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यौन शोषण

इस भाग यौन शोषण में के बारे में जानकारी उपलब्ध कराई गई है।

भूमिका

लड़कियों का शोषण महिलाओं के शोषण से जुड़ा है। पम्परा से बंधे हमारे समाज में लड़कियों और महिलाओं को वस्तु के रूप में देखा जाता है। यह दुःख की बात है कि बच्चों से सम्बन्धित कानून सिर्फ संगठित क्षेत्रों के लिए बने है और अनौपचारिक क्षेत्र आज भी उनसे बचे हुए हैं। भारत में बालिका मजदूरों का जमघट विशेषकर अनौपचारिक क्षेत्रों में दिया जाता है जहाँ उनका सामाजिक आर्थिक तथा यौन शोषण होता है। मालिकों द्वारा उसे सबसे सस्ती वस्तु के रूप में देखा जाता है

भारत में बाल मजदूरों के लिए कानून में अवश्य ही कुछ प्रावधान है लेकिन उनपर अमल बहुत कम होता है। बहुत पहले बाल मजदूरों के स्वास्थ्य पर काम के प्रभाव की एक रिपोर्ट निकली थी लेकिन बाद में इस पर कार्य रुक गया। लड़कियों के स्वास्थ्य पर प्रभाव के बारे में अध्ययन बहुत कम हैं। देश से बाल मजदूरों के शोषण को दूर करने के लिए कठोर क़ानूनी कदम उठाए जाने चाहिए। जिससे सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन लाया जा सके। मजदूरों का शोषण वास्तव में मुलभूत मानवीय अधिकारों का उल्लंघन करना है तथा साथ ही ग्लोबल अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक विकास को एक चुनौती है।

अन्तराष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी बाल मजदूरी को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाए हैं। ’बाल मजदूरी के निष्कासन के लिए अन्तराष्ट्रीय कार्यक्रम’ नामक परियोजना 199२ में आरम्भ की गई। बाल श्रम से सम्बन्धित राष्ट्रीय कार्यक्रमों तथा नीतियों के साथ-साथ कार्य प्रधान प्रोगार्मों के प्रोत्साहित किया गया तथा उन्हें समर्थन दिया गया। आई.पी.ई.सी. द्वारा कुछ प्राथमिक क्षेत्रों के लिए कार्यवाही की जा चुकी है। वे हैं। (1) जोखिमपूर्ण कार्यों से बाल रोजगार को बचाना (२)14 वर्ष से कम आयु के लड़कियों सहित बच्चों को सुरक्षा प्रदान करना (3) कारखानों, परिवार उद्योग, वस्त्र तथा चमड़ा उद्योग, खाद्यान प्रक्रिया निर्माण कार्य आदि क्षेत्रों से बच्चों को सुरक्षित रखना। 1996 में बच्चों व्यवसायिक तथा यौन शोषण के खिलाफ बाल मजदूर पर विश्व कांग्रेस सहित अनेक अन्तराष्ट्रीय बैठकें तथा कान्फ्रेंस हुई।

भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा 1994 में राष्ट्रीय बाल श्रम मजदूर कार्यक्रम के लिए 850 करोड़ रुपये देने घोषणा की गई। जिसका उद्देश्य था कि पांच साल में 20 लाख बच्चों को जोखिम भरे व्यवसायों से निकालकर पुनर्वास कराना था। इन सेवागर्त विशिष्ट स्कूल खोले जाने जहाँ उन्हें अनौपचारिक शिक्षा, अंशकालीन प्रशिक्षण, वजीफा, भोजन तथा स्वास्थ्य जाँच आदि सुविधाएँ प्रदान किये जाने का प्रावधान रखा गया है। परन्तु हमें यह कहते हुए खेद है कि बाल श्रम पर बनी यह योजना विफल हो गयी। (टाइम्स ऑफ इंडिया 10 अक्तूबर 1997)

बाल श्रमिकों के लिए अनेक राष्ट्रीय विकास कार्यक्रम बनाये जाने चहिये  जिससे नवीन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का निर्माण किया जाए जिसमें से बाल श्रमिकों का निष्कासन किया जा सके। तथा बच्चों को वेतन अर्जित करने की अपेक्षा उन्हें स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इसी समय विभिन्न एजेंसियों द्वारा बाल मजदूरों की शिक्षा तथा जोखिमपूर्ण एवं अवांछनीय मान्यताओं के प्रति जागरूकता का विकास किया जाना चाहिए।

ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में बच्चों के सामाजिक आर्थिक स्थितियों तथा शोषण के विरुद्ध लड़ाई के लिए योजनाओं बनाई जानी चाहिए। लड़के-लड़कियों के पुनर्वास के लिए प्रभावशाली कल्याणकारी कार्यक्रम बनाये जाने चाहिए। इसमें लड़कियों के पुनर्वास पर विशेष ध्यान देना होगा। जोखिमपूर्ण कार्यों में बाल श्रम के समावेश पर प्रतिबंद लगा देना चाहिए। अभी तक कुछ जोखिमपूर्ण तथा खरतनाक कार्यों में बालश्रम पर निषेध को प्रभावशाली रूप में क्रियान्वित नहीं किया गया है।

हम आशा करते हैं की लड़कियों की रक्षा की जाएगी तथा उनके अधिकारों को सुरक्षित किया जायेगा। लड़कियों का समग्र विकास होना चाहिए तथा उन्हें सामाजिक, आर्थिक तथा यौन शोषण से सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। लड़कियों की शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक शिक्षा तथा सामाजिक विकास नैतिक सामाजिक तथा आर्थिक रूप से सभी समाजों के लिए अनिवार्य है।

उत्तरदायी कारक

भिन्न-भिन्न आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक परस्थितियों के अंतर्गत बालिकाओं द्वारा स्वयं को श्रम के स्रोत के रूप में प्रस्तुत करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। बालिका के लिए श्रम हर दिन रोटी के लिए लड़ाई तथा हर रत सुरक्षा तथा बचाव के लिए संघर्ष है।

दयनीय परस्थितियों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब परिवार अपनी पुत्रियों को बहुत कम उम्र में काम करने के लिए भेजते हैं। भारत में प्रवास तथा ऋण भी बाल मजदूरी के कारण है। आर्थिक ऋणग्रस्तता के कारण ग्रामीण प्रवासी परिवारों के अधिकतर बच्चों को काम तलाशना पड़ता है। उनके द्वारा शहरी क्षेत्रों में घरेलू नौकर का काम विशेषकर खोजा जाता है बहुत से मामलों में गाँव तथा शहरों में काम करने वाली अल्पवयस्क लड़कियों को अक्सर कम मजदूरी दी जाती है और माता-पिता अथवा नियोजकों द्वारा उनका शोषण किया जाता है। लड़कियों को आसानी से उपलब्ध होने वाली वस्तु के रूप में देखा जाता है। बालिका मजदूरों की संख्या  में वृद्धि के उत्तरदायी कारक है जनसंख्या में तीव्र वृद्धि, लाभप्रदता, शोषण तथा निरक्षता में वृद्धि तथा मजदूर माता-पिता द्वारा उपेक्षा। इन समस्त कारकों के साथ बालिका मजदूरों का एक पारंपरिक सम्बन्ध है जो कुछ विशेष आर्थिक गतिविधियों में संलग्न हैं जैसे कश्मीर का शाल बनाने का उद्योग लखनऊ क चिकन उद्योग, मिर्जापुर कालीन उद्योग तथा बनारस का जरी की कढ़ाई का काम। बालिकाओं को श्रम बाजार में खींचने के लिए तुरंत अधिक लाभ की प्रवृत्ति भी जिम्मेदार है। नियोजकों का प्राथमिक उदेश्य लाभ कमाना होता और वे उस श्रम शोषण करना गलत नहीं समझते जो काफी सस्ता है। कालीन उद्योग, माचिस की फैक्ट्रियों, ग्लास तथा चूड़ी उद्योग में यह पहलू साफ दृष्टिगोचर है।

बालिका मजदूर: सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

भारत में अधिकतर बालिका मजदूर गरीब, निरक्षर तथा पोषित परिवारों की होती है। जो या तो भूमिहीन खेतिहर मजदूर या थोड़ी बहुत जमीन के मालिक होते हैं या फिर शहरों को स्लम बस्तियों में रहने वाले प्रवासी वर्ग। अधिकांश मामलों में ये लोग अनुसूचित जाति अथवा जनजाति से सम्बन्ध रखते है। यह पाया गया है कि पारिवारिक आवश्यकता की पूर्ति में सहयोग देने के लिए परिवार के सदस्य तथा माता-पिता द्वारा अपनी लड़कियों को काम पर भेजा जाता है।

जनगणना की रिपोर्ट बताती है कि शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में बालिका मजदूरों की संख्या अधिक है। कुल बालिका मजदूरों का 90 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में तथा केवल 10 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में विद्यमान है। ग्रामीण भारत में लड़कियों खेतों तथा घर में अपने माता-पिता के साथ काम करती हैं। वे औसतन दिन में 9 घंटे तथा साल में 315 दिन काम करती है। (अग्रवाल और अग्रवाल 1996:355) 7-14 साल की आयु समूह की कृषि क्षेत्र में काम करने वाली लड़कियों में 88 प्रतिशत अनुसूचित जाति तथा जनजाति से सम्बन्ध रखती हैं और अशिक्षित हैं।

शिवकाशी माचिस उद्योग में बालिका मजदूर बड़ी संख्या में कार्यरत हैं जिनकी सामाजिक पृष्ठभूमि दलित वर्ग की है। समान्यतः वे 4-12 वर्ष के आयु वर्ग की लड़कियाँ है। इसी प्रकार कश्मीर घाटी के शाल बनाने तथा कालीन उद्योग में कार्यरत बालिका मजदूर भी 5-12 साल की है और गरीब मुस्लिम परिवारों से सम्बन्ध रखती हैं और जिनमें बहुसंख्यक बंधुआ स्थिति में काम करती हैं।

मिर्जापुर के कालीन उद्योग में भी 14 वर्ष से कम आयु की लड़कियाँ कार्यरत हैं। वे पलामू जिले से लाई गई हैं व भूमिहीन, गरीब किसान तथा बुनकर परिवारों से होती हैं। (मित्तल भद्रा 1999)

कांचीपुरम के हथकरघा उद्योग में कार्यरत अधिकतर बालिका मजदूर बुनकर परिवारों से सम्बन्ध रखती हैं। समान्यतः उन्हें पड़ोसी गाँवों से लाया जाता है और उनमें से 50 प्रतिशत बंधुआ मजदूर हैं।

फिरोजाबाद के कांच काटने तथा चूड़ी बनाने के उद्योग में सामन्यतः 5-12 वर्ष की लड़कियाँ  कार्यरत हैं। वे या तो गिलास फैक्टरी के मजदूरों की बच्चियां हैं या फिर खेतिहर मजदूरों की संतानें हैं। उनमें से अधिसंख्य परिवार द्वारा पैसा एडवांस लेने के एवज में काम करती हैं। सूरत की हीरा काटने तथा पोलिश करने तथा जयपुर में कीमती पत्थर काटने के उद्योग में अधिक संख्या (85 प्रतिशत) प्रवासी मुस्लिम परिवारों की लड़कियाँ की है, जिनके परिवार या तो पारम्परिक कृषि पृष्ठभूमि से सम्बन्धित हैं या फिर परम्परागत पारिवारिक कलाओं से सम्बन्धित। वे 6-२ साल के आयु वर्ग की हैं और लम्बे अनुबंध के अंतर्गत पारिवारिक देखरेख में काम करती  है।

अलीगढ़ उत्तर प्रदेश के ताला निर्माण उद्योग में 8-14 साल की लड़कियाँ काम करती हैं और उनमें से अधिकांश मुस्लिम परिवारों से सम्बन्ध रखती हैं जो भूमिहीन कृषि मजदूर हैं और उनके परिवार ऋणभर तथा अनुबधों से ग्रस्त है।

ईंट बनाने के उद्योग में काम करने वाली लड़कियों औसतन आयु 5-14 वर्ष है और वे भूमिहीन कृषि मजदूर अनुसूचित जाति’ तथा जनजाति एवं अनपढ़ परिवारों की लड़कियाँ हैं।

पत्थर की खादानों में काम करने वाली लड़कियाँ 5-14 वर्ष की होती है और मुख्यतः भूमिहीन कृषि मजदूर वर्ग से आती है। जिनकी पृष्ठभूमि अनुसूचित जाति तथा जनजाति की है उनमें से 50 प्रतिशत अग्रिम राशि लेने के कठोर अनुबंधों का शिकार हैं। निर्माण उद्योग में 5-14 वर्ष की लड़कियाँ कार्यरत है। वे भी भूमिहीन कृषि मजदूर परिवारों से सम्बन्धित हैं तथा जिनकी अनसूचित जाति एवं जनजातीय पृष्ठभूमि है और जो अनपढ़ है। उनमें से कुछ के परिवार ऋणभार तथा बन्धनों से ग्रस्त है।

शहरों में घरेलू नौकरानियों की बड़ी संख्या सामान्यतः झुग्गी-झोपड़ी इलाकों में रहने वाली हैं। इन परिवारों के पास सिवाय अपने श्रम के कुछ और नहीं होता। इनकी पृष्ठभूमि दलित वर्ग की है।

लखनऊ का चिकन उद्योग भी कम मजदूरी पर बड़ी संख्या में लड़कियों को रोजगार देता है। वे भी गरीब तथा निरक्षर परिवारों से सम्बन्ध रखती है। चिकन का काम उनके लिए पारम्परिक व्यवसाय होता है। ये लड़कियाँ मुस्लिम परिवारों की होती हैं।

बनारस में पारंपरिक जरी की कढ़ाई के काम में बड़ी संख्या में लड़कियाँ काम करती है। जो भूमिहीन, निरक्षर पृष्ठभूमि के मुस्लिम परिवारों से सम्बन्ध रखती हैं।

केरल, कोजीकोड, उत्तरी चेन्नई तथा कन्याकुमारी (तमिलनाडु) के मत्स्य उद्योग में लड़कियाँ  अधिकतर पारिवारिक श्रम के रूप में काम करती हैं।

दक्षिण भारत में बीड़ी उद्योग में अधिकांश लड़कियाँ भूमिहीन, सूखाग्रस्त कृषि परिवारों से सम्बन्ध रखती हैं। वे भी अनुसूचित जाति तथा जनजाति के परिवारों से सम्बंध रखती हैं जो निरक्षर है और घरेलू श्रम के रूप में कार्य करती हैं।

अनेक लड़कियाँ सड़क से सामान बीनने का काम भी करती हैं ये अधिकांशतः वे फुटपाथी बच्चे होते हैं जो गरीबी तथा परिवार की ख़राब स्थिति के कारण अपने घर से भाग जाते हैं। ये स्व-रोजगार प्रवासी बाल मजदूर होते हैं।

उत्तर-पूर्वी भारत के विशेषकर असम और पशिचम बंगाल के चाय के बागानों में लड़कियाँ काफी संख्या में कार्यरत हैं। जो इनमें से अधिकांश दूसरे प्रान्तों से आये परिवारों से हैं। जो छोटानागपुर, संथाल परगना और मध्यप्रदेश के रायगढ़ एवं छत्तीसगढ़ से सटे हुए क्षेत्रों तथा उड़ीसा के गंजाम और किवोनझर जिले के आदिवासी समुदायों से सम्बन्ध रखते हैं। उनकी पारम्परिक कृषिय पृष्ठभूमि है तथा इस कार्य में उनका प्रवेश घर के अन्य सदस्यों की सहायता के रुप में होता है।

विभिन्न उद्योगों में बाल मजदूर  का विस्तार

भारत में बाल श्रमिकों से सम्बन्धित आंकड़े या तो अंतरिम हैं या आंशिक 1.35 करोड़ का आंकड़ा (1981 की जनगणना) तथा 1.736 करोड़ (एनएसएस :1983) इनका उपयोग सामान्यतः आधार रेखा के रूप में किया जाता है क्योंकि ये अन्तराष्ट्रीय बाल वर्ष (1979) के अधिक निकट है। उपलब्ध आंकड़े वास्तविकता से दूर और कम लगते हैं क्योंकि ये संकुचित परिभाषा पर आधारित हैं अर्थात “5-14 वर्ष की आयु के बच्चों की लाभकर गतिविधियों में भागीदारी। ” इसमें तथाकथित अनुत्पादक, अंश कालिक तथा गृह आधारित उद्योग धंधों की गतिविधियों जो उत्पादन के औपचारिक सम्बन्धों में नहीं आती, भी सम्मिलित हैं।

इस परिभाषा के गंभीर परिणाम स्पष्ट तथा इस रूप में देखे जा सकते हैं की इसमें से बहुसंख्यक श्रमिक बालिकाओं को निकाल बाहर किया गया है। इस तथ्य का स्पष्ट प्रतिबिम्ब 1981 की जनगणना के आंकड़ों में देखा जाता है जिसमें बाल श्रमिकों की अपेक्षा श्रमिक बालिकाओं को हाशिये पर धकेले गए (दरिद्र) श्रमिकों की श्रेणी में रखा गया है।

यही कारण है कि बाल श्रमिकों के गैर सरकारी आंकड़े 4.40 करोड़ से लेकर 5 करोड़ तक के आंकड़ों (वर्ष 1985 में ओ. आर जी.) को वास्तविकता के समीप माना जाता है। जहाँ तक वास्तविक आधार रेखा की स्थिति का सम्बन्ध है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि बाल मजदूरी की संवृत्ति दिन प्रतिदिन घटती ही चली जा रही है।

1971 से 1981 के मध्य इसमें 3.91 प्रतिशत की वृद्धि हुई (1.075 करोड़ से 1.17 करोड़) ग्रामीण क्षेत्रों में २.२1 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्रों में 25-64 प्रतिशत। सर्वाधिक उल्लेख करने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यद्यपि ग्रामीण क्षेत्रों में बाल श्रमिकों का अनुपात 8-24 प्रतिशत गिरा है तथापि दोनों क्षेत्रों में श्रमिक बालिकाओं का अनुपात बढ़ा है, 30-48 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में।

योजना आयोग की वर्ष 2000 के लिए प्रस्तुतियां ( VII ई वाई, पी, 1985-90) दर्शाती हैं कि सकल श्रम शक्ति में बाल श्रमिकों का अनुमान केवल ग्रामीण क्षेत्रों में ही गिरेगा। किन्तु शहरी क्षेत्रों में यह अनुमान बढ़ता ही रहेगा। किन्तु सम्पूर्ण संख्या की वृद्धि की दृष्टि से गिरावट आयेगी। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि शहरी क्षेत्रों में कामकाजी बच्चों, बालक तथा बालिकाओं दोनों, की संख्या पिछले तीन दशकों में तीव्र गति से बढ़ती रही है और संख्या वृद्धि की यह लहर जारी है।

1981 की जनगणना में 0-14 वर्ष की आयु समूह के श्रमिकों का स्थानिक वितरण जब दरिद्रता,  साक्षरता के स्तर, शहरीकरण के स्तर इत्यादि संवृत्तियों जैसे अस्थिर कारकों के साथ जुड़ा होता है तो वह एक भ्रामक चित्र ही प्रस्तुत करता है। हम देखते हैं कि यह अस्थिर कारक एक समान नहीं होते।

कामकाजी बच्चों में से अनुमान 85 प्रतिशत दस प्रमुख राज्यों में केन्द्रित हैं। ये राज्य हैं आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटका, तमिलनाडु, राजस्थान तथा उड़ीसा इत्यादि (बाल श्रमिकों की कुल संख्या के अनुसार सूचीबद्ध) जहाँ आंध्रप्रदेश में बाल श्रमिकों की संख्या सर्वाधिक है वही शहरी बाल श्रमिकों की दृष्टि से तमिलनाडु का तमिलनाडु का स्थान सबसे ऊपर है।

किन्तु 1971 तथा 1981 के मध्य उन राज्यों में बाल श्रमिकों की वृद्धि का अनुमान सर्वाधिक देखा गया ओ इन दस प्रमुख राज्यों की सूची में नहीं आते। ये राज्य है जम्मू एवं कश्मीर (55.7 प्रतिशत), उसके पश्चात दिल्ली (४१.२ प्रतिशत), तथा मेघालय (30 प्रतिशत) इत्यादि। उच्च अनुपात वाले राज्यों में आनुपातिक वृद्धि महाराष्ट्र (27.9 प्रतिशत) मध्यप्रदेश (23.4 प्रतिशत) तमिलनाडु (22.8 प्रतिशत) कर्नाटका (19.4 प्रतिशत) इसके विपरीत केरल में सर्वाधिक उल्लेखनीय 48.२ प्रतिशत की कमी देखी गई जिसे सामाजिक विकास के क्षेत्र में केरल का  विलक्षण अनुभव ही कहा जायेगा इसके साथ ही बिहार में 15.7 प्रतिशत तथा उत्तर प्रदेश में 6.1 प्रतिशत की कमी देखी गई  किन्तु इनके कारण केरल जैसे नहीं है। इन दोनों राज्यों में पलायन होने के कारण बाल श्रमिकों की संख्या में कमी हुई है।

जहाँ तक कामकाजी बच्चे के ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में विभाजन का सम्बन्ध है इसका राज्यवर चित्र लगभग के समान ही है। पश्चिम बंगाल के अपवाद को छोड़कर वही राज्य शहरी बाल श्रमिकों की भारी संख्या वाले क्षेत्रों की दर्शाते हैं। उनके बाल श्रमिकों की स्थिति अत्यंत गभीर है किन्तु उनके ग्रामीण क्षेत्रों में बाल श्रमिकों की संख्या कम बनी हुई है।

तमिलनाडु में श्रमिक बालिकाओं की सर्वाधिक संख्या (0.56 मिलियन) पाई जाती है। इसके पश्चात आंध्रप्रदेश(0.045 मिलियन), कर्नाटका (0.039 मिलियन), महाराष्ट्र (0.034 मिलियन) और राजस्थान और उत्तरप्रदेश (0.01 मिलियन प्रत्येक) का स्थान है।

अतः बाल श्रमिकों की कुल जनसंख्या तथा अनुपात दोनों ही दृष्टियों से तीन दक्षिणी राज्य अर्थात आंध्रप्रदेश, कर्नाटका तथा तमिलनाडु एक समूह अथवा विशेष क्षेत्र बन जाते हैं। क्योंकि यहाँ अधिकांश बाल श्रमिक पाए जाते हैं। दूसरे दो समूह हैं मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश तथा बिहार और महाराष्ट्र राजस्थान तथा गुजरात।

कुतुहल का विषय है कि बच्चों की जनसंख्या के अनुसार बाल श्रमिकों का अनुपात जो इस संवृत्ति का सबसे अच्छा सूचक अंक है, क्रमशः बिहार तथा उत्तरप्रदेश में 5-9 तथा प्रतिशत (केवल ग्रामीण क्षेत्र ) है जबकि उनकी तुलना में यह अनुमान आंध्रप्रदेश में 16-59 प्रतिशत तथा मध्यप्रदेश में  13-90 प्रतिशत है। यद्यपि शहरी बल श्रमिकों के मामले में उत्तरप्रदेश का स्थान कहीं ऊँचा है। ज्ञातव्य है कि दोनों ही राज्यों में 1971-81 के मध्य ग्रामीण तथा शहरी दोनों ही क्षेत्रों  में बाल मजदूरी की संवृत्ति में गिरावट दर्ज की गई किन्तु प्रति व्यक्ति आय का स्तर पहला दो राज्यों में ऊँचा है। एक अन्य तथ्य ध्यान दने योग्य है कि गरीबी के आधार पर बाल श्रमिक बाहुल्य वाले राज्य वे नहीं हैं जो अपेक्षाकृत गरीब हैं यानि यह जरूरी नहीं हैं कि जो राज्य अधिक गरीब हों वहाँ बाल मजदूरों की संख्या अधिक हो। केरल का दरिद्रता सूचक अंक 26.8 प्रतिशत है, गुजरात 8.75 प्रतिशत ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में 1.9 प्रतिशत की तुलना में उसके बाल श्रमिकों की संख्या का अनुमान 1.5 ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्र में 1.२ प्रतिशत है।

ग्रामीण क्षेत्रों के साथ तुलना करने पर शहरी क्षेत्र में दरिद्रता तथा बाल मजदूरी का सम्बन्ध अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। शहरी क्षेत्रों की दरिद्रता के मामले में उत्तरप्रदेश का सूचक अंक सबसे ऊँचा है उसके पश्चात् तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटका तथा आंध्रप्रदेश का स्थान  आता है। इन राज्यों में शहरी बाल श्रमिकों की संख्या भी सर्वाधिक है। अनेक मामलों में शहरी साक्षरता का स्तर इसके साथ जुड़ा हुआ नहीं है। उदाहणार्थ 70.9 प्रतिशत शहरी साक्षरता की दर जिसे अपेक्षाकृत ऊँची दर माना जाता है, के साथ सर्वाधिक शहरी बाल श्रमिकों वाला राज्य भी है। दिलचस्प बात तो यह है कि उन राज्यों में बाल श्रमिकों की संख्या अधिक है जिनका शहरीकरण कम हुआ है। अतः इस संवृत्ति का वर्णन करने के मामले में अनौपचारिक अथवा असंगठित क्षेत्रों का सापेक्ष आकार अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होता है।

एक बार पुनः बाल मजदूरी की संवृत्ति तथा बालक बेरोजगार की भयावहता के मध्य परस्पर सम्बन्ध मजबूत दिखाई देते हैं। किन्तु ये मजबूत सम्बन्ध शहरी क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं। उदाहणार्थ तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटका तथा आंध्रप्रदेश तथा उत्तरप्रदेश भले ही उनका भौगोलिक आकर कुछ भी क्यों न हो, में पंजीकृत पश्चिम बंगाल में भी, जहाँ बेरोजगार लोगों की संखया सर्वाधिक है, बाल मजदूरी की संवृत्ति बहुत कम थी।

अतः आंकड़ों के पूर्ण योग की जानी मानी सीमाओं के अतिरिक्त दरिद्रता तथा बाल मजदूरी की संवृत्ति के मध्य अन्य माध्यमिक अस्थिर कारक अवश्य है। इस संवृत्ति की संस्थागत ढांचे के अंतर्गत अधिक अच्छे ढंग से समझा जा सकता है। अधिक से अधिक गुणात्मक आंकड़े समस्या के प्रति अच्छी समझ बनाएंगे औए इस समस्या के साथ सिमटने के लिए अधिक प्रभावकारी कार्यनीति बनाने में सहायता देंगे।

अन्तराष्ट्रीय तुलनाएं किसी शुद्ध संरचना के अंतर्गत नहीं आती। ये एक या दो समीक्षाओं के लिए आधार भूमि उपलब्ध करा सकती है। बाल मजदूरी की संवृत्ति वाले अनेक राज्यों जैसे तमिलनाडु कर्नाटका तथा आंध्रप्रदेश को पहले से ही सामाजिक न्याय के पथ का अनुसरण करने वाले राज्य कहा जा सकता है। वहाँ सत्ता पिछड़े वर्गों के पास हस्तांतरित हो गई और उसके साथ-साथ नौकरियों के आरक्षण की व्यवस्था लागू हुई। लेकिन इससे बाल मजदूरी उन्मूलन होने का संकेत नहीं मिलता है। इनके विपरीत आंध्रप्रदेश सर्वाधिक बाल मजदूरों वाला राज्य है। केरल, विशेष रूप से ग्रामीण बाल मजदूरी के सम्बन्ध में, कुछ सुझाव अवश्य देते हैं। वह यह कि बाल मजदूरी उन्मूलन हेतु आवश्यक मूल ढांचा तैयार करने और सामाजिक जागरूकता लाने की आवश्यकता है। और यही अधिक सार्थक साधन है। भारत के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय असामनता एवं विकास के संसाधनों की उपलब्धि भी बाल मजदूरों की  स्थिति को प्रभावित करती है। साधनों की कमी सबसे प्रथम प्रभाव बलिकाओं के लिए चलने वाली परियोजनाओं पर पड़ता है।

अंतर क्षेत्रीय वितरण

ग्रामीण एव शहरी दोनों ही क्षेत्रों में वितरण का आंचलिक ढांचा तथा औद्योगिक श्रेणियों में परिवर्तन होता रहता है। यह सत्य है कि 1981 तक लगभग 9२ प्रतिशत कामकाजी बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में ही केन्द्रित थे किन्तु शहरी क्षेत्रों में बाल मजदूरी की संवृत्ति तीव्र गति से बढ़ती रही है। गैर कृषि धंधों में भी बाल श्रमिकों की सहभागिता का सम्मान बढ़ रहा है। अधोलिखित तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं।

खतरनाक कामों में बढ़ते बाल मजदूर

खतरे वाले कामों में अधिक से अधिक बाल श्रमिकों की भर्ती होती चली जा रही है। ये ऐसे क्षेत्र  हैं जहाँ बाल मजदूरी पर प्रतिबन्ध के लिए क़ानूनी आधार को स्वीकार किया गया है। व्यावसायिक स्वास्थ्य सम्बन्धी राष्ट्रीय संस्थान द्वारा जाति एक रिपोर्ट के अनुसार जनगणना आंकड़ों के विशलेषण से पता चलता है कि अधिक खतरे वाले उद्योगों में घरेलू उत्पादन इकाइयों की अपेक्षा बाल श्रमिकों की भागीदारी अधिक है। वर्ष 1961 तथा 1981 के मध्य इसमें दो गुणा से अधिक (0.308 मिलियन से 0.761 मिलियन) वृद्धि हुई है।

कृषि, औद्योगिक, निर्माण एवं सेवाओं के अन्य क्षेत्रों में बंधुआ मजदूरी अभी भी जारी है। वर्ष 1977-78 में एक देश व्यापी सर्वेक्षण (एन.एस आई.जी. पी एफ) से पता चला कि कृषि क्षेत्र में कार्यरत बंधुआ श्रमिकों का एक बड़ा भाग 16 वर्ष से कम आयु समूह का था और तीन दक्षिणी राज्यों आंध्रप्रदेश (20.0 प्रतिशत), कर्नाटक (10.3 प्रतिशत), तमिलनाडु (8.7 प्रतिशत) में इनकी संख्या कहीं अधिक थी। भारतीय बाल कल्याण परिषद की रिपोर्ट के अनुसार 8-15 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों में दासत्व बढ़ रहा है। अकेले मिर्जापुर भहोदी अंचल के प्रमुख कालीन उद्योग में बंधुआ बाल मजदूरों की संख्या 50,000 है। भट्टा पत्थर तोड़ने, पशुओं के बाड़ों और चाय तथा चीनी के बागानों में भी बंधुआ बाल श्रमिकों की रखे जाने के समाचार मिले हैं। कालीन जैसे भारी मुनाफे वाले उद्योगों में बाल मजदूरों  की भर्ती के लिए संगठित प्रणाली विकसित हो चुकी है। यह प्रणाली धीरे-धीरे दक्षिण भारत के कपड़ा उद्योग में भी फैलती जा रही है, विशेषकर तिरुर  में।

लैंगिक पक्षपात

श्रमिक बालिकाओं की वृद्धि दर में उल्लेखनीय भिन्नता इसी तथ्य के आलोक में देखा जा सकती है कि ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में जनगणना आंकड़ों में लैंगिक पूर्वाग्रह विद्यमान है। मसलन अपनाई गई परिभाषा के अनुसार बालिका मजदूरों का काम परिलक्षित नहीं होता। यह देखा गया है कि बहुसंख्यक बालिका मजदूर अनुत्पादक तथा गृह आधारित उद्योग-धंधों की गतिविधियों में केन्द्रित है। उनकी भूमिका उस समय और भी हाशिये पर चली जाती है जब लड़कों के श्रम को लड़कियों द्वारा किए गए श्रम की अपेक्षा अधिक महत्व दिया जाता है औए उन्हें (लड़कियों) गौण मजदूरों की श्रेणी में धकेल दिया जाता है।

श्रमिक बालिकाओं की संख्या में वृद्धि

ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत बालक तथा बालिका मजदूर अधिकतर कृषि कार्यों, खेत मजदूरी तथा पशुधन को संभालने जैसे कार्यों में केन्द्रित है। इनमें बालिकाएँ अधिक संख्या में होती है। श्रमिक बालिकाओं की घरेलू धंधों तथा अन्य सेवाओं में उपस्थिति उल्लेखनीय होती है। शहरी क्षेत्रों में बाल श्रमिक प्रमुख रूप से मेन्युफेक्चरिंग, निर्माण तथा अन्य सेवाओं जिनमें घरेलू सेवाओं को अवश्य सम्मिलित किया जाना चाहिए, में केन्द्रित होते हैं और श्रमिक बालिकाएँ शहरी क्षेत्र में अन्य सेवाओं में बालकों की अपेक्षा संख्या में अधिक होती है।

बाल मजदूरी का नारीकरण

बाल मजदूरी का नारीकरण हो रहा है। वर्ष 1971 तथा 1981 में मध्य 0-14 आयु वर्ग में बालकों की काम में भागीदारी की दर (वर्क परिशीपेशन  रेट)  में 6.55 प्रतिशत से गिरकर 5.58 प्रतिशत हो गई। इसके विपरीत उसी आयु वर्ग में श्रमिक बालिकाओं की कार्य भागीदारी की दर २.63 प्रतिशत से बढ़ कर २.95 प्रतिशत हो गई। यह वृद्धि ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में दर्ज की गई। इसका अर्थ है की श्रमिक बालिकाओं के साथ अभी भी सदियों पुराना पक्षपात जारी है जहाँ बालकों की अधिक संख्या को पाठशाला में भेजा जा रहा है, वहीं बालिकाओं को मजदूरी पर विवश किया जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार 2001 के बीच तक 14 वर्ष से कम उम्र की बालिका मजदूरों की सहभागिता की दर में 20 प्रतिशत वृद्धि होगी। ये दरें लड़कों की तुलना में अधिक हैं। श्रमिक बालिकाओं की आयु का ढांचा बालकों की अपेक्षा पहले ही कम है। 0-14 आयु वर्ग में यह ढांचा बालकों के 4.0 प्रतिशत की अपेक्षा बालिका श्रमिकों का 8.0 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह है कि श्रमिक बालिकाएँ अधिक शोषण एवं उत्पीड़न का शिकार होती है।

जनगणना के आंकड़ों में श्रमिक बालिकाओं का कार्य समान्य रूप से ‘अदृश्य’ होता है। तथापि एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 9 लाख श्रमिक बालिकाएँ हैं। यह देखा गया है कि श्रमिक बालिकाओं की बहुसंख्यक अनुत्पादक कामों तथा घरेलू धंधों की गतिविधियों में केन्द्रित होती है। कम मजदूरी वाले श्रमिकों में श्रमिक बालिकाओं की संख्या बालकों की अपेक्षा अधिक होती है। वर्ष 1971 से 1981 के मध्य 0-14 वर्ष आयु वर्ग में बालकों की सहभागिता की दर 6.65 प्रतिशत से कम होकर 5.48 प्रतिशत हो जाने जबकि श्रमिक बालिकाओं की सहभागिता की दर २.63 प्रतिशत बढ़कर २.९५ प्रतिशत हो जाने की रिपोर्ट मिली है।

बाल मजदूरी के निर्धारक तत्व

बाल मजदूरी की संवृत्ति  से सम्बन्धित आंकड़े एकत्रित करने की एक सुव्यवस्थित प्रणाली का आभाव है। इसका दुष्परिणाम इसके निर्धारकों द्वारा किये जाने वाले शोध कार्य पर पड़े बिना नहीं रहता। यह स्पष्ट है अधिकांश शोध कार्य अध्ययनों पर आधारित होते हैं। विशलेषण की अधिक तिथियाँ 1979-87 की अवधि की होती है। शायद संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1979 को अन्तराष्ट्रीय बाल वर्ष घोषित किया जाना ही शायद इसका प्रेरक तत्व हो।

बाल मजदूरी के निर्धारक तत्वों में घरेलू कामों के लिए आबंटित समय तथा जनन दर का प्रभाव पड़ता है। घरों में विद्यमान बच्चों की संख्या बाल श्रमिकों की संभावित आपूर्ति का निर्धारण करती हैं। अतः प्रजनन दर बाल श्रमिकों की आपूर्ति का निर्धारक तत्व है। आपूर्ति पक्ष की दृष्टि से बाल मजदूरी के दो प्रमुख निर्धारक तत्व होते हैं। ये हैं –श्रम बाजार की संरचना तथा उपलब्ध उत्पादन प्रौद्योगिकी।

स्रोत:- जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची।

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