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भारतीयों के लिए आहार संबंधी मार्ग-निर्देशिका

इस भाग में भारतीयों के लिए आहार संबंधी मार्ग-निर्देशिका का वर्णन किया गया है

आहार संबंधी लक्ष्य

  • जन-समुदाय में कुल मिलाकर पूर्ण स्वास्थ्य तथा सर्वोत्तम कार्य निष्पादन करने की स्थिति बनाये रखना।
  • गर्भवती तथा पयस्विनी माताओं के लिए पर्याप्त पोषण की स्थिति सुनिश्चित करना।
  • प्रसवोपरांत शिशुओं के भार में वृद्धि करना तथा पूर्ण आनुवंशिक संभावना प्राप्त करने के लिए शिशुओं, बालकों तथा व्यस्कों के विकास का संवर्धन करना।
  • सभी पोषक तत्वों में पर्याप्तता प्राप्त करना तथा हीनान्नरोगों की रोकथाम करना।
  • आहार संबंधी पुराने रोग-विकारों की रोकथाम करना।
  • वयोवृद्ध व्यक्ति का स्वास्थ्य बनाये रखना तथा जीवन प्रत्याशा में वृद्धि करना।

जीवन की विभिन्न अवस्थाओं की अवधि में में आहार का महत्व

बुढ़ापा में- शारीरिक रूप से सक्रिय तथा स्वस्थ बने रहने के लिए - पोषक तत्वों से भरपूर, कम चिकनाई युक्त भोजन।

गर्भावस्था में- स्वास्थ्य, उत्पादकता बनाये रखने तथा आहार संबंधी रोगों की रोकथाम करने तथा गर्भवती महिलाओं को बल प्रदान करने के लिये शिशु का जनन/पालन करने के लिए अतिरिक्त आहार के साथ-साथ पोषण की दृष्टि से पर्याप्त मात्रा में आहार।

किशोरावस्था में - तीव्रगति से शारीरिक विकास करने, परिपक्व होने तथा अस्थिकों का विकास करने के लिये - शरीर का सुगठन तथा संरक्षण करने वाले आहार।

बाल्यकाल में - शारीरिक वृद्धि, विकास तथा संक्रमण का मुकाबला करने के लिये - शक्ति, शारीरिक गठन तथा संरक्षण प्रदान करने वाले आहार।

शिशु अवस्था में- शारीरिक विकास करने तथा निरंतर प्रगति करने के लिये - माँ का दूध, शक्ति से भरपूर आहार।

आहार संबंधी निर्देश

  1. पोषण की दृष्टि से विभिन्नप्रकार के खाद्य-पदार्थों में से बुद्धिमता पूर्ण चयन करके पर्याप्त आहार खाना चाहिए।
  2. गर्भवती तथा पयस्विनी माताओं को अतिरिक्त भोजन तथा विशेष देखभाल करने की आवश्यकता होती है।
  3. शिशु को प्रथम 4-6 महीनों में केवल स्तन्य आहार ही करवाना चाहिये। बच्चे को दो वर्ष की आयु तक स्तन्य आहार जारी रखा जा सकता है।
  4. 4-6 माह की आयु होते-होते शिशुओं को संपूरक खाद्य पदार्थ खिलाना प्रारंभ करना चाहिये।
  5. स्वस्थ और अस्वस्थ, दोनों ही स्थितियों में बालकों और किशोरों को पर्याप्त मात्रा में समुचित भोजन करना चाहिये।
  6. हरी, पत्तीदार शाक-सब्जियों तथा अन्य फल और तरकारियों को भरपूर मात्रा में उपयोग करना चाहिये।
  7. पाक-तैलों तथा सामिष खाद्य पदार्थों को नियंत्रित (और संयमित) मात्रा में तथा वनस्पति / घी / मक्खन को केवल अल्प मत्रा मे उपयोग करना चाहिये।
  8. शारीरिक अति-भार तथा मोटापे को रोकने के लिये अतिभोजन करने से बचना चाहिये। वाँछनीय शारीरिक भार बनाये रखने के लिये शरीर को सही ढ़ंग से सक्रिय रखना अनिवार्य है।
  9. नमक का उपयोग संयम के साथ करना चाहिये।
  10. खाये गये सभी खाद्य पदार्थ पूर्णतः स्वच्छ तथा निरापद होने चाहिये।
  11. स्वास्थ्यकर तथा सुस्पष्ट आहारी संकल्पनाएँ तथा पाक-क्रियाएँ अपनायी जानी चाहिये।
  12. पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिये तथा मादक पेय केवल संयमित मात्रा में ही सेवन करें।
  13. संसाधित तथा बने-बनाये खाद्य पदार्थ विवेक-सम्मत ढ़ंग से उपयोग किये जाने चाहिये। शक्कर का उपयोग केवल अल्प मात्रा में ही किया जाना चाहिये।
  14. सदैव चुस्त-दुरुस्त तथा सक्रिय बने रहने के लिये वयोवृद्धजन को प्रचुर पोषक तत्वों वाला आहार करना चाहिये।

पोषण की दृष्टि से विभिन्न प्रकार के खाद्य-पदार्थों में से बुद्धिमता पूर्ण चयन करके पर्याप्त आहार खाना चाहिए

  • पोषण प्राप्त करना जीवित रहने की मूलभूत आवश्यकता है।
  • खाद्य पदार्थों में विविधता होना न केवल जीवन को मज़ेदार बनाता है अपितु पोषण और स्वास्थ्य के लिये भी अत्यावश्यक है।
  • खाद्य पदार्थों के अनेक वर्गों से युक्त आहार में सभी आवश्यक पोषक तत्व समुचित मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
  • अधिकाँश पोषक तत्वों के मुख्य स्रोत अनाज, ज्वार, बाजरा तथा दालें होती हैं।
  • अच्छी गुणता-युक्त प्रोटीन और अधिक मात्रा में कैल्शियम होने के कारण, दूध एक पौष्टिक आहार माना जाता है। शिशुओं, बालकों और महिलाओं के लिए दूध एक उत्तम आहार है।
  • तैल तथा गिरी युक्त फल प्रचुर मात्रा में कैलोरी देने वाले खाद्य पदार्थ होते हैं तथा कार्य शक्ति की सघनता (मात्रा) बढ़ाने में उपयोगी होते हैं।
  • आहार में अंडे, आमिष-खाद्य तथा मछलियों का समावेश करने से आहार की गुणता-वृद्धि होती है। परंतु निरामिश व्यक्ति अनाज/दाल/दुग्ध-आधारित आहार से प्रायः वे सभी पोषक तत्व प्राप्त कर सकते हैं।
  • फलों तथा शाक - सब्जियों से विटामिन/खनिज तत्व जैसे संरक्षक पदार्थ प्राप्त होते हैं।
  • अपनी आयु, लिंग, शारीरिक स्थिति तथा सक्रियता के अनुसार विविध प्रकार के खाद्यपदार्थों का उपयुक्त मात्रामें चयन करें।
  • अनाज, चना तथा ताज़ी शाक सब्जियों का संयोजन कर उपयोग करें। कैलोरी अथवा शक्ति के अंतर को मिटाने के लिये गुड़ अथवा शक्कर तथा पाक तैलों को सम्मिलित करें।
  • प्रचुर मात्रा में ताजी शाक सब्जियों और फल खाना अधिक पसंद करें।
  • पशु-मूल के खाद्य पदार्थों- जैसे दुग्ध, अंडे तथा माँस को आहार में, विशेषकर गर्भवती/पयस्विनी माताओं तथा बालकों के आहार में सम्मिलित करें।
  • व्यस्कजन को कम चिकनाई वाले किन्तु प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे चर्बी रहित माँस, मछलियाँ, दालें तथा मक्खन निकाला हुआ दुग्ध चयन करना चाहिये।
  • भोजन करने में स्वास्थ्यकर आदतें विकसित करें तथा नियमित रूप से व्यायाम करें।

गर्भवती तथा पयस्विनी माताओं को अतिरिक्त भोजन तथा विशेष देखभाल करने की आवश्यकता होती है

  • गर्भकाल में पोषण की आवश्यकता अत्यधिक होती है। अतः भ्रूण की माँगों को पूर्ण करने के लिये अतिरिक्त आहार करना जरूरी होता है।
  • गर्भकाल में पोषण की जरूरतों को पूर्ण करने के लिये महिलायें अपने शरीर में वसा अधिक मात्रा में जमा कर लेती है।
  • पयस्विनी माताओं का पर्याप्त मात्रा में दुग्ध निस्सरज करने तथा अपने स्वयं के स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिये अतिरिक्त भोजन करने की आवश्यकता होती है।

लौह प्रचुर खाद्य पदार्थ खायें

  • हेमोग्लोबिन का संश्लेषण, मस्तिष्क का प्रकार्य तथा शारीरिक प्रतिरक्षा करने के लिये लोहे की आवश्यकता होती है।
  • लोहे की अपर्याप्तता से अल्परक्तता हो जाती है।
  • लोहे की अपर्याप्तता, विशेषकर जननीय आयु की महिलाओं तथा बालकों में हो जाना सामान्य है।
  • गर्भकाल में लोहे की अपर्याप्तता होने से माताओं की मृत्युदर तथा अल्प भारवाले शिशुओं का जन्म अधिक होता है।
  • लोहे की अपर्याप्तता से बालकों में संक्रमण की गुंजाइश बढ़ जाती है तथा उनकी विद्या-ग्रहण करने की क्षमता में अधिक क्षति होती है।
  • वनस्पति मूल के खाद्य पदार्थों जैसे फलियों, सूखे मेवो तथा पत्तीदार हरी शाक सब्जियों में लोहा विद्यमान होता है।
  • लोहा माँस, मछली तथा कुकुय-उत्पादों के द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है।
  • लोहे की जैव-प्राप्यता वानस्पतिक खाद्य पदार्थों से अपर्याप्त होती हैं किन्तु पशुमूल के खाद्य पदार्थों से यह अच्छी होती है।
  • आँवला, अमरू द तथा नींबू-वंश के फलों जैसे विटामिन सी से भरपूर फल खाने से वानस्पतिक खाद्य- पदार्थों से प्राप्त लोहे का अवशोषण बढ़ जाता है।
  • चाय जैसे पेय आहारी लोहे को बाँधकर अप्राप्त कर देते हैं। अतः भोजन करने से पूर्व अथवा उसके तत्काल बाद ऐसे पेय सेवन करने से बचना चाहिये।
  • गर्भ तथा दूध पिलाने की अवधि में अधिक मात्रा में भोजन करें।
  • अनाज के समूचे दाने, अँकुरित चने तथा किण्वत खाद्य पदार्थ अधिक मात्रा में खायें।
  • दूध पियें। माँस अंडे खायें।
  • अधिक मात्रा में शाक-सब्जियों और फल खायें।
  • अंध विश्वासों तथा खाद्य पदार्थ संबंधी निषेधों तथा वर्जनाओं से बचें।
  • मद्य तथा तंबाकू का उपयोग न करें। औषधियाँ केवल तभी खायें जबकि उन्हें निर्देशित किया गया हो।
  • गर्भ ठहरने के 14-16 सप्ताह के पश्चात लोहा, फोलेट तथा कैल्शियम के संपूरक नियमित रू प से खायें तथा दूध पिलाने की अवधि में उन्हीं को जारी रखें।

फोलेट-प्रचुर भोजन करें

  • हेमोग्लोबिन का संश्लेषण करने के लिये फॉलिक अम्ल अनिवार्य होता है।
  • फॉलिक अम्ल की अपर्याप्तता स्थूलाणुक अल्परक्तता की ओर ले जाती है।
  • सगर्भा महिलाओं को अधिक मात्रा में फॉलिक अम्ल की आवश्यकता होती है।
  • फॉलिक अम्ल के संपूरक, जन्म के समय शिशु का भार बढ़ाता है तथा जन्मजात असंगतियों को कम करता है।
  • पत्तीदार हरी शाक-सब्जियाँ, फलियाँ, गिरियाँ तथा यकृत फॉलिक अम्ल के अच्छे स्रोत होते हैं।

शिशु को प्रथम 4-6 महीनों में केवल स्तन्य आहार ही देना चाहिये। बालक को दो वर्ष की आयु तक स्तन्य आहार जारी रखा जा सकता है

  • शिशुओं की सामान्य वृद्धि तथा स्वास्थ्यकर विकास के लिये माता का दूध अत्यंत प्राकृतिक तथा संपूर्णआहार है।
  • पीयूष दुग्ध में प्रचुर मात्रा में पोषक तथा प्रति संक्रामक कारक होते हैं तथा उसे शिशुओं को पिलाया जाना चाहिये।
  • शिशुओं स्तन्य आहार देने से संक्रमणों का खतरा कम हो जाता है।
  • इससे माता-शिशु का निकट संपर्क स्थापित होता है तथा माता-शिशु का बंधन सुदृढ़ होता है।
  • जनन-क्षमता पर नियंत्रण द्वारा संतति-अंतराल को बढ़ावा मिलता है (मासिक धर्म पुनः प्रारंभ होने में विलंब होता है)।
  • स्तन्य पोषण गर्भाशय के आकुंचन में सहायक होता है।
  • अपने बच्चों को स्तन्य आहार देने वाली माताओं में स्तन का कैन्सर कम घटित होता है।
  • प्रसवोपरांत एक घंटे के अंदर ही स्तन्य आहार देना प्रारंभ कर दें तथा पीयूष दुग्ध कदापि न फेंकें।
  • कम से कम चार से छह माह तक शिशु का केवल स्तन्य पोषण ही करें।
  • संपूरक (स्तन्य-मोचक) आहार प्रारंभ करने के बाद भी दो वर्ष तक स्तन्य पोषण निरंतर जारी रखें।
  • पर्याप्त मात्रा में माता के दुग्ध की आपूर्ति स्थिर करने तथा बनाये रखने के लिये शिशु को बार-बार अथवा उसके माँगने पर स्तन्य आहार दें।
  • गर्भकाल तथा अपना दूध पिलाने की अवधि, दोनों में ही पोषण की दृष्टि से पर्याप्त भोजन करें।
  • शिशु का स्तन्य आहार करने की अवधि में तंबाकू (धूम्रपान तथा चबाना) मद्य तथा औषधियों का सेवन करने से बचें।
  • शिशु का स्तन्य आहार करने में अपने परिवार का सक्रिय सहयोग सुनिश्चित करें।

4-6 महीने आयु के पश्चात संपूरक आहार खिलाएँ

  • 4-6 महीने आयु के पश्चात (शिशु को) केवल माँ का दूध पिलाना ही पर्याप्त नहीं होता।
  • 4-6 माह की आयु होते -होते शिशुओं को स्तन्य आहार के साथ -साथ संपूरक आहार खिलाना प्रारम्भ करना भी आवश्यक है।
  • छोटे बच्चोंके लिये पर्याप्त तथा समुचित संपूरक आहार की व्यवस्था करके उन्हें खिलाने से कुपोषण को रोका जा सकता है।
  • बच्चे के लिये स्तन्य मोचक आहार तैयार करते तथा खिलाते समय स्वास्थ्यकर प्रक्रियाएँ बरतें अन्यथा यह अतिसार की ओर ले जायेगा।
  • 4-6 महीने की आयु होने के पश्चात शिशुओं को केवल माँ का दूध पिलाना ही पर्याप्त नहीं है।
  • 4-6 महीने की आयु से ही शिशुओं को संपूरक आहार खिलाना प्रारंभ करें किन्तु उनका स्तन्य आहार भी जारी रखें।
  • संपूरक आहार प्रारंभ करने में कोई विलंब न करें।
  • बच्चों को अपने ही घर में निर्मित और कम लागत वाले स्तन्य मोचक आहार खिलायें।
  • संपूरक आहार दिन में 5-6 बार खिलायें।
  • संपूरक आहार तैयार करते तथा खिलाते समय स्वस्थ प्रक्रियाएँ बरतें।

क्या करें, यदि माँ का दूध पर्याप्त मात्रा में न हो रहा हो

  • यदि स्तन्य-पोषक करना अपर्याप्त हो तो शिशु को पशु अथवा शिशुओं के वाणिज्यिक सूत्रानुसार निर्मित दूध पिलाना आवश्यक होगा।
  • शिशु को पिलाने से पूर्व, दूध को उबालना चाहिये।
  • प्रारंभ करते समय, दूध के समान मात्रा में जल मिलाकर पतला कर सकते हैं।
  • 4 सप्ताह आयु होने के पश्चात पूर्णसांद्र दूध प्रारंभ कर सकते हैं।
  • पशु-दूध पोषित शिशुओं को लोहा तथा विटामिन सी युक्तसंपूरक आहार दिये जाने चाहिये।
  • शिशु को एक बार में प्रायः 120-180 मिली लीटर दूध में चाय का एक चम्मच शक्कर मिलाकर पिलायें। इस प्रकार दिन भर में 6-8 बार दूध पिलायें।
  • शिशुओं के लिये सूत्रानुसार निर्मित दुग्ध का पुनर्गठन करते समय उसके लेबल पर उल्लिखित अनुदेशों का अक्षरशः पालन करना चाहिये।
  • अत्यंत सावधानी पूर्वक रोगाणुरहित कप, चम्मच, बोतलें तथा निप्पल का उपयोग करते हुए हर बार दूध तैयार करके पिलाना चाहिये।
  • मोटापा रोकने के लिये अस्वाभाविक रूप से पोषित शिशुओं को आवश्यकता से अधिक दूध न पिलाना चाहिये।
  • शिशु को अपने घर में ही बनाये गये तथा सस्ते स्तन्य मोचक आहार खिलाना अधिक अच्छा है। फिर भी, वाणिज्यिक रूप से उपलब्ध खाद्य पदार्थों को, जो खरीदने में समर्थ हों, उपयोग कर सकते हैं।

स्वस्थ और अस्वस्थ, दोनों ही स्थितियों में बालकों और किशोरों को पर्याप्त मात्रा में समुचित भोजन करना चाहिये

  • शिशु की सर्वोत्तम बढ़त तथा विकास के लिये पर्याप्त भोजन देना अत्यावश्यक है।
  • बाल्यकाल में समुचित आहार देने से बाद में जीवन में आहार से संबंधित दीर्घकालिक रोगों के जोखिम को कम किया जा सकता है।
  • सामान्य संक्रमण तथा कुपोषण का बालरु ग्णता तथा मृत्यु-दर में महत्वपूर्ण योगदान होता है।
  • शिशु को संक्रमण ग्रस्त होने की अवधि में तथा उसके बाद उसे पोषण की दृष्टि से अनुकूल स्थिति बनाये रखने के लिये अधिक आहार देना चाहिये।

कैल्शियम-प्रचुर खाद्य पदार्थ खिलायें

  • बढ़त तथा अस्थिविकास के लिये कैल्शियम की आवश्यकता होती है।
  • कैल्शियम अस्थिसुषिरता (अस्थियों के पतले होने) को रोकता है।
  • सामान्यतः महिलाओं में अस्थिसुषिरता अधिक होती है।
  • गर्भवती तथा पयस्विनी माताओं, बच्चों तथा वयोवृद्ध-जन को कैल्शियम की अधिक आवश्यकता होती है।
  • दूध, दही तथा गिरियों जैसे जैविक स्रोतों से प्रचुर मात्रा में कैल्शियम उपलब्ध होता है।
  • कैल्शियम रागी तथा हरी पत्तियों वाली शाक-सब्जियों से भी उपलब्ध होता है।
  • नियमित व्यायाम करने से अस्थियों से कैल्शियम की क्षति कम होती है।
  • शैशवकाल में माता के दूध के अतिरिक्त पका कर नर्म किये गये अनाज तथा दाल पर आधारित आहार अल्प मात्रा में शिशुओं को खिलाये जाने चाहिये।
  • किसी छोटे बालक को दूध पिलाते समय अतिरिक्त सावधानी बरतें तथा उसके आहार में पका कर नर्म की गयी सब्जियाँ तथा मौसमी फलों को सम्मिलित करें।
  • बच्चों तथा किशोरों को भरपूर मात्रा में दूध पिलायें तथा दुग्ध-उत्पाद खिलायें।
  • अधिक भोजन करने के साथ-साथ अव्यवस्थित ढ़ंग से उपवास रखने की आदत का समर्थन न करें।

अस्वस्थता की अवधि में

  • शिशु को निराहार कदापि न रहने दें।
  • शिशुओं को दूध और मिश्रित सब्जियों के साथ आहार में ऊर्जा-प्रचुर अनाज तथा दाल खिलायें।
  • शिशुओं को थोड़ा-थोड़ा करके आहार दिन में अनेक बार खिलायें।
  • स्तन्य आहार जारी रखें।
  • अस्वस्थता की अवधि में शिशुओं को भरपूर मात्रा में तरल पदार्थ पिलायें।
  • शिशुओं को अतिसार से होने वाले निर्जलन को रोकने तथा सुधारने के लिये जीवन रक्षक (मौखिक जलयोजन) घोल का उपयोग करें।

हरी, पत्तीदार शाक-सब्जियों तथा अन्य फल और सब्जियों को भरपूर मात्रा में उपयोग करना चाहिये

  • सामान्य आहार को पौष्टिक तथा सुस्वादु बनाने के लिये उसमें ताजी शाक-सब्जियों तथा फलों को सम्मिलित करें।
  • ताजी शाक-सब्जियाँ तथा फल सूक्ष्म-पोषकों के प्रचुर स्रोत होते हैं।
  • फल और शाक-सब्जियाँ जीवनप्रद महत्व के अनेक रेशे तथा पादप रसायन जैसे अपोषणज कारक भी प्रदान करते हैं।
  • ताज़ी हरी तरकारियाँ, सब्जियों (पीली/नारंगी रंग की) तथा फल सूक्ष्म पोषकों के अभाव से उत्पन्न कुपोषण तथा कुछ दीर्घकालिक रोगों को रोकने में सहायक होते हैं।

14.विटामिन ए प्रचुर खाद्यपदार्थ खायें

  • सामान्य दृष्टि के लिये विटामिन ए आवश्यक होता है।
  • विटामिन ए की अपर्याप्तता रतौंधी तथा नेत्रों में बदलाव की ओर ले जाती है।
  • छोटे बच्चों में विटामिन ए की गंभीर कमी अँधता की ओर ले जाती है।
  • बाल्यकाल में होने वाले अतिसार, खसरा तथा श्वसन-संक्रमण तथा परजीवी-ग्रसन जैसे संक्रमण आँत्र द्वारा विटामिन ए के अवशोषण को कम कर देते हैं।
  • दूध, अंडे, यकृत तथा माँस संरचना-पूर्व विटामिन ए के उत्तम स्रोत होते हैं।
  • बीटा कैरोटीन के रू प में विटामिन ए पौधे -मूल में खाद्य पदार्थों से प्राप्त किया जा सकता है।
  • शरीर में बीटा कैरोटीन विटामिन ए के रू प में परिवर्तित हो जाता है।
  • पत्तीदार हरी शाक-सब्जियाँ, फल, पीले तथा नारंगी रंग वाली तरकारियाँ बीटा कैरोटीम के प्रचुर स्रोत हैं।
  • सहजन की पत्तियाँ, चौलाई, मेथी, पालक-जैसी गहरी हरी पत्तीदार शाक-सब्जियाँ तथा गाजर, पीला कुम्हड़ा, आम तथा पपीते - जैसे फल तथा सब्जियाँ बीटा कैरोटीन -प्रचुर खाद्य पदार्थों के उदाहरण हैं।
  • दैनिक आहार में पत्तीदार हरी शाक-सब्जियाँ सम्मिलित करें।
  • प्रतिदिन जितनी अधिक हो सके उतनी अधिक अन्य तरकारियाँ भी खायें।
  • ताज़ी और कच्ची तरकारियाँ सलाद के रूप में खायें।
  • अपने परिवार के लिये आवश्यक सब्जियाँ तथा तरकारियाँ शाकवाटिका में उगायें।
  • ठीक ढ़ंग से साफ करके पकाने पर पत्तीदार हरी सब्जियाँ शिशुओं के लिये भी निरापद होती हैं।

15.पाक-तैलों तथा आमिष खाद्य पदार्थों को नियंत्रित (और संयमित) मात्रा में तथा वनस्पति/मक्खन को केवल अल्पमात्रा में उपयोग करना चाहिये।

  • वसा/तैलों में अत्यधिक ऊर्जा-मान होता है तथा वे संतृप्ति प्रदान करते हैं।
  • वसा से आवश्यक वसा-अम्ल प्राप्त होता है तथा वे वसा में घुलनशील विटामिनों के अवशोषण को बढ़ावा देते हैं।
  • वसा शरीर में जैविक रू प से सक्रिय आमिश्रों के अग्रदूत होते हैं।
  • अधिक मात्रा में कैलोरियाँ, वसा तथा कोलेस्ट्रोल देने वाले आहार रक्त में वसा (कोलेस्ट्रोल तथा ट्राइग्लिसराइड) बढ़ाते हैं।
  • आहार में अधिक मात्रा में वसा होने से मोटापा, हृदयरोग, तथा कैन्सर का जोखिम बढ़ जाता है।
  • आहार में अधिक मात्रा में वसा होने के कुप्रभाव बचपन से ही प्रारंभ हो जाते हैं।
  • वसा केवल उतनी ही मात्रा में खायें जितना खाना पर्याप्त हो।
  • पाक-तैलों के एकाधिक स्रोतों का उपयोग करें।
  • घी, मक्खन तथा वनस्पति का सीमित मात्रा में उपयोग करें।
  • लिनोलीनिक अम्ल-प्रचुर खाद्य पदार्थ खायें जैसे- फलियाँ, पत्तीदार हरी शाक-सब्जियाँ, मेथी तथा राई, सरसों के बीज।
  • माँस तथा मुर्गी-माँस की अपेक्षा अधिक बार मछलियाँ खायें तथा यकृत, वृक्क, मस्तिष्क आदि जैसे अँगों का माँस सीमित मात्रा में खायें/खाने से बचें।

16.शारीरिक अतिभार तथा मोटापे को रोकने के लिये अतिभोज करने से बचना चाहिये। वाँछनीय स्तर पर शारीरिक भार बनाये रखने के लिये अपने शरीर को सही ढ़ंग से सक्रिय रखना अनिवार्य है

  • मोटापे को, शरीर पर बहुत अधिक चर्बी बढ़ जाने के रूप में, परिभाषित करते हैं।
  • मोटापे का स्वास्थ्य पर अनेक कुप्रभाव पड़ते हैं तथा यह समय पूर्व ही मृत्यु की ओर भी ले जा सकता है।
  • यह उच्च रक्तदाब, रुधिर में अधिक मात्रा में कोलेस्ट्रोल तथा ट्राईग्लिसेराइडों, हृदयरोग, मधुमेह, पित्ताश्मरी तथा विशेष प्रकार के कैन्सर का जोखिम बढ़ा देता है।
  • मोटापा केवल अतिभोजन करने का ही सीधा-सादा परिणाम नहीं है।
  • इसके मनोसामाजिक परिणाम महत्वपूर्ण होते हैं।
  • धीरे-धीरे तथा नियमित रू प से अपना शारीरिक भार घटाना वाँछनीय है।
  • दुस्सह उपवास रखने से स्वास्थ्य के लिये खतरा हो सकता है।
  • अपने शरीर की सक्रियता को संतुलित करने के लिये विविध प्रकार के खाद्य-पदार्थ समुचित मात्रा में खाकर आनंद लें।
  • अल्पाहार नियमित रूप से अनेक बार करें।
  • मक्खन-निकाले हुए दूध का उपयोग करें।

उत्तम स्वास्थ्य के लिये संकेत

  • नियमित रूप से व्यायाम करें।
  • धूम्रपान करने, तंबाकू चबाने, मद्यपान करने से बचें।
  • वर्ष की आयु होने के पश्चात रुधिर शर्करा, लिपिडों तथा रक्तदाब की नियमित रूप से जाँच करवायें।
  • स्व-उपचार करने से बचें।
  • योग तथा ध्यान- जैसी तनाव -नियंत्रण तकनीकों के अनुसार आचरण करें।
  • बच्चों तथा गर्भवती महिलाओं को असंक्राम्य बनायें।

नमक का उपयोग संयम के साथ करना चाहिये

  • कोशिका बाह्य तरल पदार्थ में सोडियम एक मुख्य विद्युत अपघट होता है।
  • शरीर में तंत्रिका-चालन तथा तरल पदार्थ में संतुलित बनाये रखने में सोडियम एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • सोडियम का संतुलन बनाये रखना वृक्क (गुर्दे) के ठीक से कार्य करने पर निर्भर करता है।
  • अधिक नमक (सोडियम क्लोराइड) खाने का संबंध उच्च रक्तचाप तथा जठर कैन्सर से जोड़ा जाता है।
  • सभी खाद्य पदार्थों में सोडियम विद्यमान होता है। संयम के साथ नमक खाने से सोडियम की आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
  • सोडियम की मात्रा (अंतर्ग्रहण) को पोटैशियम की मात्रा से संतुलित करें।
  • बचपन से ही (भोजन में) अतिरिक्त नमक छिड़क कर खाना कम (सीमित) कर दें।
  • कम नमक वाले पदार्थ खाद्य-पदार्थ/आहार खाने का स्वाद विकसित करें।
  • पापड़, अचार, चटनी, केचप, नमकीन बिस्कुट, चिप्स, पनीर तथा मछली जैसे परिरक्षित तथा संसाधित खाद्य -पदार्थ खाना कम (सीमित) कर दें।
  • पर्याप्त मात्रामें पोटेशियम पूरक फल, सब्जियाँ तथा तरकारियाँ भरपूर मात्रा में खायें।
  • सदैव आयोडीन युक्त लवण खायें।

पर्याप्त मात्रा में आयोडीन युक्त खाद्य-पदार्थ खायें/केवल आयोडीन युक्त लवण का ही उपयोग करें

  • अवटुहॉर्मोन की संरचना के लिये आयोडीन की आवश्यकता होती है।
  • शरीर की बढ़त तथा विकास के लिये अवटु हॉर्मोन आवश्यक होते हैं।
  • आयोडीन की अपर्याप्तता घेंघे (गलगंड), अवटु ग्रंथि की वृद्धि, की ओर ले जाती है।
  • आयोडीन की अपर्याप्तता से उत्पन्न रोगों (विकारों) का मुख्य कारण आहार तथा जल में आयोडीन का अभाव होता है।
  • गर्भावस्था की अवधि में आयोडीन की अपर्याप्तता होने के फलस्वरू प मृत प्रसव, गर्भपात तथा अवटुवामनता होती है।
  • आयोडीन युक्त लवण का उपयोग पर्याप्त आयोडीन अंतर्ग्रहण सुनिश्चित करता है।
  • खाये गये सभी खाद्य पदार्थ पूर्णत्र स्वच्छ तथा निरापद होने चाहिये
  • उत्तम स्वास्थ्य रखने के लिये निरापद तथा उत्तम गुणता युक्त खाद्य पदार्थ खाना महत्वपूर्ण है।
  • खाद्य-पदार्थों में, प्रकृति में पाये जाने वाले आविष, वातावरणीय संदूषक तथा अपमिश्रणीय वस्तुएँ विद्यमान होना स्वास्थ्य के लिये खतरनाक होता है।
  • असंरक्षित खाद्य-पदार्थ खाना, आहार द्वारा वाहित रोगों की ओर ले जाता है।
  • खाद्य-पदार्थ केवल विश्वसनीय स्रोतों से ध्यानपूर्वक जाँच-परख कर ही खरीदें।
  • उपयोग करने से पूर्व, फलों, सब्जियों, तरकारियों को भलीभाँति धो लें।
  • भंडार में कच्चे तथा पकाये हुए खाद्य पदार्थ सही ढ़ंग से संग्रह करें तथा रोगाणुकों, कृतकों तथा कीड़ों का आक्रमण रोकें।
  • उपभोग होने तक विकारीय भोज्य पदार्थ प्रशीतित करें।
  • अपना व्यक्तिगत स्वास्थ्य उत्तम बनाये रखें तथा रसोई घर तथा खाद्य-पदार्थ भंडार क्षेत्र स्वच्छ तथा निरापद रखें।
  • स्वास्थ्यकर तथा सुस्पष्ट आहारी संकल्पनाएँ तथा पाक-क्रियाएँ अपनायी जानी चाहिये
  • आहारी रिवाजों में सांस्कृतिक कारकों की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
  • आहार संबंधी दोष पूर्ण विश्वासों, सनक और कट्टरता से पोषण तथा स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
  • पाक-क्रियाएँ भोजन को स्वादिष्ट बनाती है तथा आसानी से पचाने में सहायक होती है।
  • पाक-क्रियाओं से हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
  • दोषपूर्ण पाक-क्रियाएँ अपनाने की आदतें पोषकों की हानि की ओर ले जाती है।
  • उच्च तापमान पर खाना पकाना पोषकों को विनाश की ओर ले जाता है तथा खाने में हानिकारक पदार्थ पैदा करता है।
  • खाद्य-पदार्थ के बारे में सनक और कट्टरता से बचें तथा भ्राँति पूर्ण विश्वासों को त्याग दें।
  • पकाने से पूर्व अनाज को बार-बार न धोयें।
  • काटने के बाद सब्जियों-तरकारियों को न धोयें।
  • कटी हुई सब्जियों तरकारियों को लंबी अवधि तक पानी में भिगो कर न रखें।
  • पकाने के बाद बचा हुआ अतिरिक्त जल न फेकें ।
  • खाना पकाते समय बर्तनों को ढक्कन से ढँका रखें।
  • अधिक घी / तेल में तलने /भूनने की अपेक्षा प्रेशर कुकर /वाष्प में पकाना अधिक अच्छा होता है।
  • अँकुरित /किण्वित खाद्य पदार्थों के उपयोग को प्रोत्साहित करें।
  • दालों / सब्जियों को पकाते समय सोडे का उपयोग करने से बचें।
  • बचे हुए शेष तेलों को बार-बार न गर्म करें।

पर्याप्त मात्रा में जल पीना चाहिये तथा पेय संयमित/नियंत्रित रू प से उपयोग करना चाहिये

  • जल मानव-शरीर का एक बड़ा घटक है।
  • पेय प्यास को शांत करने में उपयोगी होते हैं तथा शरीर में तरल द्रव की माँग को पूर्ण करते हैं।
  • कुछ पेय पोषकों की पूर्ति करते हैं जबकि अन्य उद्दीपक के रू प में कार्य करते हैं।
  • सभी आयु वर्गों के लिये दूध एक उत्कृष्ट पेय है क्योंकि यह पोषकों का एक भरपूर स्रोत है।
  • प्रतिदिन की तरलता आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिये निरापद तथा स्वास्थ्यकर जल यथेष्ट मात्रा में पियें।
  • जब जल का निरापद होना संदिग्ध हो तो जल उबाल कर पियें।
  • प्रतिदिन कम से कम 250 मिली लीटर उबाला हुआ अथवा पास्चुरीकृत दूध पियें।
  • कार्बोनेटीकृत पेयों के स्थान पर प्राकृतिक तथा ताज़े फलों का रस पियें।
  • कॉफी की अपेक्षा चाय पीना अधिक पसंद करें।
  • मद्यपान करने से बचें। जो लोग पीते हों, उन्हें इसका सेवन सीमित करना चाहिये।

संसाधन किये गये तथा बने-बनाये खाद्य पदार्थों का उपयोग समझदारी से करने चाहिये। शक्कर का उपयोग अल्प मात्रा में करना चाहिये

  • शहरीकरण ने संसाधित खाद्य-पदार्थों का खाया जाना तथा माँग बढ़ायी है।
  • परंपरागत ढ़ंग से पकाये गये खाद्य-पदार्थों के स्थान पर संसाधित खाद्य-पदार्थ अपनाने की प्रवृति होती जा रही है।
  • संसाधित खाद्य-पदार्थोंमें विविध प्रकार के खाद्य-सहयोज्य पदार्थ मिलाये जाते हैं।
  • पोषण की दृष्टि से जब तक कि संसाधित खाद्य पदार्थों को और अधिक पौष्टिक न बनाया जाये, संभव है कि वे संतुलित न हों।
  • शक्कर, एक संसाधित खाद्य-पदार्थ, कैलोरी के अतिरिक्त और कुछ नहीं देती।
  • परंपरागत ढ़ंग से अपने घर में ही पकाये गये आहार को खाना अधिक पसंद करें।
  • भोजन के समय संसाधित अल्पाहार करने से बचें।
  • शक्कर तथा संसाधित खाद्य-पदार्थ जो कैलोरियों के अतिरिक्तऔर कुछ नहीं देते, का उपयोग सीमित कर दें।
  • पुष्टीकृत संसाधित खाद्य पदार्थों को खाना अधिक पसंद करें।
  • अपने शरीर में खाद्य-सहयोज्यों की मात्रा को कम रखने के लिये संसाधित खाद्य पदार्थों के डिब्बों पर लगाये गये नाम पत्र पर निधानी-आयु तथा उपयोग किये गये सहयोज्यों के बारे में दी गयी जानकारी पर ध्यान दें।

वयोवृद्धजन को सदैव स्वस्थ और सक्रिय बने रहने के लिये पोषक-प्रचुर आहार खाना चाहिये

  • वृद्धजन को कैलोरियों की आवश्यकता कम ही होती है।
  • भोजन, शारीरिक सक्रियता तथा संक्रमण-प्रतिरोध क्षमता कम हो जाने के कारण वयोवृद्धजन में रोग होने की प्रवृति अधिक होती है।
  • आहार-संबंधी अच्छी आदतें होने तथा नियमित व्यायाम करने से वृद्धावस्था के कुप्रभाव कम हो जाते हैं।
  • वयोवृद्धजन से संबंधित रोगों का निवारण करने के लिये कैल्शियम, लौह, यशद, विटामिन ए, तथा प्रति ऑक्सीकारकों की आवश्यकता अधिक होती है।
  • स्वस्थ रहने के लिये विविध प्रकार के पोषक-प्रचुर पदार्थ खायें।
  • अपने भोजन को शारीरिक सक्रियता के अनुरू प बनायें।
  • दिनभर में भोजन को अनेक भागों में बाँट कर खायें।
  • तले हुए नमकीन तथा मसालेदार खाद्य-पदार्थ खाने से बचें।
  • नियमित रूप से व्यायाम करें।

स्थानबद्ध व्यस्क पुरुषों के लिये नमूना आहार योजना

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