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सुरक्षित मातृत्व : मुख्य बिन्दुएँ

सुरक्षित मातृत्व : मुख्य बिन्दुएँ

भूमिका

गर्भधारण करना एक नैसर्गिक प्रक्रिया है और माँ बनना तो प्रकृति का सर्वोत्तम उपहार। मां बनने की प्रक्रिया में महिला के शरीर में काफी परिवर्तन होते हैं और इस दौरान महिला की जरूरतें भी आम महिला से अलग हो जाती है। हर महिला की चाहत होती है मां बनना। साथ ही उनकी इच्छा रहती है कि गर्भावस्था और प्रसव के समय उसे परेशानियों का सामना न करना पड़े और वे एक स्वस्थ शिशु को जन्म दें। इसके लिये जरूरी है कि महिला व उसके परिवार वाले गर्भावस्था और सुरक्षित प्रसव को आसान बनाने के उपाय समझें। कुछ जानकारी के ज्ञान को अपनाकर गर्भवती महिला स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकती है। सरकार ने सुरक्षित प्रसव के लिये संबंधित विभागों के माध्यम से कई योजना चला रखी है इसकी भी जानकारी से महिला को मिल सकता है सुरक्षित मातृत्व

गर्भावस्था (प्रेगनेन्सी)

मासिक धर्म होने के लगभग दो सप्ताह बाद हर माह स्त्री के डिम्बकोश से एक डिम्ब बाहर आता है। यह डिम्बनाल से गुजरता है। इस बीच संभोग हुआ हो तो डिम्ब-नाल में ही कहीं यह पुरुष  के शुक्राणु से मिलता है। शुक्राणु और डिम्ब के इस प्रकार मिलने से स्त्री को गर्भ ठहरता है।

गर्भिैत डिम्ब, डिम्बनाल से गुजरता हुआ गर्भाशय  की ओर जाता है और उसकी अन्दरूनी झिल्ली से चिपक जाता है। यहॉं एक मोटा तथा स्पंज के समान लचीला अवयव बनता है। यह आंवल (प्लासेन्टा, बीज-अंडाशय ) कहलाता है। आंवल का एक सिरा गर्भाशय  की अन्दरूनी दीवार से चिपका रहता है। दूसरा सिरा आंवल नाल से जुड़ा होता है। आंवल नाल, आंवल अर्भात प्लासेन्टा को विकसित होतु शिशु  से जोड़ती है। गर्भ में लगातार बढ़ता शिशु  भ्रूण कहलाता है। भ्रूण को एक पूरे शिशु  में बदलने में 38 से 40 हफ्‌ते का समय लगता है। भ्रूण की सुरक्षा के लिए उसमें एक थैली होती है जिसमें पानी भरा हुआ होता है। बच्चा हर समय इसी पानी में नहाता रहता है।

गर्भावस्था के दौरान इस द्‌व्य पदार्थ के निम्न काम हैं :

  • यह शिशु  के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करता है।
  • गर्भाशय  गुहा में समान दबाव बनाए रखता है
  • बच्चे के हिलने-डुलने में मदद करता है
  • बच्चे के चारों ओर समान तापमान बनाए रखता है
  • प्रसव पीड़ा के समय बच्चे के अंगों को एक-दूसरे में फंस जाने से बचाता है।

 

प्रसव पीड़ा के समय यह तरल पदार्थ :

  • जनन मार्ग को चौड़ा करने में मदद देता है
  • गर्भाशय के सिकुड़ने-फैलने के कारण पड़ने वाले दबाव से शिशु और आंवल को बचाता है|
  • बच्चा पैदा होने से पहले योनि से बाहर आकर उसे धो देता है इस प्रकार बच्चा और गर्भाशय  गुहा, दोनों को संक्रमण से बचाता है।

गर्भ में पल रहा शिशु  लड़का होगा या लड़की, यह डिम्ब और शुक्राणु के मिलने के समय ही निर्धारित हो जाता है। दरअसल भ्रूण का लिंग इस बात पर निर्भर होता है कि स्त्री का डिम्ब पुरुष  डिम्ब के किस प्रकार के शुक्राणु द्वारा गर्भित हुआ है।स्त्री और पुरुष  दोनों के बीजों में एक प्रकार की धागे जैसी संरचनाऍं पाई जाती है। यह गुण सूत्र (क्रोमोसोम) कहलाती है। स्त्री के अंड डिम्ब में दो XX क्रोमोसोम पाए जाते हैं। पुरुष  के शुक्राणु में एक X और एक Y क्रोमोसोम होता है। यदि डिम्ब को शुक्राणु से क्रोमोसोम मिलता है तो स्त्री X और पुरुष  के द्वारा लड़का पैदा होता है। लेकिन पुरुष  के शुक्राणु से भी X क्रोमोसोम मिला तो XX के मिलने से लड़की जन्म लेती है।

इसलिए बच्चे के लिंग निर्घारण के लिए पुरुष  जिम्मेवार होता है, स्त्री नहीं। लड़का पैदा होने पर स्त्री को दोष  देना या उसे बुरा-भला कहना उचित  नहीं है।

पति का शुक्राणु           पत्नी का डिम्ब

XY                     XX

XX लड़की               XY लड़का

 

गर्भ ठहरने के लक्षण

  • मासिक धर्म रूक जाता है
  • सुबह उठने पर जी मिचलाता है। यह लक्षण गर्भ के दूसरे और तीसरे महीने में सामने आता है। और तीन महीने के बाद धीरे-धीरे ठीक हो जाता है
  • स्तन बड़े होने लगते हैं। उनका काला घेरा बढ़ने लगता है
  • बार-बार पेशाब होता है
  • चेहरे, स्तनों और पेट पर काली झाईयां (धब्बे) हो जाती है। (यह लक्षण सब स़्ित्रयों में नहीं होता)
  • नींद अधिक आती है। सुस्ती महसूस होती है।

 

गर्भावस्था में स्वस्थ बने रहने के लिए स्त्री को चाहिए कि वह :

  • अच्छी तरह पूरा भोजन करें
  • सही समय पर पूरी नींद लें
  • आयोडीन मिलें हुए नमक का प्रयोग करें
  • सफाई पर पूरा ध्यान दें
  • दवाइयों का इस्तेमाल न करें
  • बीड़ी/सिग्रेट और द्राराब सेवन बिल्कुल न करें
  • आरामदायक कपड़े व चप्पल (या जूते) पहलें
  • जहरीली वसतुओं, रसायनिक पदार्थों, गैसों आदि से बचें
  • गर्भ के आखिरी महीने में योनि की अन्दरूनी धुलाई और संभोग से परहेज करें

डॉक्टरी जांच व सलाह के लिए नियमित रूप से डॉक्टर/नर्स से मिलती रहें और लौह टिकियों व टिटनस से बचने वाले दो टीकों का कोर्स ले। टिटनस के टीके गर्भ ठहरने के बाद 16 से 36 सप्ताह के बीच लें एवं दोनों टीकों बीच 4 सप्ताह का अन्तराल रखें।

गर्भावस्था के दौरान कुछ साधारण परेशानियाँ  और उनकी रोक-थाम

1. जी मिचलाना तथा कै होना

गर्भ के शुरू में दो-तीन महीने तक यह समस्या लगभग सभी औरतों को होता है। तीसरे माह के बाद अपने आप ठीक होने लगती है। गर्भवती को चाहिए कि वह भर पेट भोजन करने की बजाए थोड़ा-थोड़ा करके कई बार भोजन करे।गर्भ के अन्तिम तीन महीनों में कै होना खतरनाक है। अगर ऐसा हो तो तुरन्त डॉक्टर को दिखाऍं।

 

2. पेट व छाती में दर्द या जलन की शिकायत

- थोड़ा-थोड़ा भोजन कई बार करने व ठंडा दूध पीने से इस कद्गट में आराम मिलता है। गर्भवती को चाहिए कि वह तला भुना और अधिक मसालों वाला भोजन न खाए।

3. पैरों की सूजन

पैरों पर सूजन आ जाए तो दिन में थोड़ी-थोड़ी देर के लिए कई बार पैर ऊपर रख कर आराम करना चाहिए। इसके अतिरिक्त खाने में नमक कम कर देने या बिना नमक खाना खाने से भी पैरों की सूजन में कमी आ जाती है।

 

4. कमर के निचले हिस्से में दर्द

गर्भवती को चाहिए कि वह बैठने व खड़े होने में कमर को बिल्कुल सीधा रखें। बिस्तर बहुत मुलायम व ढीला न हो। चौकी पर पतला गद्‌दा डालकर सोने से आराम मिलता है। कमर पर हल्के हाथ से हल्के गरम तेल की मालिश से भी आराम मिलता है।

 

5. खून की कमी व कुपोषण

गर्भवती औरत को संतुलित भोजन

लक्षण जो खतरनाक हो सकते हैं

  • लगातार उल्टी होना।
  • चेहरे तथा पैरों पर सूजन।
  • सिर दर्द एवं देखने में परेच्चानी।
  • अत्यधिक कमजोरी एवं निचली पलक का सफेद होना।

गर्भावस्था में देखभाल

  • बच्चे का विकास मॉं के शरीर  में ही होता है और विकास के लिए पोद्गाण उसे मॉं के रक्त द्वारा ही मिलता है, अतः मॉं को सामान्य से अधिक एवं पौद्गिटक भोजन करना चाहिए। खाने में निम्न चीजें खानी चाहिए -
  • हरी पत्तेदार सब्जियॉं जैसे पालक, चौराई, नारी का साग, सरसों, बथुआ।
  • अंकुरित अनाज जैसे चना, मूंग इत्यादि।
  • गुड़, दाल, अण्डा, फल, मांस मछली इत्यादि।
  • बिटामिन सी युक्त आहार जैसे नीबू, आंवला अंकुरित चने एवं दालें।
  • कब्ज की शिकायत  होने पर द्गाहद, अमरूद पपीता इत्यादि।

गर्भावस्था में भोजन थोड़ा-थोड़ा कई बार में खाना चाहिये तथा मसाले एवं तेल का प्रयोग कम करना चाहिये। पानी अधिक पीना चाहिए। कई बार ऐसा देखा गया है कि ऐसी अवस्था में स्त्री के स्वाद में परिवर्तन हो जाता है तो स्त्री को अपने स्वाद के हिसाब से खाना चाहिए उसमें रोका-टेकी की आवश्यकता नहीं रहती।

दवाये एवं इंजेक्शन

  • गर्भावस्था में जब तक जरूरी न हो तब तक कोई दवा न लें आवश्यकता होने पर डाक्टर की सलाह पर ही दवा लें।
  • शरीर  में खून बढ़ाने के लिए आयरन, कैलसियम, तथा फोनिक एसिड की गोलियॉं लें।
  • गर्भावस्था के दौरान टिटनेस के 2 टीके एक महीने के अन्तर पर अवश्य  लगवायें। सामान्यतः यह चौथे महीने से सातवें महीने के बीच कभी भी लगाये जा सकते हैं।
  • माहवारी के कुछ दिन चढ़ने पर माहवारी आने के लिए कोई दवा न लें, ऐसी दवायें बच्चे को नुकसान पहुँचा  सकती हैं।
  • गर्भवती महिलाओं को नद्गाीले पदार्थ जैसे बीड़ी, सूर्ती, तम्बाकू, द्राराब इत्यादि का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना चाहिए यह सब बच्चे को कमजोर एवं विकृत कर सकते हैं।
  • बच्चे का लिंग जानने के लिए कोई जॉंच बिल्कुल नहीं करानी चाहिये
  • यह बच्चे और मॉं दोनों के लिए हानिकारक हो सकती है

 

सफाई एवं आराम

  • सामान्यतः दोपहर में 2 घंटे तथा रात में 8 घंटे आराम करना चाहिये।
  • शरीर  की सफाई खास तौर से छाती एवं जननांग की सफाई आवश्यक है ।
  • शौच  के समय सफाई आगे से पीछे की ओर करनी चाहिये।
  • इस दौरान मॉं को भारी बोझ नहीं उठाना चाहिये।
  • गर्भवती महिला को स्वच्छ एवं ढीले-ढाले कपड़े पहनने चाहिये।
  • ऊॅंची एड़ी की चप्पल बिल्कुल नहीं पहननी चाहिये।

जॉंच

(क)  साधारण जॉंच

(ख)  पेट की जॉंच

(ग)  खून की जॉंच

(घ)  मूत्र की जॉंच

 

(क) साधारण जॉंच

ऊॅंचाई नापना –

एक न्यूनतम ऊॅंचाई जो कि भारतीय परिवेद्गा में 145 सेमी. है से कम लम्बाई की महिलाओं के प्रसव में रूकावट और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है इसलिए दाई को अपने पास 145 सेमी. की लम्बाई का डण्डा या छड़ रखनी चाहिए जिससे वह महिला की न्यूनतम लम्बाई का अन्दाजा लगा सके।

वजन नापना -

गर्भ के दौरान

औसत वजन वृद्धि - (10-12 किलो)

पहली तिमाही -

अल्प या कुछ वृद्धि नहीं

दूसरी तिमाही -

1 किलोग्राम प्रति महीना

तीसरी तिमाही

1.5 से 2 किलोग्राम महीना

 

गर्भावस्था के दौरान वजन अगर अचानक बढ़ जाए (3 किलो 2 महीने में) तो झटके की बीमारी होने का डर होता है। इसलिए 12 किलो से ज्यादा वजन नहीं बढ़ने देना चाहिए। ज्यादा वजन बढ़ने से पीठ और मांसपेशियों पर तनाव रहता है इससे रह-रह कर दर्द और कमजोरी, थकावट महसूस होती है व प्रसव के दौरान परेशानी भी हो सकती है।

3.  रक्तचाप की जॉंच -

सही रक्तचाप -     ऊपर वाला          100-120 मिमी (मिलीमीटर)

नीचे वाला                       50-80 मिमी

ज्यादा रक्तचाप-     ऊपर वाला               140 मिमी से अधिक

नीचे वाला                                  90 मिमी से अधिक

रक्तचाप नपवाएं -

1-  प्रत्येक गर्भवती महिला को रक्तचाप महीने में एक बार अवश्य  नपवाना चाहिए

2-  कभी भी ज्यादा रक्तचाप मिलने पर 6 घंटे के विराम के बाद दुबारा नपवाएं।

यदि रक्तचाप दो बार या उससे अधिक बार ज्यादा आये तो उसे तुरन्त किसी नजदीकी अस्पताल भिजवा दें।

अधिक रक्तचाप की शंका  -

  • बराबर सिर में दर्द रहना।
  • मरीज के पैरों में सूजन सुबह उठने के उपरान्त भी।
  • अत्यधिक वजन बढ़ना
  • ऑंखों के आगे अन्धकार का छा जाना।

(ख)  पेट की जॉंच -

  • पेट की जांच करके यह जानना जरूरी है कि -
  • जितना बच्चा मासिक के हिसाब से बढ़ना चाहिए था वह बढ़ा है कि नहीं।
  • एक बच्चा है या जुड़वा।
  • बच्चे की थैली में पानी तो ज्यादा नहीं है।
  • बच्चा मॉं के पेट में घूम रहा है अथवा नहीं।
  • बच्चे के हृदय की धड़कन है या नहीं।
  • बच्चा सीधा-उल्टा है या टेढ़ा।

मॉं के पेट पर पहले किसी ऑपरेशन का निशान ।

(ग)  खून की जॉंच -

यह जॉंच गर्भावस्था में खून की कमी जानने के लिए बहुत जरूरी है।

हीमोग्लोबिन की सामान्य सीमा -   10 से 12 ग्राम

असामान्य सीमा           -     10 ग्राम से कम

असामान्य सीमा           -     10 ग्राम से कम

रक्त का ग्रुप              -     आर एच धनात्मक या ऋणात्मक

(घ)  मूत्र परीक्षण  -

  • प्रोटीन एवं ग्लूकोज़ का परीक्षण किया जाता है।

संक्रमण की भी जॉंच की जाती है।

गर्भावस्था में सम्भावित खतरों के चिन्ह

यदि मां में निम्नलिखित लक्षणों में से कोई भी लक्षण पाया जाता है अथवा पहले गर्भ धारण के समय इनमें से कोई भी लक्षण रहा हो तो उसे प्रसव के लिए स्वास्थ्य केन्द्र्‌ या सरकारी अस्पताल ले जाने की सलाह देनी चाहिये।

निम्न लक्षण होने पर तुरन्त रेफर करें

  • 35 से ज्यादा उम्र में पहला बच्चा ठहरना।
  • पॉंच या छः बच्चों से ज्यादा होना।
  • आवंल का गर्भाशय में ठहरना।
  • कोई बच्चा अगर ऑपरेशन द्वारा हुआ हो।
  • पहले प्रसव में अगर बच्चा काफी देर में पैदा हुआ हो। (लम्बा प्रसव)
  • पहले प्रसव में अगर बच्चा उल्टा पैदा हुआ हो।
  • पूर्व में पैदा हुए बच्चे की मृत्यु पैदा होने के एक महीने के अंदर हो गयी हो।
  • दो तीन बार कच्चा बच्चा गिरने के बाद बच्चे का ठहरना।
  • चक्कर आना, आंखों की रोच्चनी कम होना, मुंह या पैरों में सूजन आना (उच्च रक्तचाप)
  • जुड़वां बच्चों की सम्भावना।
  • चीनी की बीमारी होना (डायबिटीज)।
  • दिल की बीमारी होना।
  • गर्भ के समय खून जाना।
  • गर्भ के समय खून की कमी होना (हीमोग्लोबिन 8 ग्राम से कम)।
  • 9 महीने से पहले पानी का स्राव होना।
  • बच्चा उल्टा या बड़ा होने की सम्भावना होना।
  • बच्चे का आकार महीने की तुलना में बहुत छोटा होना।
  • औरत का कद 4 फीट 10 इंच से कम हो (140 सेमी से कम हो)

मरीज को भेजते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  • हमेशा पहले से बड़े अस्पताल या प्राथमिक केन्द्र्‌ सामुदायिक केन्द्र्‌ का या अन्य अस्पताल का पता करके रखें या मरीज को पता बताकर रखें कि कभी भी मरीज को, खतरे का निशान  दिखते ही फौरन अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़ सकती है, इसलिए कोई गाड़ी, जीप, ट्रैक्टर या किसी भी वाहन का इन्तजाम करके रखें।
  • हमेशा  मरीज के बारे में जरूरी बातें व जो भी दवाएं दी गयी हैं उसके पर्चे भी भेजे।
  • मरीज को बॉंएं करवट लिटा कर भेजें।
  • यदि सुविधा हो तो ग्लूकोज़ की बोतल शुरू करके भेजें।
  • जितनी जल्दी हो सके फौरन उसे भेज दें, अगर हो सके तो उसके साथ अस्पताल तक जायें।
  • अगर झटके की बीमारी हो तो - मुँह से पानी न दें। मंॅुंह में गैग लगाकर के भेजें या मुंॅह में दॉंतों के बीच चम्म्च डाल दें ताकि जीभ कटने व पीछे गिरने से बचें और द्रवसन नली स्वतं़त्र रहे।
  • अगर खून प्रसव से पूर्व ज्यादा जा रहा हो तो मरीज को आपरद्गान व खून की जरूरत पड़ सकती है इसलिए ऐसे लोगों को मरीज के साथ ले जाना चाहिए जो ऑपरेशन की स्वीकृति दे सकते हों व खून देने के लिए तैयार हों।
  • मरीज को गर्म या पूर्णतया ढका हुआ रखें।
  • योनि जॉंच कभी न करें।

प्रसव पूर्व तैयारी

  • जिस कमरे में प्रसव होना हो उसमें सफाई कर दें। सम्भव हो तो चूने की पुताई भी करें। गोबर का लेप नहीं करना चाहिए।
  • बिस्तर, चटाई, चादर, कम्बल इत्यादि को तेज धूप दिखा दें।
  • चूल्हा, ईंधन, माचिस, एक बड़ा बर्तन, बाल्टी और एक लालटेन तैयार रखें।
  • फटी पुरानी धोतियों को धो कर सूखा लें एवं प्रसव के बाद उपयोग के लिए सूती धोतियों का पैड बनाकर रखें।
  • मॉं और बच्चे के लिए तेल, साबुन और साफ कपड़े तैयार रखें।
  • आवश्यकता पड़ने पर प्रसूता को अस्पताल ले जाने की तैयारी रखें।

 

आदर्श  प्रसूति किट

एक प्रसूति किट तैयार करें, जिसमें निम्न वस्तुएं होनी चाहिए -

  • साफ रूई
  • एक नया ब्लेड
  • साबुन
  • एन्टीसेप्टिक लोशन  जैसे डेटॉल या सेवलान
  • नाल बांधने के लिए धागा
  • बोरिक पाउडर
  • एक जोड़ा दस्ताना
  • प्लास्टिक एप्रन
  • प्लास्टिक शीट (प्रसूता के नीचे बिछाने के लिए)
  • म्यूक्स एक्सिरेटर (बच्चे के मुख से पानी निकालने के लिए)
  • प्लास्टिक कैथेटर (पेशाब की थैली खाली करने के लिए)
  • स्क्रबर हाथ साफ करने के लिए
  • दो छोटी कटोरी

प्रसव के लक्षण

प्रसव एक प्राकृतिक क्रिया है और यदि गर्भावस्था में कोई समस्या न हो तो बिना किसी सहायता के बच्चा पैदा हो जाता है, प्रसव समय में जितनी कम छेड़-छाड़ होगी उतनी ही आसानी से सब कुछ ठीक-ठाक हो जायेगा। प्रसव शुरू  होने से कुछ समय पहले बच्चा गर्भाशय  में नीचे की ओर सरकता है। प्रसव शुरू होने पर पहले थोड़ी से द्गलेद्गमा झिल्ली या म्यूकस बाहर निकलता है, जिसके साथ कभी-कभी थोड़ा खून भी लगा होता है तो मॉं को अचानक पेशाब की तरह नीचे से भींगने का अहसास होता है।

सामान्य प्रसव प्रबन्धन

  • मॉं को साफ सुथरी जगह पर लिटायें और थोड़ी-थोड़ी देर में चहलकदमी करने को प्रोत्साहित करें।
  • जरूरत की चीजों को वहॉं इकट्‌ठा करें।
  • मॉं को चाहिए कि वह अपना मूत्राशय और मलाशय खाली रखें, अतः जल्दी-जल्दी पेशाब करें तथा एनिमा भी दिया जा सकता है!
  • मॉं को पानी या दूसरे तरल पदार्थ काफी मात्रा में पीने को दें।
  • दोनों कटोरी एवं धागा खौलते हुए पानी में दस मिनट तक उबालें।
  • एक कटोरी में उबला पानी लेकर थोड़ा एन्टीसेप्टिक लोशन  डालकर रखें तथा दूसरी कटोरी में नाल बॉंधने का धागा, कैंची, ब्लेड व रूई का फाहा इत्यादि रखें।
  • दर्द के समय मॉं की पीठ मलें तथा उसे गहरी सांस लेने को कहें।
  • जब पानी आना शुरू हो जाये तो मॉं को पीठ के बल लिटाकर उसके घुटने मोड़ दें।
  • यह देखें कि बच्चे का सिर नीचे जा रहा है कि नहीं।
  • अपनी अंगूठी चूड़ी अत्यादि उतार दें और यदि नाखून बड़े हो तो काट लें।
  • अपने हाथ और बाहों को साबुन से धो लें तथा हाथ न पोछें।
  • कटोरी और रूई लेकर एन्टीसेप्टिक लोशन  से योनि द्वार साफ करें।
  • अब तक दर्द तेज होगा और मॉं को मल करने जैसा महसूस होने पर नीचे से जोर लगाने को कहें। इस समय तक बच्चे का सिर नीचे दिखने लग जाता है।
  • मल द्वार पर साफ कपड़ा रख दें।
  • यदि मॉं को अत्याधिक खून बह रहा हो तो उसे तुरन्त स्वास्थ्य केन्द्र्‌ भेजें।
  • दर्द के दौरान जब सिर बाहर आ जाये तो उसे बायें हाथ से नीचे की तरफ झुकाकर सहारा दें और बाहर आने दें, ताकि एक कन्धा बाहर आ जाये।
  • अब बच्चे को उपर की तरफ उठायें जिससे दूसरा कंधा बाहर आ जाये, दूसरा कंधा बाहर आने पर बच्चा स्वतः बाहर आ जायेगा।
  • यदि बच्चे की नाल गर्दन से लिपटी हुई है तो उंगली से खींचकर नाल ढीली करके बच्चे के सिर के ऊपर से नीचे उतार दें।
  • बच्चे का मुँह साफ कपड़े से पोछ दें।
  • नाल का धड़कना बंद होने पर उसे 2 जगहों पर बॉंधकर बीच के हिस्से को नई ब्लेड से काट दें।
  • नाल की ठूंठ पर कुछ न लगायें।
  • बच्चे की ऑंखों को अलग अलग रूई से बाहर की ओर साफ करें।
  • यदि बच्चा नीला लगे तो उसे तुरन्त कपड़े में लपेट दें तथा उसका सिर नीचा करके अपने मुँह से उसके मुँह में सॉंस दें।
  • अब यदि गर्भाशय  सखत मालूम पड़ता है तो मॉं को जोर लगाने को कहें और लटकी हुई नाल पर जरा सा नीचे की ओर जोर लगाये, ऐसा करने पर ऑंवल बाहर आ जायेगी। ऑंवल को जोर से न खींचे तथा ऑंवल गोल-गोल घुमाकर बाहर निकालें।
  • अब पेट को धीरे-धीरे मलें तथा पैड रखकर कसकर बॉंध दें।
  • ऑंवल को हथेली पर रखकर देखें कि वह कहीं टूटा-फूटा तो नहीं है।

सावधानियॉं

1-  प्रसव को जल्दी कराने के लिए दर्द बढ़ाने का टीका न लगायें।

2-  मॉं से कहें कि वह दर्द के शुरू में ही या दर्द के बीच में ही बच्चे को बाहर न धकेलें।

3-  पेट पर जोर लगाना या बच्चे को धक्के से बाहर निकालने की कोद्गिाद्गा नहीं करनी चाहिए।

4-  योनि को फटने से बचाने के लिए सिर को धीरे-धीरे ही बाहर निकालें।

5-  अब ऑंवल बाहर आ जाये तो आंवल और झिल्ली पूरी है या नहीं यह देखिये यदि ऑंवल पूरी बाहर न आयी हो तो मां को  तुरन्त अस्पताल भेजना चाहिए।

6-  यदि बच्चा पैदा होने के बाद एक घंटे तक आंवल बाहर न आये और चाहे अधिक रक्तस्राव न भी हो रहा हो तो भी तुरन्त अस्पताल जाना चाहिए।

असामान्य प्रसव एवं प्रसवोपरान्त प्रबन्धन

प्रसव के दौरान निम्न परेशानियाँ  होने पर महिला को अस्पताल भेजें -

1-  बच्चे के नाल, हाथ या पैर का योनि से बाहर आना।

2-  किसी भी समय अत्यधिक रक्तस्राव होना।

3-  महिला को झटके आना या दौरा पड़ना।

4-  महिला के पेट में तेज दर्द या उल्टी के साथ देखने में परेशानी  होना।

5-  पानी की थैली फूटने के 12 घंटे बाद भी बच्चे का पैदा न होना चा दर्द का शुरू न होना।

6-  प्रसव शुरू होने के 16 से 18 घंटे के बीच बच्चा पैदा न होना।

7-  बच्चे का पेट में मल कर देना जिससे कि गहरे हरे रंग का पानी योनि द्वार पर दिखाई देता है।

8-  बच्चे का घूमना बन्द हो जाना

9-  बच्चे का सिर काफी समय से बाहर दिखाई देने पर भी बच्चा न पैदा होना।

बच्चा पैदा होने के एक घंटे बाद भी आवल न आये और चाहे खून न पड़ रहा हो तो भी मदद लेनी चाहिए।

प्रसव के बाद मॉं की देखभाल -

1-  योनि को साफ करें तथा देखें कि अन्दर या बाहर कोई जखम तो नहीं है।

2-  यदि जखम हो गया और खून ज्यादा पड़ रहा हो तो कपड़े का पैड रखकर कम से कम 5 मिनट तक दबाव डालिए। यदि फिर भी खून गिरना बन्द न हो तो महिला को अस्पताल भेजिए।

3-  महिला के कमर के निचले हिस्से को पानी से धोएं, उसे अच्छी तरह सुखायें तथा साफ कपड़े पहनायें।

4-  मॉं को साफ सुथरा कर योनि द्वार पर कपड़े का पैड बॉंधें और उसे गरम चाय या दूध पीने को दें।

5-  बच्चे को तेल लगाकर साफ कर लें तथा नहलाकर कपड़े पहनाकर माूं के नजदीक करवट से लिटा दें।

6-  प्रसव के बाद जल्दी से जल्दी मॉं से छाती धो कर दूध पिलाने को कहें और उसके हर 3 घन्टे में दूध पिलाने को कहें।

7-  प्रसव के अगले दिन मॉं को जाकर देखें कि कहीं बुंखार तो नहीं है या अधिक खून तो नहीं जा रहा है। जरूरत होने पर उसे स्वास्थ्य केन्द्र्‌ भेजें।

8-  मॉं को पेट के बल लेटने को कहें तथा घुटना एवं छाती का व्यायाम करने को कहें।

9-  इस समय मॉं को पौष्टिक आहार देना चाहिए क्योंकि वह बच्चे को दूध पिला रही है।

10-मॉं को कहें कि अपने बच्चे को टीकाकरण के लिए स्वास्थ्य केन्द्र्‌ लें जाये और नियमित रूप से वजन भी लें।

निम्न बिन्दुओं पर ध्यान दें -

  • दाइयों को अपने क्षेत्र के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र्‌/अस्पताल/सम्बन्धित योग्य व्यक्ति की जानकारी रखना।
  • असाधारण परिस्थितियों में समय रहते ही पहचान कर अस्पताल भेजना।
  • असामान्य स्थितियों में गर्भवती महिला एवं परिवार के सदस्यों का धीरज बॅंधाने के साथ-साथ यदि सम्भव हो सके तो अस्पताल तक साथ जाना।

प्रसव उपरान्त भी एक हफ्‌ते तक मॉं एवं बच्चे की देखभाल करना।

निम्नलिखित बातें नहीं करनी चाहिए -

  • दर्द बढ़ाने के लिए किसी प्रकार का इंजेक्शन लगाना।
  • रक्तस्राव होने पर योनि के अन्दर हाथ डालकर जॉंच करना।
  • परिस्थिति समझ में न आने पर अनावश्यक छेड-छाड़ करना।
  • आंवल को गर्भाशय  से अलग न होने की दशा में भी जोर लगाकर खींचना।

 

स्रोत: ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची|



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