवेगिक गड़बड़ियाँ पायी गयीं। पारिवारिक वातावरण के अतिरिक्त व्यक्तित्व संबंधी विशेषताएँ, सामाजिक सहयोग संबंधियों के साथ सहृदयतापूर्ण संबंध भी जन्म पश्चात विकास में सहायक होते हैं (वर्नर, 1989, वर्नर एवं स्मिथ, 1992)।

स्त्रोत:

ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान



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