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पर्यावरण

इस भाग में पर्यावरण से जुड़ी योजनाओं और नीतियों की जानकारी दी गई है।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम- 2010

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम- 2010 को भारत के राष्ट्रपति द्वारा 2 जून 2010 को मंजूरी दे दी गई है। इसके तहत राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम का गठन किया जा सकता है, जो पर्यावरण से जुड़े नागरिक मामलों की तीव्र सुनवाई के लिए एक फास्ट ट्रैक अदालत है।

इस ट्रिब्युनल के प्रमुख बेंच की स्थापना भोपाल में की जाएगी। ट्रिब्युनल में 4 सर्किट बेंच होंगे। यह वायु और जल प्रदूषण, पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम तथा जैवविविधता अधिनियम से जुड़े सभी पर्यावरणीय मामलों का निपटारा करेगा। इसके सदस्यों को एक समिति द्वारा चयनित किया जाएगा। पर्यावरणीय कानूनों के क्रियान्वयन तथा उनकी निगरानी के लिए जल्द ही एक राष्ट्रीय पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण का गठन किया जाएगा।

इस प्रयास के साथ ही भारत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों की पंक्ति में शुमार हो गया है, जिनके पास पर्यावरण से जुड़े इस प्रकार के विशेष प्राधिकरण हैं।

राष्ट्रीय जल नीति 2002

राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद ने अप्रैल 2002 में राष्ट्रीय जल नीति 2002 (एनडब्‍ल्‍यूपी) अपनाई जो विभिन्न जल संसाधनों के प्रबंधन से संबंधित मुद्दों के बारे में है। राष्ट्रीय जल नीति सतत विकास और जल संसाधनों के कुशल प्रबंधन पर जोर देती है।

राष्ट्रीय जल नीति के विशिष्‍ट लक्षण
  • जल एक प्रमुख प्राकृतिक संसाधन, एक बुनियादी मानवीय आवश्यकता और एक कीमती राष्ट्रीय परिसंपत्ति है। जल संसाधनों का नियोजन, विकास और प्रबंधन राष्ट्रीय दृष्टिकोण से संचालित किए जाने की आवश्यकता है।
  • जल से सम्बंधित डाटा के लिए राष्ट्रीय/राज्य स्तर पर उचित रूप से विकसित एक सूचना प्रणाली  स्थापित की जानी चाहिए जिसमें डाटा बैंक और डाटा बेस मौजूदा केंद्रीय और राज्य स्तर की एजेंसियों को समेकित और शक्तिशाली करने के एक नेटवर्क की भूमिका निभाए।
  • अधिकतम संभव सीमा तक देश में उपलब्ध जल संसाधन उपयोग को योग्य संसाधनों की श्रेणी में लाया जाना चाहिए।
  • उपयोग योग्य जल संसाधनों को और अधिक बढाने के लिए अंतर-बेसिन स्थानान्तरण, भूजल का कृत्रिम पुनर्भरण और  खारे या समुद्र के पानी को लवणमुक्त करने जैसी गैर-पारंपरिक विधियों के साथ-साथ छत पर वर्षा जल संचयन सहित वर्षा जल संचयन जैसी पारंपरिक जल संरक्षण प्रथाओं को अपनाने की आवश्यकता है।  इन तकनीकों के लिए केंद्रित तरीके से अग्रगामी अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना आवश्यक है.
  • एक हाइड्रोलॉजिकल इकाई के लिए जल संसाधन विकास और प्रबंधन की योजना बनानी होगी। नदी घाटियों के नियोजित विकास और प्रबंधन के लिए उचित नदी घाटी संगठनों को स्थापित किया जाना होगा।
  • क्षेत्रों/ घाटियों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए जल की कमी वाले क्षेत्रों में एक नदी घाटी से दूसरे में स्थानांतरित करने सहित अन्य स्थानों से स्थानांतरित कर जल उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  • जहां तक संभव हो, जल संसाधन विकास परियोजनाएं एक एकीकृत और बहु-अनुशासनिक उद्देश्य से समाज के वंचित वर्गों सहित मानव और पर्यावरण के पहलुओं को ध्यान में रखते हुए बहुप्रयोजन के लिए नियोजित की जानी चाहिए।
  • जल का वितरण, पहली प्राथमिकता में पीने के लिए, उसके बाद सिंचाई, पनबिजली, पारिस्थितिकी, कृषि उद्योगों और गैर-कृषि उद्योगों, अन्‍वेषण और अन्य उपयोगों के लिए- इसी क्रम में  किया जाना चाहिए।
  • भूजल का दोहन पुनर्भरण संभावनाओं और सामाजिक समानता के विचार के संदर्भ में नियामित किया जाना चाहिए। भूजल के अत्यधिक दोहन के हानिकारक पर्यावरणीय परिणामों को प्रभावी ढंग से रोका जाना चाहिए।
  • यह सुनिश्चित करने के लिए कि निर्माण और पुनर्वास गतिविधियां सुगमता से तथा एक साथ आगे बढ़ें, नियोजन सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए। पुनर्स्थापना और पुनर्वास पर ढांचागत राष्ट्रीय नीति तैयार करने की आवश्यकता है ताकि परियोजना से प्रभावित लोगों को उचित पुनर्वास के माध्यम से लाभ का हिस्सा मिले।
  • मौजूदा जल संसाधन सुविधाओं की भौतिक और वित्तीय स्थिरता पर पर्याप्त जोर दिए जाने की जरूरत है। यह सुनिश्चित करने की ज़रुरत है कि विभिन्न उपयोगों के लिए जल प्रभार स्थिर किया जाए ताकि शुरुआत में कम से कम संचालन और रखरखाव के व्यय और बाद में पूंजीगत लागत का एक हिस्सा इसके दायरे में हो।
  • विभिन्न उपयोगों के लिए जल संसाधनों के प्रबंधन में विभिन्न सरकारी एजेंसियों के साथ प्रयोक्ताओं और अन्य पक्षकारों को शामिल करके एक प्रभावी और निर्णायक ढंग से भागीदारी दृष्टिकोण को शामिल करना चाहिए।
  • जहाँ भी संभव हो, विविध उपयोगों के लिए जल संसाधन परियोजनाओं के नियोजन, विकास और प्रबंधन में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • सतही तथा भूजल, दोनों की गुणवत्ता की नियमित रूप से निगरानी की जानी चाहिए। प्राकृतिक धाराओं में निर्वहन से पहले अपशिष्ट को स्वीकार्य स्तर और मानकों के अनुसार शोधित किया जाना चाहिए। पारिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए धाराओं में बारहमासी  न्यूनतम प्रवाह सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • सभी विभिन्न उपयोगों में जल के उपयोग की क्षमता बेहतर की जानी चाहिए और शिक्षा, नियमन, पुरस्‍कार और दंड के माध्यम से संरक्षण चेतना को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • बाढ़ का खतरा झेलने वाली प्रत्‍येक घाटी के लिए बाढ़ नियंत्रण और प्रबंधन का एक मास्टर प्लान होना चाहिए।
  • उपयुक्त लागत प्रभावी उपायों से समुद्र या नदी द्वारा भूमि कटाव को न्यूनतम किया जाना चाहिए। तटीय क्षेत्रों और बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में अंधाधुंध व्यवसाय और आर्थिक गतिविधि को नियामित किया जाना चाहिए।
  • जल संसाधनों के विकास की परियोजना के नियोजन में सूखा प्रभावित  क्षेत्रों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। विभिन्न उपायों द्वारा इन क्षेत्रों की कमजोरी को कम किया जाना चाहिए।
  • राज्यों के बीच जल वितरण राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए जिसमें नदी घाटी के भीतर जल संसाधन की उपलब्धता और आवश्यकता पर विचार का उचित स्थान हो।
  • जल संसाधन विकास के एक अभिन्न अंग के रूप में प्रशिक्षण और अनुसंधान के प्रयासों में तेजी लाई जानी चाहिए।

राष्‍ट्रीय जल नीति मानती है कि उसकी सफलता उसके अंतर्निहित सिद्धांतों और उद्देश्यों के प्रति एक राष्ट्रीय सहमति और अपनी वचनबद्धता पर पूरी तरह निर्भर होगी और वांछित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य जल नीति के साथ एक संचालन योग्य कार्य योजना तैयार करनी होगी।  अब तक 13 राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों ने राज्य जल नीति तैयार की है। राज्यों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से तथा एनडब्‍ल्‍यूपी के उद्देश्यों को प्राप्त करने में उनके प्रयासों के पूरक के लिए भारत सरकार राज्यों को तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना

जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) को औपचारिक रूप से 30 जून 2008 को लागू किया गया। यह उन साधनों की पहचान करता है जो विकास के लक्ष्य को प्रोत्साहित करते हैं, साथ ही, जलवायु परिवर्तन पर विमर्श के लाभों को प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत करता है। राष्ट्रीय कार्य योजना के कोर के रूप में आठ राष्ट्रीय मिशन हैं। वे जलवायु परिवर्तन, अनुकूलन तथा न्यूनीकरण, ऊर्जा दक्षता एवं प्रकृतिक संसाधन संरक्षण की समझ को बढावा देने पर केंद्रित हैं।

आठ मिशन हैं:

  • राष्ट्रीय सौर मिशन
  • विकसित ऊर्जा दक्षता के लिए राष्ट्रीय मिशन
  • सुस्थिर निवास पर राष्ट्रीय मिशन
  • राष्ट्रीय जल मिशन
  • सुस्थिर हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र हेतु राष्ट्रीय मिशन
  • हरित भारत हेतु राष्ट्रीय मिशन
  • सुस्थिर कृषि हेतु राष्ट्रीय मिशन
  • जलवायु परिवर्तन हेतु रणनीतिक ज्ञान पर राष्ट्रीय मिशन

राष्ट्रीय सौर मिशन

जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के अंतर्गत राष्ट्रीय सौर मिशन को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है। इस मिशन का उद्देश्य देश में कुल ऊर्जा उत्पादन में सौर ऊर्जा के अंश के साथ अन्य नवीकरणीय साधनों की संभावना को भी बढ़ाना है। यह मिशन शोध एवं विकास कार्यक्रम को आरंभ करने की भी माँग करता है जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग को साथ लेकर अधिक लागत-प्रभावी, सुस्थिर एवं सुविधाजनक सौर ऊर्जा तंत्रों की संभावना की तलाश करता है।

जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना ने शहरी क्षेत्रों, उद्योगों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में सौर ऊर्जा के सभी निम्न तापमान (<150° सेंटीग्रेड) वाले अनुप्रयोगों के लिए 80% राशि तथा मध्यम तापमान (150° सेंटीग्रेड से 250° सेंटीग्रेड) के अनुप्रयोगों हेतु 60%  राशि उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसे हासिल करने के लिए समय-सीमा वर्ष 2017 तक 11वें एवं 12वें पंचवर्षीय योजनाओं की अवधि तय की गई है। इसके अतिरिक्त ग्रामीण अनुप्रयोगों को सरकारी-निजी भागीदारी के तहत लागू किया जाना है।

जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना ने वर्ष 2017 तक एकीकृत साधनों से 1000 मेगावाट/वर्ष फोटोवोल्टेइक उत्पादन का लक्ष्य रखा है। साथ ही, 1000 मेगावाट की संकेंद्रित सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता प्राप्त करने का भी लक्ष्य है।

स्रोत: http://pib.nic.in/release/release.asp?relid=61520&kwd

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