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पारम्परिक प्रौद्योगिकी पद्धतियाँ

इस खंड में देश में प्रचलित पारंपरिक प्रौद्योगिकी पद्धतियों के बारे में बताया गया है।

पारम्परिक प्रौद्यौगिकी पद्धतियों की महत्ता-एक परिचय 

उत्तराँचल के कुमाऊँ हिमालय में सदियों से चली आ रही पारंपरिक खेती के पद्धतियों और ग्रामीणों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने भरण-पोषण के लिए जिंदा रखी गयी उन तकनीकों की जानकारी है|

कुछ पारम्परिक प्रौद्यौगिकी-पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं -

  1. पनचक्की (घट / घराट)
  2. ओखली/ओखल/उखव
  3. तेल का कोल्हू
  4. गन्ने का कोल्हू
  5. ज्वाँत
  6. रेशा उद्योग
  7. बाँस और किंरगाल उद्योग
  8. ऊनी वस्त्र निर्माण
  9. दवाइयाँ बनाना
  10. पेड़-पौधों की प्रवर्द्धन विधियाँ
  11. तम्बाकू निर्माण
  12. चारा इकट्ठा करने की विधि
  13. साबुन निर्माण की विधियाँ
  14. धूप निर्माण
  15. नदी पार करना व तैराकी
  16. आखेट की विधियाँ
  17. खेल सामग्री की निर्माण
  18. कृषि तकनीकी
  19. जलस्रोत एवं संचय की विधियाँ
  20. समय व मौसम विज्ञान संबंधी विश्वास
  21. मौन पालन की प्रचलित विधियाँ
  22. चर्म उद्योग

छोटे-बड़े जीव-जन्तुओं के साथ जब मानव का आविर्भाव हुआ, तभी से उसने अपने को चारों ओर से नाना प्रकार की प्रकृति और वनस्पतियों से घिरा पाया। उसने प्रकृति के रहस्यों को समझने का प्रयास करते हुए अपने लिए प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया। उसने प्राकृतिक संसाधनों को अपने उपयोग में लाना प्रारंभ किया। वह आदिम युग से ही निरंतर वैज्ञानिक उपलब्धियों की ओर अग्रसर होता आया। जिसके फलस्वरुप उसने विभिन्न युगों में तदनुरुप व्यावहारिक तकनीकी ज्ञान अपनी आने वाली संतानों को परम्परागत रुप से प्रदान किया।

आदियुग से वर्तमान तक सभ्यता और संस्कृति के विकास के रुप में मानव ज्ञान-विज्ञान के अपार भण्डार को अपने पूर्वजों से प्राप्त करता आया है। आधुनिक युग में विज्ञान अपनी चरमोन्नति पर है। आधुनिक विज्ञान ने जहाँ संसार को प्रगति एवं विकास के विविध सोपान प्रदान किए हैं, वहीं हानि भी कम नहीं पहुँचाई है। जिस व्यावहारिस तकनीकी ज्ञान को मानव ने अथक प्रयास और बुद्धि-कौशल से प्राप्त किया, आज वह कोरे भौतिक विकास की दौड़ में पीछे छूटता जा रहा है।

तकनीकी ज्ञान के सम्यक् प्रयोग के अभाव में आज प्रदूषण जैसी भीषण समस्या मुँह बाए खड़ी है। दिन-प्रतिदिन इसका स्वरुप और विकराल होता जा रहा है। सारे विश्व के तमाम तकनीकी विशेषज्ञ चिंतित हैं कि प्रदूषण की इस समस्या का समाधान कैसे हो? ऐसे में यदि परम्परागत व्यावहारिक तकनीक को आधुनिक विकास के अनुरुप ढाल कर प्रयोग में लाया जाए, तो प्रदूषण की इस विकट समस्या का आंशिक निदान अवश्य निकल आएगा।

हिमालय की संरचना के अनुरुप हमारे पूर्वजों ने ऐसी प्रौद्यौगिकी विकसित की, जो निर्वाह के समुचित साधनों की आवश्यकता पूरी करने के साथ ही पर्यावरण सुरक्षा के दृष्टि से भी महत्वपूर्ण थी। कुमाऊँ हिमालय में आज भी कस्बों को छोड़कर इस परम्परागत प्रौद्योगिकी का ही प्रचलन है। कृषि, खनिज, पशुपालन, चर्म कार्य, आटा चक्की, कागज, तेल, मौन पालन, रंग, स्याही, आभूषण, लोहा, ताँबा, बर्तन, लकड़ी उद्योग, शिकार आदि विषयक कई स्थानीय प्रौद्योगिकी पद्धतियाँ यहाँ प्रचलित हैं। इनमें से कुछ तो विलुप्त हो गई हैं, कुछ नई सभ्यता के आगमन तथा गाँवों के शहरीकरण के कारण अंतिम साँसें गिन रही है और कुछ अभी भी प्रचलन में हैं। किन्तु वह दिन दूर नहीं, जब यह सम्पूर्ण परम्परागत ज्ञान-विज्ञान विलुप्त हो जाएगा।

इस लेख में कुमाऊँ क्षेत्र में पारम्परिक रुप से प्रचलित कुछ प्रौद्यौगिकी पद्धतियों का विवरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। औद्यौगिक विकास के इस युग में यद्यपि इनमें से कई पद्धतियां अप्रासंगिक समझी जाने लगी है, तथापि पर्वतीय क्षेत्र की भौगोलिक संरचना और ग्रामीण जनों की दृष्टि में आज भी इनका महत्व यथावत् है।

कुछ पारम्परिक प्रौद्यौगिकी-पद्धतियाँ निम्ननिखित हैं -

पनचक्की (घट/घराट)

पर्वतीय क्षेत्र में आटा पीसने की पनचक्की का उपयोग अत्यन्त प्राचीन है। पानी से चलने के कारण इसे "घट' या "घराट' कहते हैं। पनचक्कियाँ प्राय: सदानीरा नदियों के तट पर बनाई जाती हैं। गूल द्वारा नदी से पानी लेकर उसे लकड़ी के पनाले में प्रवाहित किया जाता है जिससे पानी में तेज प्रवाह उत्पन्न हो जाता है। इस प्रवाह के नीचे पंखेदार चक्र (फितौड़ा) रखकर उसके ऊपर चक्की के दो पाट रखे जाते हैं। निचला चक्का भारी एवं स्थिर होता है। पंखे के चक्र का बीच का ऊपर उठा नुकीला भाग (बी) ऊपरी चक्के के खांचे में निहित लोहे की खपच्ची (क्वेलार) में फँसाया जाता है। पानी के वेग से ज्यों ही पंखेदार चक्र घूमने लगता है, चक्की का ऊपरी चक्का घूमने लगता है।

पनचक्की प्राय: दो मंजिली होती है। कही पंखेदार चक्र के घूमने की जगह को छोड़कर एक मंजिली चक्की भी देखने में आती है। भूमिगत या निचली मंजिल में पनचक्की के फितौड़ा, तलपाटी (तवपाटी), ताल (तव), काँटा (कान), बी, औक्यूड़, तलपाटी को दबाने के लिए भार या पत्थर तथा पनेला (पन्याव) होते हैं। ऊपरी मंजिल में निचला चक्का (तवौटी पाटि), ऊपरी चक्का (मथरौटी पाटि), क्वेलार, चड़ि, आधार की लकड़ी, पन्याइ तथा की छत की रस्सियों से लटका "ड्यूक' होता है।

पनचक्की निर्माण के लिए सर्वप्रथम नदी के किनारे किसी उपयुक्त स्थान तक गूल द्वारा पानी पहुँचाया जाता है। उस पानी को फिर ऊँचाई से लगभग 45 डिग्री के कोण पर स्थापित लकड़ी के नीलादार पनाले में प्रवाहित किया जाता है, इससे पानी में तीव्र वेग उत्पन्न हो जाता है। पनाले के मूँह पर बाँस की जाली लगी रहती है, उससे पानी में बहकर आने वाली घास-पात या लकड़ी वहीं अटक जाती है। गूल को स्थानीय बोली में "बान' भी कहा जाता है। पनाले को पत्थर की दीवार पर टिकाया जाता है। गूल के पानी को तोड़ने के लिए पनाले के पास ही पत्थर या लकड़ी की एक तख्ती भी होती है, जिसे "मुँअर' कहते हैं। इसे पानी की विपरीत दिशा में लगाकर जब चाहे पनाले में प्रवाहित कर दिया जाता है या पनाले में पानी का प्रवाह रोककर गूल तोड़ दी जाती है। "पनाला' प्राय: ऐसी लक़ड़ी का बनाया जाता है, जो पानी में शीघ्र सड़े-गले नहीं। स्थानीय उपलब्धता के आधार पर पनाले की लकड़ी चीड़, जामुन, साल (Shoera robusta ), बाँस, सानड़ (Ougeinia oojennesis ), बैंस, जैथल आदि किसी की भी हो सकती है। पनाले की नाली इस तरह काटी जाती है कि बाहर की ओर निचे का सिरा संकरा तथा भीतरी ओर गोल गहराई लिए हुए हो। पनाले का गूल पर स्थित सिरा चौड़ा और नीचे का सिरा सँकरा होता है। सामान्यत: पनाले की लंबाई 15-16 फीट होती है और गोलाई लगभग 2 फीट तक होती है, परन्तु नाम घट-बढ़ भी सकती है। पनाले गाँव के लोग सामूहिक रुप से जंगल से पनचक्की के स्थल तक लाते हैं।

फितौड़ा लकड़ी का ऐसा ठोस टुकड़ा होता है, जो बीच में उभरा रहता है और दोनों सिरों पर कम चौड़ होता है। इसका निचला सिरा अपेक्षाकृत अधिक नुकीला होता है, जिस पर लोहे की कील लगी होती है। यह कील आधार पटरे के मध्य में रखे लोहे के गुटके या चकमक पत्थर के बने ताल पर टिका रहता है। इन दोनों को समवेत् रुप से ताल काँटा कहा जाता है। तालकाँटे को कही "मैनपाटी' भी कहा जाता है। फितौड़ा प्राय: सानड़, साल, जामुन, साज (Terrninalia alata ) की लकड़ी का बना होता है। आधार पटरा प्राय: साल या सानड़ की लकड़ी का होता है। "तालकाँटे' की कहीं मैणपाटी भी कहते हैं। फितौड़े के गोलाई वाले मध्य भाग में खाँचों में लकड़ी के पाँच, सात, नौ या ग्यारह पंखे लगे रहते हैं। इनकी लंबाई 1-1 /4 फीट तथा चौड़ाई 3 /4 फीट तक होती है। पंखों की लंबाई-चौड़ाई ऊपरी चक्के के वजन और फितौड़े के आकार-प्रकार पर निर्भर करती है। पंखों को "फिरंग' कहा जाता है। पंखों में प्राय: चीड़ या साल की छड़ फँसाई जाती है, जो निचले चक्के के छेद से होती हुई ऊपरी चक्के के खाँचे में फिर लोहे की खपच्ची (क्वेलार) में फँसाई जाती है, निचले चक्के में स्थिति छेद में लकड़ी के गुटके को अच्छी तरह कील दिया जाता है, जिससे मडुवा आदि महीन अनाज छिद्रों से छिर न सके। लोहे की इस छड़ को "बी' कहा जाता है। आधार के पटरे को पत्थरों से अच्छी तरह से दबा दिया जाता है, जिससे वह हिले नहीं। आधार पटरे के एक सिरे को दीवार से दबा कर दूसरे सिरे पर साज या साल की मजबूत लकड़ी फँसा कर दो मंजिलें तक पहुँचाई जाती है, जहाँ उस पर एक हत्था लगाया जाता है। इसे "औक्यूड़' कहते हैं। औक्यूड़ का अर्थ है - उठाने की कल। औक्यूड़ को उठाने के लिए लकड़ी की पत्ती प्रयोग में लाई जाती है, जो सिरे की ओर पतली तथा पीछे की ओर मोटी होती है। इस पर भी हत्था बना रहता है। औक्यूड़ उठाने से घराट का ऊपरी चक्का निचले चक्के से थोड़ा उठ जाता है, जिससे आटा मोटा पिसता है। औक्यूड़ को बिठा दिया जाए, तो आटा महीन पिसने लगता है। औक्यूड़ की सहायता से आटा मोटा या महीन किया जाता है। दुमंजिले में "बी' को बीच में रख कर निचला चक्का स्थापित किया जाता है। निचले चक्के (तवौटी पाटि) को स्थिर कर दिया जाता है। फिर निचले चक्के के ऊपर ऊपरी चक्का रखा जाता है। इसी ऊपरी चक्के के खांचे में फंसी लोहे की खपच्ची को फितौड़ से ऊपर निकली लोहे की छड़ की नोक पर टिकाया जाता है। ऊपरी चक्के को "मथरौटि पाटि' कहा जाता है। ये चक्के पिथौरागढ़ जनपद के बौराणी नामक स्थान के सर्वोत्तम माने जाते हैं, जो घिसते कम हैं और टिकाऊ भी होते हैं। इन्हें निर्मित करने में बौराणी के कारीगर सिद्धहस्त माने जाते हैं। चक्की को भी गांव वाले सामूहिक रुप से पनचक्की स्थल तक लाते हैं। ऊपरी चक्के पर अलंकरण भी रहता है। बौराणी के चक्के उपलब्ध न होने पर स्थानीय टिकाऊ व कठोर पत्थरों के भी कई लोग चक्के बनाते हैं।

ऊपरी चक्के से लगभग दो-ढाई इंच छत में बँधी भांग (cannabis Sativa),रामबांस (Agaveamericana ) या बाबिल (Eulalipsis binata ) की रस्सियों की सहायता से किंरगाल (Chimnobambusa faicata and C. jaunsarenisis ) का "डोका' बनाया जाता है। यह किसी पेड़ के तने का शंक्वाकर खोखल का भी हो सकता है, जो उल्टा लटका रहता है, अब यह तख्तों से बॉक्स के आकार का भी बनने लगा है। इस डोके के निचले संकरे सिरे पर एक "पन्याइ' या "मानी' लगी रहती है। यह आगे की ओर नालीनुमा मुख वाली होती है। मानी डोके में डाले गए अनाज को एकाएक नीचे गिरने से रोकती है। इस मानी के मुखड़े की ओर से पीछे की ओर नाली लगभग 25 अंश से 30 अंश का कोण बनाती हुई काटी जाती है। यह मानी या पन्याइ गेठी (Boehmeria regulosa ) जामुन, बाँज आदि की बनी होती है। मानी की नाली से अनाज की धार को नियंत्रित करने के लिए कभी गीले आटे का भी लेप उसके मुँह पर लगा दिया जाता है। इस मानी या पन्याइ के पीछे की ओर छेद करके उसमें कटूँज (Castanopsis tribuloides ) बाँज या फँयाट (Quercxus glauce ) की तिरछी लकड़ी फँसा दी जाती है। यह लकड़ी मानी और डोके का संतुलन बनाए रखती है। आवश्यकता पड़ने पर इस तिरछे डंडे पर रस्सी बाँध कर मुँह को ऊपरी चक्के में बने छेद के ठीक ऊपर रखा जाता है। जिससे अनाज के दाने चक्के के पाट के भीतर ही पड़े, बाहर न बिखरें। डोके और मानी की रस्सियों पर गाँठे लगी रहती हैं। इनमें लकड़ी फँसाकर आवश्यकतानुरुप डोके व मानी को आगे-पीछे कर स्थिर कर दिया जाता है। इस तिरछे डंडे पर एक या एकाधिक पक्षी के आकार के लकड़ी के टुकड़े इस प्रकार लगाए जाते हैं कि उनका निचला सिरा चक्के के ऊपरी पाट को निरन्तर छूता रहे। इन्हें "चड़ी' कहा जाता है, क्योंकि ये चक्के के ऊपरी पाट पर सदा चढ़ी रहती है। ये चड़ियाँ चक्के के घूमते ही मानी और डोके को हिलाती है, अनाज के दाने मानी की धार से चक्की में गिरने लगते हैं और चक्की अन्न के दानों को आटे में परिणत कर देती है।

पानी से चलने वाले इस पूरे संयंत्र को "घट', "घराट' या "पनचक्की' कहते हैं। घराट को वर्षा या धूप से बचाने के लिए उसके बाहर 10 से 16 फीट तक लंबा तथा 6 से 10 फीट तक चौड़ा एक कमरा बना दिया जाता है। रात में आदमी वहाँ सो भी सकते हैं। पर्वतीय क्षेत्र में पानी की माप "घट' या "घराट' से मापी जाती है जैसे - इस नदी में इतने "घट' पानी है।

ये घराट प्राय: गाँवों की सामूहिक सम्पत्ति होते हैं। घराट की गूलों से सिंचाई का कार्य भी होता है। यह एक प्रदूषण से रहित परम्परागत प्रौद्यौगिकी है। इसे जल संसाधन का एक प्राचीन एवं समुन्नत उपयोग कहा जा सकता है। आजकल बिजली या डीजल से चलने वाली चक्कियों के कारण कई घराट बंद हो गए हैं और कुछ बंद होने के कगार पर हैं।

इसी प्रकार हथचक्की भी एक प्रकार पनचक्की का छोटा रुप है, जो हाथ से चलाई जाती है। हथचक्की का प्रचलन पानी की कमी वाली जगहों पर प्राय: किया जाता है। इसमें चीड़ और बाँज की लकड़ी का अधिक प्रयोग किया जाता है। "दवनी', "घाडू' एवं "सिलबट्ट' दालों की दलने के काम में आते हैं।

ओखली/ओखल/उखव

ओखली एक अति प्राचीन प्रौद्यौगिकी है। इसमें मूसल की सहायता से प्राय: छिकलेदार अन्न कूटा जाता है। ओखली में प्राय: धान (oryza sativa) मडुवा (Eleusine coracana),जौ (Hordeum vulgare ), बाजरा (sorghum vulgare), गेहूँ (Triticum aestivum ), मादिरा (Echinochloa frumentacea ), आदि कूटा जाता है। इसमें अन्य वस्तुएँ भी कूटी जाती है। पशुओं के लिए बिच्छू घास (Urtica parviflora ) आदि चारा भी ओखली में कूटा जाता है। कई प्रकार के तिलहनों को भी ओखली में कूट कर उनसे तेल निकाला जाता है। ओखली प्राय: प्रत्येक घर-आँगन में खुले स्थान पर होती है। प्रत्येक गाँव में एक या एकाधिक छतयुक्त ओखलियाँ भी होती है। एक कमरे के भीतर कभी-कभी दो-दो ओखलियाँ होती है। इन कमरों की लम्बाई-चौड़ाई लगभग 8x 6 फीट होती है। धूप और वर्षा में इन्ही ओखलियों में धान आदि कूटे जाते हैं। इस कमरे वाली ओखली को "ओखलसारी' कहा जाता है। ये ओखलसारियाँ सामूहिक और व्यक्तिगत दोनों प्रकार की होती हैं।

कुमाऊँ में मुख्यत: दो प्रकार की ओखलियाँ पाई जाती है –

(1) पैडल वाली ओखली और (2) सादी ओखली।

(1) पैडल वाली ओखली - ओखली किसी कठोर पत्थर अथवा बाँज या सानड़ के गिल्टे में बीच में 7 से 10 इंच की गहराई का ऊपर की ओर चौड़ा एवं नीचे की ओर संकरा गड्डा बना कर निर्मित की जाती है। पत्थर की ओखली का वजन 1-1/2 मन से अधिक होता है। यह गड्डा किसी चौकोर पत्थर पर बनाया जाता है। ओखली को निर्धारित स्थान पर भूमि के अन्दर गाढ़ दिया जाता है। ओखली के चारों ओर पटाल (स्लेट) बिछा दिए जाते हैं। पैडल वाली ओखली में लकड़ी की ओखली सुविधाजनक रहती है। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भी ले जाया जा सकता है, पर पत्थर की ओखली में चीजें कूटने के लिए पैडल को अलग-अलग ओखलियों में ले जाना पड़ता है। इस ओखली में मूसल का ऊपरी सिरा एक लंबी लकड़ी में फँसाया जाता है। इस लंबी लकड़ी को आधार की दो तख्तियों के सहारे टिका कर इसके दूसरे सिरे को पैडल से जोड़ दिया जाता है। लकड़ी हिले-डुले नहीं, इसलिए आधार की तख्तियों के ऊपर एक तिरछी लकड़ी तथा उसके ऊपर लंबी लकड़ी को ढकती हुई लकड़ी के गुटकों की बाढ़ लगा दी जाती है। इनमें प्राय: तंग (Rhus parviflora ), साज (Terminalia alata ), हरड़(Tchebula), तुन(Shorea robusta ), सानड़ (ougeinia oojeinensis) की लकड़ी प्रयोग में लाई जाती है। इसका मूसल लंबोतरा अंडाकार व भारी होता है। पैडल के दूसरे सिरे पर उसकी दूरी इतनी होती है कि पैडल दबते ही वह उठ कर ठीक ओखली में पड़े। इस मूसल के निचले सिरे पर लोहे का छल्ला लगा रहता है, जो अनाज की भूसी निकालने में सहायक होता है, ओखली को उठाने के लिए ये आधार की तख्तियाँ, तिरछी लकड़ी और उनसे जुड़ी लंबी लकड़ी व पैडल लीवर का काम करते हैं। पैडल वाली ओखली में कम ताकत लगती है। इस पैडल को पाँवों से चलाया जा सकता है। पैडल वाली ओखली का प्रयोग अल्मोड़ा के लमगड़ा क्षेत्र में प्रचलित है, किन्तु अब इस ओखली का प्रचलन नहीं के बराबर है, मूसल साल (shorea robusta ) खैर (Acacia catecchr ), बाँज (Quercus glauca ) आदि किसी भी भारी लकड़ी का बनाया जाता है।

(2) सादी ओखली - इसमें ओखली स्थिर और प्राय: पत्थर की होती है, पर मूसल पैडल वाला लंबोतरा अंडाकर और छोटा ने होकर लंबा होता है। इसकी गोलाई लगभग 4 से 8 इंच तथा लंबाई औसतन 5 से लेकर 6 1/2 फीट तक होती है। बच्चों के मूसल छोटे व हल्के होते हैं। मूसल को बीच से दोनों हाथों के बल ओखली में मारा जाता है। ये मूसल बीच में हत्थे की जगह पतले व सिरों की ओर मोटे होते हैं। मूसल के निचले सिरे में कभी-कभी लोहे की कीलें लगा दी जाती हैं, जिन्हें दाँत कहते हैं। इन मूसलों के निचले सिरों पर लोहे के छल्ले लगे होते हैं, जिन्हें "सौपा' कहते हैं, इनसे भूसा निकलने में मदद मिलती है।

ओखली में मुख्यत: धान कूटे जाते हैं। धान प्राय: गाँव की महिलाएँ कूटती हैं। मूसल से वे ओखली में धानों पर प्रहार करती हुई, पाँवों से बिखरते धानों को समेट कर ओखली में भी डालती जाती हैं। कभी-कभी दो महिलाएँ एक साथ क्रम-क्रम से ओखली में मूसल से प्रहार करती हुई धान कूटती हैं। इसे "दोरसारी' कहा जाता है। आधुनिक युग में धनकुट्टियों के प्रचलन के बाद बी कूटने की यह प्राचीन पारम्परिक तकनीक कुमाऊँ के ग्रामीण क्षेत्रों में यथावत् जीवित है। कुमाऊँ में यत्र-तत्र चट्टानों या बड़े पत्थरों में ओखलियाँ खुदी हुई मिलती हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि कभी इन ओखलियों के आसपास मानव बस्तियाँ रही होंगी। दीपावली के दिन ओखली और जाँतर में दिए जलाए जाते हैं और इनकी पूजा की जाती है, इन पर ऐपण डाले जाते हैं।

तेल का कोल्हू

कुमाउनी में कोल्हू के लिए "कोलु' या कोलू शब्द प्रचलित है। जिस स्थान पर कोल्हू जुता रहता है, उसे "कोल्यूड़' कहा जाता है। हर गाँव में या दो - एक गाँवों के बीच गाँव का एक कोल्हू अवश्य होता है, जिसमें गाँव वाले विभिन्न प्रकार के तिलहनों को पेरते हैं। तिलहनों में सरसों (Brassica campeatris var sarson ), तिल, भंगीरा (perilla frutescents ) पीली सरसों, लाही, अलसी आदि का तेल निकाला जाता है। इसके अतिरिक्त च्यूरा, अखरोट, खुबानी, आडू, भांग आदि के बीजों से भी तेल निकाला जाता है। तेल के कोल्हू में डेढ़ से दो फीट चौड़ी और चार से पाँच फीट तक लंबी तथा 3 से 4 फीट मोटी आधार की वजनदार तख्ती स्थापित की जाती है, इसे "घानि' या "घाचि' कहा जाता है। इस आयताकार घानि में चारों ओर लगभग 1/2 इंच की बाड़ बनी रहती है तथा बीच में ओखली बनी रहती है। ओखली के तले में एक संकरा छेद होता है इसे मजबूत पत्थरों पर टिका दिया जाता है, जिससे यह हिले-डुले नहीं। इस तख्ती के नीचे की कुछ जमीन खोद कर चूल्हानुमा जगह बनाई जाती है, जहाँ बर्तन रखा जाता है, जिसमें तेल इकट्ठा होता है। घानी के नीचे टिन या लकड़ी का एक पतला पनेला लगा रहता है, जिसमें से तेल की धार नीचे रखे बर्तन में गिरती है। यह घानि जामुन, बौंज, फयाँट, फल्दा आदि किसी भी लकड़ी से बनाई जाती है। इस घानि के ओखलीनुमा छेद के खांचे में नीचे की ओर मोटा तथा ऊपर की ओर पतला लगभग 5 से 6 फीट लंबा खंभा स्थापित किया जाता है। इसे 'बी' या 'बियो' (स्तंभ) कहते है। बी की लकड़ी साल, बाँज, मेहल आदि किसी की भी हो सकती है। बी से एक आड़ी तथा कमर तक की ऊँचाई पर एक तिरछी लकड़ी जुड़ी रहती है। ये लकड़ियाँ 'बी' को संतुलित रखती है। बी का संतुलन सही बनाये रखने के लिए तिरछी व आड़ी लकड़ी में जोड़ कर पत्थर का भार रख दिया जाता है। जोड़ के कुछ बाहर की ओर निकला हुआ तिरछी लकड़ी का भाग हत्थे का काम करता है। तेल पेरने से पहले बीजों या तिलहनों को भली भाँति सुखा लिया जाता है। फिर सूखे बीजों को कोल्हू के ही पास बने चूल्हे की आँच में हल्का सा भून लिया जाता है। फिर इन भुने बीजों को घानि में डाला जाता है। कोल्हू पर बने हत्थे को गोलाई में घुमाते ही लकड़ी का बी (खंभा) घानि में घूमने लगता है और तेल की धार पनेले से होती हुई नीचे गिरने लगती है। तेल पैरने के लिए दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। एक कोल्हू घुमाता है और दूसरा तिलहन घाने में डालता जाता है। तिलहनों की पेरी हुई खली को कई-कई बार घाने में डाला जाता है, ताकि उसमें तेल शेष न रहे। खली को बीच-बीच में गरम भी किया है।

उस पर हल्का सा गरम पानी का छिड़काव भी बीच-बीच में किया जाता है। इस खली को कुमाउनी में 'पिन' कहा जाता है। यह खली कई रुपों में उपयोग में लाई जाती है। खली का उपयोग साबुन बनाने तथा पशुओं के खाद्य के रुप में होता है। च्यूरा की खली बिवाइयों पर लगाने से बिवाइयाँ ठीक हो जाती है। तिल और अखरोट की खली खाई भी जाती है। भाँग की खली की तरी बनती है। इस तरी को 'भंगज्वाव' (भांग का रस) कहा जाता है। नमक, मिर्च मसाले के साथ यह तरी बड़ी स्वादिष्ट होती है। इसकी तासीर गर्म होती है। भाँग की खली को छान कर उसका रस सब्जियों में भी डाला जाता है। भाँग की खली को छान कर उसका रस सब्जियों में भी डाला जाता है। भँगीरा की खली पशुओं के 'दामड़ी' रोग के उपचार में भी काम आती है।

तेल की पिराई दोपहर की धूप में अधिक उपयोगी होती है। कोल्हू द्वारा तेल पिराई का अर्थ अब समाप्तप्राय है। ग्रामीण क्षेत्रों में च्यूरा, अखरोट तथा तिलहनों आदि के बीजों से हाथ से भी तेल निकाला जाता है। च्यूरा के बीजों के छिलके पानी में उबाल कर भी निकाले जाते है। इन सूखे बीजों या तिलहनों को हल्की आँच में गरम कर ओखली या सिल पर कूट-पीस लिया जाता है। फिर लुग्दी को एक-दो घंटे कड़ाके की धूप में रखने के बाद उसे दोनों हथेलियों से दबा कर तेल निकाला जाता है। कभी इस लुग्दी को गरम पानी में डाल कर भी तेल प्राप्त किया जाता है। च्यूरा का तेल घी की भाँति उपयोग में लाया जाता है। इसे पशुओं से प्राप्त घी में भी मिलाया जाता है। इस तेल को 'च्यूरे का घी' कहा जाता है। इस च्यूरे के घी के पराठे अत्यधिक स्वादिष्ट होते है, इसलिए गाँववासी च्यूरे के पेड़ को घी का पेड़ भी कहते है। कम मात्रा में तेल निकालने के लिए यही विधि काम में लाई जाती है। च्यूरा से निकाला तेल स्वाद में तीता और कडुवा होता है। इसके तीतेपन को दूर करने के लिए लगभग 4 लीटर तेल में लगभग 750 मिलीलीटर मट्ठा डाल कर इस मिश्रण को तब तक उबाला जाता है, जब तक उसमें से मट्ठा उड़ न जाए, इस प्रक्रिया में बीच-बीच में बर्तन से झाग निकालते रहना पड़ता है। जब झाग आना पूरी तरह बंद हो जाता है, तो तेल चूल्हे से उतार लिया जाता है। इस तेल का स्वाद विशुद्ध घी की भाँति होता है। घी की ही भाँति यह दानेदार भी होता है। घी को साफ करने के लिए कभी गरम करते समय उसमें थोड़ा नमक भी डाल दिया जाता है।

गन्ने का कोल्हू

कुमाऊँ के कई घाटी क्षेत्रों में गन्ने (Saccharum officiarum ) की खेती भी की जाती है। पहले जब आवागमन के साधन कम थे, तब गन्ने की खेती का महत्व अधिक था। लोग अपनी आवश्यकता का गुड़, शीरा, खुदा (साफ शीरा, जो पिया भी जाता है) आदि घर पर ही बना लेते थे। गन्ने के कच्चे रस में चावल पका कर 'रसौट' नामक मीठा खाद्य बनता था। दो प्रकार का गुड़ बनाता था चिमड्या और ठिणक्या। ठिणक्या गुड़ खाँड की भाँति टूट जाता है। चिमड्या गुड़ की दो सेरी और ढाई सेरी भेलियाँ बनती थी, किन्तु अब पर्वतीय क्षेत्र में गन्ने की खेती भी लगभग समाप्तप्राय है।

कुमाऊँ में दो प्रकार के गन्ने के कोल्हू मिलते है-

(1) छोटा कोल्हू और (2) बड़ा कोल्हू।

(1) छोटा कोल्हू - इस कोल्हू में कल या बोलन तिरछी जोती जाती है। इनका भार कम और आकार लंबा बेलनाकार होता है। दो खंभों में बने खाँचों में फँसा कर उसे खंभे पर लगी चाबी से मजबूती से कस दिया जाता है। यह ऊपर की कल स्थिर रहती है। ऊपर की कल से सटा कर नीचे की कल भी लकड़ी के खंभे के खाँचों में फंसा दी जाती है। नीचे की कल के एक ओर काँटेदार घिर्री होती है, जो ऊपरी कल की घिर्री में फँसी रहती है। ऊपर की घिर्री का संबंध हत्थे से रहता है, जो उस ओर के खंभे से होकर बाहर निकला रहता है। निचली कल के नीचे दोनों खंभों के बीच में एक तिरछी लकड़ी उन्हें संतुलित रखती है। इस तिरछी लकड़ी के बीचोबीच एक चौड़े मुँह वाली टिन की कुप्पी लगी रहती है। उस कुप्पी के नीचे गन्ने का रस एकत्र करने हेतु एक बर्तन रखा जाता है। दोनों कलों के बीच गन्ना डाल कर हत्था घुमाने से निचली कल घूमने लगती है और गन्नों से रस निकल कर कुप्पी से होता हुआ बर्तन में इकट्ठा होने लगता है। कलों को कसने के लिए चाबी की सहायता ली जाती है। गन्नों को कलम की तरह काटा जाता है। जिससे कले उनके सिरों को पकड़ कसे। गन्ने मोटे होने की दशा में हाँसिए से उन्हें बीचोबीच चीर लिया जाता है। कम मात्रा में रस निकालने के लिए प्राय: छोटा कोल्हू उपयोग में लाया जाता है।

(2) बड़ा कोल्हू - इसकी कले भारी होती है और अपेक्षाकृत लंबाई में छोटी होती है। इसमें कलों को खड़े रख कर जोता जाता है। कोल्हू जोतने के लिए पहले जमान पर साल या बाँज की लकड़ी के दो मजबूत चौकोर खंभे गाड़े जाते है। इन खंभों के बीच में एक चौकोर तिरछी लकड़ी फँसाई जाती है। इसमें दोनों कलों के खाँचों में कलों को निचले भाग में रखा जाता है। कलों और लकड़ी के बीच में पान के पत्ते के आकार का एक पनालेदार टीन का पत्ता रखा जाता है, जिसकी धार के नीचे गन्ने का रस जमा करने का बड़ा बर्तन रखा जाता है। कलों के ऊपर एक छेदयुक्त चौकोर तिरछी कड़ी रखी जाती है। दोनों खड़े खंभों को अच्छी तरह कील दिया जाता है, जिससे कोल्हू हिले नही। इन खड़ी कलों को कसने के लिए एक ओर के खड़े खंभे पर चाबी बनी रहती है। एक कल के ऊपरी उठे भाग में बीच में छिद्रयुक्त यू रोमन (छ्) आकार के लोहे के टुकड़े को फँसाया जाता है। उसके ऊपर बीच में छेद वाली लम्बी तिरछी लकड़ी इस प्रकार रखी जाती है कि लोहे के यू आकार के दोनों सिरे उसमें अच्छी तरह फँस जाएँ। इस लकड़ी के दोनों ओर 15 से 20 व्यक्ति बल लगाकर जब उसे घुमाते है, तो दोनों कले घूमने लगती है। इन कलों के बीच में गन्ने फँसा कर उन्हें पेर लिया जाता है। सुरक्षा की दृष्टि से कलों के बाहर से दोनों खंभों पर बीच में छेदयुक्त एक लगभग 4 इंच चौड़ा लकड़ी का तख्ता ठोंक दिया जाता है। इसे 'पटका' कहते है, इसके बीच के छेद से एक व्यक्ति गन्ने कोल्हू में लगाता जाता है, बाकी लोग शीर्ष की तिरछी लकड़ी घुमाते जाते है, इस प्रकार एक कोल्हू में एक दिन में सात-आठ तौले (लगभग 50लीटर की माप का एक तौला होता है) गन्ने का रस निकल आता है। यह कोल्हू आकार-प्रकार में छोटा-बड़ा हो सकता है। आदमियों के स्थान पर कोल्हू में बैल भी जोते जाते है। बैल जोतने की दशा में शीर्ष की तिरछी लकड़ी से जुआ बाँधा जाता है, जिसे बैलों के कंधों पर रखा जाता है। पीछे से एक आदमी बैलों को हाँकता जाता है। गन्ना पेरने के बाद प्राप्त रस को कलघर (कोल्हूघर) में ले जाकर उबाला और पकाया जाता है। कलघर वस्तुत: गुड़ और शीरा बनाने की भट्टी होता है। इसमें आग जलाने के लिए एक नाली बनी होती है। इस आग की नाली के ऊपर एक साथ सात-आठ तौलों में रस ऊबाला जाता है। ये तौले ताँबे के बने होते है। उबाल आते समय इनमें से अलग-अलग छलनियों द्वारा झाग निकाला जाता है। गुड़ बनाने के लिए लकड़ियों के 'दाबलों' से रस के गाड़े हो जाने पर उसे लगातार घोटा जाता है। गुड़ तैयार होने की पाक का समय आते ही उसे लकड़ी की नाद में उलटकर भेलियों की शक्ल दे दी जाती है।

कुमाऊँ में तीन प्रकार का गन्ना पाया जाता है - 1. काला 2. सफेद और 3. पीला। काले व पीले गन्ने के तने मोटे होते है। काले गन्ने का रस व गुड़ थोड़ा फीका होता है। पीला गन्ना कम उगाया जाता है और प्राय: खाने के काम में लाया जाता है। इस 'पौठ्या' गन्ना कहते है। गुड़ प्राय: सफेद (देशी) गन्ने का ही बनता है। दीपावली के दिन गन्ने का तना काट कर पत्तों सहित मंदिर व द्वारा पर रशा जाता है। यह समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। दीपावली में गन्ने के तने (culm ) से लक्ष्मी की मूर्ति भी बनाई जाती है।

उपर्युक्त दोनों प्रकार के कोल्हुओं में मुख्यत: बाँज (Quercxux leucotrichophora and Q. glaucs, Q. semicarpifolia), साल (shorea robusta), सानड़ (Ougeinia oojeinensis ), हरड़ (Terminalia chebula), साज (Terminalia alata) , कटूँज आदि की लकड़ियाँ प्रयोग में लाई जाती (Castanopsis tribuloides) है।

ज्वाँत

यह लकड़ी से निर्मित एक यंत्र होता है। यह चूख (बड़ा नींबू- Citrus lirmon ), नींबू, जँभीरा (जामिर- Citrus sinensis ), माल्टा (Citrus hystrix ), संतरा (Citrus reticulata ), दाड़िम (Punica granatum ) आदि फलों से रस निकालने के काम आता है। इन खट्टे फलों का रस निकाल कर उसे गाढ़ा पका कर सुरक्षित कर लिया जाता है।

चूख, नींबू, जँभीरा, दाड़िम आदि का गाढ़ा पका रस 'चूख' कहा जाता है। पकने के बाद इस रस का रंग भूरा या गहरा काला हो जाता है। चूख बेमौसम में खटाई, चटनी, अचार आदि के प्रयोग में लाया जाता है। विभिन्न दालों, सब्जियों तथा मछलयों के सूप में भी चूख की थोड़ी मात्रा डाली जाती है। सादे नमक में चूख मिलाकर चटनी की भाँति इसका उपयोग होता है।

इस लकड़ी के यंत्र-ज्वाँत, को निर्मित करने के लिए भूमि पर सर्वप्रथम बाँज (Quercus leucotrichophor ), फयाँट (Q. glauca ) या किसी भी उपलब्ध लकड़ी के तीन पाये गाड़े जाते है। फिर दो खंभों पर एक तिरछी तख्ती रखी जाती है। इसके तख्ती के बीच में तीसरे पाये के ऊपर बाँज, साल, फयाँट या किसी अन्य उपलब्ध नालीनुमा लकड़ी को स्थापित किया जाता है। इस नालीनुमा लकड़ी के दोनों सिरे बंद होते है तथा इसके मध्य भाग में रस निकलने के लिए छेद बना होता है। इस छेद के ठीक नीचे रस जमा करने के लिए भूमि पर मिट्टी का घड़ा या कोई बर्तन रख दिया जाता है। इस तिखटी का आकार अंग्रेजी वर्णमाला के 'टी' (T) जैसा होता है। नालीदार लकड़ी के सिरे से एक हत्था जुड़ा रहता है, जो बीच में उभरा रहता है और ऊपर की ओर उठा रहता है। इस नाली में नींबू, माल्टा आदि के दाने काट कर डाले जाते है। हत्थे को दबाते ही फलों का रस नाली में बने छेद द्वारा बर्तन में गिरता है। लकड़ी में खुदी यह नाली छेद की ओर ढलवाँ होती है, जिससे रस नाली में नहीं अटकता है, छिलकों और बीजों से भर जाने पर नाली व छेद को साफ कर लिया जाता है। प्राप्त रस को उबाल कर गाढ़ा होने पर बोतलों में रख लिया जाता है।

रेशा उद्योग

कुमाऊँ में पुराने समय से ही भाँग (Cannabis stivs ), अल (Griardinia palmata) , भकुवा (grewia optiva ), उदाल, रामबाँस (Agava americana ), युका, (Yuca gloriosa ), बाबिल (Eulaliopsis binata ), मालू (Bauhinia bahloo ), मोथा (Cyperus sp. ), मूँज (Saccharum munja ), गेहूँ का नलौ (cilm of Whear Triticum aestivum ), धान का पुआल (Dry straw of Oryzastiva ), कुचि बाजुर वस्तुत: ज्वार (Pennisetum typhoides ) थाकल (Phoenix humilis ) आदि वनस्पतियों से रेशा प्राप्त किया जाता है, इन रेशों से दैनिक उपयोग में आने वाली चीजें जैसे- रस्सियाँ, बोरे, कुथले, ज्यौड़, गल्याँ (जानवरों को बाँधने वाली रस्सियाँ), मौले, गादे, दरी, पट्टी, चटाई, कपड़े, थैलियाँ आदि निर्मित की जाती है। रस्सियाँ बनाने के लिए पहले बाबिल, भाँग आदि के रेशों को थोड़ी देर पानी में भिगो दिया जाता है। भाँग और अल के रेशों के बने बुदलों (कम्बलों), कुथलों एवं रस्सियों, धागों सुतलियों आदि की बहुत अधिक माँग थी। मछली पकड़ने के जाल तो केवल अल के ही बनाए जाते है। भाँग, बाबिल, रामबाँस आदि पतली रस्सियों से धान के पुआल तथा गेहूँ के नलौ (डंठलों) को बाँधकर फीड़े एवं चट्टाइयाँ निर्मित की जाती है। इन फीड़ों को पाली पछाऊँ क्षेत्र में मानिरा या 'मिनरा' कहा जाता था। (पाण्डे 126, 1937)। कही-कही पर मालू (bauhinia vahlii ) के छाल से बने डोरों से गेहूँ के नलौ (Clum ) के साथ हल्दी (Curcuma longa ) की सूखी पत्तियों को भी फौड़े में बाँधा जाता है। मोथा घास से मजबूत व सुन्दर फीड़ा (चटाई) बनाई जाती है, इसे भाँग या अन्य रेशों से बिना जाता है। मोथा घास की चटाई की मजबूती के लिए घास को काटकर उसके ऊपर गरम पानी डालते है, पानी के सूख जाने पर चटाई बुन लेते है। बाबिल घास के बहुत सुन्दर एवं टिकाऊ झाडू बनाए जाते है। कभी हत्थे की ओर बिनाई करके उसे कलात्मकता भी प्रदान की जाती है। झाडू बनने के बाद उसमें चावल के दाने डाले जाते है। इसके पीछे यह लोक मान्यता काम करती है कि यह झाडू सदा अनाज बटोरने के ही काम आये। इसके अलावा कुचिया बाजुर, थाकल, मूँज, सीक एवं पाती (Artemisia spp ) के सूखे डंठलों, चीड़ की पत्तियों (leaves of Pinus longifolia ) आदि से भी झाडू बनाया जाता है। रामबाँस के रेशों से मौले, हल्यूण व ज्यूड़ तथा बैलों के सिर पर लगाये जाने वाले फुन्दे भी बनाए जाते है। इसके अलावा पुराने फटे कपड़ों को भाँ के तागे से सिलकर उनके थैले या खोल बनाये जाते थे, जिनमें पुआल, सेमस (Bombax ceiba ) की रुई या पिरुल (Pinus needle ) भर कर गद्दे बनाए जाते थे।

बाँस और किंरगाल उद्योग

पर्वतीय जनपदों में बाँस और किंरगाल (Chimnobambusa Falcati, C jaunsarensis ) पर आधारित कुटीर उद्योग बहुत पहले से ही प्रचलित है। बाँस (Dendrocalamus strictus ) की अपेक्षा किंरगाल से बनी वस्तुएँ अधिक मजबूत व टिकाऊ होती है। इन दोनों से दैनिक एवं कृषि में काम आने वाली अनेक उपयोगी वस्तुएँ निर्मित की जाती है, जिनमें मोस्टा, डोका छापरी डाला, सोजा, टुपर, टोकरी, छत्यूर, कुरा, घुघि या मोड़, छत्री, डलिया, थलिया, पसौल्या, गोदा, पुतका, कंडी, सूपा, कच्यल, हुक्के की नली, दरवाजों व खिड़कियों के पर्दे (झिड़की), खोका, पिचकारी, औजारों के हत्थे, बाँसुरी आदि मुख्य है।

बाँस व किंरगाल से वस्तुएँ निर्मित करने से पहले जंगल से बाँस तथा किंरगाल काट लिया जाता है। इसके हरे पत्ते जानवरों को खिला दिए जाते है। डंठलों से छोटी टहनियाँ काट ली जाती है। प्राय: पाँच वर्ष से कम आयु के पौधों को नही काटा जाता है। सुखने से पहले डंठलों से छिलके उतार लिए जाते है। बाहरी छिलके उतारने के बाद भीतरी डंठलों की खपच्चियाँ उतारी जाती है। सूखी खपच्चियाँ अपेक्षाकृत सस्ती व घटिया मानी जाती है। सूखी खपच्चियों में लचीलापन बनाए रखने के लिए उन पर पानी तथआ गोसूत्र का छिड़काव किया जाता है। खपच्चियों के पतली पट्टियाँ तैयार हो जाने के बाद तानों-बानें के रुप में बुनाई करके वस्तु विशेष का आकार दे दिया जाता है। बाँस व किंरगाल से बनी अक्सर सभी वस्तुएँ इन्ही पौधों के बाहरी छलके व डंठलों की खपच्चियों से बनाई जाती है, परन्तु इनमें मोड़ (घुघि) में बाँस या किंरगाल के अलावा जालीदार बुनाइयों के बीच मालू की पत्तियाँ या भोजपत्र की छाल के टुकड़े लगाए जाते है।

ऊनी वस्त्र निर्माण

कुमाऊँ के सीमावर्ती क्षेत्रों में प्राचीन काल से भेड़ पालन का कार्य होता आया है, भेड़ों से प्राप्त ऊन से दस्तकारी एवं ऊनी वस्र निर्माण का कार्य जुड़ा है। भेड़ों के बालों को कैंची से काटकर ऊन एकत्र किया जाता है, फिर ऊन को भली भाँति धोकर सुखा लिया जाता है, सूखे ऊन को तारों के दाँतों वाली पट्टियों से साफ किया जाता है। फिर साफ किए गए ऊन को तकली तथा चरखे से भिन्न-भिन्न मोटाई के तागों में आवश्यकतानुसार कात कर गोले बना लिए जाते है। भारत-तिब्बत मार्ग जब व्यापार के लिए खुला था, तब तिब्बत से पर्याप्त मात्रा में ऊन का आयात होता था। आजकल लुधियाना आदि मैदानी भागों से ऊन की आपूर्ति होती है। भिन्न-भिन्न मोटाई के तागों को राँच तथा अड्डों की सहायता से तानो-बानों के रुप में बुनाई करके कालीन, पश्मीना, कंबल, पंखी, चुटका, दन, थुलमा, गुदमा, डौटी, शाल आदि ऊनी वस्र निर्मित किए जाते है।

1. अड्डा द्वारा बुनाई

दन (कालीन) तथा आसन बुनने के लिए अड्डों का उपयोग होता है। अड्डा वस्तुत: लकड़ियों (बल्लियों) का आयताकार या वर्गाकार चौखट होता है। इसकी लंबाई-चौड़ाई सामान्यत: 6-1/2X 4-1/2 फीट होती है, किन्तु यह इससे छोटा-बड़ा भी हो सकता है। इसमें दो तिरछी बल्लियों के ऊपर दो खंभे स्थाई रुप से गढ़े होते है। दो तिरछी बल्लियों के आधार पर दोनों के ऊपर बैठने के लिए खाँचों पर एक बल्ली का टुकड़ा रखा रहता है। जमीन से 4 अंगुल ऊपर दोनों खड़े खंभों के खाँचों में एक षट्कोणात्मक रुप में गोल लकड़ी फँसी रहती है। इसमें लम्बवत् छेद बने रहते है, जिनमें रस्सियाँ डालकर उसे घुमाते या कसते है। इस लकड़ी के दोनों ओर से दो-दो तागों के खड़े ताने ठीक ऐसे ही खंभों के ऊपर लकड़ी पर फँसे रहते है। एक गोल डंडे से इन तागों के कस दिया जाता है, कसावट जितनी अधिक होती है, बुनाई उतनी अधिक आती है। इन तानों के बीच में किंरगाल का एक बीच से फटा डंडा व सूत फँसा रहता है। इससे नीचे प्रत्येक ताने से फँसा कर एक बाना भी किंरगाल के पतले डंडे पर लिपटा रहता है, जो ऊपर-नीचे किया जाता है। इसमें बानों के तागे फँसा कर बुनाई पर बाहर लगभग 1 या 1-1/4 से.मी. झुलाया जाता है। ग्राफ पेपर सामने रखकर कालीन में तदनुरुप डिजाइन बनाया जाता है। लोहे के बने पंजे में लोहे के मुड़े हुए दाँत लगे होते है। 3-4 इंच बुनाई हो जाने पर लटके हुए ऊन के तागों को खुक्यार (उल्टी धार वाली छोटी हँसिया) से काट दिया जाता है। ऊन की कटाई को बराबर करने के लिए लोहे की चिमटीनुमा कैंची दोनों हाथों से ऊन पर चलाई जाती है। इससे ऊन बराबर में कटता है तथा उसमें सफाई आती है। इस विधि से कुछ थुलमा भी अड्डे में बुनते है। थुलमे में चार बाने सूत तथा एक बाना मोटे ऊन को क्रम से रखकर बुनाई की जाती है। पर अड्डे में दन व आसन ही अधिकतर बुने जाते है। कुछ लोग ऊन के तागे की कताई और रंगाई भी स्वयं करते है, किन्तु अधिकांशत: अब कता व रंगा तागा प्रयोग में लाया जाने लगा है। एक 6फीट लंबा 4फीट चौड़ा दन बनने में लगभग 10 से 15 दिन तक लग जाते है। कालीन (दन) में इच्छानुरुप कलात्मकता लाने के लिए विविध प्रकार के रंगों का प्रयोग किया जाता है। एक आसन सामान्यत: 1-1/2X 1-1/2फीट तथा सोफे की लम्बाई-चौड़ाई, 5X 1-1/2फीट का होता है। इसे बुनने के लिए छोटे या कम चौड़े अड्डे से ही काम चल जाता है। माँग व आवश्यकतानुसार कालीन या दन आकार-प्रकार में छोटे-बड़े भी हो सकते है। धारचूला और मुनस्यारी में कालीन निर्माण की अलग-अलग शैलियाँ है।

2. राँच द्वारा बुनाई

राँच भी अड्डे के समान ही बुनाई की लकड़ी की एक मशीन है। कुमाऊँ क्षेत्र में दो प्रकार के राँच देखने को मिलते है- 1. विशुद्ध परंपरागत राँच तथा 2. परिवर्धित राँच को बुनाई की मशीन भी कहा जाता है। यह प्राय: उद्योग केन्द्रों या बुनकर केन्द्रों में उपयोग में लाया जाता है।

सुदूर ग्रामीण अंचलों में परंपरागत राँच ही बुनाई में उपयोग में लाया जाता है। यह लकड़ी के चार या छ: खंभों पर टिका लगभग 5 से 6फीट चौड़ा तथा 6 से 12फीट लंबा चौखटा या छ: खटा होता है। इसमें बीच में फँसी दो या अधिक गोल ##ंगिाल की लकड़ियों में तानों को लपेटकर लम्बाई में दुहरे कर फैलाते है। फिर एक-एक ताना छोड़कर बाना फँसाया जाता है। ताना बाने के रेशे के ऊपर एक नीचे क्रम-क्रम से फँसता है। फिर लकड़ी की या लोहे की कैंची से बानों को कस कर दबा देते है। तानों-बानों को फटकारने या दुरस्त करने के लिए लकड़ी के चौखट की चौड़ाई के बराबर लम्बे पट्टे काम में लाये जाते है। कभी बानों को कसने के लिए सारे तानों को समेटकर कमर पर लपेटकर पीछे की ओर जोर लगाकर खींचा जाता है। अलग-अलग आकार-प्रकार के वस्र बुनने के लिए अलग-अलग आकार व नाप के राँचों का उपयोग किया जाता है। राँच में कम्बल, थुलमा, पट्टू, चुटका, कालीन, पंखी, पश्मीना (शाल) आदि वस्र बुने जाते है।

परिस्कृत राँच का चौखटा लगभग 6फीट चौड़ा, 6फीट लम्बा तथा 6फीट ऊँचा रहता है। यह इस नाप से छोटा-बड़ा भी हो सकता है। इसकी लंबाई व गोलाई (ऊँचाई) में ताने बिछे रहते है। ये ताने मध्य भाग में लगभग 1-1/2फीट की ऊँचाई पर 2 से 4 बत्तों पर लिपटे हुए तागों में फँसे रहते है। प्रत्येक बत्ते पर एक घिर्री रहती है, जिससे बानों का तागा तानों में फँसता जाता है। चौखटे पर बुनाई को कसने के लिए लकड़ी के पट्टे व पेंच होते है, चौखटे के पृष्ठ भाग में कुर्सीनुमा बैठने का स्थान बना रहता है। कभी कुर्सी को अलग से रखकर भी बैठा जाता है। लकड़ी के ऊपरी बत्तों का संबंध नीचे पैडलों से होता है। मशीन में जितने बत्ते होते है, उतने ही पैडल होते है। पैडलों पर पाँव का दबाव पड़ते ही बत्तों द्वारा घिर्री का तागा बानों के रुप में तानों में फँस जाता है। सूत और ऊन के तागों का अलग-अलग वस्रों की बुनाई में भिन्न-भिन्न अनुपात रहता है। तागों को लपेटने के लिए लकड़ी की नलकियों का प्रयोग किया जाता है, तागे काटने के लिए खुक्यार या कैंची का प्रयोग किया जाता है। डिजाइन निकालने के लिए ग्राफ पेपर पर बने डिजाइन को सामने रखा जाता है।

दवाइयाँ बनाना

पर्वतीय क्षेत्रों में परंपरागत रुप से औषधीय वनस्पतियों से कई प्रकार की दवाइयाँ बनाई जाती है। फलों और बीजों से बनने वाली कुछ दवायों सुखाकर भी रखी जाती है। पत्तियों, फलों व बीजों को पीसकर कुछ दवायें ताजी भी प्रयोग में लाई जाती है। वैद्य दवाइयों को सिल-बट्टे र पीस या घिस कर या खरल में मूसली से कूट कर दवायें तैयार करते हैं। कुछ पेशेवर वैद्य दवाइयों को पहले से तैयार करके रखते है। दवाई के काम आने वाले पक्षियों के अण्डे गोबर से ढक कर सुरक्षित रखे जाते है। दवाई के काम आने वाला जानवरों का मांस धूप में सूखाकर या माला बनाकर सुरक्षित रखा जाता है। सींग आदि के छोटे-छोटे टुकड़े सुखाकर रखे जाते है। कुछ वनस्पतियों, उनके फलों और बीजों का चूर्ण बनाकर बोतलों या कपड़े में लपेटकर रखा जाता है।

पेड़-पौधों की प्रवर्द्धन विधियाँ

कुमाऊँ में पेड़-पौधों के प्रवर्द्धन की कई परंपरागत विधियाँ है। जिनमें निम्नलिखित प्रमुख है- 1. क्यारियाँ, 2. बिन (गीली क्यारी), 3. भूसा रोपण, 4. कलम रोपण, 5. दब्बा लगाना, 6. कशारोपण आदि। क्यारियाँ बिन एवं भूसा रोपण द्वारा प्रवर्द्धन मुख्यत: सब्जियों दालों आदि के लिए किया जाता है जबकि कलम रोपण, दब्बा लगाना एवं कशारोपण गन्ना, गुलाब, अप्रैलिया, बाड़ (त्र्ठ्ठेद्यद्धदृद्रण् ड़द्वेद्धड़ठ्ठेs) गुड़हल एवं विभिन्न फलदार पेड़-पौधों के लिए किया जाता है।

तम्बाकू निर्माण

कुछ समय पूर्व तक पहाड़ों में तम्बाकू की भी खेती की जाती थी। तम्बाकू की कलियों और कोमल पत्तियों को तोड़कर, उन्हे विशेष रुप से सैत-सुखाकर ओखली में कूटकर धूसा बनाया जाता था। इस धूसे में आवश्यकतानुरुप सीरा या गुड़ मिलाकर मीच लिया जाता था। अब बाजार में उपलब्ध तम्बाकू के अधिक प्रचलन के कारण तम्बाकू निर्माण समाप्ति की ओर है।

चारा इकट्ठा करने की विधि

पशुओं को विभिन्न प्रकार का चारा उपलब्ध करने के लिए अनेक प्रकार की विधियों से चारे को संरक्षित किया जाता है, जिससे बेमौसम भी पशु चारे से वंचित न रहे। चारा इकट्ठा करने के लिए निम्नलिखित विधियाँ अपनाई जाती है- 1. लूटा, 2. भराड़, 3. गोठ में चारा एकत्र करना। फसलों की मढ़ाई के बाद धान, कोदो, मादिर (Echinochloa frumentacea ), कौणी (Setaria glacuca ) आदि के पुआल को सुखाकर उसे गठ्ठरों में बाँधकर लकड़ी के खंभे के सहारे चारों ओर शंक्वाकार एकत्रित कर 'लूटा' बना लिया जाता है या जमीन में चार खंभे गाढ़कर उसमें चारे को एकत्रित कर संरक्षित कर लिया जाता है, इसे भराड़ कहते है।

साबुन निर्माण की विधियाँ

वर्तमान साबुन और डिटर्जेन्ट पाउडर के प्रचलन से पूर्व कुमाऊँ में परंपरागत रुप से विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों तथा उनके फलो, बीजों आदि से साबुन बनाया जाता था। यह नहाने, सिर धोने और कपड़ा धोने के काम में आता था। रीठा (Sapindus mukorossi),कुछ तैलीय पदार्थों- सरसों,च्यूरा (Diploknema butyracea ),तिल आदि की खली,तुन(Toona ciliata) के छिलकों की राख, चावलों का माँड बेसन, अटन (Parietaria deilis ), भौरड़ (Ipoea nil), भीमल (Grewi aoptiva ), रामबाँस (Agave ameriacana ), आँवला, कोदो के भूसे की राख और कभी-कभी मट्ठा आदि चीजे साबुन के रुप में प्रयोग की जाती थीं।

धूप निर्माण

कुमाऊँ में प्राचीन काल से ही पाती (Artemisia spp. ), सम्यौ (Valariana jatamansi and V vallichii ), नैर (Skimmia laureola ), गुग्गलु (Tenasutun longifolium ) के पौधों को धूप बनाने में प्रयोग किया जाता है। कुछ लोग धूप बनाते समय सुगंध के लिए गोला, जौ, तिल तथा मोरपंखी की पत्तियों को भी इसमें मिला देते थे।

नदी पार करना व तैराकी

प्राचीन काल में पुलों के अभाव में नदियों को पार करने के लिए लंबे लठ्ठों रस्सियों आदि की सहायता ली जाती थी। तैराकी के लिए चमघोड़ा और तुम्बी विधियाँ प्रचलित थीं।

(i) चमघोड़ा विधि से (भैंस के कटिया/कटरे की खाल से)- चमड़े का हवा भरा थैला बनाया जाता था। इसे चमघोड़ा कहा जाता था। इन घोड़ों को बगल में दबाकर नदी पार की जाती थी।

(ii) तुम्बी विधि (गोल लौकी या तुम्बियों)- को मजबूत डोरे से कमर में बाँधकर नदी पार करते थे।

(iii) झूला विधि

(iv) लकड़ी का पुल आदि साधन भी नदी पार करने में उपयोग में आते है।

आखेट की विधियाँ

कुमाऊँ में पशुओं, पक्षियों तथा जलचरों की आखेट की कई परंपरागत विधियाँ प्रचलित है। इन विधियों में गुलेल, वंशी, जाल, गोदा, सुर्का, मैड़, गड्ढा, जिबाला, चूहेदानी, धुँआ लगाना आदि आखेट के मुख्य साधन है। आखेट की अन परम्परागत विधियों में मुख्यत: बाँज (Auercus spp.), पय्याँ (Prunus Carasoides), घिंघारु (Pyracantha crenulata), अल (Girardinia palata), केला (Musa paracantha), cktjk (Pennisetum typhoides) , ज्वार (Sorghum vulgare), सैलिक्स (Salix sp.), रामबांस (Agave americacana), रवीना (Sapium insigne ) आदि पौधों का प्राय: उपयोग किया जाता है।

खेल सामग्री की निर्माण

कुमाऊँ में बाल मनोरंजन के लिए विविध प्रकार की खेल सामग्री भी परम्परागत रुप से निर्मित की जाती थी। आधुनिक खिलौनों के प्रचलन तथा खेलों के बदलते रुपों ने परंपरागत खेलों और खेल सामग्री को मैदान से बाहर कर दिया है। ये परम्परागत खेल कई प्रकार के है जैसे- झिटालू की बन्दूक, बाँस की पिचकारी, बाजा, पिपरी, गिल्ली-डंडा, घुर्रा या लट्टू, बाघ-बकरी की गोटें, गाड़ी, अडु, गट्टा या दानी, अंठी, दमुवे, बाल्ली, घुच्ची, राजा-रानी खेल आदि। इन परंपरागत खेलों में कई प्रकार की स्थानीय वनस्पतियाँ प्रयोग में लायी जाती है, जो इस प्रकार है- Princepia Utilis का तना, Leaves of Anaphalis Contorta, Culm of Dendrocalamus Strictus Strictus and Chimnobambusa Spp. and Phragmites karka, Seeds of Magifera indica nad Prunus persica Stem and bark of Pinus longifolia, Acorn of Quercus spp. seeds of Sapindis mukorossi, Musa paradisics, Stem of Quercus spp. etc.

कृषि तकनीकी

कुमाऊँ में तराई भावर की कृषि का तौर-तरीका प्रदेश के अन्य मैदानी क्षेत्रों की तरह का है, किन्तु कुमाऊँ हिमालय के पहाड़ी भागों में ज्यों-ज्यों ऊँचाई बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों खेती के तौर तरीकों में थोड़ी बहुत भिन्नता आ जाती है। घाटियों को छोड़कर सर्वत्र ढालूदार पहाड़ी सीढ़नुमा खेल मिलते है। इन सीढ़ीदार खेतों के किनारे मेढ़ बनाई जाती है। कृषि योग्य अधिकांश भूमि असिंचित है। पुराने समय में झूम खेती में आलू (Solanum tuberisum ) की खेती मुख्य रुप से की जाती थी। सिंचित भूमि पर रबी, खरीफ और जायद की फसल मुख्य रुप से ली जाती है। खरपतवार को नष्ट करने के लिए खेतों में चीड़ आदि की पत्तियाँ (Pine needles ) बिछाई जाती है, जिन्हें सूखने पर जला दिया जाता है। इसे 'आगज्याल' डालना कहते है, फसल बोने से काटने तक कई विधियाँ अपनाई जाती है, जैसे जुताई-बोआई, दनेला लगाना, गुड़ाई, निराई, कटाई, चुटाई/मड़ाई, आदि।

इसके अलावा एक साथ कई फसलें एक खेत से लेते है। तात्पर्य यह है कि यहाँ डपगमक बतवचचपदह का प्रचलन है। खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए खेतों को छ: माह के लिए खाली छोड़ देते है। ले हमेशा कम्पोस्ट या गोबर की खाद का ही प्रयोग किया करते थे (अब रासायनिक खाद भी प्रयोग करते है) तथा जिस खेत में दाल वाली फसलें बोते है, उस खेत में दूसरे साल दूसरी फलस बोते है। गूलों द्वारा पानी लाकर असिंचित भूमि को सिंचाई योग्य बनाया जाता है।

जलस्रोत एवं संचय की विधियाँ

पर्वतीय क्षेत्रों में फैले गाँव प्राय: नदियों, गाड़-गधरों के किनारे अवस्थित है। पानी के स्रोतों से दूर बसे गाँवों में सिंचाई तथा पेयजल सुविधा के लिए कई परम्परागत विधियाँ है, इनमें कुछ प्रमुख निम्न है -

  1. बड़ी गूले- (बड़ी गूल बनाते समय यदि कहीं खाई या नाला आए तो वहाँ चीड़ (Pinus iongigola ) या जामुन (Eugenia Jambolana ) के तने को नालीदार बनाकर पानी दूसरे छोर पर पहुँचाया जाता है।
  2. छोटी गूले- (इनमें भी प्राय: खाई या नाले आने की दशा में चीड़, जामुन या केले के पत्तों (Musa spp. ) की नलियाँ काम में लाई जाती हैं
  3. धारे
  4. नौले
  5. तालाब,
  6. चुपटौल आदि अन्य विधियाँ है, धारे के पास अधिकतर छायादार वृक्ष जैसे आम (Mangifera indica ), पीपल (Ficus religiosa ), बाँज (Quercus leuotrichophora ), काफल (Myrica esculenta ) च्यूरा (Diploknema butyracea ) आदि लगाए जाते है।

समय व मौसम विज्ञान संबंधी विश्वास

(क) समय आदि

पर्वतीय समाज के समय, कृषि, वर्षा तथा मौसम आदि के सम्बन्ध में जानकारी के लिए कोई वैज्ञानिक उपकरण नही मिलते है। विशेषकर मौसम का अनुमान विभिन्न प्रकार के लोक विश्वासों के आधार पर लगाया जाता है। लोक विश्वास लोगों के अनुभव सिद्ध ज्ञान पर आधूत होते है। अत: इनकी उपयोगिता लोक जीवन में विज्ञानवत् एवं निर्विवाद रहती है। इनमें प्रमुख लोक विश्वास निम्न है-

  1. घड़ियों के प्रचलन से पहले कुमाऊँ में ताँबे का समय मापक यंत्र 'जलघड़ी' का प्रयोग होता था। चारों पहरों में 64 घड़ियाँ होती है, घड़ी की गिनती प्रथम पहर से होती है।
  2. शुक्रतारे के क्षितिज पर प्रकट होने पर रात खुल जाती है।
  3. मुर्गा बाँग देने लगे तो रात खुलने का संकेत होता है।

(ब) मौसम आदि

  1. बाँज (Accipiter nisus ) पक्षी आकाश में उड़ते-उड़ते यदि एक स्थआन पर रुक जाए तो वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है।
  2. गौतार (Spus affinis ) पक्षियों की चहल-पहल बढ़ जाए, तो वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है।
  3. चींटियाँ अपनी बाँबी से अण्डों को लेकर एक कतार में बाहर निकले, तो वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है।
  4. पशु जंगल में पूँछ उठाकर भागने लगे, तो वर्षा का अनुमान लगाया जाता है।
  5. यदि चील (Gyps himlayensis ) आकाश में उड़ते-उड़ते "सरुल दिदी पाणि-पाणि" बोले और लमपूछिया (Cissa sp. ) पक्षी 'द्यो काका पाणि-पाणि' बोले तो वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है।
  6. आकाश में यदि इन्द्र-धनुष (धनौला) दिखलाई पड़े तो वर्षा रुकने का संकेत माना जाता है।
  7. पूर्व व उत्तर दिशा में बिजली चमके तो वर्षा होती है।
  8. कुछ विशेष प्रकार की दीमकें (धनपुतली) पंख लग जाने पर उड़ने लगती है, तो धानों की बुआई प्रारम्भ कर देनी चाहिए।
  9. पूस में बर्फ पड़ने पर गेहूँ की फसल चौपट हो जाती है, परन्तु माघ से बर्फ पड़ने पर गेहूँ की फसल अच्छी होती है।

मौन पालन की प्रचलित विधियाँ

पर्वतीय क्षेत्र की परम्परागत रुप से मौन पालन होता है। मधुमक्खियों के घरौंदे दो प्रकार से बनाए जाते है- (i) मकान की दीवारों में जाले (आले) बनाकर, (i i ) किसी पेड़ के तने को खोखला कर और उसे दोनों ओर से बन्द कर बॉक्सनुमा आकार देकर। आलों में बाहर की ओर मधुमक्खियों के आने-जाने के लिए छेद छोड़ देते है तथा भीतर की ओर व आले के छत पर अक्सर साल (Sjoers tobudya ), साज (Terminalia lalata ), चीड़ (Pinus longifolia ), जामुन (Eugenia jambolana ) की तख्ती लगाई जाती है। मधुमक्खियाँ आले के अन्दर डालने से पहले आले के अन्दर सम्यौ (Valerikia hatamansu और V. Wallichii ) की जड़ से बनी धूप को जला देते है। बॉक्स विधि में पेड़ के तने के खोखल में मधुमक्खियाँ डाल दी जाती है। फिर खोखल को दोनों ओर से चीड़ के तख्तों से बन्द कर देते है। इसे 'ढ़ाड़ा' कहा जाता है। ढाड़ा के बीचोबीच में मधुमक्खियों के आने-जाने के लिये दो छेद बने होते है, ढाड़ा प्राय: जामुन की लकड़ियों का बनाया जाता है।

चर्म उद्योग

पुराने समय में कुमाऊँ में चमड़े के शोधन, चमड़े के वस्तुओं के निर्माण तथा चमड़े की रंगाई का कार्य परम्परागत रुप से किया जाता था। मृत पशुओं की खालें निकालकर उन्हें पूरे फैलाव से जमीन में खींचकर लकड़ी की कीलें ठोकी जाती थी। चमड़े को कमाने तथा रंगाने के लिए पानी से भरे गड्ढों का प्रयोग किया जाता था। कई बार पानी में धोने, भिगोने, सुखाने तथा रंगने के बाद दो तीन माह में खाल चमड़े के रुप में उपयोग में आती थी। चमड़ा रंगने के लिए किलमोड़ा (Derderis Spp. ) और काफल (Myrica esculenta ) की छाल का घोल बनाकर चमड़े के एक ओर रगड़ा जाता था।

तैयार किया गया चमड़ा कई रुपों में प्रयोग किया जाता है। इस चमड़े से सन्दूक और कुछ वाद्य यंत्र सढ़े जाता है। सांभर के जूते बनाने के लिए खाल सुखाकर उसके भीतरी भाग पर सरसों का तेल या दही लगाया जाता था। कच्चे चमड़े से घोड़े की लगाम तथा रस्सियाँ बनाई जाती थीं, हुड़का वाद्य यंत्र पर लगाया जाने वाला चमड़ा बकरी के आमाशय से बनाया जाता है। ढोल, दमामा आदि का निर्माण मोटे चमड़े से किया जाता है। चमड़े के रुप में बैल, भैंस, बकरी आदि पशुओं की खाल का प्रयोग किया जाता है।

अन्य

इसके अतिरिक्त कुमाऊँ में काष्ठ उद्याग, लौह एवं ताम्र उद्योग, आभूषण निर्माण तथा मिट्टी के बर्तनों के निर्माण की भी कई परम्परागत पद्धतियाँ प्रचलित है। इनमें कई पारम्परिक पद्धतियाँ आज समाप्तप्राय हो गई है। समय के साथ-साथ आवश्यकताओं में वृद्धि तथआ आरामदायक ढंग से जीवन-यापर करने का प्रभाव ग्रामीण अंचलों में भी पड़, जिससे इन परम्परागत प्रौद्योगिकी पद्धतियों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। यदि समय रहते इनमें से उपयोगी विधियों को लघु एवं वृहद् उद्योगों के रुप में उन्नत तकनीक द्वारा विकसित और परिष्कृत कर संरक्षित न किया गया, तो यह प्राचीन तकनीकी ज्ञान इस क्षेत्र से सदा के लिए विलुप्त हो जायेगा।

अधुना पर्यावरण सन्तुलन बनाये रखने में सहायक जो पारम्परिक प्रौद्योगिकी तकनीक उपयोगी एवं लाभकारी सिद्ध हो सकती है, उन पद्धतियों को इस क्षेत्र की उपलब्ध खनिज तथा वन सम्पदा के आधार पर परिवर्धित कर कार्यसाधक बनाया जाय तथा उन्हें लघु एवं वृहद् उद्योगों के रुप में विकसित किया जाय। इस क्षेत्र के सम्यक् विकास की दृष्टि से ऐसा किया जाना अपरिहार्य है। इससे स्थानीय रुप से उपलब्ध कच्चे माल से सम्बन्धित लघु उद्योग धन्धों का विकास तो होगा ही, साथ ही हम प्रदूषण रहित पर्यावरण को जन्म दे पायेगें। इन लघु उद्योगों द्वारा निर्मित की गई विभिन्न वस्तुओं के विपणन की भई समुचित किया जाना नितान्त आवश्यक है। ये लघु तथा कुटीर उद्योग पर्वतीय क्षेत्र में व्याप्त बेरोजगारी को भी कुछ हद तक कम करने में कारगर सिद्ध होंगे।

स्त्रोत: डॉ. देवसिंह पोखरिया

(इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र द्वारा आयोजित संगोष्ठी में पढ़ा गया आलेख)

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