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सईदुल्लाह ने किये कई आविष्कार, राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा मिले कई सम्मान

इस लेख में बिहार के मोतिहारी के बुज़ुर्ग आविष्कारक मोहम्मद सईदुल्लाह की कहानी बताई गयी है, जिन्होंने पानी पर चलने वाली साइकिल के बाद एक रिक्शा का भी निर्माण किया, किन्तु वे आज किस प्रकार जीवन में संघर्ष कर रहे हैं, यह बताया गया है ।

परिचय

 

बिहार के मोतिहारी के बुज़ुर्ग आविष्कारक मोहम्मद सईदुल्लाह ने अपने अविष्कारों से कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं। पर सईदुल्लाह ने ग़रीबी से तंग आकर अपनी बची-खुची ज़मीन और टूटा-फूटा घर बेचने का फ़ैसला किया है। अपने अविष्कारों से सईदुल्लाह कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके सईदुल्लाह क्यों करना चाहतें है ऐसा, पढ़िए इस लेख में।

पानी पर चलने वाली साइकिल बनायीं

सईद को एक ऐसी साइकिल बनाने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने पुरस्कार से नवाज़ा था जो नाव की तरह पानी पर चल सकती है। सईद ने अपनी इस साइकिल पर सवार होकर पटना में गंगा नदी पार की थी। उनके इस आविष्कार को बिहार के तत्कालीन राज्यपाल ए.आर. किदवई ने भी देखा था।लेकिन, सईद सरकार से नाराज़ हैं। वो अब अपने सारे पुरस्कार लौटाना चाहते हैं।उनका कहना है कि उन्हें पुरस्कार तो काफ़ी दिए गए लेकिन, किसी ने भी उन्हें इस तरह की खोज करने के लिए आर्थिक सहायता देने की कोशिश नहीं की। सईद का कहना है, अगर आप किसी को तबाह करना चाहते हैं तो बस उसे पुरस्कार दे दीजिए। सईद की गरीबी का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपने 16 सदस्यों वाले परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें रोज़ाना अपनी साइकिल पर शहद बेचने के लिए निकलना पड़ता है। कभी-कभी तो सईद को इसके लिए 30 किलोमीटर तक का सफ़र करना पड़ता है और वो इससे बमुश्किल 1500 रुपए महीना कमा पाते हैं। सईदुल्लाह ने अपनी पूरी ज़िंदगी इन्हीं अविष्कारों और खोज़ों में खपा दी । सईदुल्लाह ने अपनी खोज के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं। बिहार का ये इलाका हर साल बाढ़ की चपेट में आ जाता है। 1975 में इसी तरह की एक बाढ़ के दौरान सईद को एक मल्लाह ने बिना पैसे लिए नाव में बैठाने से मना कर दिया। तभी से सईद ने ठान ली कि वो इस बाढ़ से निपटने के लिए अपना ही कोई इंतज़ाम करके रहेंगे। बड़ी मशहूर कहावत है, आवश्यकता आविष्कार की जननी है। फिर क्या था सईद जुट गए और उन्होंने अगले तीन दिनों में ही एक ऐसी साइकिल तैयार कर दी जो पानी पर नाव की तरह तैर सकती थी। बस पैडल चलाइये और ये साइकिल आगे बढ़ती जाएगी। इसके लिए सईद ने साइकिल के साथ चार खाली कनस्तर जोड़ दिए। जो इसे पानी के ऊपर रखते हैं। इसके अलावा साइकिल के पहियों के साथ दो पंखुड़ियां भी लगाईं जिनकी मदद से साइकिल उसी तरह आगे बढ़ती है जैसे कोई नाव चप्पुओं के सहारे आगे चलती है। सईद की इस साइकिल में खास बात ये है कि ये पानी में अपने पैडल के सहारे पीछे की तरफ़ भी चल सकती है।

कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया है सईदुल्लाह को

सईदुल्लाह को अब तक कई पुरस्कार मिल चुके हैं कि वो तो इनकी गिनती भी भूल चुके हैं। 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान यानी नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (एनआईएफ) की तरफ़ से लाइफ़ टाइम अचीवमेंट  पुरस्कार से नवाज़ा था। इसी साल सईदुल्लाह को वॉल स्ट्रीट जरनल का एशियन इनोवेशन अवार्ड भी मिला। सईद ने 11 प्रतियोगियों के बीच बाज़ी मारी थी। सईद के बारे में डिस्कवरी चैनल के कार्यक्रम ‘बियोंड टुमॉरो’ में भी बताया गया था। सईद की साइकिल-नाव से प्रभावित एनआईएफ़ ने पेटेंट कराने के लिए सईद का ये आविष्कार ही उनसे ले लिया। इस बात को कइे वर्ष बीत चुके हैं लेकिन न तो सईद को साइकिल ही वापस मिली और न ही पेटेंट। लेकिन एनआईएफ की तरफ़ से उम्मीदें खो देने वाली सईद यहीं नहीं रुके। उन्होंने इसी तरह का एक साइकिल रिक्शा तैयार कर दिया। अब वो अपने नाती-पोतों को इस रिक्शे पर क़रीब के ही तालाब में सैर कराते हैं। सईदुल्लाह अपनी वर्कशॉप में ही सारे नए आविष्कार करते हैं। सईद कहते हैं, एनआईएफ़ ने मेरा दिल तोड़ा है। उन्होंने अपने प्रचार के लिए मेरा इस्तेमाल किया। सईद के दिल का दर्द उनके चेहरे पर ही नुमायां हो जाता है। बिहार सरकार के विज्ञानं एवं तकनीकी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अजय कुमार ने कहा कि वो एनआईएफ़ से बात करके उनकी इस ईजाद को जल्द से जल्द पेटेंट कराने की कोशिश करेंगे।

सईदुल्लाह के हालात हमेशा ऐसे नहीं रहे हैं। उनके बेटे मोहम्मद शकील-उर-रहमान के मुताबिक उनके पिता को विरासत में कई एकड़ ज़मीन, बाग़, एक बड़ा घर और एक हाथी मिला था। लेकिन नई-नई चीज़ें ईजाद करने के लिए उन्होंने ये सारा कुछ बर्बाद कर दिया। अपने पिता की ही तरह साइकिल पर पटना में शहद बेचने वाले शकील का कहना है कि उनके पिता का जुनून ही परिवार की ग़रीबी की अहम वजह है। घर की कमज़ोर आर्थिक हालात भी सईदुल्लाह को अपने अविष्कारों से नहीं रोक पाए हैं। साइकिल के बाद सईद चाभी से चलने वाला एक पंखा भी बना चुके हैं। मेज़ पर रखा जाने वाला ये पंखा लगातार दो घंटे तक हवा दे सकता है।

ज़ुर्ग वैज्ञानिक के आविष्कार

  • चाभी से चलने वाला पंखा
  • बिना ईंधन के चलने वाला पानी का पंप
  • कम ईंधन में चलने वाला ट्रैक्टर

सईद एक ऐसे पानी के पंप भी ईजाद कर चुके हैं जो बिना किसी ईंधन के चलता है।सईद की खोजों में एक छोटा ट्रैक्टर भी शामिल है जो सिर्फ़ पांच लीटर डीज़ल में दो घंटे चल सकता है। सईदुल्लाह का दावा है कि वो एक हेलीकॉप्टर भी बना सकते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें तक़रीबन ढाई लाख रुपए की ज़रूरत होगी। सईद का कहना है कि वो एक ऐसी कार बनाने के बारे में सोच रहे हैं जो हवा से चलेगी। सईदुल्लाह के घर में उनकी एक छोटी सी कार्यशाला भी है जिसे आप इस बुज़ुर्ग वैज्ञानिक की वर्कशॉप या लैब कह सकते हैं। यहां उनके पास एक हाथों से चलने वाली लेथ मशीन और कई सारे दूसरे औज़ार हैं जिनकी मदद से वो अपने आविष्कार करते हैं। सईद कहते हैं, मुझे यहां पर काम करने में मज़ा आता है। मेरा बस चले तो मैं यहां हमेशा रहूँगा। ग़रीबी का दर्द होने के बावजूद भी सईद के चेहरे की मुस्कुराहट कम नहीं होती। मोहम्मद सईदुल्लाह अपने हर आविष्कार को अपनी पत्नी नूरजहां के नाम कर देते हैं। जब सईद से पूछ गया कि अपना घर और बाकी की ज़मीन बिक जाने के बाद वो कहां रहेंगे तो मुस्कुराते हुए वो कहते हैं, मैं एक तीन मंज़िला कार बनाऊंगा जिसमें तह हो जाने वाले पलंग होंगे। इसे मैं किसी भी सड़क के किनारे खड़ी कर दूंगा।सईद का कहना है कि उन्हें अपनी इन खोजों के लिए प्रेरणा रोज़ाना की ज़रूरतों और अनुभव से मिलती है।

स्त्रोत: संदीप कुमार

लेखक स्वतंत्र पत्रकार है

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