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पंचायत की विकासात्मक भूमिकाएं एवं कार्य

इस पृष्ठ में बिहार राज्य में पंचायत की विकासात्मक भूमिकाएं एवं कार्य की जानकारी दी गयी है।

परिचय

सामाजिक-आर्थिक विकास सामाजिक पूंजी से शुरू होकर उद्योगों के विकास तक पंहुचता है। यह सामाजिक पूंजी सबसे पहले एकजुटता के रूप में प्रकट होती है। अर्थात जिस समाज में एकता और एकजुटता नहीं है, कलह और वैमनस्य है, वहाँ विकास का काम बहुत कठिन है।

पंचायत राज, विशेषकर ग्राम पंचायत एंव ग्राम कचहरी के लिए जितने भी प्रावधान हैं वे सभी  इसी एकजुटता के माध्यम से सामाजिक पूंजी को बनाने और बढ़ाने की बात करते हैं। इसीलिए अगर हम यह कहें कि किसी भी समाज के सामाजिक-आर्थिक विकास में ग्राम पंचायत की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इस प्राथमिक आधार के अलावा जिस मूलभूत संरचना की आवश्यकता सामाजिक-आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने में पड़ती है वह भी पंचायत है कि विकास के लिए आधार की ही नहीं वरन सहायक तत्वों की भी व्यवस्था पंचायत के माध्यम से ही होती है।

बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 22 के अंतर्गत दिए  ‘ग्राम पंचायत के कार्य में जो काम सवसे पहले है वह है, ‘पंचायत क्षेत्र के विकास के लिए वार्षिक योजना तैयार करना’ तीसरे स्थान पर ‘पशुपालन डेयरी उद्योग और कूक्कट पालन, चौथे पर मत्स्य पालन, छठे पर है, खादी, ग्राम, कुटीर उद्योग, नौवें पर है ‘सड़क, भवन, पुलिया  निर्माण, जल मार्ग एवं संचार संसाधन। धारा 25 के अंतर्गत दिए ग्राम पंचायत की स्थायी समितियों’ में दूसरी समिति है, ‘उत्पादन समिति’ जिसका कार्य क्षेत्र है, कृषि, पशुपालन, डेयरी, कुक्कट पालन, मत्स्य पालन, वानिकी सबंधी प्रक्षेत्र, खादी ग्राम या कुटीर उद्योग एवं गरीबी उन्मूलन संबधी कार्यों को करने के लिए।

पंचायत समिति एंव जिला परिषद के स्तर पर ग्राम पंचायतों द्वारा किए गये इन्हीं कार्यों के ‘प्रोत्साहन’ अनुरक्षण’ एवं निष्पादन करने का प्रावधान है।

ग्राम कचहरी के विशेष कर्तव्य

ग्राम कचहरी के लिए विशेष कर्तव्य के अंतर्गत धारा :102  में ‘विवादों के सौहार्दपूर्ण समझौता कराने के लिए ग्राम कचहरी के न्यायपीठ का कर्तव्य की बात कही गई है:

ग्राम कचहरी की न्यायपीठ, इस अध्यादेश के उपबन्धों के अधीन, किसी वाद की सुनवाई करते समय या किसी मामले का विचारण करते समय, पक्षकारों को यथोचित के बीच सौहार्दपूर्ण समझौता कराने का प्रयास करेगी।

‘सौहार्दपूर्ण समझौता न होने की दशा में ग्राम कचहरी की न्यायपीठ द्वारा विवाद की जाँच करना तथा उस पर  निर्णय देना’ का संदेश यही है कि पहले न्यायपीठ की पक्षकारों के बीच सुलह-सफाई कराकर समाज की एकजुटता को बनाये रखना है।

यह सुलह-सफाई, समझौता वास्तव में उसी एकजुटता रूपी सामाजिक पूंजी को बनाये रखने की ओर चेष्टा है जिसके बिना न सामाजिक विकास हो सकता है और न आर्थिक।

पूरे विश्व में जहाँ कहीं भी औद्योगिक विकास हुआ है वहाँ-वहाँ सबसे पहले कृषि विकास ने समृद्धि का आधार बनाया। खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने के आधारभूत चिंता से समाज पहले विमुक्त हुआ, सामाजिक पूंजी बनी, फिर नैतिकता की प्रतिष्ठा हुई और तब आर्थिक विकास की ओर समाज अग्रसर हुआ। कारण कि आधारभूत तत्व के अभाव से त्रस्त लोगों के बीच न समाजिकता पनपती है और न नैतिकता।

पंचायत, विशेषकर ग्राम पंचायत ही यह कृषि आधारित समृद्धि देने स्थिति में है। बिहार के लिए यह और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ प्राकृतिक संपदा के रूप में उपजाऊ मिट्टी और नदियों का बहता पानी प्रचुरता से उपलब्ध है।

इस सन्दर्भ में बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 में स्पष्ट प्रावधान दिए गये हैं।

धारा: 22 में ग्राम पंचायत के कार्य के अंतर्गत दूसरे कार्य के रूप में वर्णित है कृषि विस्तार भी शामिल है इसमें कृषि और बागबानी का विकास और उन्नति, तथा बंजर भूमि का विकास आदि शामिल है।

धारा: 73 जिला परिषद के कार्य एवं शक्तियां में सबसे पहला स्थान कृषि को प्राप्त है जिसके अंतर्गत

- कृषि उत्पादन को बढ़ाने के साधनों को प्रोत्साहित करना।

कृषि बीज फार्म तथा व्यवसायिक फार्म खोलना ।

गोदाम की स्थापना

किसानों का प्रशिक्षण,अ अदि  शामिल है।

इसके लिए बिंदु (२) सिंचाई, भूतल जल संसाधन एन जल संभार विकास के अंतर्गत

लघु सिंचाई कार्य

भूतल जल संसाधनों का विकास

सामुदायिक पम्पसेट लगाना। आदि कार्य दिए हैं।

इसके अतर्गत सौपे गये 30 कार्यों में 20 ऐसे कार्य हों जो सामजिक एवं आर्थिक विकास से जुड़े हों। अता यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि पंचायत की अवधारणा तथा भूमिका में बदलाव हुआ है। आज के दौरे में पंचायत विवाद निपटाने की अपनी आरंभिक भूमिका से बहुत दूर निकल आई है। आज सामाजिक और आर्थिक विकास में इसकी महत्वपूर्ण एवं प्रभावी भूमिका को स्वीकार कर लिया गया है।

पंचायत की विकास संबंधी पहल प्रमुख रूप से चार क्षेत्रों में प्रभावी हो सकती है।

1. किसी विशेष लक्ष्य समूह के लिए अ९जैसे अनुसूचित जाती, अनुसूचित जन जाति, महिला पिछड़ा वर्ग आदि)

२. किसी विशेष क्षेत्र के लिए जैसे किसी सुखाड़ग्रस्त क्षेत्र के लिए

3. किसी विशेष समस्या को लेकर (जैसे-साक्षरता, गरीबी, परिवार कल्याण आदि)

4. किसी अवधि-विशेष के आधार पर (जैसे दीर्घ, लघु, वार्षिक, अर्द्धवार्षिक आदि)

इसके अतिरिक्त पंचायतों के विकास संबधी कार्यकलाप अधिनियम के अनुसार तीन स्त्रोतों से जुड़े है:

केंद्र सरकार द्वारा संपोषित योजनाएं

राज्य सरकार के विभागों द्वारा विनिद्रिष्ट काय

स्व-प्रेरित

इसमें से पहले दो पंचायतों के बस में भले न हों स्व-प्रेरित विकास कार्य धारा:22 के अतर्गत सबसे प्रमुख एवं उनके अपने हाथ में हैं। इसमें भी तीन तरह से वार्षिक योजनाओं का निर्माण किया जा सकता है:

केन्द्रीय योजनाओं को ध्यान में रखते हुए सड़क, रोजगार, आवास से जुडी योजना

विभागों द्वारा विनिद्रिष्ट से सूक्ष्म-स्तरीय सर्वेक्षण कराकर उस पर प्राथमिकता के आधार पर बनी एवं इसकी सहमति से पारित योजना।

वास्तव में ग्राम पंचायत स्तर पर इन तीनों तरह की योजनाओं को मिलाकर एक समेकित योजना बनाई जा सकती है, जिसकी चरणबद्ध तरीके से क्रियान्वयन किया जा सकता है। यहीआदर्श विकास योजना भी होगी।

2. विशेषकर ग्राम पंचायत समेकित विकास योजना बनाकर कार्य करने में अधिक सक्षम है। स्थानीय-स्तर की समेकित योजना बनाकर काम करने के पाने लाभ है:

1. यह स्थान विशेष के निवासियों की आवश्यकताओं ध्यान में रखकर बनायी जायेगी।

२. यह स्थान विशेष में विकास से विभिन्न पहलुओं एवं संभावनाओं को ध्यान में रखकर बनी  योजना होगी।

3. चूँकि इस योजना निर्माण में स्थानीय लोगों की भागीदारी होगी अतः इसके प्रति उनमें उत्साह होगा।

4. इसमें शासन-प्रशासन दोनों को ध्यान में रखकर कार्यक्रमों को निर्धारण किया जा सकेगा।

ऐसे स्थानीय –स्तर सूक्ष्म-स्तरीय योजनाएं बनाई जाने पर लोगों को यह स्पष्ट दिखने लगता है कि

कौन-कौन से काम वे स्वयं बिना किसी बाहरी मदद के कर सकते हैं (जैसे-ब्द्धों को स्कूल भेजने, स्कूल की सफाई एंव रख-रखाव आदि)

कौन-कौन से काम वे थोड़ी-सी बाहरी सहायता से कर सकते हैं तथा

कौन-कौन से काम बिना बाहरी मदद के नहीं कर सकते।

कार्यों का इस तरह बंटवारा करके हम अपनी आत्मनिर्भरता बढ़ा सकते हैं तथा ग्राम स्वराज्य के लक्ष्य की ओर बढ़ सकते हैं।

5. इसके अतिरिक्त सूक्ष्म-स्तरीय योजनाओं का बहुस्तरीय होना स्वाभाविक है। इसमें ग्राम उद्योग, लघु सिंचाई, पयेजल, स्थानीय सड़क, प्राथमिकता स्कूल, स्वच्छता, स्वास्थ्य केंद्र आदि आ जांयेंगे। इस योजना के माध्यम से क्षेत्र में उपलब्ध मानव संसाधन तथा सामग्री संसाधन की भी जानकारी मिल जाती है। वहाँ कितने पढ़े-लिखे एंव कैसे अनुभवों वाले स्त्री-पुरुष हैं तथा किसी काम में इस्तेमाल की जाने वाली चीजें, जैसे परती भूमि, पानी उपकरण, ईंट, धातु आदि कहाँ-कहाँ और किस परिमाण में उपलब्ध हैं यह भी मालूम हो जाता है। इन्हीं के आधार पर एक पंचायत वार ‘संसाधन रजिस्टर’ भी बनाया जा सकता है जिसे समय-समय पर अद्यतन किया जा सकता है। इस तरह की योजना बनाकर लोक-स्तर पर कामं करने हेतु धारा:147 के तहत ग्राम पंचायतों को पानी उप-विधि बनाकर कम करने का प्रावधान किया गया है। इसके अतर्गत ग्राम पंचायत एक स्वैच्छिक संगठन के रूप में परियोजना प्रपत्र बनाकर विभिन्न सरकारी संस्थानों से उसको क्रियान्वित करने के लिए वितीय संपोषण प्राप्त कर सकती है।

6. स्थानीय विकास में पंचायत की भूमिका सबसे प्रमुख  है। पर एक मूलभूत प्रश्न उठता है कि क्या वे अपन दायित्वों के निवर्हन में सक्षम है? क्या प्रावधान बना देने मात्र से विकास के रास्ते के अवरोधों का समाधान हो जाता है?वास्तव में ऐसा नहीं है। पंचायतें इन भूमिकाओं का निर्वहन करने की स्थिति में तबतक नहीं हो सकती जबतक उन्हें सलाह, सहाय्य तथा मार्गदर्शन देने वाली किसी संस्था का साथ नहीं मिलता। केंद्र सरकार से लेकर जिला प्रशासन तक के पास काम करने के लिए पढ़े-लिखे एवं अनुभवी व्यक्तियों की पूरी लश्कर मौजूद रहती है। ग्राम पंचायतें भला बिना किसी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण तथा सहायता के इतने सारे कुछ साधारण, कुछ जटिल काम कैसे कर सकती है?

इसी  मूलभूत आवश्यकता को ध्यान में रखकर विपार्ड ने प्रखंड स्तर पर एक संसाधन एवं साह्य्य केन्द्र की स्थापना की योजना बनाई है। इस केन्द्र पर उद्यमी प्रशिक्षक उपलब्ध रहेंगे जो सलाहकार, सहायक एवं मार्गदर्शक की भूमिका निभाएँगे।

7. सूक्ष्म-स्तरीय नियोजन

विकास के लिए सतत क्रियाशील रहना मानव का स्वभाव है। विकाशिलता हमारे चरित्र में निहित है। अतः हर व्यक्ति हर समय अपने जीवन –यापन के लिए, पाने परिवार के कल्याण के लिए और समुदाय के उत्थान के लिए किसी न किसी रूप में क्रियाशील रहता है।

विकास के लिए तीन तत्वों का होना आवश्यक  है-वर्तमान स्थिति की समझदारी, उपलब्ध संसाधनों की पहचान एंव प्राप्त करन योग्य लक्ष्य। इन तीनों तत्वों के बिना विकास एक कोरी कल्पना है।

इसके अलावा, यह हर समय याद रखना आवश्यक है कि सामुदायिक विकास के लिए परिवार कल्याण भी सम्मिलित है एवं व्यक्ति का अपना जीवन-योआन भी इसलिए विकास की जब भी बात की जाए तो  हमें सामुदायिक विकास की ही बात करनी चाहिए।

सामुदायिक विकास के लिए सूक्ष्म-स्तरीय नियोजन एक अचूक माध्यम है जो हमें विकास के लिए आवश्यक तीनों तत्वों को एक साथ उपलब्ध कराता है। इसलिए हर ग्राम पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधियों को एवं उनके साथ काम करने वालों को सूक्ष्म-स्तरीय नियोजन के विषय में जानना परम आवश्यक है।

सूक्ष्म-स्तरीय नियोजन स्थानीय लोगों की सहमति एवं सहयोग से स्थानीय स्थिति और संसाधनों का विश्लेषण करते हुए, योजना निर्माण से लेकर क्रियान्वयन एवं मूल्यांकन स्तर तक, सबों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए वास्तविकता पर आधारित योजना-निर्माण करना है। इसमें व्यक्ति  को केंद्र में रखकर, छोटे और कम महत्वपूर्ण कारकों को भी ध्यान में रखते हुए परियोजना का निर्माण किया जाता है।

पंचायत राज द्वारा सत्ता के विकेन्द्रीकरण के प्रयास के तहत ग्राम पंचायत को पाने सामाजिक एवं आर्थिक विकास की योजना के निर्माण से सही शुरुआत करनी चाहिए। राजनीति अरु अफसरशाही के  बीच फंसकर रह जाने से ग्राम पंचायत को अगर बचना है तो उसे अपनी विकास योजना स्वयं ही बनानी होगी और उसके लिए सूक्ष्म-स्तरीय नियोजन सबसे सरल एवं सहभागिता माध्यम है।

सूक्ष्म-स्तरीय नियोजन के प्रमुख चरण इस प्रकार है

  • वातावरण तथा सम्पर्क निर्माण
  • आंकड़ा संग्रहण
  • आंकड़ा विश्लेषण तथा समस्याओं की पहचान
  • समस्या का विश्लेषण
  • योजना निर्माण एवं सामूहिकता के दृष्टिकोण से विश्लेषण
  • उनके क्रियान्वयन में अवरोधकों की पहचान एवं समाधान
  • क्रियान्वयन के लिए म्स्न्य निर्धारण
  • योजना की ग्राम सभा में प्रस्तुति
  • योजना का ग्रामसभा में अनुमोदन
  • योजना के क्रियान्वयन के आयाम
  • योजना के मूल्यांकन के मापदंड

ग्राम पंचायत को उपविधि बनाने की शक्ति (धारा:147)

ग्राम पंचायत अपने संस्थागत लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक स्वशासित निकाय की तरह यदि चाहे तो तो उपविधि बनाकर काम कर सकती है। लेकिन उपविधि बनाकर काम करने से पहले ग्राम पंचायत को इसके लिए जिला परिषद की अनुमति प्राप्त करनी होगी।

यह उपविधि अधिनियम के अधीन सुपर्द किये गये कार्यों एंव दायित्त्वों के निष्पादन के लिए ही बनायी जा सकेगी।

यह उपविधि बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 के उपबन्धों एवं इसके अधीन बनाई गई नियमावली के अनुरूप ही होगी।

इस उपविधि में कार्यों के सुचारू एंव सुनिश्चित ढंग से क्रियान्वयन के इए विशेष प्रावधान, जैसे, दिय गये मानकों के उल्लंघनस्वरुप दंड या उससे हुई हानि की पूर्ति, का भी प्रावधान किया जा सकेगा।

उपविधि बनाकर तथा उसे जिला परिषद से स्वीकृत कराकर, ग्राम पंचायत, अधिनियम के अंतर्गत दिए गये कार्यों को करने एवं उत्तरदायित्वों के पालन हेतु, योजना बनाकर कार्य कर सकने में सक्षम होगा।

जैसे, अपने विनिद्रिष्ट कार्य, ‘ग्रामीण एवं कुटीर उद्योग को बढ़ाना’ के अंतर्गत ग्राम पंचायत एक योजना बनाकर उसके लिए वित्तीय तथा सहायता हेतु खादी एवं कुटीर उद्योग कमीशन को भेज सकती है तथा सहायता प्राप्त होने पर उसे ग्राम पंचायत  निधि में रखकर उस योजना का क्रियान्वयन कर सकता है।

उसी प्रकार महिला सशक्तिकरण हेतु योजना बनाकर महिला विकास निगम को सहायतार्थ भेज सकती है।

थोड़ी सी कल्पनाशीलता के बल पर उप-विधि बनाकर ग्राम पंचायत अपने को एक सशक्त निगमित निकाय के रूप में आगे ला सकता है। उसे महज सौंपी गयी योजनाओं एवं कार्यक्रमों पर आश्रित रहने के आवश्यकता नहीं। इस प्रकार उपविधि बनाकर कार्य करके ग्राम पंचायत राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के समग्र विकास के माध्यम से ग्राम स्वराज की सोच को साकार कर सकती है।

 

स्त्रोत: पंचायती राज विभाग, बिहार सरकार

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