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किन्नों के बागानों में लगने वाले कीट व टोगों का परिचय एवं उनका समेकित प्रबंधन

इस पृष्ठ में किन्नों के बागानों में लगने वाले कीट व टोगों का परिचय एवं उनका समेकित प्रबंधन की विस्तृत जानकारी दी गयी है।

प्रस्तावना

नींबूवर्गीय फलों की फसलें महत्वपूर्ण एवं बहुवर्षीय होती हैं। इनका उत्पादन विश्व के कई ऊष्ण एवं शीतोष्ण कटबन्धीय देशों में किया जाता है। भारतवर्ष में नींबू वर्गीय फलों की खेती लगभग 10.77 लाख हेक्टेयर में की जाती हैं जिनका वार्षिक उत्पादन लगभग 11.47 लाख मेट्रिक टन है। भारत में फल उत्पादन की दृष्टि से नींबूवर्गीय फलों का उत्पादन तीसरे स्थान पर है। इस वर्ग में लगभग 162 जातियाँ पाई जाती हैं। इस वर्ग में से मेन्ड्रिन नारंगी (किन्नों मेन्ड्रिन, नागपुर संतरा एवं खासी और दार्जिलिंग मेन्ड्रिन) को एक बड़े क्षेत्रफल में उत्पादित किया जाता है तथा तुलनात्मक तौर पर मीठी नारंगी (मुसम्बी एवं जाफा आदि) का उत्पादन कम होता है। इनमे से किन्नों का स्थान उत्पादन, उत्पादकता, रसीलेपन एवं फल की गुणवत्ता की दृष्टि से सर्वोच्च है। हमारे देश में किन्नों की खेती व्यवसायिक तौर पर कई राज्यों में की जाती है। जैसे पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान का उत्तरपश्चिमी भाग और उत्तर प्रदेश उत्तरी भारत में अन्य नारंगी की खेती सीमित क्षेत्र में होती है। इस फसल के लिए कम आर्द्रता, गर्मी और अपेक्षाकृत सुहानी सर्दी अनुकूल होती है। उत्तर भारत में जहाँ पर तापमान गिर कर 1.5 से 4.4° सेल्सियस तक पहुंच जाता है। वहाँ किन्नों के फल अच्छे रंग, स्वाद और अत्यधिक रसदार होते हैं। किन्नों के अच्छे उत्पादन के लिए बलुई या बलुई-दोमट मृदा सर्वोत्तम होती है। नींबू-वर्गीय फल की दो किस्मों राजा (सिट्रस नोबिलिस) व विलो लिफ (सिट्रस डेलिसिओसा) के संकरण से किन्नो मेन्ड्रिन को तैयार किया गया है। उत्तर-पश्चिमी भारत में किन्नों के प्रवर्धन की सबसे सफल विधि टी–बडिंग है जिसको जट्टी-खट्टी या जम्भेरी रुट स्टोक से तैयार किया जाता है तथा अन्य भागों में करना-खट्टा से वानस्पतिक प्रवर्धन किया जाता है।

किन्नों फल दिसम्बर-जनवरी माह में तैयार हो जाते हैं तथा फलों में बारह से पच्चीस बड़े बादाम की आकृति के बीज पाए जाते हैं। इनके फल के छिलके का विशेष आर्थिक महत्व है तथा ये बड़ी मात्रा में निर्यात किए जाते हैं। फल की अम्लता, फुलाव, विशिष्ट स्वाद, साथ ही विटामिन सी का पर्याप्त स्रोत के कारण किन्नों नारंगीं से अधिक लोकप्रिय साबित हुआ है। इसमें विशेष प्रकार की सस्य कृषि जलवायु की परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता पाई जाती है। पौधे कीट, व्याधियों एवं तेज हवाओं के प्रति तुलनात्मक रूप से प्रतिरोधी होते हैं तथा किन्नों को पक्षियों के द्वारा कम क्षति होती है। किन्नों में कई प्रकार के कीट व रोग व्यापक रूप से क्षति पहुँचाते हैं। जोकि पत्तों, फूलों व फलों, आदि को क्षतिग्रस्त करके उत्पादन एवं फलों की गुणवत्ता में भारी कमी पहुँचाते हैं। कुछ कीट फलों पर आक्रमण करके उनको बाजार के लिए अनुपयोगी बना देते हैं। इनमे से कुछ हॉनिकारक कीटों एवं व्याधियों का पंजाब एवं राजस्थान क्षेत्र में किन्नों की फसल पर अत्यधिक क्षति पायी गयी है। जिनमें से सिट्रस पर्ण सुरंगक, सिट्रस सिल्ला, सिट्रस कैन्कर (नासूर), सिट्रस गमोसिस, ग्रीनिंग रोग एवं सिट्रस स्कैब आदि हैं। किन्नों की खेती के लिए उतर-भारत मुख्य रूप से प्रसिद्ध है तथा यहाँ के किसान किन्नों में लगने वाले प्रमुख कीट व व्याधियों द्वारा उनकी फल क्षति, क्षति की प्रकृति और वातावरणीय मैत्रिक प्रबंधन के प्रति जागरुक भी हैं। इन बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए किन्नों के मुख्य हॉनिकारक कीट व बीमारियों के परिचय एवं उनके समेकित प्रबंधन हेतु इस लेख में संक्षिप्त क्रिया कलापों का वर्णन प्रस्तुत किया गया है।

हाँनिकारक कीट

लीफ माइनर

लीफमाइनर (पर्ण सुरंगक) कीट पौधों को नर्सरी अवस्था में मुख्य रूप से नुकसान पहुंचाते हैं तथा यह स्वस्थ नर्सरी उत्पादन में प्रमुख बाधक हैं। यह मुख्य रूप से नर्सरी रोपण के बाद अत्यधिक क्षति पहुँचाते हैं। यह सामान्यतः बसंत ऋतु (मार्च-अप्रैल) और शरद ऋतु (सितम्बर-अक्टूबर) के दौरान अक्रामक होते हैं। पर्ण सुरंगक का वयस्क बहुत छोटा, चमकीला-सफेद रंग 2 मिमी लम्बा साथ ही इसके झालरदार पंख होते हैं। आगे वाले पंखों पर भूरे रंग की पट्टियाँ और किनारे पर एक गहरा काला धब्बा होता है। जबकि पीछे वाले पंख पूर्ण सफेद होते हैं, पंख फैलाने पर 4-5 मिमी नाप के होते हैं। वयस्क नई कोमल पत्तियों पर दिखाई देती है। इसकी मादा अंडे समूह में न देकर एक एक करके पत्तियों की मध्यशिरा के पास देती है। अंडे छोटी पानी की बूंदों की तरह दिखाई देते हैं और अण्डों से सुंडियाँ 3-5 दिन में निकल आती हैं। हल्के पीले रंग की सुंडियाँ तुरंत पत्ती की एपिडर्मल परत के नीचे से खाना शुरू कर देती हैं। क्षतिग्रस्त पत्ती के किनारे के पास सुन्डियाँ कोष अवस्था में बदल जाती हैं। ये अपना जीवन चक्र 20-60 दिन में पूरा कर लेते हैं। पर्ण सुरंगक के क्षति पहुँचाने के विषेश लक्षण आमतौर पर पत्ती की सतह पर सफेद टेढ़ी-मेढ़ी सुरंग दिखाई देती है। आमतौर पर एक पत्ती पर केवल एक ही सुरंग दिखाई देती है। लेकिन भारी क्षति होने पर एक पत्ती पर कई सुरंगे हो सकती हैं। पत्तियों पर इस सुरंग के कारण पत्तियाँ ऊपर की ओर मुड़कर विकृत हो जाती है जिससे नई पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण हेतु क्षेत्र भी कम हो जाता है। सुरंगों के कारण, गंभीर क्षति को पत्तियों के ऊपरी सतह पर देखा जा सकता है। इस कीट से क्षतिग्रस्त पौधे कैन्कर रोग के विकास के लिए पूर्वाधार बन जाते हैं।

सिल्ला

यह कीट शरद ऋतु एवं वसंत के दौरान नई कोमल पत्तियों पर सक्रिय रहती है लेकिन यह अधिक क्षति मार्च-अप्रैल में फूल और फल बनने के दौरान करता है। यह कीट छोटा, 3-4 मिमी लम्बा, भूरे या हल्के कत्थई रंग का दिखता है। सिल्ला के अंडे चमकीले पीले रंग के होते हैं और यह अंडो को खुली पत्तियों की कलियों पर देता है। प्रारम्भिक अवस्था में इनका रंग हल्का हरा या नारंगी और अंतिम अवस्था में चकतेदार भूरे पीले नारंगी रंग का हो जाता है। नवजात शिशु व प्रौढ दोंनो ही नुकसान पहुंचाते हैं जो कि पत्तियों, कोमल तनों और फूलों से रस चूसते हैं। जिससे पत्तियॉ मुड़कर सूखना, पतझड़ होना और अन्ततः टहनियों के सुखने जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं। नवजात शिशु सफेद शहद जैसे द्रव को स्रावित संश्लेषण करती हैं। जो कि कवक के विकास को आकर्षित करती हैं फलस्वरूप प्रकाश संष्लेशण की क्रिया प्रभावित होती है। यह कीट प्रौड़ अवस्था में पौधों की पत्तियों में ग्रीनिंग रोग का कारक भी बन जाता है और इसको संचारित भी करता है। गंभीर नुकसान के कारण पत्तियाँ, कलियाँ व फूल मुरझा जाते हैं।

सफेद मक्खी

सफेद मक्खी, नींबू-वर्गीय फल उगाए जाने वाले सभी क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका प्रौढ़ 1.5 मिमी लम्बा, सफेद या भूरे पंख वाला, हल्के पीले नारंगी रंग का शरीर और लाल संकीर्ण आँखों वाला होता है। नवजात शिशु आकार में अंडाकार स्केल के समान एवं काले रंग के होते हैं और स्थिर अवस्था में रहते हैं। शरीर पर सीमान्तर खड़े रोम भी दिखाई देते हैं। ये बड़ी संख्या में पत्तियों की निचली सतह पर पीले रंग के 150 से 200 अंडे देती है। जिनसे 10 दिन बाद नवजात शिशु बाहर आ जाते हैं। नवजात शिशु पत्तियों की निचली सतह पर एकत्रित होकर रस चुसते रहते हैं। नवजात शिशु एवं प्रौढ दोनों ही पत्तियों से रस चुसते रहते हैं और शहद जैसा पदार्थ स्रावित करते है। जिससे फफेंद पत्तियों पर विकसित हो जाता है। जिसके कारण फल सहित पूरे भाग पर काले रंग की परत सी चढ़ जाती है और प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है तथा फलों का आकार छोटा रह जाता है। परिणाम स्वरूप फलों की उपज में भारी कमी आ जाती है।

काली मक्खी

प्रौढ़ काली मक्खी का उदर भाग गहरे कत्थई रंग का होता हैं तथा उदर के ऊपरी भाग पर दो समान एवं पारदर्शी पंख होते हैं। प्रौढ़ मादा 1.2 मिमी लम्बी और नर 0.8 मिमी लम्बा होता है। इसके नवजात स्केल कीट के समान चमकदार काले अन्डाकार तथा इनके किनारों पर नुकीले हुक पाये जाते हैं। प्रौढ़ मार्च-अप्रैल में निकलते हैं और मादा पीले भूरे रंग के अंडाकार 15 से 22 अंडे एक समूह में पत्तियों की निचली सतह पर एक सर्पिलाकार ढगं से देती है। अण्डों से 7 से 14 दिनों में नवजात निकल आते हैं और नवजात प्रारम्भिक अवस्था में ही पत्ती की कोशिकों से रस चूसना प्रारंभ कर देते हैं तथा पत्ती की निचली सतह पर ही रहते हैं। काली मक्खियाँ एक वर्ष में अलग-अलग दो जीवन चक्र पूरे कर लेती हैं। प्रथम चक में प्रौढ़ मार्च-अप्रैल में तथा द्वितीय चक में जूलाई-अक्टूबर में निकलते हैं। प्रौढ़ एवं नवजात दोनों पत्तियों से रस चूसते हैं जिसके परिणामस्वरूप पत्तियाँ मुड़ने लगती हैं। इसके साथ-साथ फूलों की कलियाँ तथा विकसित हो रहे फल पकने से पूर्व गिर जाते हैं और पेड़ की आयु कम हो जाती है। काली मक्खी के अधिक प्रकोप होने पर पत्तियों तथा पौधों पर शहद जैसा तरल पदार्थ एकत्रित होता है। जिस पर काली सूटी मोल्ड (कवक) को पेड़ों तथा पत्तियों पर विकसित होने के लिए पर्याप्त भोज्य पदार्थ उपलब्ध हो जाता है और कवक विकसित होकर पत्तियों की ऊपरी सतह को काला कर देता है। जिससे पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है। जिसके परिणामस्वरूप पौधों की वृद्धि रुक जाती है एवं फूलों की सघनता भी कम हो जाती है फलतः फलोत्पादन भी अपर्याप्त होता है।

एफिड

एफिड का शरीर मुलायम होता है जो कि नाशपाती के आकार का छोटा रस चूसक कीट हैं। इनकी लम्बाई कम से कम 2 मिमी और रंग मेंपीले, हरे, भूरे तथा काले रंग के होते हैं। इनके पिछले शरीर के पांचवें उदर खंड से उत्पन्न होने वाली एक जोडी कोर्निक्लस पाई जाती है। एफिड में अनिषेचक जनन होता है। मादा एक दिन में पाँच नवजात शिशुओं को जन्म देती है तथा यह प्रक्रिया 1-3 सप्ताह तक जारी रहती है। एक जीवन चक्र पूरा करने में सामान्यतः छः से आठ दिन का समय लगता है। एफिड की तीन प्रजातियॉ; टोक्सोप्टेरा एयूरॉन्टी, एफिस गोसिपी और माइजस परसिकी सामान्य रूप से किन्नों के आकस्मिक नाशीजीव कीट हैं, किन्तु अब ये सिट्रस के नियमित रूप से नाशीजीव बनते जा रहे हैं। टी. एयूरॉन्टी और एपिस गोसिपी मुख्य रूप से सिट्रस सिटीजा वायरस (सीटीवी) के प्रमुख वाहक के रूप में पाये गये हैं। नवजात एवं प्रौढ़ द्वारा मुलायम पत्तियों और प्ररोह का रस चूसने के कारण पत्तियाँ पीली होकर मुड़ने लगती हैं और कार्यिक विकृत के कारण सूखने लगती हैं। जिससे नए प्ररोह की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और पौधों की वृद्धि रूक जाती है। एफिड के द्वारा उत्सर्जित शर्करा युक्त द्रव पदार्थ पर सूटी मोल्ड (कवक) विकसित हो जाता है। फूल आने के समय एफिड का आक्रमण होने से फल लगने में कमी देखी गयी है।

फलों का रस चूसने वाला पतंगा

हाल ही में पंजाब के होशियारपुर और गुरूदासपुर जिलों में अगस्त से नवम्बर के दौरान किन्नों के परिपक्व फलों पर नियमित नुकसान करने वाला यह नाशीजीव कीट पाया गया है। इसके पतंगे रात के समय सक्रिय हो जाते हैं। और अपनी लम्बी सुन्ड (प्ररोवोसिस) के द्वारा फलों से रस चूसते हैं। जिससे फल छिद्र युक्त हो जाते हैं और फलों पर प्रायः रोगजनक कवकों का प्रकोप हो जाता है। जिससे फलों में दुर्गन्ध आने लगती है और फल परिपक्व होने से पहले ही गिर जाते हैं केवल प्रौढ़ पतंगे ही किन्नों फलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इन कीटों में विषेश प्रकार की सुविकसित दॉतेदार नुकीले सुन्ड (प्ररोवोसिस) होने से ये पतंगे पके हुए फलों को बेधने के लिए सक्षम होते हैं। प्रौढ़ पीले नारंगी भूरे शरीर वाले होते हैं इनके आगे वाले पंख गहरे भूरे एवं पीछे के पंख नारंगी लाल रंग के साथ ही इनमें दो काली घुमावदार पट्टियां होती हैं। मादा पतंगे प्रायः अण्डे अन्य पौधों जैसे, गुड़वेल (टीनोस्पोरा कार्डिफोलिया, टी. सेमिलासिना) वासनवेल (कोकूलस हिरसूटस), चाँदवेल (कोनवालवुल्स एरवेन्सिस) आदि पत्तियों पर देती हैं और आठ से दस दिनों में अण्डे परिपक्व होने के बाद लार्वा (सुन्डियॉ) निकल आती हैं। सुन्डियों पर, गहरे भूरे साथ में पीले और लाल रंग के धब्बे पाए जाते हैं और इनका आकार अर्द्धकुण्डलक होता है। पूर्ण विकसित सुन्डियॉ 50-60 मिमी लम्बी होती हैं तथा ये पृष्ठीय और पाश्र्वीय भागों पर गहरे नीले रंग के साथ पीले रंग के धब्बे होते हैं। इसका कोष (प्यूपा) पारदर्शी पीला-सफेद पत्तियों के आवरण में पाया जाता है। सुन्डियों की अवस्था 28-35 दिनों की होती है और 14-18 दिनों में सुन्डियॉ कोष अवस्था में हो जाती है।

छाल खाने वाली सुन्डियाँ

ये कीट पुराने एवं अप्रबन्धित बागानों में मुख्य रूप से दिखाई देते हैं। प्रौढ़ पतंगे मई-जून के दौरान सक्रिय रहते हैं। ये आकार में 35-40 मिमी तथा पीले-भूरे या भूरे रंग के होते हैं। इनके प्रकोप के कारण अक्टूबर-अप्रैल के दौरान सूखी लकड़ी का बुरादा या इसके मल पदार्थ तथा जाले की बनी पट्टी शाखाओं पर लटकती हुई दिखाई पड़ती हैं। और कभी-कभी दो शाखाएँ आपस में सुरंग के रूप में जुड़ी रहती है। प्रौढ़ मादा पौधों की छाल में अण्डे देती है। अण्डे 8-10 दिन में परिपक्व हो जाते है। और अण्डों से सुन्डियाँ निकल आती हैं इनका रंग पीला-भूरा होता है। पूर्ण विकसित सुन्डियाँ 50-60 मिमी. लम्बी होती है। सुन्डियॉ पेड़ की छाल को खाती हैं और पेड़ के अन्दर छेदकर देती है। सुन्डियॉ दिन के समय इन सुरंगों में छिपी रहती हैं और रात के समय सक्रिय हो जाती हैं। कई सारी सुन्डियॉ एक ही पेड़ पर अलग-अलग स्थानों पर हमला करती हैं जिससे छाल को गम्भीर क्षति हो जाती है और छोटी शाखाएं सूख भी जाती हैं। इस प्रकार तने पर बने छिद्र अन्य कीटों या पादप रोगों के संक्रमण के आश्रय शिद्ध हो सकते हैं। प्रभावित शाखाएं प्रकोपित स्थान से टूट जाती हैं। गंभीर संक्रमण से पेड़ों का विकास एवं फल-फूलन की क्षमता निम्न स्तर की हो सकती है।

माइटस (मकड़ियाँ)

माइट नींबू के बगीचों में विशेष रूप से मई-जून में पायी जाती हैं और शुष्क वातावरण में इसका गंभीर प्रकोप देखा गया है। पंजाब में इसका प्रकोप किन्नों, नारंगी, नींबू, अंगूर और खट्टे नींबू में पाया गया है। नवजात एवं प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों पर धब्बे बना देते हैं जिसके परिणामस्वरूप पत्तियॉ फटकर क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। भारी नुकसान विशेष रूप से युवा पौध अवस्था में होता हैं जिससे पेड़ों में पूर्ण रूप से पतझड़ हो जाता है तथा बड़े प्रभावित पौधों में फल छोटे दाग सहित पीले पड़ जाते हैं। प्रौढ़ 0.33 मिमी लम्बे होते हैं एवं इनके शरीर के पृष्ठीय पक्ष पर मोटे गहरे भूरे रंग के धब्बे पाये जाते है और इनका शरीर कटीले रोमयुक्त रेशों से ढका रहता है तथा प्रत्येक रेशा एक छिद्र युक्त रचना (टयूबरक्ल) से निकलते हैं। माइट मई-जून में सबसे अधिक सक्रिय रहती है तथा इसी दौरान मादा लगभग 150-300 अंडे देती है जो कि पत्तियों की निचली सतह पर शिराओं के साथ व्यवस्थित रहते हैं। अंडे बहुत छोटे, गोल और नारंगी रंग के होते हैं जो कि पत्ती के ऊतको में फँसे रहते हैं। जिनसे एक सप्ताह में नवजात बन जाते हैं। ये निकले हुए नवजात हल्के पीले भूरे रंग के और इनमें केवल तीन जोड़ी टांगें होती हैं। ये तीन-चार दिन तक पत्तियों से रस चुसते रहते हैं इसके बाद त्वचा में विमोचन करके प्रोटोनिम्फ में बदल जाते हैं। अब इनमें चार-जोड़ी टांगें बन जाती हैं और यह 3-4 दिनों तक वृद्धि करके प्रोटोनिम्फ से ड्यूटोनिम्फ में बदल जाते हैं। यह 4-5 दिन तक पत्तियों के खाने के बाद त्वचा विमोचन करके प्रौढ़ माइट में परिवर्तित हो जाते हैं। मादा माईट लगभग 10 दिनों तक ही जीवित रहती है। गर्मियों में यह अपना जीवन चक्र 17 से 20 दिनों में पूरा कर लेती हैं। वयस्क माइट वर्ष भर में कई अतिरिक्त पोषक पौधों के माध्यम से गुजरती है।

थ्रिप्स

थ्रिप्स के वयस्क एवं नवजात बहुत ही छोटे आकार के कीट होते है, दोनों ही प्रायः पूर्ण विकसित फूलों, कलिकाओं एवं अपूर्ण विकसित फलों एवं पत्तियों का रस चूसते हैं, जिससे पत्तियां सिकुड़कर कप आकार की तरह मुड़ जाती हैं एवं ये थोड़ी सी मोटी भी हो जाती हैं और इनको मोड़ने पर ये टूट जाती हैं। इस कीट का प्रकोप पत्तों पर मध्य शिरा के समान्तर दो सफेद रेखाओं के रूप में दिखता हैं। फलों पर इनका प्रकोप होने पर डंठल की तरफ सफेद घेरे बन जाते है। थ्रिप्स से प्रकोपित फलों की बाजार कीमत गिर जाती है अर्थात ये कम दाम में बिकते हैं।

हानिकारक बिमारियाँ

गमोसिस

 

इस बीमारी से ग्रसित पेड़ों को इनकी छाल से अधिक मात्रा में गोंद जैसा चिपचिपा पदार्थ निकलने से पहचाना जा सकता है। तथा प्रभावित तने की छाल पर गहरे कत्थई अथवा काले रंग और लम्बी दरारे विकसित हो जाती हैं। इस रोग की अधिकता से छाल सड़ने लगती है। इससे लकड़ी के ऊतकों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है और पौधे सूखने लगते हैं इसको बीमारी का गर्डलिंग प्रभाव भी कहते हैं। सिट्रस की गमोसिस बीमारी अधिक वर्षा, जल निकासी न होना, अत्यधिक और सिंचाई की पुरानी प्रचलित (फ्लड) विधि, अत्यधिक पानी के साथ तना और क्राउन के लम्बे समय तक नम रहने, गहरी जुताई, नीची बड़िग और ग्रसित जड़े महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पौध अवस्था में फाइटोप्थोरा निकोशिआनी कवक से संक्रमित पौधे लगाने से नींबू-वर्गीय बगीचों में यह रोग फैलता है। प्राथमिक अवस्था में रोगजनक मिट्टी या संक्रमित जडो में मौजूद कवक हो सकते हैं तथा रोग के लक्षण तत्काल स्पष्ट दिखाई नहीं देते हैं। रोग कारक कवक किसी रोग वाहक के द्वारा ही स्वस्थ पेड़ों तक गमन करके पौधो या नर्सरी को संक्रमित कर देते हैं। अनियंत्रित विधि से सिंचाई करने के कारण रोगजनक एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक आसानी से फैल जाते हैं तथा भारी वर्षा के कारण सतह का पानी भी रोगग्रसित पौधौं से स्वस्थ पौधों तक आसानी से पहुँच जाता है। जिससे रोग कारक कवक स्वस्थ पौधों को भी अपनी चपेट में ले लेते हैं। और रोग फैलता चला जाता है।

कैन्कर/नींबू का नासुर

यह भारत में स्थानीय रोग है। यह उन सभी क्षेत्रों में पाया जाता है जहॉ नींबू-वर्गीय फसलें उगायी जाती हैं। यह एक जीवाणु जनित रोग है। यह नींबू के लीफ माइनर (पर्ण सुंरगक) कीट के द्वारा फैलता है। कैंकर सूक्ष्म घाव अथवा धब्बे के रुप में शुरू होता है और पीले ऊतकों से घिरा होता है तथा यह 2-10 मिमी व्यास तक पहुँच जाता है। इसका अंतिम आकार तथा संक्रमण मुख्य रूप से फसल की आयु एवं पौधों के ऊतकों पर निर्भर करता है। धब्बा शुरू में गोल लेकिन बाद में अनियमित हो जाते हैं। पत्तियों पर धब्बे के संक्रमण जल्द ही लगभग सात दिनों में पत्तियों की ऊपरी व निचली सतहों पर भी दिखाई देने लगते हैं। इसका प्रभाव प्रायः पत्ती के अग्रभागों या पत्ती के एक सीमित क्षेत्र में हो सकता है। यह धब्बे बाद में पिचके हुए कटोरेनुमा आकार में बदल जाते हैं और साथ मे उठा हुआ मध्यशिरा और धसा हुआ केन्द्र बन जाता है। फल व तने पर विस्तारित घाव 1-3 मिमी गहरे और पत्तियों की पृष्ठीय सतह पर एक समान दिखाई देते हैं।

स्कैब

नींबू-वर्गीय स्कैब का आक्रमण होने पर फल, पत्तियों एवं टहनियों पर हल्के अनियमित उभार युक्त बाह्य वृद्धि होने लगती हैं। ये उभार भूरे/धूसर या गुलाबी रंग के होते हैं और कालान्तर में गहरे रंग के हो जाते हैं। ये पत्तियों की तुलना में फलों पर अधिक होते हैं। स्कैब रोग से ग्रसित फलों पर उठी हुई गाँठ, नींबू-वर्गीय के कैन्कर और स्कैब के रोगों के लक्षणों में भ्रमित करती है। कवक के बीजाणु साल भर नये फलों और पत्तियों पर स्कैब घाव उत्पन्न करते रहते हैं। कवक के बीजाणु बगीचों में वर्षा तथा अतिरिक्त सिंचाई द्वारा तथा कभी-कभी छिड़काव प्रक्रिया के दौरान एक पौधे से दूसरे पौधे पर संचरित होते रहते हैं। अधिक ओस पड़ने से भी कवक के बीजाणु अन्य जगहों एवं पौधों पर विसरित हो जाते हैं। परन्तु बीजाण शुओं का सीमित मात्रा में बिखराव के कारण इनका संक्रमण केवल स्थानीय ही होता है।

हरितकारी (ग्रीनिंग) रोग

इस रोग का संक्रमण एवं प्रकोप की तीव्रता प्रायः ऋतु, संक्रमण का प्रकार, पौधे की आयु और पोषक तत्वों की उपलब्धता के साथ बदलती रहती है। ग्रीनिंग रोग से संक्रमित पौधों की पत्तियॉ सामान्यतः छोटी एवं सीधी हों जाती है। यह लक्षण अक्सर हरी शिराओं और आन्तरिक शिराओं वाले क्षेत्रों में क्लोरोफिल की कमी के कारण हल्का पीला छोटा सा घेरा बन जाता है। रोग से ग्रसित विभिन्न प्रकार की पत्तियाँ चित्तीदार हो जाती हैं इस प्रकार के संक्रमण को धब्बेदार या चित्तीदार ग्रीनिंग रोग कहते हैं। इस रोग के अत्यधिक प्रकोप से पत्तियाँ पीले व उनमें हलके हरे रंग के अनेक धब्बे बन जाते हैं जिससे प्रभावित पेड़ कमजोर पड़ जाते हैं और इसके फल छोटे तथा कई बार परिपक्व होने से पूर्व ही गिर जाते हैं और कभी-कभी फल टहनियों पर लगे रहते हैं लेकिन इनका रंग परिपक्व फल से भिन्न अर्थात समान रूप से पकने जैसा नहीं दिखाई देता अपितु कहीं पीला कहीं हरा प्रतीत होता है। इस कारण इस रोग को ग्रीनिंग रोग कहते हैं। यह रोग प्रायः सिट्रस सिल्ला कीट के माध्यम से फैलता है।

नींबू-वर्गीय पौधों का डाईबैक

डाईबैक से तात्पर्य यह है कि इस रोग से प्रभावित पौधों में ऊपरी भाग से नीचे की तरफ सूखना शुरू हो जाता है। इस रोग का विशिष्ट कारण ज्ञात नहीं है परन्तु यह माना जाता है कि कुछ रोग जनक जैसे ट्रिस्टीजा वाइरस का संक्रमण, जिंक तत्व की कमी होना तथा रोग जनक कवकों का संक्रमण होना माना जाता है। इसके साथ-साथ पोषक तत्वों से सम्बन्धित विकार, प्रतिकूल वातावरण, दोष पूर्ण व्यवसायिक प्रक्रियाएँ, कमजोर चयनित पौध सामग्री आदि भी कारण हो सकते हैं। भूमि की सख्त परत से जड़ों का टकराना भी एक अन्य कारण हो सकता है। प्रभावित पेड़ों की जड़ों के गलने से, तने में घेरा/खाई, फलों का गिरना, पत्तियों का मुरझाना तथा पत्तियों की प्रारम्भिक अवस्था में प्ररोह के अंतिम भागों पर हल्के भूरे या गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं। यह रोग प्ररोह के अग्र भागों से प्रारम्भ होता है और अनुकूल जलवायु परिस्थितयों में यह तेजी से फैलता हुआ प्ररोह के अग्र भाग से नीचे आधार तक पहुंच जाता है। जिससे प्ररोह के मुझने के लक्षण प्रतीत हाते हैं और प्ररोह अन्त में मर जाता है। संक्रमित पेड़ों पर सामान्यतः भारी मात्रा में फूलन-फलन होता है। तथा छोटे आकार के फूल आते हैं। और जड़ गलन के कारण फल भारी मात्रा में गिर जाते हैं व रोग की अधिकता में पेड़ों की छाल भी काली हो जाती है।

हाँनिकारक कीटों एवं बीमारियों की आई.पी.एम. प्रबन्धन तकनीक

फाइटोफ्थोरा का प्रबन्धन

1). तने के मुख्य एवं निचले भाग (2–फीट) की कवकनाशी से पुताई करनाः

फाइटोप्थोरा से ग्रसित पेड़ों के निचले भाग की छाल प्रायः कटी-फटी सी हो जाती है जिसमें से गोंद निकलने लगता है। अतः इसकी पुताई एक समान कर पाना मुश्किल होता है। इस रोग से ग्रसित छाल को तथा इससे जुड़ी कुछ स्वस्थ हरी छाल को भी तेज धार वाले चाकू या खुरपे से उतार देना चाहिए। इस रोग की रोकथाम हेतु साल में दो बार पहला मानसून से पहले (जून) एवं दुसरा मानसून के बाद (अक्टूबर-नवम्बर) बोर्डो पेस्ट लगाना चाहिए। रोग ग्रस्त छाल को उचित तरीके से एकत्रित करके जला देना चाहिए कभी भी इसको खुले जमीन पर नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि इसके कारक कवक पुनः स्वस्थ पौधों को संक्रमित कर सकते हैं। यह क्रिया पूर्ण होने पर तने के मुख्य एवं निचले भाग पर जमीन से लगभग 2 फीट की ऊँचाई तक कवकनाशी, पेस्ट रिडोमिल गोल्ड* 60 ग्रा/ ली. पानी में मिलाकर ब्रुश से अच्छी तरह पुताई कर देनी चाहिए या ट्राइकोडर्मा हरजीनियम को 100 ग्रा/ली पानी में पेस्ट बनाकर ब्रुश से घावों पर अच्छी तरह पुताई कर दें। चार-पांच दिन बाद पेस्ट सूखने पर इस पर अलसी का तेल ब्रुश से लगाएं। यह प्रक्रिया साल में दो बार, फरवरी-मार्च और जुलाई-अगस्त के दौरान करनी चाहिए।

2). पौधों के चारों ओर मृदा को कवकनाशी से भिगोना एवं निथारनाः

फरवरी-मार्च और जुलाई-अगस्त में दो बार रिडोमिल गोल्ड* 25 ग्राम एवं कार्वेन्डाजिम* 10 ग्राम को लगभग 10 ली पानी में / वृक्ष की दर से संक्रमित पौधों के चारों ओर (1-1.5 मी) मृदा को भिगोकर खुरपी से अच्छी तरह मिला देना चहिए तथा इसके उपरान्त लगभग 20-25 ली पानी का छिड़काव करें जिससे प्रयोग किया गया कवकनाशी जमीन में सुचारु रूप से विसरित हो जाए। तने की पुताई के साथ यदि यह प्रक्रिया भी की जाए तो प्रभावी ढंग से इस रोग को नियंत्रण किया जा सकता है।

3). पत्तों पर छिड़काव करनाः

फोसेटिल ए एल* (80 डब्ल्यु. पी.) 2.5 ग्रा/ली की दर से घोल बनाकर अगस्त और सितम्बर के दौरान छिड़काव करने से इस रोग को प्रभावी रूप में नियंत्रित कर सकते हैं क्योंकि यह विशेष प्रकार का कवकनाशी है जो पौधों की पत्तियों में अवशोषित होकर संम्पूर्ण तने में विसरित हो जाता है तथा कवक के बीजाणुओं के अंकुरण को रोक देता है जिससे इसका संक्रमण रुक जाता है। छिड़काव करने से पेड़ पर घाव भरने के साथ ही पोषण वाली जड़ें भी पुनः उत्पन्न हो जाती हैं।

4). उपयोगी सिंचाई विधिः

समान्यतः बागानों में परम्परागत रूप से प्रचलित खुले मुहाने से सम्पूर्ण खेत की सिंचाई की जाती हैं जो कि कई पहलुओं के दृष्टिगत हानिकारक है। जैसे अधिक पानी बर्बाद होना, फाइटोप्थोरा तथा अन्य रोगों का संवहन करने और अधिक खरतपतवार की वृद्धि को बढ़ावा देने की दृष्टि से हानिकारक है। अर्थात बागानों की सिंचाई पेड़ों के चारों तरफ मिटटी से उभार युक्त लगभग एक मीटर त्रिज्या का घेरा बनाकर करना चाहिए। जिससे एक पौधे को छूने वाला पानी दुसरे पौधे तक न पहुँच सकें जिससे रोग संचरण को रोका जा सके। यदि बगान में ड्रिप (बूंद-बूंद) करके सिंचाई तंत्र लगा हो तो उस तरह के घेरे बनाने की कोई आवश्यकता नही है। अतः एव सिंचाई की विधि में सुधार करके फाइटोप्थोरा बीमारी के संवहन एवं संचरण को नियंत्रित किया जा सकता है।

ग्रीनिंग रोग का प्रबन्धन

1). ग्रीनिंग रोग के प्रबन्धन हेतु प्रभावित पेड़ों को पूर्ण रूप से हटा देना चाहिए और उनके स्थान पर रोग मुक्त पौधों को रोपित कर देना चाहिए।

2). संगरोधक (क्वारेन्टाइन) नियंत्रणकारी उपायों को नियमित रूप से संचालित करना चाहिए जिससे प्रभावी तरीके से रोगग्रस्त पौधों से स्वस्थ पौधों में रोग संचरण को रोका जा सके। संक्रमित पौध को न ही खरीदना चाहिए और न ही बेचना चाहिए।

3). पौध पूरी तरह से रोग मुक्त होना चाहिए जिसका प्रमाणीकरण पंजीकृत संस्थान द्वारा होना आवश्यक है।

4). यह रोग सिट्रस सिल्ला रोगवाहक के माध्यम से भी फैलता है। अतः इस रोग के संचरण को नियंत्रण करने हेतु सारणी में दी गई सिफारिश अपनानी चाहिए।

हानिकारक कीटों एवं बीमारियों की रोकथाम हेतु कुछ आवश्यक तथ्य

1) एहतियाती तौर पर पहला छिड़काव नई प्ररोह शुरू होते ही कर देना चहिए।

2) बगीचों में चीटियों के बिलों/कोलोनियों को नष्ट कर देना चाहिए। चीटियाँ पेड़ों की छाल या पत्तियों पर छोटे-छोटे कट कर देती हैं जिसके माध्यम से पेड़ों पर अन्य रोग कारक अथवा कीट भारी क्षति पहुँचा सकते हैं।

3) प्रायः बागानों में पौधों की सघनता न करें इसके साथ-साथ इनमें जल भराव न होने दें। इससे कीटों एवं रोगकारकों की संख्या में वृद्धि होती है और फल उत्पादन के प्रबल अवरोधक बन जाते हैं।

4) पेड़ों की वृद्धि के समय इनकी कटाई-छंटाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि इस समय रोग कारकों का प्रकोप आसानी से हो सकता है। यदि आवश्यक हो तो फल तुड़ाई के बाद सक्रमित एवं सूखे प्ररोह की ही कटाई-छंटाई करें और रोग नियंत्रकों का प्रयोग करना चहिए।

5) पौधों के फूलन-फलन के उपरान्त अत्यधिक और लगातार नाइट्रोजन उर्वरकों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से नये पुष्प तथा प्ररोह आने लगते हैं जो कीटों के आक्रमण के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्रदान करते है। अतः आवश्यकता अनुसार ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए।

6) पौधों की कटाई-छंटाई छतरीनुमा आकार में करनी चाहिए जिससे अधिकतम प्रकाश नीचे तक पहुँच सके व प्रकाश का अवरोध कम से कम हो।

7) कीटनाशकों एवं फफूदनाशकों का छिड़काव के पूर्व इनकी आपस में अनूकूलता, इनके अवशेष बचने की संम्भावनाओं की जानकारी किसी विशेषज्ञ से कर लेनी चाहिए। इसके साथ-साथ छिड़काव का समय (सुबह या शाम), कीटों की नवजात अवस्थाओं आदि का ध्यान रखकर प्रयोग करना चाहिए।

8) छिड़काव को पत्तियों की निचली सतह एवं नये प्ररोह को लक्षित करके करना चाहिए तथा एक विशेष प्रकार के कीटनाशी का प्रयोग बार-बार नहीं करना चाहिए। यदि किसी रासायनिक कीटनाशक की संरक्षण अवधि समाप्त हो गयी हो तो इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।

9) छिड़काव के लिए पहले घोल कम मात्रा में तैयार करें और फिर पानी मिलाकर आवश्यक स्तर तक की मात्रा में बढ़ा लें। नम करने योग्य (वेटेवल) कीटनाशक को पहले इसकी आवश्यक मात्रा में पानी की कुछ मात्रा डालते हैं तथा इसको अच्छी तरह से मिलाते हैं और फिर लगातार बची हुई पानी की मात्रा डालते जाना चाहिए और अच्छी तरह से मिलाते रहना चाहिए।

10) तेज हवाओं, बादल वाले दिनों और बूंदा-बॉदी के दौरान छिड़काव नहीं करना चाहिए।

किन्नो में पोषक तत्वों की कमी के लक्षण एवं उनके निराकरण

जिंक की कमी : किन्नू के बागान प्रायः बलुई मिट्टी में लगाए जाते हैं जो कि पौधों की वृद्धि की दृष्टि से उत्तम होती है। इसके साथ-साथइसका दुष्प्रभाव यह है कि बलुई मिट्टी में जिंक की कमी होने की सम्भावनाएं अधिक होती हैं। जिंक की कमी युक्त पौधों की पत्तियां चित्तीदार हो जाती हैं। इस प्रकार के लक्षण पूर्ण रूप से विकसित हुई नयी पत्तियों की शिराओं के पास अनियमित चित्तियों के रूप में दिखाई देते हैं। जिंक की कमी के लक्षण सर्वप्रथम शीर्षस्थ पत्तियों पर दिखाई पड़ते हैं। यह पत्तियाँ प्रायः छोटी एवं संकरी हो जाती हैं तथा ऊपर की ओर तनी हुई दिखाई पड़ती है। जब जिंक की कमी अधिक समय तक रहती है। तो डाई बैक अर्थात् ऊपर से सूखा रोग शुरू हो जाता है। सामान्यतयः जिंक की कमी अप्रैल-मई-जून महीनों में दिखाई पड़ती है एवं कभी-कभी इस तरह के लक्षण अगस्त - सितम्बर महीनों में भी प्रतीत होते हैं। पौधों में जिंक की कमी की आपूर्ति करने हेतु 0.3 (3 ग्राम/ ली.) प्रतिशत जिंक सल्फेट को पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए और यदि इसकी बहुत कमी प्रतीत हो तो 0.45 प्रतिशत जिंक सल्फेट के घोल का छिड़काव करना चाहिए। जिंक सल्फेट के छिड़काव के एक सप्ताह बाद तक बोर्डो मिश्रण या कॉपर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव नहीं करना चाहिए।

मैंग्नीज तत्व की कमी : मैंग्नीज तत्व की कमी भी सामान्यतः बलुई मिट्टी में उगाये जाने वाले बागानों में पायी जाती है। यह या तो मृदा में कम मात्रा में होने से या मृदा की अधिक पी.एच., कैल्सियम एवं फास्फोरस की अधिकता के कारण पौधे इसे मृदा से अवशोषित नहीं कर पाते हैं जिससे पौधों में इसकी आवश्यक मात्रा से कम मैंग्नीज सान्द्रण रह जाता है। पंजाब के अबोहर क्षेत्र में किन्नू के बागानों में मैग्नीज तत्व की न्यूनता अक्सर दिखाई देती है। शुष्क एवं अति ठण्डे क्षेत्रों के बागानों में भी मैग्नीज तत्व की कमी पायी जाती है।

पौधों में मैंग्नीज कमी को उनकी पत्तियों का सावधानी पूर्वक अवलोकन करने से पहचाना जा सकता है। पत्तियों की मुख्य शिरा एवं उप शिराओं के साथ-साथ गहरे हरे रंग की धारियां दिखाई देती हैं तथा इन गहरी धारियों के बीच में हल्के हरे रंग की धारियां दिखाई देती हैं। मैंग्नीज तत्व की कमी की तीन अवस्थाएं होती हैं जैसे निम्न, मध्य एवं अधिकतम स्तर की कमी। प्रथम स्तर की कमी नई पत्तियों में प्रतीत होती हैं जो कुछ समय बाद समाप्त हो जाती हैं। अर्थात् पुरानी पत्तियों में मैंग्नीज की कमी कम ही प्रतीत होती है। मध्य स्तर की कमी में मुख्य शिरा एवं उपशिराओं के साथ-साथ वाला गहरा हरा रंग कुछ हल्का हरा हो जाता है तथा इनके बीच का हल्का हरा रंग पत्तियों के अन्त समय तक बना रहता है। जबकि यह निम्न स्तर की कमी होने पर पुरानी पत्तियों में सामान्य हरा हो जाता है। मैंग्नीज तत्व की अधिकतम स्तर की कमी होने पर मुख्य शिराओं के साथ वाला गहरा हरा रंग कुछ हल्का हरा हो जाता है तथा इनके बीच वाला हल्का हरा रंग और हल्का हो जाता है और कभी-कभी सफेद प्रतीत होने लगता है। ये लक्षण प्रायः उन पत्तियों पर जो धूप की तरफ होती हैं तथा निम्न एवं मध्य स्तर की कमी पौधे के छाया वाले भाग की पत्तियों में दिखाई देते हैं और अन्त में मैंग्नीज की अधिकतम कमी के कारण पत्तियां झड़ने लगती हैं। अर्थात् पौधे कमजोर हो जाते हैं और इनकी उत्पादकता निम्न हो जाती है।

क्षारीय मृदा में यदि मैंग्नीज उर्वरक प्रयोग किये जाते हैं तो उनका पौधों को ज्यादा लाभ नहीं होता है। अर्थात् ये पौधों में अवशोषित नहीं हो पाते है। ऐसी दशा में बागानों में इसका छिड़काव करना ही उपयोगी हाता है। मैंग्नीज की आपूर्ति हेतु मैंग्नीशियम सल्फेट का 0.28% का छिड़काव करना चाहिए। प्रायः यह देखा गया है। कि मैंग्नीज की कमी अप्रैल एवं अगस्त के महीनों में होती है जिस समय यह प्रतीत हो तो 100 लीटर पानी में मैंग्नीज सल्फेट की 280 ग्रा. मात्रा घोलकर छिड़काव करके इसकी आपूर्ति की जा सकती है।

आयरन (लोहा) तत्व की कमी : आयरन तत्व की कमी भी बलुई मृदा में मुख्यतयः देखी गयी है। इसके साथ-साथ आयरन कमी के कई अन्य कारक भी होते हैं। जैसे - प्रचुर मात्रा में फॉस्फोरस, जिंक, कापर, मैंग्नीज एवं बाइकार्बोनेट्स की उपलब्धता अर्थात् मृदा में इन तत्वों की अधिकता से आयरन तत्व की कमी आ जाती है। इसके साथ-साथ उन क्षेत्रों में भी आयरन तत्व की कमी हो जाती है जहाँ मृदा की पी.एच. 8.0 या इससे अधिक होती है और कहीं-कहीं चूना अर्थात् कैल्सियम कार्बोनेट की मात्रा अधिक होती है।

आयरन तत्व की कमी के लक्षण नयी पत्तियों में प्रारम्भ होते हैं। इन पत्तियों की शिराओं का भाग गहरा हो जाता है और बीच का क्षेत्र हल्का हरा रहता है। आयरन की कमी को भी तीन भागों में बांटा जा सकता है, जैसे : निम्न स्तर, मध्य स्तर एवं अधिकतम स्तर की न्यूनता। जब आयरन की न्यूनता कम होती है तो इसके लक्षण पुरानी पत्तियों में समाप्त हो जाते हैं। मध्य स्तर की न्यूनता में शिराओं का मध्य भाग हल्के पीले रंग का होने लगता है और धीरे-धीरे पूरी पत्ती का रंग हर-सफेद हो जाता है। आयरन की अधिकतम न्यूनता होने पर पत्तियाँ झड़ने लगती हैं तथा डाईबैक बीमारी प्रारम्भ हो जाती है और अन्ततः पौधे सूखने लगते हैं। आयरन की कमी युक्त वाले पौधों के फलों की गुणवत्ता निम्न हो जाती है। इनमें गुलित खनिज तत्वों की कमी आ जाती है।

पौधों में आयरन तत्व की कमी को पूर्ण करने हेतु फेरस सल्फेट का 0.18 प्रतिशत (1.8 ग्राम/ली.) का छिड़काव करना चाहिए। आयरन की कमी प्रायः अप्रैल एवं अगस्त महीनों में देखी जाती है। फेरस सल्फेट को अन्य रसायनों में मिश्रित करके छिड़काव नहीं करना चाहिए।

नाइट्रोजन तत्व की कमी : नाइट्रोजन पौधों की अधिकतम वृद्धि के लिए बहुत आवश्यक तत्व है। फसलों में इसकी आपूर्ति प्रायः जैविक खाद, हरी खाद, गोबर की खाद एवं रासायनिक खादों के प्रयोग से की जाती है। नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का प्रयोग सामान्यतयः मृदा में ही किया जाता है। नाइट्रोजन की कमी होने पर पौधों की वृद्धि निम्न स्तर की हो जाती है तथा पत्तियाँ पीली पड़ने लगती है। नयी पत्तियां प्रायः सामान्य दिखाई पड़ती हैं। परन्तु जैसे ही ये पुरानी होती जाती हैं, तो पीली पड़ने लगती हैं। पंजाब की मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी कम ही पायी जाती है। नाइट्रोजन की कमी को आसानी से पूरा किया जा सकता है। अर्थात् नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों को सीधा मृदा में प्रयोग करना चाहिए।

फास्फोरस तत्व की कमी : फास्फोरस कमी युक्त मृदा में पौधे की वृद्धि धीमी हो जाती है तथा पत्तियों की चौड़ाई सामान्य से कम होती हैं। पत्तियों एवं फलों में ढीलापन प्रतीत होता है तथा फलों का केन्द्रीय भाग अधिक ढीला हो जाता है। इसके साथ-साथ फलों में अम्लता अधिक हो जाती है जिससे फलों में खट्टापन अधिक हो जाता है। फास्फोरस की अधिक कमी होने पर फल झड़ने लगते हैं। फास्फोरस की कमी को ठीक करने हेतु विभिन्न फास्फोरस युक्त उर्वरकों की निर्धारित मात्रा को मृदा में प्रयोग करना चाहिए। तथा पोटैशियम डाई हाईड्रोजन फास्फेट (0.1%) का छिड़काव करने से भी फास्फोरस की आपूर्ति की जा सकती है।

पोटैशियम तत्व की कमी : पोटैशियम की न्यूनता से पत्तियाँ छोटी हो जाती हैं तथा वृद्धि धीमी पड़ जाती है। इसकी कमी का स्पष्ट लक्षण है कि ऊपरी तना आसानी से टूट जाता है। पोटैशियम कमी के लक्षण प्रायः फलों में दिखाई देते हैं। फल सामान्यतया छोटे रह जाते हैं तथा इनका छिलका पतला एवं चिकना हो जाता है। जिन फलों में पोटैशियम की कमी होती है उनका रंग सामान्य फलों से अच्छा दिखाई देता है। पोटैशियम की कमी को ठीक करने हेतु 1.0 प्रतिशत पोटेशियम नाईट्रेट (1.0 कि. ग्रा./100 ली. पानी) का छिड़काव करना चाहिए तथा इसका प्रयोग अप्रैल, मई एवं जून के महीनों में करने से उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है।

किन्नों के हानिकारक कीटों एवं बीमारियों के प्रबन्धन हेतु वर्षभर के क्रियाकलाप

क्रियाकलाप का समय

 

नियंत्रणकारी अवयव एवं तकनीक

 

लक्षित नाशीजीव

 

बसन्त ऋतु(फरवरी-मार्च)

1.  फलों की तुड़ाई पूरा होने पर वृक्षों की कटाई-छटाई करें। और सूखी टहनियों को हटा दें। इसके उपरान्त बोर्डो मिश्रण (2:2:250) अथवा कॉपर आक्सी क्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यू पी. (3 ग्राम/लि. पानी) का छिड़काव करें।

2.  पौधों की कटाई-छंटाई छतरीनुमा आकार में करनी चाहिए जिससे अधिकतम प्रकाश नीचे तक पहुँच सके व प्रकाश का अवरोध कम से कम हो।

3.  प्रायः फल तुड़ाई के बाद फरवरी के अन्त में या मार्च के प्रारम्भ में जब कलिकाएं फूलने की अवस्था में होती हैं तब नींबूवर्गीय के सिल्ला का प्रकोप देखा जाता है। पहले यह कीट बागान के किनारे वाले पेड़ों पर दिखाई देता है। यदि इसका प्रकोप प्रारंभिक अवस्था हो तो लेकेनीसिलियम लेकेनाई 5 ग्राम/ली. पानी (1x10 कोनीडिया/ मिली) या डाईमिथोट (30 ई.सी.) 25 मिली/10 ली. की दर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। इस कीट की (प्रथम और द्वितीय) निम्फ अवस्था में छिड़काव करने से अधिकतम रोक थाम की जा सकती है।

4.  मार्च में यदि कीट का आक्रमण फिर से देखा जाए तो इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल.) 4 मिली/10 ली. पानी की दर से पानी में मिलाकर छिड़काव करें। नींबू का सिल्ला, पर्णसुरंगक, थ्रिप्स और एफिडस के प्रबन्धन के लिए यदि आवश्यकता हो तो थाइमिथोक्जेम (25 डब्ल्यु.जी.) को 3 ग्रा/10 ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें तथा 10 दिन के बाद इमिडाक्लोप्रिड का छिड़काव करना चाहिए। यदि आवश्यकता हो तो 8 दिन बाद डाइमिथोएट का छिड़काव करना चाहिए।

5.  फाइटोफ्थोरा से प्रभावित पौधों के निचले भाग की छाल प्रायः कटी-फटी सी हो जाती है जिसमें से गोंद निकलने लगता है। अतः इसकी पुताई एक समान कर पाना मुश्किल होता है। इस कारण प्रभावित छाल को तथा इससे जुड़ी कुछ स्वस्थ हरी छाल को भी तेज धार वाले चाकू या खुरपे से उतार देना चाहिए। रोग ग्रस्त छाल को उचित तरीके से एकत्रित करके जला देना चाहिए कभी भी इसको खुले जमीन पर नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि इसके कारक कवक पुनः स्वस्थ पौधों को संक्रमित कर सकते हैं। यह क्रिया पूर्ण होने पर तने के मुख्य एवं निचले भाग पर जमीन से लगभग 2 फीट की ऊँचाई तक कवकनाशी, रिडोमिल गोल्ड* 2 ग्रा/100 मिली अलसी के तेल में मिलाकर ब्रुश से अच्छी तरह पुताई कर देनी चाहिए या ट्राइकोडर्मा हरजीनियम को 100 ग्रा/ली पानी में पेस्ट बनाकर ब्रुश से घावों पर अच्छी तरह पुताई कर दें। चार-पांच दिन बाद पेस्ट सूखने पर इस पर अलसी का तेल ब्रुश से लगाएं। यह प्रक्रिया एक साल में दो बार, फरवरी-मार्च और जुलाई-अगस्त के दौरान करना चाहिए।

 

नींबू-वर्गीय फलों का सिल्ला, एफिड एवं पूर्णसुरंगक

 

ग्रीष्म ऋतु (अप्रैल-जून फल लगाने के

बाद)

1.  लगभग एक फुट लम्बी एवं आधा फुट चौड़ी लोहे, की पतली पर्त काटकर उस पर पीले रंग की पालिस (पेन्ट) करके इस पर सरसों के तेल या ग्रीस का पतला लेप करके बागानों में इन ट्रैप्स को 10/हे. की दर से लगाते हैं। चिपकने वाले कीटों में यदि सफेद मक्खी सप्ताहिक रूप से 5-10/ट्रेप या अधि कि हों या लगभग 5 प्रतिशत पौधे प्रकोप से प्रभावित हों तो ट्राइजोफॉस* (40 ई.सी.) 25 मिली/10 ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। इस माह के दौरान प्रायः इनके अण्डों से नवजात या तों निकल चुके होते हैं या निकलने वाले होते हैं। यह छिड़काव सिल्ला एवं पर्ण सुरंगक की वृद्धि को भी रोकता हैं। ट्राइजोफोस* के छिड़काव के 8-10 दिन बाद यदि सफेद मक्खी का प्रकोप दिखाई दे तो इथियोन* (50 ई.सी.) का 20 मिली/10 ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। इससे माईट का प्रकोप भी कम हो जाता है। परन्तु दोबारा माईट का प्रकोप होने पर फेनाजक्विन 10 ई.सी.* का 15 मि.ली./10 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें।

2.  फल गिरने की दशा में औरियोफन्जिन (0.4 ग्रा)/कार्बनडेन्जिम* (10 ग्रा)+2,4-डी (0.1 ग्रा) के मिश्रण को प्रति 10 ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें, इससे फल गिरना रुक जायेगा। यदि बागान में या बाहर कपास या अन्य चौड़ी पत्ती वाली फसलें हों तो 2,4-डी की बजाए जी ए-3 (जिब्बरेलिक एसिड-3) का प्रयोग करना चाहिए।

3.  यदि सफेद मक्खी का प्रकोप अभी भी दिखाई दे तो ट्राइजोफॉस* (40 ई.सी.) 25 मिली./10 ली पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

4.  यदि फल गिरते हैं तो कार्बनडेजिम’ (50 डब्ल्यु.पी.) 10 ग्रा/10 ली पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

5.  वृक्षों के तनों को जमीन से 1 से 1.5 फीट तक बोर्डो पेस्ट 3:3:30 (3 किग्रा. चूना, 3 किग्रा. कॉपर सल्फेट और 30 ली. पानी) का ब्रश से लेप करें

 

सफेद मक्खी माइट एवं फल गिरना

वर्षा ऋतु (जुलाई- सितम्बर)

 

1.  इस दौरान नींबू का सिल्ला, पर्णसुरंगक एवं सफेद मक्खी आदि नाशीजीवों का प्रकोप दुबारा हो सकता है। इनके नियन्त्रण हेतु थायोमेथोक्जेम (25 डब्ल्यु. जी.) 3 ग्रा तथा ट्राइजोफोस* (40 ई.सी.) 25 मिली को 10 ली पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

2.  फलों को गिरने से बचाने के लिए 2,4-डी 0.1 ग्रा. तथा प्रोपीकोनाजोल* 10 ग्रा. (25 ई.सी.) को 10 ली पानी में मिश्रित करें या कार्बनडेन्जिम* (50 डब्ल्यु. पी.) 10 ग्रा / 10ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

3.  यदि सफेद मक्खी का प्रकोप अभी भी बना हुआ हो। और सूटी मोल्ड भी दिखाई दे तो ट्राइजोफॉस* (40 ई.सी.) एवं जिरम 27 एस सी* प्रत्येक की 25 मिली मात्रा को 10 ली पानी में मिश्रित करके छिड़काव करें।

4.  छाल भक्षक कीट के प्रकोप को उसके अपशिष्ट या मल पदार्थ की उपस्थित से पहचाना जा सकता है। यदि मल पदार्थ की उपस्थित हो और सुरंग भी दिखाई दे तो संक्रमित शाखाओं को साफ करके सुरंगों में 5-10 मिली डाइक्लोरवास* (0.1 प्रतिशत) से भीगी हुई रुई को भरें एवं इसको समुचित तरीके से ढक दें।

5.  अगस्त और सितम्बर माह में यदि फाइटोफ्थोरा का प्रकोप दिखाई दे तो फोसेटिल ए एल* (80 डब्ल्यु. पी.) 25 ग्रा. को 10 ली पानी में मिलाकर छिड़काव करें। प्रकोप अधिक होने पर बसंत ऋतु में अपनाई गई विधि से तने एवं शाखाओं और मृदा का भी उपचार कर सकते हैं।

6.  फल गिरने की स्थिति में 10 ग्रा. थायोफेनेट मिथाइल* (70 डब्ल्यु. पी.) को 10 ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

नींबू-वर्गीय का सिल्ला, सफेद मक्खी, पर्णसुरंगक, फल गिरना

 

 

 

 

सफेद मक्खी, छाल भक्षक कीट, सूटी मोल्ड स्कैब, फाइटोफ्थोरा एवं

फल गिरना

वर्षा ऋतु उपरान्त(अक्टूबर)

  • यदि सितम्बर में ट्राइजोफॉस* का छिड़काव किया गया है तो प्रायः सिट्रस सिल्ला का प्रकोप अक्टूबर में नही दिखाई देगा। फिर भी यदि इसका प्रकोप दिखाई दे तो थाइमिथोक्जेम (25 डब्ल्यु.जी.) 3 ग्रा. /10 ली की दर से पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
  • फलों का रस चूसने वाले कीटों की संख्या नियंत्रित करने के लिए खराब गिरे हुए फलों को नष्ट करें। शाम के समय जलाकर धुआँ उत्पन्न करें और नीम का तेल (1 प्रतिशत) या मैलाथियॉन* (50 ई.सी.) 2 मिली/ली. पानी की दर छिड़काव करें।
  • कैन्कर (नासूर) स्कैब के प्रबन्धन हेतु स्ट्रेप्टोसाइक्लिन (1 ग्रा) एवं कॉपरआक्सीक्लोराइड या कॉपर हाइड्रोक्साइड (25 ग्रा) को 10 ली पानी में मिलाकर छिड़काव करना चहिए ।

सिट्रस सायला, फलों का रस चूसने वाला व्यस्क एवं कैन्कर स्कैब

 

स्त्रोत: राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र

3.05882352941

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