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दार्शनिक सिद्धांत के रूप में आदर्शवाद

इस लेख में दार्शनिक सिद्धांत के रूप में आदर्शवाद के विषय में अधिक जानकारी दी गयी है।

परिचय

आदर्शवाद शब्द अंग्रेजी के आइडियलिज्म शब्द का रूपांतर है, जिसकी उत्पति प्लेटो के विचारवादी सिद्धांत से हुई है। इस सिद्धांत के अनुसार अंतिम सत्ता विचारों अथवा विचारवाद की है। इस प्रकार असली शब्द तो आइडियलिज्म है किन्तु उच्चारण की सुविधा के लिए इस शब्द में अंग्रेजी भाषा के (L) अक्षर को जोड़कर इसे आइडियलिज्म की संज्ञा दी जाती है।

दार्शनिक सिद्धांत के रूप में आदर्शवाद वस्तु की अपेक्षा विचारों, भावों तथा आदर्शों के महत्त्व को स्वीकार करके प्राकृत की अपेक्षा मानव तथा उसके व्यक्तित्त्व के विकास एवं आध्यत्मिक मूल्यों को जीवन का लक्ष्य स्वीकार करता है जिससे विभिन्नता में एकता (ईश्वर) का ज्ञान हो जाये।

आदर्शवाद की यह धारणा है कि भौतिक जगत की अपेक्षा आध्यात्मिक जगत आर्थिक उत्कृष्ट एवं महान है। इसका कारण ये है कि भौतिक जगत नाशवान है। अत: यह असत्य है। इसके विपरीत आध्यात्मिक जगत विचारों, भावों तथा आदर्शों का संसार है जिसके ज्ञान से मन तथा आत्मा का ज्ञान होता है। इस दृष्टि से इस महान दर्शन के अनुसार केवल आध्यात्मिक जगत ही सत्य है। इससे परे तथा इसके पश्चात और कुछ नहीं है। इस प्रकार आदर्शवाद, प्रकृतिवाद अथवा वैज्ञानिक तत्वों की अपेक्षा मानव तथा उसके विचारों भावों तथा आदर्शों की आध्यात्मिकता के अधिक महत्त्व देते हुए मानव तथा उसके मस्तिष्क के अध्ययन पर बल देता है।

इस दर्शन के अनुसार मानव की प्रकृति आध्यात्मिक होती है जिसकी अभिव्यक्ति वह बौद्धिक, सौन्दर्यात्मक तथा धार्मिक क्षेत्रों में करता है। निम्न जन्तुयों तथा पशुयों के साथ यह बात नहीं है। इसलिए पशुओं की अपेक्षा मानव का जीवन अधिक श्रेष्ठ होता है।

आदर्शवाद मानव के अध्ययन पर इसलिए भी अधिक बल देता है, क्योंकि अन्य पशुओं की तुलना में मानव की वृद्धि तथा विवेक आदि शक्तियाँ भी आधिक होती है। अपनी प्रखर बुद्धि एवं विवेक के बल पर मानव अन्य पशुओं की भांति वातावरण का देवल दस ही नहीं बना रहता अपितु उसमें आवशयकतानुसार परिवर्तन करके देवत्व का स्थान भी ग्रहण करता है तथा अनके प्रकार की मानसिक, कलात्मक तथा धार्मिक क्रियाओं में भाग लेते हुए धर्म तथा आचरणशास्त्र आदि का सृजन करता है। वर्तमान सांस्कृतिक तथा अध्यात्मिक वातावरण मानव ने स्वयं भी बनाया है।

संक्षेप में आदर्शवाद मानव तथा उसके विचारों, भावों तथा आदर्शों को महत्वपूर्ण स्थान देता है। इन्हीं आदर्शों तथा मूल्यों को प्राप्त करके मानव अपने व्यक्तित्व को विकसित करते हुए अपनी आत्मा का सच्चा ज्ञान प्राप्त करके परमब्रह्म परमेश्वर के साथ साक्षात्कार कर सकता है। अत: आदर्शवाद के अनुसार वास्तविक सत्ता आध्यात्मिक है, भौतिक नहीं। इस दर्शन के अनुसार देश ततः काल में सृष्टि का क्रम नित्य तथा आध्यात्मिक संघ के प्रकटीकरण के कारण चलता है। इस प्रकार आदर्शवाद का क्षेत्र विश्व की अनादी, अपरिमित नित्य तथा अनन्त सत्ता है, न कि कोई तटस्थ एवं विरोधी संसार। होने के शब्दों में – “ आदर्शवादी शिक्षा-दर्शन व्यक्ति को वह स्वरुप प्रदान करता है जिसमें वह अपने को मानसिक विश्व का पुर्नाश समझने लगे। ”

आदर्शवादी दर्शन का प्रतिपादन, सुकरात, प्लेटो, डेकाटें, स्पनोजा, बर्कले, कान्ट, फिटेश, शेलिग, हिंगल, ग्रीन, शापन हावर तथा जेंटाइल आदि अनके पाश्चात तथा वेदों एवं उपनिषदों के प्रणेता महर्षियों से लेकर अरविन्द घोष तक अनके पूर्वी दार्शनिक ने किया है।

आदर्शवादी की परिभाषा

आदर्शवादी के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए हम निम्नलिखित पंकियों में प्रसिद्ध विद्वानों की परिभाषायें दे रहें हैं –

डी० एम० दत्ता- “आदर्शवादी वह सिद्धांत है जो अन्तिम सत्ता आध्यात्मिक मानता है। ”

जे० एस० रास- “ आदर्शवादी दर्शन के बहुत से और विविध रूप है। परन्तु सबका आधारभूत तत्व यही है कि संसार का उत्पादन कारण मन तथा आत्मा है, कि वास्तविकता स्वरुप मानसिक स्वरुप का है। “

ब्रुबेकर- “ आदर्शवादी इस बाक का संकेत देते हैं कि संसार को समझने के लिए मन अथवा मस्तिष्क सर्वोपरि है। उनके लिए इससे अधिक और कोई बात नहीं है कि मन संसार को समझने में लगा रहे और किसी बात को इससे अधिक वास्तविकता नहीं की जा सकती है, क्योंकि मन से अधिक किसी और बात को वास्तविकता समझना स्वयं मन की कल्पना होगी। ”

आदर्शवाद का विकास

आदर्शवाद एक प्राचीन विचारधारा है। इसका विकास उसी समय से माना जाता है जब से मनुष्य ने चिन्तन करना आरम्भ किया। इस दर्शन के इतिहास पर दृष्टिपात करने से पता चलता कि इसका ऐतिहासिक जन्म पाश्चात देशों में सुकरात के प्रसिद्ध शिष्य प्लेटो तथा भारत में वैदिक एवं उपनिषद् काल से हुआ। इस प्रकार पूरब तथा पश्चिम दोनों ने मिलकर आदर्शवाद के विकास में अपना-अपना योग दिया है।

आदर्शवाद के प्रमुख सिद्धांत

सम्पूर्ण जगत के दो रूप – आदर्शवाद के अनुसार सम्पूर्ण जगत के केवल दो रूप हैं – (1) आध्यात्मिक जगत तथा (2) भौतिक जगत। आदर्शवादी बहुत जगत की तुलना में भौतिक जगत तुलना में आध्यात्मिक जगत को अधिक महत्त्व देते हैं। उनका विश्वास है कि अध्यात्मिक जगत की तुलना में भौतिक जगत केवल एक झलक मात्र है। इसका कारण यह है कि भौतिक तत्व नाशवान है। अत: यह असत्य है। इसके विपरीत आध्यात्मिक जगत सत्य है तथा यथार्थ है। इसका ज्ञान पारपत करने से मन तथा आत्मा का ज्ञान प्राप्त  होता है। अत: भौतिक तत्व की अपेक्षा आध्यात्मिक सत्ता अथवा अध्यात्मिक जगत का ज्ञान प्राप्त करना मानवीय जीवन का मुख्य लक्ष्य है। एच० एन० हार्न के अनुसार – “आदर्शवाद के अनुसार देश और काल में सृष्टि का क्रम नित्य तथा अध्यात्मिक सत्य के प्रकटीकरण के कारण चलता है। ”

वस्तु की अपेक्षा विचार का महत्त्व – आदर्शवादीयों के अनुसार मन तथा आत्मा का ज्ञान केवल विचारों के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। इसीलिए उन्होंने भौतिक जगत के पदार्थों तथा वस्तुओं की तुलना में विचार एवं भाव जगत को अधिक महत्वपूर्ण माना है। उसका पूर्ण विश्वास है कि वस्तु अथवा पदार्थ असत्य है। केवल विचार ही सत्य है, सर्वव्यापी हैं तथा अपरिवर्तनशील हैं। इन्हीं विचारों में संसार के समस्त तत्व निहित हैं। प्लेटो का मत है – “विचार अन्तिम एवं सार्वभौमिक महत्त्व वाले होते हैं। यही वे परमाणु हैं जिनसे विश्व को रूप प्राप्त होता है। ये वे आदर्श अथवा प्रतिमान हैं जिनके द्वारा उचित की परीक्षा की जाती है। ये विचार अन्तिम तथा अपरिवर्तनीय हैं। ”

जड़ प्रवृति की अपेक्षा मनुष्य का महत्त्व – आदर्शवाद के अनुयायी जड़ प्रकृति की अपेक्षा मनुष्य को आधिक महत्त्व देते हैं। इसका कारण यह है कि मनुष्य में विचार तथा अनुभव करने की शक्ति होती है क्योंकि आदर्शवादी अनुभव जगत को अधिक महत्त्व देते हैं इसलिए अनुभवकर्ता स्वयं और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। मनुष्य विवेकयुक्त तथा बुद्धियुक्त प्राणी है। अत: वह अन्य पशुओं की भांति वातावरण का केवल दास ही नहीं बना रहता है अपितु उसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन भी करता है, देवत्व का स्थान ग्रहण करता है तथा अपनी अनके प्रकार की मानसिक, धार्मिक एवं कलात्मक क्रियाओं में भाग लेने के परिणामस्वरूप धर्म, आचारशास्त्र, कला तथा साहित्य का सृजन भी करता है। रस्क ने मनुष्य के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है – “इस आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण स्वयं मनुष्य ने ही किया है अर्थात समस्त नैतिक तथा अध्यात्मिक वातावरण समस्त मनुष्यों की रचनात्मक क्रियायों का ही फल है। “

आध्यात्मिक सत्यों तथा मूल्यों में विश्वास – आदर्शवादीयों के अनुसार जीवन का लक्ष्य आध्यात्मिक मूल्यों तथा सत्यों को प्राप्त करना है। ये अध्यात्मिक मूल्य हैं – (1) सत्यं (2) शिवम् (3) सुन्दरम्। आदर्शवादीयों के अनुसार ये मूल्य सदैव अमर हैं। जो मनुष्य इन अध्यात्मिक मूल्यों को जान लेता है वह ईश्वर को प्राप्त कर लेता है। दूसरे शब्दों में, इन मूल्यों को प्राप्त करना ही ईश्वर की प्राप्ति है अत: मनुष्य के जीवन का चरम लक्ष्य इन्हीं मूल्यों को प्राप्त करना है। आदर्शवादी का यह विश्वास है कि ये तीनो मूल्य एक-दूसरे को पृथक हैं। इन तीनो मूल्यों को अलग-अलग ही प्राप्त किया जा सकता है। सत्य को प्राप्त करके शिव तथा सौदर्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। परन्तु यह निश्चित है कि इनमें से प्रत्येक आध्यात्मिक मूल्य को प्राप्त करने क्या लिए मन की तीनों क्रियायें – (1) ज्ञान (2) इच्छा का अनुभव, तथा चेष्टा अर्थात कुछ करने की इच्छा अवश्य सहायक होती है। ज्ञान के द्वारा सत्य को तथा इच्छा के द्वारा सौंदर्य को एवं चेष्ठा अथवा प्रयत्न के द्वारा शिवं को प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार आदर्शवादीयों के अनुसार मनुष्य के जीवन का लक्ष्य इन तीनों आध्यात्मिक मूल्यों को नि:स्वार्थ रूप से प्राप्त करके सत्यं को सत्य के लिए, शिवं को शिव के लिए तथा सुन्दर को सुन्दर के लिए अपने जीवन में ढालना चाहिये। जे०एस० रास का भी यह मत है – “ आदर्शवादीयों के अनुसार शिवं, सत्यं तथा सुन्दरं निरपेक्ष गुण हैं जिसमें प्रत्येक्ष अपनी आवश्यकता के कारण उपस्थित है तथा वह अपने आप में पूर्णतया वांछनीय है। ”

स्त्रोत: पोर्टल विषय सामग्री टीम

2.95145631068

दीपक कुमार मीणा Mar 04, 2019 10:51 PM

बहुत ही अच्छा है । इसको download करने का ऑप्सन भी दीजिये। thanks।

Sapna Feb 11, 2019 08:47 PM

It's very useful

Diksha Oct 05, 2018 08:31 PM

Very useful and thnx for help

Shuaib Jun 30, 2018 01:58 AM

Bahut effective jankari hai

Shuaib Jun 29, 2018 03:56 PM

Bahut effective jankari hai

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