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प्रेमचन्द के साहित्य में मानवाधिकार का यथार्थ

परिचय

साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। चूँकि व्यक्ति या लेखक भी उस समाज का एक अभिन्न अंग होता है इसलिए किसी व्यक्ति विशेष के साहित्य को समग्रता से जानने के लिए उस के जीवन-वृत्त को जानना अति आवश्यक है। प्रेमचन्द ने अपने जीवन के विभिन्न अनुभवों और समाज की प्रत्येक छोटी बड़ी घटना का गहरी सूक्ष्मता के साथ अवलोकन किया और उसे मनोवैज्ञानिक और यथार्थ के धरातल पर विश्लेषण करते हए अपने साहित्य में अनुस्यूत किया। उनके अपने अनुभवों की ही यह पूंजी हमारे समक्ष साहित्य के रूप में साक्षात होती है। एक ओर जहाँ प्रेमचन्द के साहित्य में स्वतन्त्रता को पाने की देशवासियों की ललक दृष्टिगत होती है वहीं दूसरी ओर वे उस स्वतंत्र भारत की कल्पना करते समय अधिकार, उन्हें सुविधा सम्पन्न तथा शोषण करने वाले उच्च वर्गों के चंगुल से मुक्ति दिलाने और उनके अधिकारों के प्रबल पक्षधर प्रतीत होते हैं। उनका सम्पूर्ण साहित्य मानव अधिकारों के लिए दलित, शोषित, निम्न वर्गों का निरंतर संघर्स परिलक्षित होता है।

किसी व्यक्ति के साहित्य को यदि बारीकी से समझना हो, तो प्रथमतः समग्रता से उसके सम्पूर्ण साहित्य पर दृष्टि डालनी होगी और साथ ही साथ उसके जीवन यात्रा को भी देख लेना उचित होगा।

प्रेमचंद के जीवन साहित्य यात्रा

एक मायने में इस पर विवाद हो सकता है कि जीवन यात्रा का साहित्य से कोई नाता है अथवा नहीं, इसमें कोई संदेह नहीं कि अभी हमारे पास किसी व्यक्ति के साहित्य और उसके जीवन यात्रा के अलावा कोई और विकल्प नहीं ही, जिससे की उसका मूल्यांकन किया जा सके। अतः उपरोक्त कथन हमारे लिए साहित्यिक मीमांसा हेतु अपरिहार्य हैं। प्रेमचन्द की जीवनी मुख्यतः दो लोगों ने लिखी है एक तो मदन गोपाल जी की अंग्रेजी में लिखी हुई तथा दूसरी उनकी पुत्री द्वारा लिखी गई ;कलम का सिपाही’ है।  यदि प्रेमचन्द के ही शब्दों को लें तो उन्होंने कहीं कहा है कि ‘उनकी जिन्दगी के समतल-सपाट मैदान की तरह है। उनके कहने का आशय यह लगाया जा सकता है कि उनकी जिन्दगी कहीं से भी किसी भी कोण से तवज्जो लायक नहीं ही, एकदम साधारण है। परन्तु उनके सम्पूर्ण साहित्य अथवा जीवन को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह उनकी विनम्रता अथवा सकोंच ही है, जिसमें उनकी सत्यता, विनम्रता एवं संकोच के बादल से ढक सी गई है, करण इतने गहन साहित्य का प्रणेता, जिसने जिदंगी में इतने उतार-चढ़ाव देखे हों व सपाट और समतल नहीं हो सकता। हाँ के मायने में सपाट और समतल होना उस खेत की तरह है जिसमें बीज बोने से पहले, झाड़-झंकार, उंच-नीच को झाड़-बुहार खोद कर समतल तैयार किया गया है-अच्छी फसल की पैदावार के लिए।  बहरलाल, प्रेमचन्द सन 1881 ई. मने एक साधारण परिवार में पैदा हुए। पिता डाकखाने में मुंशी थे। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। प्रेमचन्द जब 9वीं कक्षा में पढ़ रहे थे तभी उनके पिता का देहावसान हो गया। इस वक्त इनका विवाह भी हो चूका था, तथा पत्नी के अलावा उन पर विमाता और उनके दो बच्चों के भरण-पोषण की भी जिम्मेदारी थी। घर-परिवार की जिम्मेदारियों को चलाते हुए सन 1910 ई. में प्रेमचंद ने इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। इसके अतिरिक्त मुदरिसींके साथ-साथ बी.ए. की डिग्री भी हासिल कर ली थी। बी.ए. पास कर लेने के पश्चात संयुक्त प्रान्त के शिक्षा विभाग में मुलाजिम हुए और डिप्टी इंस्पैकटर ऑफ़ स्कूल्स’ के पद तक पहुंचे। यहाँ यह बता देना आवश्यक जान पड़ता है कि नौकरी के दौरान जगह-जगह उनके तबादले हुए जिसका एक लाभ हुआ कि उन्हें तरह-तरह की जगहों और तरह=तरह के लोगों के अनुभव मिले। अनुभवों की यह पूंजी उनके साहित्य में बड़ी संजीदगी से दिखाई पड़ती है।

इस पूरे दौर में उनकी जिन्दगी में और भी उतार-चढ़ाव आये। पत्नी की मृत्यु बाल-विधवा शिवरानी से विवाह, श्रीपत, अमृत दो पुत्रों तथा बेटी कमला का जन्म, इसके अतिरिक्त बीच में ही नौकरी से इस्तीफा, इत्यादि-इत्यादि। इन सब घटनाओं में जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह कार्य जो मैट्रिकुलेशन के आस-पास  शुरू हुआ था, तब तक बंद न हुआ जब तक उनकी मृत्यु न आई। प्रेमचन्द की मृत्यु 1936 ई. हुई। प्रेमचन्द का सम्पूर्ण साहित्य मावन केन्द्रित है, इस लिहाज से यदि उनके साहित्य का अवलोकन किया जाए तो प्रेमचन्द और उनका मानव, प्रेमचन्द के जन्म सन 1881 ई, से लेकर उनकी मृत्यु 1936 ई, तक के मानव संबधित यथार्थवादी साहित्य का एक जीवंत दस्तावेज है।

प्रेमचंद के कहानी संकलन की यात्रा

उनका पहला प्रकाशित कहानी-सकंलन सोजे-वतन, देशभक्ति की कहानियों का संकलन है। उनका यह कहानी संग्रह तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया था तथा उनका अंतिम कहानी संग्रह ‘समर –यात्रा’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ।

प्रथम कहानी-संकलन की ही तर्ज पर इस अंतिम कहानी संग्रह में संकलित कहानियाँ भी भारत के स्वाधीनता-संग्राम से ही जुड़ी हुई हैं।

उपरोक्त कथन के आधार पर यह बात जाहिर होती है कि मानव अधिकार के बुनियादी तत्वों अर्थात स्वतन्त्रता की कशमकश प्रेमचन्द में कूट-कूट का भरी हुई थी और यह अंग्रेजी सियासत के बरक्स पुरे मैस्तैदी के सह कलम के जरिये अहिंसात्मक क्रांति थी। इस संन्दर्भ में यहाँ यह कह देना अतिशयोक्ति न होगा कि कहानी के माध्यम से वह केवल स्वाधीनता संग्राम के लेखक ही नहीं, उसके उपज भी थे। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के विविध पक्षों तथा उसके विविध आयामों से अपरिचित व्यक्ति मात्र उनके उपन्यासों एवं कहानियों के माध्यम से स्वाधीनता आंदोंलन तथा उसके विभिन्न पहलुओं की जानकारी हासिल कर सकता है।

ऐसा कहा जाता है कि प्रेमचन्द अपने आरंभिक दौर में कांग्रेस में गर्म दल के प्रवक्ता, बालगंगाधर तिलक के उग्र-राष्ट्रवाद के पक्षधर थे किन्तु कालन्तर में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद उनके चलाए गए राष्ट्रीय आंदोलनों से वह काफी प्रभावित हुए जिसके फलस्वरूप उनके लेखन में सांप्रदायिकएकता, स्त्री-उत्थान तथा हरिजन जैसे तत्वों का भी समावेश हुआ।

यहाँ यह बात भी विचारणीय है कि प्रेमचन्द तत्कालीन उस स्वतन्त्रता प्राप्ति से संबंधित उन तमाम विचारों से सहमत होते हुए भी स्वाधीनता आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में  थोड़े अलग दिखाई पड़ते हैं। वे स्वयं ‘जागरण’ जैसे पात्रों के माध्यम से स्वाधीनता आंदोलन के स्वरुप और चरित्र के गुणात्मक बदलाव के बात कर रहे थे। उन्हें इस बात की कसक थी अपने वर्ग चरित्र के चलते राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्य नेतृत्व किस तरह किसान-मजदूर और साधारण जनता की जिन्दगी स्तर पर, राजनितिक सत्ता हस्तांतरण पर केन्द्रित कर राजनितिक सत्ता भर हथियाना चाहता है। इस मायने में प्रेमचन्द स्वतंत्रता के यथार्थ की बात  तो बड़ी शिद्दत से  दोहरा रहे थे। बार-बार अपने लेखों में यही कहते नजर आते हैं कि स्वाधीनता का  आंदोलन केवल साम्राज्यवाद विरोध के मोर्चे पर ही न लड़ा जाए, वह सामन्तवाद और पूंजीवाद-विरोध के मोर्चे पर भी समांतर लड़ा जाए। अगर यह लड़ाई इस तरह नहीं लड़ी गई तो भारत को सच्चे मायनों में स्वंत्रता नहीं मिलेगी।

यह सत्य है कि जिस आजादी की परिकल्पना प्रेमचन्द ने की थी वह उनके जीवनकाल में क्या अब भी सरकार नहीं दिखती। इस मायने में भारत राजनितिक तौर पर आजाद तो जरुर हुआ पर जिस सत्य की इच्छा प्रेमचन्द की साधारण जनता, किसान-मजदूर, स्त्री, हरिजन  इत्यादि को लेकर थी वह बाद में और भी जटिल होती चली गई। इस बात की प्रमाणिकता ‘गबन’ उपन्यास के पात्र देवीदीन खटिक की वाणी में देखी जा सकती है। वह अपने दो बेटों को आजादी की लड़ाई में गंवा चूका है।

आंदोलन के नेतावर्ग की आगामी जिन्दगी पर जो वह टिप्पणी करता है, महत्वपूर्ण है कि आजादी के बाद आप बड़े-बड़े बंगलों में रहोगे, हलवा-पुड़ी खाओगे, मजे उड़ाओगे, आज हमारी आँखों का सच बन चुकी है। समाज भी गारी-बराबरी है, घोर गरीबी है और घोर अमीरी है। किसान, मजदूर, स्त्री , हरिजन, सब आज अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।

अभी तक चले आ रहे सम्पूर्ण लेख में जिस बात पर हमें केन्द्रित होना है उस पर भी अब थोड़ा विचार कर लेना आवश्यक जान पड़ता है। मानवाधिकार को लेकर प्रेमचन्द की परिकल्पना समग्र रूप से सत्य और यथार्थ पर ही अवलम्बित है। उनके साहित्य में अगर भारत के स्वाधीनता आंदोलन की बात कही गई है तो वह महज राजनैतिक स्वतन्त्रता की बात नहीं है अपितु उस स्वंत्रता की बात है जहाँ मानव-मानव की बात आती है। भारत तत्कालीन समय में जहाँ एक ओर गोरों के कारण अभिशप्त था, वहीं भारत की अधिसंख्य जनता देश के तमाम ऊँचे तबकों पर बैठे जमींनदारों, सेठों साहूकारों से भी त्रस्त थी।

प्रेमचन्द के साहित्य में सामाजिक जीवन के यथार्थ के पल

प्रेमचन्द की साहित्य में सामाजिक जीवन के यथार्थ और साधारण जनता के जीवन-सन्दर्भों में समान मानव अधिकार की पहल को लेकर, किसान, स्त्री एवं हरिजन के संबंध में उनकी चिंता प्रमुख है। यह बात उल्लेखीय है कि प्रेमचन्द के समय में दिय गये उपरोक्त सन्दर्भों में निहित उनकी दृष्टि समग्र रूप से उस समय हो रहे घटनाओं के परिपेक्ष्य में है। कहना न होगा कि प्रेमचन्द जिस मानव-मानस की बात उजागर तथा (चाहे वह शोषित करने वाले व्यक्ति के विषय में अथवा जो शोषण कर हर है उसके विषय में ) क्रोध करना चाहते हैं वह दरअसल तत्कालीन घटनाओं का सहारा लेते हुए हमेशा से चले आ रहे मानवाधिकार के हनन के विषय  की ओर इशारा करते हैं।

प्रेमचन्द जिस किसान की बात अपनी कहानियों और उपन्यासों में लाते हैं वे धनी किसान नहीं हैं, छोटी जाती अथवा छोटे-पूंजी के किसान हैं और  दरअसल जीवन की यही विचित्र बिडम्बना है कि मानव संबंधित किसी भी क्षेत्र का छोटे वर्ग के साथ ही शोषण की प्रक्रिया अधिकांशतः जुडी रहती है।

प्रेमचन्द के साहित्य में जो सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आती है वह यह कि जहाँ वह तरफ शोषण के विरुद्ध अपनी कलम चलाते हैं, वहीं दूसरी तरफ शोषित वर्गों  की तमाम कमजोरियों  को भी नजर अंदाज नहीं करते। इस लिहाज से हम उनके साहित्य के किसान पात्रों के चरित्रों पर अगर नजर दौड़ाए तो हम देख सकते हैं कि छोटी हो, शकर हो, दुखी हो सब बाहरी सन्दर्भों के साथ पानी प्रव्रत्तिबद्धता तथा रुढ़िवाद के कारण भी अभिशप्त होते हैं। ‘पूस की रात’ का हल्कू अपने आलस्य के चलते अपनी फसल का विनाश देखता है और इसी से मिलती-जुलती स्थिति  ‘मुक्ति मार्ग’ के उन पात्रों की भी है, जो अपनी व्यक्तिगत ईर्ष्या, द्वेष के चलते अपना विनाश देखते हैं।

मानवाधिकार के हनन अथवा उसके प्रायोजित स्वरुप के यथार्थ का मनोविज्ञान से बड़ा गहरा संबंध है। प्रेमचन्द , इन दोनों तत्थ्यों को बखूबी समझते थे। दरअसल मानवाधिकार के हनन की जो घटनाएं घटती हैं, मुख्यतया दो वर्गों में विभाजित की जा सकती हैं। एक वह जो किसी के द्वारा प्रायोजित रूप में प्रयोग में लायी जाती है, जैसे-हत्या, लुट, बलात्कार इत्यादि-इत्यादि। दूसरी वह जो सामाजिक व्यवस्था के हाथ उपजी हुई होती हैं उसमें  हम शोषण, छुआ-छुत इत्यादि को रख सकते हैं।

शोषण, छुआछूत की प्रक्रिया समाज में एक तो खराब मानसिकता का परिमाण हो सकती है। अतः इसलिए वह फलती-फूलती हैं और दूसरी ओर, जिन पर इस तरह के शोषण हो रहे होते हों उनका उस पर संघटित रूप से विरोध न करने के कारण भो हो सकते हैं यह एक पक्ष है मानवाधिकार के हनन का इस जन्म का कारण होती हैं। कुल मिला-जुलाकर मानवाधिकार समाज के परिपेक्ष्य में उनके अधिकारों के हनन के खिलाफ होने की प्रक्रिया में नहीं ही, अपितु मानवाधिकार का क्षेत्र व्यक्ति के उन तमाम, गुणों के विकास से भी संबंधित है जिसमें कि समाज प्राकृतिक रूप से अपने विवेक, चातुर्य एवं कार्य प्रवीणता के जरिये, उन तमाम दुर्घटनाओं के बरक्स खड़ा हो सकता है जिससे कि मानवाधिकारों के हनन की संख्या में वृद्धि न हो और यही संकेत प्रेमचंद ने किसानों के माध्यम से कहना चाहा है, जिसे हम मानवाधिकार के संबंध में देख सकते हैं।

लेखन : डॉ अप्रेमय मिश्र

स्रोत: मानव अधिकार आयोग, भारत सरकार



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