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अधिक उत्पादन हेतु उन्नतशील फसल प्रभेद

इस पृष्ठ में फसलों के अधिक उत्पादन हेतु उन्नतशील फसल प्रभेद की जानकारी दी गयी है।

परिचय

झारखण्ड राज्य में अनुसूचित जनजातियों अनुसूचित जातियाँ और पिछड़े वर्ग की जनसँख्या कुल आबादी का 60% है, जिनकी आर्थिक समृद्धि कृषि पर आधारित है। राज्य में कुल कृषि योग्य भूमि 80 लाख हेक्टेयर है जो की यहाँ पर रहने वाले कुल जनसँख्या को खाद्यान उपलब्ध कराने के लिए काफी नहीं है। पठारी भू-भाग, वर्षा आश्रित परम्परागत खेती कृषि को जीवन यापन साधन ही उपलब्ध करा सकती है, लेकिन आदिवासी कृषकों को उबरने के लिए या अधिक नहीं है। झारखण्ड राज्य की कुल कृषि भूमि मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजित है।  इनमें मुख्यतः टाड़, मध्यम जमीन तथा नीची जमीन है।  टाड़, जमीन में किसान मुख्यतः वर्षा पर आधारित कृषि कार्य करते हैं तथा इस जमीन की उपज क्षमता भी बहुत कम होती है जहाँ पर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है वहां पर जमीन किसान मध्यम तथा नीची जमीन में खेती करते हैं तथा इसकी उपज क्षमता टाड़, जमीन के मुकाबले अधिक होती है। झारखण्ड में फसल सघनता 110% है, अर्थात् यहाँ रबी में बहुत कम खेती का कार्य किया जाता है। ज्यादातर यहाँ खरीफ में धान, रागी, मक्का, उड़द, मूंग, अरहर, कुल्थी, मूंगफली, सरगुजा इत्यादि का उत्पादन किया जाता है। इसलिए उपरोक्त बातों को  ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए हमें विभिन्न फसलों के उन्नतशील प्रभेदों का उपयोग करना होगा, ताकि सीमित कृषि विश्वविद्यालय ने इस ओर कदम उठाते हुए विभिन्न फसलों में उन्नतशील प्रभेद विकसित किए हैं जिनको लगाने से न केवल गरीब किसानों की आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ होगी, बल्कि खाद्यान्न उत्पादन के मामले में भी हम आत्मनिर्भर हो सकेंगे। खरीफ तथा रबी में लगने वाले विभिन्न फसलों के उन्नतशील प्रभेदों के बारे में हम आगे विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे।

खरीफ

खरीफ में यहाँ लगने वाले मुख्य फसल धान, रागी, मक्का, उड़द,मूंग, अरहर, कुल्थी है। अब बारी-बारी से प्रत्येक फसल के उन्नतशील प्रभेद की जानकारी लेंगे।

धान:झारखण्ड राज्य की मुख्य फसल धान है। झारखण्ड के कुल 77 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से 18.२ लाख हेक्टेयर में धान की खेती की जाती है। इसमें टाड़, जमीन 7.29 लाख हेक्टेयर, मध्यम जमीन (दोन-3 और दोन-२) 6.29 लाख हेक्टेयर और नीची जमीन   (दोन-1) 4.81 लाख  हेक्टेयर है। टाड़, जमीन में जो कुल धान के क्षेत्रफल का लगभग 39% है। इसमें कम अवधि वाली प्रजातियों की खेती की जाती है। इसलिए हमें चाहिए कि काफी सोच-समझकर धान के उन्नतशील प्रभेद का चुनाव करें ताकि हमें अधिक से अधिक उत्पादन प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो सके।

ऊँची जमीन (टांड ऊँची जमीन में धान के वैसे प्रभेद का चुनाव करना चाहिए जो 80-95 दिन में पक कर तैयार हो जाएं. टांड में सिंचाई की सुविधा नहीं होती है और ज्यादातर वर्षा आधारित खेती ही की जाती है। इनमें से कुछ उन्नतशील प्रभेद इस प्रकार है:

किस्म

तैयार होने की अवधि (दिन)

उपज क्षमता (कि./हे.)

बिरसा धान 101

80-85

25-30

बिरसा धान 102

95-100

20-25

बिरसा धान 103

95-100

35-40

बिरसा धान 104

90-95

30-35

बिरसा धान 105

90-95

30-35

बिरसा धान 106

90-95

30-35

बिरसा धान 107

90-95

30-35

बिरसा धान 108

70-75

25-30

बिरसा विकास धान 109

85-90

30-35

बिरसा विकास  धान 110

90-95

30-35

बिरसा धान

85-90

25-30

वन्दना

90-95

30-35

कलिंगा

85-90

25-30

नरेन्द्र -97

95-100

35-90

मध्यम जमीन (दोन-3 एवं दोन-२) : मध्यम जमीन के खेतों में पानी कुछ दिन तक रहता है। यहाँ पर आवश्कतानुसार सिंचाई की भी व्यवस्था रहती है, इसलिए इस  जमीन में वैसे प्रभेद लगाना चाहिए जो लगभग 120-135 दिन में पक कर तैयार हो जाए। इनमें निम्नलिखित मुख्य प्रभेद है:

किस्म

तैयार होने की अवधि (दिन)

उपज क्षमता (कि./हे.)

आई.कर-36

120-125

40-45

बिरसा धान 201

115-120

30-35

राजेंद्र धान 202

130-135

40-45

आई.कर-64

120-125

40-45

बिरसा धान 202

120-125

35-40

सीता

130-140

45-45

कनक

130-140

55-60

बी.कर-9

145-150

30-35

बी.कर-10

145-150

30-35

पूसा बासमती

120-125

35-20

बासमती

130-135

30-35

बिरसामति

130-135

35-40

पी.एस.बी.-71

130-135

65-70

के.एच.कर.-२

125-130

50-60

नीचे जमीन (दोन-२): नीची जमीन में पानी की कोई समस्या नहीं होती है। इसलिए इसमें वैसे प्रभेद का चुनाव करना चाहिए जो लगभग 120- 135 दिन में पक कर तैयार हो जाए। इनमें निम्नलिखित मुख्य प्रभेद है:

किस्म

तैयार होने की अवधि (दिन)

उपज क्षमता (कि./हे.)

राजश्री

140-150

50-55

एम्.टी.यू- 7029

150-155

60-65

बी.पी.टी.-5204

145-150

55-60

आई.ई.टी.-5656

140-145

45-50

तुलसी

145-150

30-35

पूसा-44

130-140

55-60

रागी (मडुआ):धान के बाद राज्य में अधिक लगाई जाने वाली दूसरी फसल ‘रागी’  है जिसे लोग मडुआ के नाम से भी पुकारते हैं। इसकी खेती टांड जमीन पर की जाती है। सूखा पड़ने पर भी रागी कुछ-न कुछ उपज दे जाती है। जबकि टांड़ जमीन पर लगाई जाने वाली दूसरी फसल बिल्कुल  फेल हो जाती है। इसलिए रागी को ‘फेमिन क्रॉप’ भी कहा जाता है। कुछ वर्षों से खरीफ के मौसम में बराबर सूखाड़ की स्थिति के कारण किसान भाइयों ने टांड जमीन पर गोड़ा धान की जगह मडुआ की खेती शुरू कर दी है। इस क्षेत्र के लिए रागी की उपयुक्त प्रभेद निम्न है:

1) ए-404: 115-120 दिनों में तैयार होती है, इसकी औसत उपज 30 कि./हे. है।

2) बी.एम्-1 करीब 80 दिनों में तैयार होती है, इसकी औसत उपज 16 कि./हे. है। अगर मडुआ को काट कर कोई दूसरी फसल लगानी हो तभी इस प्रभेद को लगाना उपयोगी है।

3) बी.एम्-2 100-105 दिनों में तैयार होती है, इसकी औसत उपज 24 कि./हे. है।

गोंदली: गोंदली खरीफ में सवसे पहले कटने वाली फसल है। कभी इसकी खेती काफी होती थी पर इधर 10-15 वर्षों में इसकी खेती में काफी कमी आई है और अब जहां तहां पहाड़ों पर इसकी फसल दिखती है। जो किसान भाई गोंदली की खेती करते हैं या करना चाहते हैं वह बिरसा गोंदली -1 प्रभेद लगाकर अच्छी उपज ले सकते हैं यह प्रभेद 55-60 दिनों में तैयार होती है, इसकी औसत उपज 6 कि./हे. है।

मक्का: मक्का भी झारखण्ड राज्य में अधिक क्षेत्रफल में लगाई जाती है। मक्का के उन्नतशील प्रभेद निम्नलिखित है:

  1. सुआन कम्पोजिट-1: यह प्रभेद सिंचित अवस्था में खेती के लिए उपयुक्त है। इसकी उपज क्षमता 45-50 कि./हे. (खरीफ में) तथा 55-60 कि./हे. (रबी में) यह प्रभेद लगभग 100 दिन में पक कर तैयार हो जाती है।
  2. बिरसा मकई-1 यह 80-85 दिन में पक कर तैयार हो जाती है।45-50 कि./हे. (खरीफ में) तथा 50-55 कि./हे. (रबी में)
  3. बिरसा विकास मक्का-2 यह दिन में पक कर तैयार हो जाती है इसकी उपज क्षमता 45-50 कि./हे. है। यह रबी के लिए बहुत ही उपयुक्त प्रभेद है।

उरद: उरद एक महत्त्वपूर्ण दलहनी फसल है जो खरीफ में लगाया जाता है। इसके प्रमुख उन्नतशील प्रभेद टी-9, पन्त यू,-19 तथा बिरसा उरद है। प्रभेद 80 दिन में पक कर तैयार हो जाती है इन प्रभेदों की औसत उपज क्षमता 45-50 कि./हे. है।

मूंग: मूंग भी एक खरीफ दलहनी फसल है। इसके मुख्य प्रभेद सुनयना, पूसा विशाल, पी.एस.-16 पन्त मूंग-२ तथा के.8.15 है। यह प्रभेद लगाने के 60-65 दिन पश्चात पक कर तैयार हो जाती है इसकी  औसत उपज क्षमता 45-50 कि./हे. है।

कुल्थी: कुल्थी की उन्नतशील प्रभेद बिरसा कुल्थी-1, मधु तथा बी, कर-10 है कर.-65 इसके उन्नतशील प्रभेद है। जो लगभग 180-185 दिन में पक कर तैयार हो जाती है इसकी औसत उपज क्षमता 20 कि./हे. है।

मूंगफली: मूंगफली भी झारखण्ड राज्य की एक प्रमुख तेलहन फसल है। मूंगफली को तैयार होने के अवधि के अनुसार इसे मुख्यतः तीन भागों में बांटा गया है:

  1. आगत: अगात किस्म वाली उन्नतशील प्रभेद 100-105 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। आगात किस्म की प्रमुख ए.के 12-24, जे. एल.-24 (फुले प्रगति), जी.जी.-२ था टी.जी.-22 है। ए.ले 12-25 की उपज क्षमता 15-17कि./हे. हैं। फूलें प्रगति की क्षमता 12-24 कि./हे. तथा जी.जी.-२ था टी.जी.-22 है। ए.ले 12-25 की उपज क्षमता 22 -24 कि./हे. हैं।
  2. मध्य आगात: मध्य आगत वाली किस्म 115-120 दिन में पककर तैयार हो जाती है इनमें प्रमुख हैं:

किस्म

उपज क्षमता

बिरसा मूंगफली-1

22-24

बिरसा मूंगफली-२

25-30

बिरसा मूंगफली-3

25-30

बिरसा बोल्ड

25-30

इनमें बिरसा बोल्ड -1 निर्यात के लिए सर्वोत्तम प्रभेद है।

रबी झारखण्ड में रबी में लगने वाले प्रमुख फसल गेंहू, चना, तोरी-राई, तीसी मसूर इत्यादि है।

गेंहू: गेंहू की खेत रबी के मौसम में सिंचित तथा असिंचित दोनों अवस्था में की जाती है।

सिंचित अवस्था में समय पर बोआई

समय पर बोआई के लिए सिंचित अवस्था में प्रमुख उन्नतशील प्रभेदों में एच.डी.-2733, एच.यु.डब्लू-४६८. एच.डी.-240२, पी.वी.डब्लू,-३४३, के-0907, के.-8804 तथा एन.डब्ल्यू.-1012 प्रमुख हैं। इनकी औसत उपज क्षमता 35-40 किवंटल /हे. है।

असिंचित अवस्था में विलम्ब से बोआई

असिंचित  अवस्था में समय पर बोआई के लिए उन्नतशील प्रभेदों में सी.-306, के.-8027. एच. डी. कर.-77, के.-8962 प्रमुख हैं। इन प्रभेद की औसत उपज क्षमता 15-20 किवंटल /हे. है।

चना: झारखण्ड राज्य की रबी की मुख्य दलहनी फसल है। इसके प्रमुख उन्नत प्रभेद पन्त जी.-114, राधे, सी-२३5, बी.जी.-256, एवं एच.-208 प्रमुख है। एच.-208 असिंचित क्षेत्र एवं विलंब से बोआई के लिए उपयुक्त है। ये प्रभेद 135-145 दिनों में पककर तैयार हो जाते हैं तथा इनकी औसत उपज क्षमता 18-20 किवंटल /हे. है।

तोरी-राई: तोरी-राई एक तेलहनी फसल है। इनके उन्नतशील प्रभेद निम्नलिखित है -

 

तोरी

राई

किस्म

बी.कर.-23, टी.-9

शिवानी, वरुणा, पूसा बोल्ड, क्रांन्ति

उपज क्षमता

4-5 किवंटल /हे.

8-10 किवंटल /हे.

तीसी: झारखण्ड राज्य में तीसी के खेती तेलहन फसल के रूप में की जाती है। तीसी की प्रमुख श्वेता, शुभ्रा तथा टी-397 है। इन सब प्रभेदों की उपज क्षमता 7-8 किवंटल /हे. है।

मसूर: मसूर एक प्रमुख दलहनी फसल है। मसूर की प्रमुख प्रभेदों में बी.कर.-25, पी.एल.-639, पी.एल.-406, डी.पी.एल.-62 हैं। यह सारे प्रभेद 120-130 दिनों में पककर तैयार हो जाते हैं।

इस तरह से हम पाते हैं कि अगर किसान भाई विभिन्न फसलों के उन्नतशील प्रभेदों का चुनाव फसलोत्पादन में करें तो उन्हें प्रति हेक्टयेर अधिक से अधिक पैदावार मिलेगी। जिससे झारखण्ड राज्य में खाद्यान उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो सकेगा।

 

स्त्रोत एवं सामग्रीदाता:समेति, कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार

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