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उच्चतर शैक्षिणिक संस्थान में महिला कर्मचारियों एवं छात्राओं के लैंगिक उत्पीड़न पर निषेध संबंधी निदेशिका

इस भाग में उच्चतर शैक्षिक संस्थानों में महिला कर्मचारियों एवं छात्रों के लैंगिक उत्पीड़न के निराकरण, निषेध एवं इसमें सुधार से सबंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी जा रही है।

परिचय

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्चतर शैक्षिक संस्थानों में महिला कर्मचारियों एवं छात्रों के लैंगिक उत्पीड़न के निराकरण, निषेध एवं इसमें) विनियम 2015

मि. सं. 91 -1/2013 (टी. एफ. जी. एस – विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनिमय 1958 (1956 का 3) जिसे उक्त अधिनियम के अनुच्छेद (1) से संयुक्त रूप से पढ़ा जाए उस अधिनियम 26 के अनूच्छेद (1) की धारा (जी) द्वारा प्रदत्त अधिकारों के क्रियान्वयन अनुसार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एतद् द्वारा निम्न विनियम निर्मित कर रहा है नामत: -

1. लघु शीर्ष, अनुप्रयोग एवं समारंभ - (1) ये विनियम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्चतर शैक्षिक संस्थानों में महिला कर्मचारियों एवं छात्रों के लैंगिक उत्पीड़न के निराकरण, निषेध एवं इसमें सुधार) विनियम, 2015 कहलाएँगे

(2) ये विनियम भारत वर्ष में सभी उच्चतर शैक्षिक संस्थानों पर लागू होंगे।

(3) सरकारी राजपत्र में उनके प्रकाशन की तिथि से वे लागू माने जाएंगे।

परिभाषाएँ

इन विनियमों में बर्शते विषयवस्तु के अंतर्गत कुछ अन्यथा जरूरी है

(अ) पीड़ित महिला से अर्थ है किसी भी  आयु वर्ग की एक ऐसी महिला – चाहे वह रोजगार में है या नहीं, किसी कार्य स्थल में कथित तौर पर प्रतिवादी द्वारा कोई लैंगिक  प्रताड़ना के कार्य का शिकार बनी है,

(ब) अधिनियम से अर्थ है कार्य स्थल में महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निराकरण, निषेध एवं समाधान) अधिनियम, (2013 का 14)

(स) परिसर का अर्थ उस स्थान अथवा भूमि से हैं जहाँ पर उच्चतर शैक्षिक संस्थान तथा इसके संबद्ध संस्थागत सुविधाएँ जैसे पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ, लेक्चर हॉल, आवास, हॉल, शौचालय, छात्र केंद्र, छात्रावास, भोजन कक्षों स्टेडियम, वाहन पड़ाव स्थल, तथा अन्य कुछ सुविधाएँ उपवनों जैसे स्वास्थय केंद्र, कैंटीन, बैंक पटल इत्यादि स्थित है तथा जिसमें छात्रों द्वारा उच्च शिक्षा के छात्र के रूप में दौरा किया जाता हो – जिस में वह परिवहन शामिल है जो उन्हें उस संस्थानों से आने जाने के लिए, उस संस्थान के अलावा क्षेत्रीय भ्रमण हेतु संस्थान पर अध्ययनों, अध्ययन भ्रमण, सैर – सपाटे के लिए, लघु – अवधि वाली नियुक्तियों के लिए, शिविरों के लिए उपयोग किए जा रहे स्थानों, संस्कृतिक समारोहों, खेलकूद आयोजनों एवं ऐसी ही अन्य गतिविधियों    जिनमें कोई व्यक्ति एक कर्मचारी अथवा उच्चतर शैक्षिक संस्थान के एक छात्र के रूप में भाग ले रहा है- यह समस्त उस परिसर में सम्मिलित हैं।

(डी) आयोग का अर्थ है विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम 1956 (1956 का 3) के अनूच्छेद 4 के अंतर्गत स्थापित हैं

(ई) आवृत्त व्यक्तियों से अर्थ उन व्यक्तियों से है जो एक सुरक्षित गतिविधि के कार्यरत है जिसे कि किसी लैंगिक उत्पीड़न की शिकायत को दायर करना – अथवा वे किसी व्यक्ति से घनिष्ठ रूप से संबंद्ध हैं जो सुरक्षित गतिविधि में कार्यरत है तथा ऐसा व्यक्ति एक कर्मचारी हो सकता है  अथवा उस पीड़ित व्यक्ति का एक कर्मचारी हो सकता है अथवा उस पीड़ित व्यक्ति का एक कर्मचारी हो सकता है अथवा एक साथ छात्र अभिभावक हो सकता है।

(एफ) कर्मचारी का अर्थ, उस व्यक्ति से है जिसे अधिनियम में परिभाषित किया गया है तथा इसमें इन विनियमों की दृष्टि से प्रशिक्षार्थी, शिक्षार्थी अथवा वे अन्य जिस नाम नाम से भी जाने जाते हैं। आन्तरिक अध्ययन में लगे छात्र, स्वयं सेवक, अध्यापन – सहायक शोध सहायक चाहे वे रोजगार में है अथवा नहीं, तथा क्षेत्रीय अध्ययन में, परियोजनाओं लघु – स्तर के भ्रमण अथवा शिविरों में कार्यरत व्यक्तियों से है।

(जी) कार्यकारी प्राधिकारी से अर्थ है उच्चतर शैक्षिक संस्थान के प्रमुख कार्यकारी प्राधिकारी, चाहें जिस नाम से वे जाने जाते हों- तथा जिस संस्थान में उच्चतर शैक्षिक संस्थान का सामान्य प्रशासन सम्मिलित है। सार्वजनिक रूप से निधि प्राप्त संस्थानों के लिए, कार्यकारी प्राधिकारी से अर्थ है अनूशासनात्मक  प्राधिकारी जैसा कि केन्द्रीय नागरिक सेवाएँ ( वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम तथा इसके समतुल्य नियमों में दर्शाया गया है।

(एच) उच्चतर शैक्षिक संस्थान (एचई.आई) से अर्थ है- एक विश्वविद्यालय से अनूच्छेद 2 की धारा (जे) के अंतर्गत अर्थों के अनुसार है, ऐसा एक महाविद्यालय जो अनूच्छेद 12 ए (ए) के उप – अनूच्छेद (1) की धारा (बी) के अर्थ के अनुसार है तथा एक ऐसा संस्थान जो मानित विश्वविद्यालय के रूप में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम 1956 (1956 का 3) के अनूच्छेद 3 के अंतर्गत है।

(आई) आन्तरिक शिकायत समिति (आई.सी.सी) इंटरनल कन्प्लेंट्स कमिटी) से अर्थ इन विनियमों के विनियम 4 के उप – विनियम (1) के अर्थ के अनुसार उच्चतर शैक्षिक संस्थान द्वारा गठित की जाने वाली आन्तरिक शिकायत समिति से है। यदि पहले से ही सामान उद्देश्य वाला कोई निकाय सक्रिय है, जैसे कि लैंगिक संवेदीकरण समिति जो लैंगिक उत्पीड़न संबंधी विवाद देखेगी (जी.एस.सी.ए.एस.एच) ऐसे निकाय को आन्तरिक शिकायत समिति (आइसीसी) के रूप में पुनर्गठित किया जाना चाहिए।

बशर्ते बाद वाले मामले में उच्चतर शैक्षिक संस्थान ऐसा सुनिश्चित करेगा कि इन विनियमों के अंतर्गत आन्तरिक शिकायत केंद्र के लिए ऐसे एक निकाय का गठन आवश्यक है। बशर्ते  कि ऐसा निकाय इन विनियमों के प्रावधानों  द्वारा बाध्य होगा।

(जे) संरक्षित गतिविधि में ऐसी एक परंपरा, के प्रति तर्कपूर्ण विरोध शामिल है, जिसके बारे में ऐसा माना जाता है कि अपनी तरह से अथवा कुछ दुसरे लोगों की तरफ से लैंगिक उत्पीड़न संबंधी कानूनों का उल्लंघन उस परंपरा के माध्यम से किया जा रहा है – जैसे कि लैंगिक उत्पीड़न मामलों की कार्रवाई में भागीदारी करना, किसी भी आन्तरिक जाँच पड़ताल में अथवा कथित लैंगिक उत्पीड़न कामों में सहयोग करना अथवा किसी बाहरी एजेंसी द्वारा की जा रही जाँच पड़ताल में अथवा किसी मुकदमें में बतौर गवाह मौजूद रहना।

(के) लैंगिक उत्पीड़न का अर्थ है –

(i) ऐसा एक अनचाहा आचरण जिसमें छिपे रूप में लैंगिक भावनाएं जो प्रत्यक्ष भी हो जाती हैं अथवा जो भावनाएं अत्यंत मजबूत होती, नीचतायुक्त होती हैं, अपमानजनक होती हैं अथवा एक प्रतिकूल और धमकी भरे परिणामों द्वारा अधीनता की ओपर प्रेरित करने वाली होती हैं तथा ऐसी भावनाओं में निम्नलिखित अवांछित काम या व्यवहारों में कोई भी एक या उससे अधिक या ये समस्त व्यवहार शामिल हैं (चाहे सीधे तौर से या छिपे तौर से ) नामत:

(अ) लैंगिक भावना से युक्त कोई भी अप्रिय शारीरक, मौखिक अथवा गैर मौखिक के अतिरिक्त कोई आचरण

(ब) लैंगिक अनुग्रह या अनुरोध करना

(स) लैंगिकता युक्त टिप्पणी करना

(ड़) शारीरिक रूप से संबंध बनाना अथवा पास बने रहने की कोशिश करना

(ई) अश्लील साहित्य दिखाना

(ii)   निम्न परिस्थितियों में से किसी एक में (अथवा इससे अधिक एक या सभी में) यदि ऐसा पाया जाता है अथवा वह ऐसे किसी बर्ताव के बारे में है या उससे संबंधित है जिसमें व्यापक रूप से या छिपे रूप में लैंगिक संकेत छिपे हैं

(अ) छिपे तौर से या प्रत्यक्ष रूप से अधिमान्य व्यवहार देने का वायदा जो लैंगिक समर्थन के एवज में हैं

(ब) कार्य के निष्पादन में छिपे रूप से या सीधे तौर से रूकावट डालने की धमकी

(स) संबद्ध व्यक्ति के वर्तमान अथवा उसके भविष्य के प्रति छिपे तौर से या सीधे तौर से धमकी देकर

(द) एक दहशत भरा हिंसात्मक या द्वेष पूर्ण वातावरण पैदा करके,

(ई) ऐसा व्यवहार करना जो कि संबद्ध व्यक्ति के स्वास्थय उसकी सुरक्षा, प्रतिष्ठा अथवा उसकी शारीरिक दृढ़ता को दुष्प्रभावित करने वाला है।

(एल) छात्र शब्द का अर्थ उस व्यक्ति के लिए है जिसे विधिवत प्रवेश मिला हुआ है, जो नियमित रूप से या दूर शिक्षा विधि से एक उच्च शिक्षा संस्थान में एक अध्ययन पाठ्यक्रम का अनुसरण कर रहा है जिसमें लघु अवधि प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी शामिल है।

बशर्ते ऐसे किसी छात्र के साथ यदि कोई लैंगिक उत्पीड़न की घटना होती है जो उच्च शिक्षा संस्थान परिसर में प्रवेश पाने की प्रक्रिया में है – यद्यपि वह प्रवेश प्राप्त नहीं हुआ है तो इन विनियमों के आधार पर उस छात्र को उच्च शिक्षा संस्थान का छात्र माना जाएगा।

बशर्ते एक ऐसा छात्र जो किसी उच्चतर शैक्षिक संस्थान में प्रवेश प्राप्त है तथ उस संस्थान में भागीदार है और उस छात्र के प्रति कोई लैंगिक उत्पीड़न होता है तो उसे उस उच्च संस्थान का छात्र माना जाएगा।

(एम) किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा उत्पीड़न उस स्थिति को दर्शाता है जब लैंगिक उत्पीड़न की घटना किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा या किसी बाहर के आदमी द्वारा की गई हो तो जो न तो उस उच्च शैक्षिक संस्थान का कर्मचारी अथवा उसका छात्र है – बल्कि उस संथान में एक आगन्तुक है जो अपने अन्य किसी काम आ उद्देश्य से आया हुआ है।

(एन) उत्पीड़न का अर्थ है किसी से नकारात्मक व्यवहार जिसमें छिपे तौर से या सीधे तौर से लैंगिक दुर्भावना की नियत छिपी होती है।

(ओ) कार्यस्थल का अर्थ है उच्चतर शैक्षिक संस्थान का परिसर जिसमें शामिल हैं

क. कोई विभाग, संगठन, उपक्रम, प्रतिष्ठान, उद्योग, संस्थान, कार्यालय, शाखा अथवा एकांश जो उपयुक्त उच्चतर शैक्षिक संस्थान द्वारा पूरी तरह अथवा पर्याप्त रूप से उपलब्ध निधि द्वारा सीधे तौर से अथवा अप्रत्यक्ष रूप से स्थापित, स्वामित्व वाले या उससे नियंत्रित हैं,

ख. ऐसा कोई खेलकूद संस्थान, स्टेडियम, खेल परिसर या प्रतियोगिता या खेलकूद क्षेत्र चाहें वह आवासीय है या नहीं उसे उच्चतर शैक्षिक संस्थान की प्रशिक्षण, खेलकूद अथवा  अन्य  गतिविधियों के लिए उपयोग नहीं किया जा रहा है,

ग. ऐसा कोई स्थान जिसमें कर्मचारी अथवा छात्र अपने रोजगार के दौरान या अध्ययन के दौरान आते रहते हैं तथा जिस गतिविधि में यातायात शामिल हैं जिसे कार्यकारी प्राधिकारी ने ऐसे भ्रमण के लिए उपलब्ध कराया है जो उस उच्च शैक्षिक संस्थान में अध्ययन के लिए हैं।

उच्चतर शैक्षिक संस्थानों के दायित्व

प्रत्येक उच्चतर शैक्षिक संस्थान

क. कर्मचारियों एवं छात्रों के प्रति लैंगिक उत्पीड़न के निराकरण एवं निषेध संबंधी अपनी नीति एवं विनियमों में उपरोक्त परिभाषाओं की भावना को यथा आवश्यक उपयुक्त रूप में सम्मिलित करें तथा इन विनियमों की आवश्यकता अनुसार अपने अध्यादेशों एवं नियमों को संशोधित करना।

ख. लैंगिक उत्पीड़न के विरूद्ध प्रावधानों को अधिसूचित करना तथा उनके विस्तृत प्रचार – प्रसार को सुनिश्चित करना,

ग. जैसा कि आयोग की सक्षम (परिसरों में महिलाओं की सुरक्षा एवं सुरक्षा एवं लैंगिक संवेदीकरण कार्यक्रम) रिपोर्ट में दर्शाया गया है, प्रशिक्षण कार्यक्रम अथवा कार्यशाला, अधिकारियों, कार्यपालकों, संकाय सदस्यों एवं छात्रों के लिए उन्हें सभी को सुग्राही बनाना तथा इस अधिनियम एवं इन विनियमों में स्थापित अधिकारों, पात्रताओं एवं दायित्वों की जानकारी उन्हें सुनिश्चित कराना तथा उनके प्रति उन्हें जागरूक बनाना,

घ. इस बात को पहचानते हुए कि प्राथमिक रूप से महिला कर्मचारी तथा छात्राओं एवं कुछ छात्र तथा तीसरे लिंग वाले छात्र कई प्रकार के लैंगिक उत्पीड़न, अपमान एवं शोषण के अंतर्गत संवेदनशील हैं, तदनुसार सभी लिंगों के कर्मचारियों एवं छात्रों के प्रति सुनियोजित समस्त लिंग आधारित हिंसा के निर्णयात्मक रूप से सक्रिय बनना,

ङ. लैंगिक उत्पीड़न के प्रति शून्य स्तर सहन संबंधी नीति की सार्वजनिक प्रतिबद्धता रखना,

च. सभी स्तरों पर अपने परिसर को, भेदभाव, उत्पीड़न, प्रतिशोध अथवा लैंगिक आक्रमणों से मुक्त बनाने की प्रतिबद्धता की पुन:पुष्टि करना,

छ. इस विषय में जागरूकता पैदा करना कि लैंगिक उत्पीड़न में क्या सामिल हैं – तथा इसके साथ ही हिंसापूर्ण वातावरण उत्पीड़न एवं प्रतिकर उत्पीड़न इन विषयों में जागरूकता पैदा करना,

ज. अपनी विवरणिका में सम्मिलित करना और महत्वपूर्ण स्थलों पर विशिष्ट स्थानों पर या  नोटिस बोर्ड पर लैंगिक उत्पीड़न के दंड एवं परिणामों को दर्शाया जाना तथा संस्थान के सभी समुदायों के वर्गों को इस तंत्र की सूचना के प्रति जागरूक करना जो तंत्र लैंगिक उत्पीड़न संबंधी शिकायतों के समाधान के लिए बनाया गया है तथा इसके बारे में आन्तरिक शिकायत समिति के सदस्यों का विवरण, उनसे संपर्क साधना, शिकायत के बारे में विधि आदि के बारे में बताना यदि कोई मौजूदा निकाय पहले से ही उसी लक्ष्य के साथ सक्रिय है (जैसे कि लैंगिक संवेदीकरण समिति जो लैंगिक उत्पीड़न के विरूद्ध है, ऐसे जेंडर सेन्सिटाइजेशन कमिटी अंगेस्ट सैक्सुअल ह्रासमेंट – जी.एस.सी.ए.एस.एच निकाय को आन्तरिक शिकायत समिति) इंटरनल कम्प्लेंट्स कमिटी- आई.सी.सी के समान ही पुनर्गठित करना,

झ. बशर्ते बाद में दर्शाये गए मामले में उच्चतर शैक्षिक संस्थान सुनिश्चित करेंगे, कि इस प्रकार के निकाय का गठन आई.सी.सी के लिए आवश्यक सिद्धांतों के आधार पर इन विनियमों के अंतर्गत किया गया है। ऐसा कोई भी निकाय इन विनियमों के प्रावधानों के द्वारा बाध्य होगा,

ण. कर्मचारयों एवं छात्रों को उपलब्ध आश्रय के बारे में बताना, यदि वे लैंगिक उत्पीड़न के के शिकार हुए हैं,

ट. आन्तरिक शिकायत समिति के सदस्यों द्वारा शिकायतों के निपटान, समाधान अथवा समझौते आदि के प्रक्रिया का संचालन संवेदनशील रूप से करने के लिए, नियमित अभिमुखी अथवा प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालन करना,

ठ. कर्मचारियों एवं छात्रों के सभी प्रकार के उत्पीड़न के निराकरण हेतु सक्रिय रूप से गतिशीलता बनाना चाहें वह उत्पीड़न किसी प्रबल अधिकारी अथवा उच्चतर शैक्षिक संस्थान स्थित पदानुक्रम संबंधों के आधार पर है। अथवा किसी घनिष्ठ भागीदार की हिंसा संबंधी हो अथवा समकक्षों से अथवा उस उच्चतर शैक्षिक संस्थान की भौगोलिक सीमाओं से बाहर किन्हीं तत्वों के कारण हो,

ड. उसके कर्मचारियों एवं छात्रों के प्रति किए गए लैंगिक उत्पीड़न के लिए दोषी जो लोग हैं उन्हें दंडित करना तथा विधि द्वारा मान्य कानून के अनुसार समस्त कार्यवाही करना तथा परिसर में लैंगिक उत्पीड़न के निराकरण एवं अवरोध हेतु तंत्रों एवं समाधान प्रणाली को यथास्थिति बनाना,

ढ. यदि उस दुराचार का षड्यंत्रकारी वहाँ का कर्मचारी है तो सेवा नियमों के अंतर्गत लैंगिक उत्पीड़न को एक दुराचार के रूप में मानना,

न. यदि अपराधकर्ता कोई छात्र है तो लैंगिक उत्पीड़न को अनुशासनात्क नियमों (जो बहिष्कार तक हो सकता है) के उल्लंघन के रूप में देखना,

प. इन विनियमों के प्रकाशन की तिथि से लेकर 60 दिनों की आवधि में विनियमों के प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना, जिनमें आन्तरिक शिकायत समिति की नियुक्ति शामिल है,

फ. आन्तरिक शिकायत समिति द्वारा की गई रिपोर्टों का समयबद्ध रूप से प्रस्तुतिकरण,

ब. एक वार्षिक स्थिति रिपोर्ट जिसमें दायर मामलों का, उनके निपटान का विवरण  हो  वह तैयार करना तथा इसे आयोग को प्रस्तुत करना,

समर्थन करने वाली गतिविधियाँ

(1) जिन नियमों, विनियमों अथवा अन्य इसी प्रकार के माध्यम जिनके द्वारा आन्तरिक शिकायत केंद्र (आई.सी.सी) प्रकार्य करेगा, उन्हें अद्यतन किया जाएगा उन्हें समय – समय पर संशोधित किया, जाएगा – क्योंकि न्यायालय के निर्णय एवं अन्य कानून तथा नियमों द्वारा उस कानूनी ढांचे में लगातार संशोधन होता रहेगा जिनके अनुसार अधिनियम लागू किया जाना है,

(2) उच्चतर शैक्षिक संस्थानों का कार्यकरी प्राधिकारी द्वारा अधिदेशात्मक रूप से पूरा समर्थन किया जाना चाहिए तथा यह देखा जाना चहिए कि आई.सी.सी की सिफारिशों  का क्रियान्वयन समयबद्ध रूप से किया जा रहा है कि नहीं। आई.सी.सी के प्रकार्य के लिए समस्त संभावित संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए – जिनमें कार्यालय और भवन अवसंरचना सहित (कम्प्युटर, फोटो कॉपियर, श्रव्य दृश्य उपकरणों आदि) स्टाफ (टाइपिस्ट, सलाह एवं कानूनी सेवाओं) सहित पर्याप्त रूप में वित्तीय संसाधन का आबंटन भी हो,

(3) असुरक्षित/दुर्बल वर्ग विशेष रूप से प्रताड़ना के शिकार बन जाते हैं और उनके द्वारा शिकायत करना और भी ज्यादा कठिन होता है। क्षेत्र, वर्ग जाति, लैंगिक प्रवृत्ति, अल्पसंख्यक पहचान, एवं पृथक रूप से सामर्थ से असुरक्षा सामाजिक रूप से संयोजित हो सकती है। समर्थकारी समितियों को इस प्रकार की असुरक्षितताओं के प्रति अति संवेदनशीलता एवं विशेष जरूरतों के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है,

(4) क्योंकि शोध छात्र और डॉक्टोरल छात्र विशेष रूप से आक्रांत होते हैं, अत: उच्चतर शैक्षिक संस्थानों द्वारा यह सुनिश्चित कराया जाए कि शोध सर्वेक्षण की नैतिकता संबंधी दिशा निर्देश उचित रूप से लागू हो रहे हैं,

(5) समस्त उच्चतर शैक्षिक संस्थानों द्वारा उनकी लैंगिक उत्पीड़न विरोधी नीति की क्षमता का नियमित रूप से अर्द्ध वार्षिक पुनरीक्षण किया जाना चाहिए,

(6) सभी अकादमिक स्टाफ कॉलेज (जिन्हें अब मानव संसाधन विकास केन्द्रों के रूप में पाया जाता है) (एचआरडीसी) और क्षमता निर्माण के क्षेत्रीय केन्द्रों द्वारा लिंग संबंधी स्तरों को अपने अभिमुखी एवं पुनश्चर्य पाठयक्रमों में निगमित करना चाहिए। अन्य सब विषयों से भी इसे प्राथमिकता दी जाए तथा इसे मुख्य धारा के रूप में विशेष रूप से बनाया जाए तथा इसके लिए यूजीसी सक्षम रिपोर्ट का उपयोग करें जिसमें, इस बारे में प्रविधियां उपलब्ध कराई जाती हैं,

(7) उच्चतर शैक्षिक संस्थानों में प्रशासकों के लिए संचालित अभिमुखी पाठ्यक्रमों में आवश्यक रूप से लैंगिक संवेदीकरण तथा लैंगिक उत्पीड़न की समस्याओं पर एक मापदंड होना चाहिए। उच्चतर शैक्षिक संस्थान के समस्त विभागों में मौजूद सदस्यों के लिए कार्यशालाएं नियमित रूप से संचालित की जानी चाहिए,

(8) समस्त उच्चतर शैक्षिक संस्थानों में परामर्श सेवाओं को संस्थानों के अंतर्गत रखा जाना चाहिए और इसके लिए सुप्रशिक्षित पूर्णकालिक परामर्शदाता होने चाहिए,

(9) कई उच्चतर शैक्षिक संस्थान जिनके विशाल परिसर हैं जिनमें प्रकाश संबंधी व्यवस्था बहुत अधूरी है तथा अन्य संस्थानों के लोगों के अनुभव अनुसार वे स्थान असुरक्षित समझे जाते हैं, वहाँ पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था अवसंरचना एवं रख – रखाव का एक अनिवार्य अंग हैं,

(10) पर्याप्त एवं अच्छी तरह से प्रशिक्षित सुरक्षा स्टाफ आवश्यक रूप से होना चाहिए जिसमें महिला सुरक्षा स्टाफ सदस्य अच्छी संख्या में हों, जिससे संतुलन बना रहे। सुरक्षा स्टाफ नियुक्ति के मामले में लैंगिक संवेदनशीलता प्रशिक्षण को एक शर्त के रूप में माना जाना चाहिए,

(11) उच्चतर शैक्षिक संस्थान आवश्यक रूप से विश्वसनीय जन यातायात को सुनिश्चित करें – विशेष रूप से उच्चतर शैक्षिक संस्थानों के विस्तृत परिसरों के अंदर विभिन्न विभागों के मध्य जैसे – छात्रावासों, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं तथा मुख्यालय और विशेष रूप से वे स्थान जिन तक पहुँच पाना दैनिक शोधकर्ताओं के लिए कठिन है। सुरक्षा की कमी तथा उत्पीड़न बहुत बढ़ जाता है जब कर्मचारी और छात्र सुरक्षित जन यातायात पर निर्भर नहीं रहते हैं। कर्मचारी एंव छात्रों द्वारा पुस्तकालयों और प्रयोगशालाओं में देर रात तक काम करने और शाम के समय अन्य कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए उच्चतर शैक्षिक संस्थानों द्वारा भरोसेमंद यातायात का प्रबंध किया जाना चाहिए,

(12) आवासीय उच्चतर शैक्षिक संस्थानों द्वारा महिला छात्रावासों की संरचना को प्राथमिकता दी जाए। महिला छात्रावास, जो सभी प्रकार के उत्पीड़न से थोड़ी बहुत सुरक्षा प्रदान करते हैं, उस उच्च शिक्षा के सभी स्तरों पर, शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा इच्छुक युवा महिलाओं के लिए अत्यंत जरूरी है,

(13) युवा छात्रों की तुलना में छात्रावास में स्थित छात्राओं की सुरक्षा के मामले को भेदभाव पूर्ण नियमों का आहार नहीं बनाया जाना चाहिए। परिसर की सुरक्षा संबंधी नीतियों को महिला कर्मचारी एवं छात्राओं की सुरक्षात्मक के रूप में नहीं बन जाना चाहिए, जैसे कि आवश्यकता से अधिक सर्वेक्षण या पुलिसिया निगरानी अथवा आने जाने की स्वतंत्रता में कटौती करना – विशेषकर महिला कर्मचारी एवं छात्राओं के लिए,

(14) सभी उच्चतर शैक्षिक संस्थानों के लिए पर्याप्त स्वास्थय सुविधाएँ होनी चाहिए आदेशात्मक हैं। महिलाओं के बिषय में इस प्रक्रिया में लिंग संवेदी डॉक्टर और नर्से तथा इसके साथ ही एक स्त्री रोग विशेषज्ञ की सेवाएँ उपलब्ध होनी चाहिए,

(15) महाविद्यालयों में महिला विकास प्रकोष्ठ पुन: चालू किए जाने चाहिए एवं उन्हें धन दिया जाना चाहिए और इन्हें लैंगिक उत्पीड़न विरोधी, समितियों तथा आन्तरिक शिकायत समिति के प्रकार्यों से पृथक करके स्वशासी रखा जाना चाहिए। उसके साथ ही वे आन्तरिक शिकायत केन्द्रों के परामर्श से अपनी गतिविधियाँ विस्तारित करेंगे। संस्कृतिक पृष्ठभूमि एवं औपचारिक अकादमिक स्थल इन्हें परस्पर सहभागिता करनी चाहिए ताकि ये कार्यशालाएं नवोन्मेषी, आकर्षक बने एवं मशीनी न हों,

(16) छात्रावासों के वार्डन, अध्यक्ष, प्राचार्यों, कुलपतियों, विधि अधिकारीयों एवं अन्य कार्यकारी सदस्यों को नियमों के अथवा अध्यादेशों में संशोधन द्वारा जबाबदेही के दायरे में यथावश्यकता रूप से लाना चाहिए

शिकायत समाधान तंत्र

(1) लैंगिक उत्पीड़न के विरूद्ध प्रत्येक कार्यकारी प्राधिकारी लैंगिक संवेदीकरण के लिए एक आन्तरिक तंत्र सहित एक आन्तरिक शिकायत समिति (आई.सी. सी.) का गठन करेंगे। आई.सी.सी. की निम्न संरचना होगी –

(अ) एक पीठासीन अधिकारी जो एक महिला संकाय सदस्य हो और जो एक वरिष्ठ पद पर (एक विश्वविद्यालय की स्थिति में प्रोफेसर से निम्न न हो तथा किसी महाविद्यालय की स्थिति में सह – प्रोफ़ेसर अथवा रीडर से निम्न न हो) शैक्षिक संस्थान में नियुक्त हो तथा कार्यकारी प्राधिकारी द्वारा नामित हो

बशर्ते यदि उस कार्यस्थल के अन्य कार्यालयों अथवा प्रशासनिक एकांशों में कोई वरिष्ठ स्तर की महिला कर्मचारी नहीं है तो अध्यक्ष अधिकारी को उसी नियोक्ता के कार्यस्थल से अथवा किसी अन्य विभाग या संगठन में से  नामित किया जा सकता है।

(ब) दो संकाय सदस्य एवं दो गैर – अध्यापनरत कर्मचारी जो अधिमानत: महिलाओं की समस्याओं के लिए प्रतिबद्ध है तथा जिन्हें सामाजिक कार्य अथवा कानूनी जानकारी है, उन्हें कार्यकारी प्राधिकारी द्वारा नामित किया जाना चाहिए,

(स) यदि किसी मामले में छात्र शामिल हैं तो उसमें तीन छात्र हों जिन्हें स्नातक पूर्व, स्नातकोत्तर एवं शोधस्तर पर क्रमशः भर्ती किया जाएगा जिन छात्रों को पारदर्शी लोकतांत्रिक प्रणाली द्वारा चुना गया है,

(द) गैर सरकारी संगठनों में से किसी एक में से अथवा किसी ऐसी सभा में से जो महिलाओं की समस्याओं के लिए प्रतिबद्ध हैं या एक ऐसा व्यक्ति हो जो लैंगिक उत्पीड़न से जुड़े मामलों का जानकर हो, जो कार्यकारी प्राधिकारी द्वारा नामित हो,

(2) आन्तरिक शिकायत समिति के कुल सदस्यों में न्यूनतम आधे सदस्य महिलाएँ होनी चाहिए,

(3) उच्चतर शैक्षिक संस्थानों में वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर नियुक्त व्यक्ति जिसे कुलपति, पदेन कुलपति, रेक्टर, कुलसचिव, डीन, विभागों के अध्यक्ष आदि आन्तरिक समिति के सदस्य नहीं होंगे ताकि ऐसे केंद्र में प्रकार्य के स्वायत्तता सुनिश्चित रहे,

(4)  आन्तरिक शिकायत समिति के सदस्यों की सदस्यता आवधि तीन वर्ष की होगी। उच्चतर शैक्षिक संस्थान ऐसी एक प्रणाली का उपयोग करें जिसके द्वारा आन्तरिक शिकायत केंद्र के सदस्यों का एक तिहाई भाग प्रतिवर्ष प्रतिवर्तित होता रहे,

(5) आन्तरिक समिति की बैठक आयोजित करने के लिए जो सदस्य गैर सरकारी संगठनों  अथवा सभाओं से संबद्ध हैं उन्हें कार्यकारी प्राधिकारी द्वारा ऐसे शुल्क अथवा भत्ते का भुगतान किया जाए, जैसा निर्धारित किया गया है,

(6) जिस स्थिति में आन्तरिक समिति का अध्यक्ष अधिकारी अथवा इसका कोई सदस्य यदि –

क. अधिनियम की धारा 16 के प्रावधानों का उल्लंघन करता हैं, अथवा

ख. वह किसी अपराध के लिए दोषी सिद्ध हुआ है अथवा उसके विरूद्ध वर्तमान में लागू किसी कानून के अंतर्गत किसी अपराध के बारे में कोई पड़ताल लंबित है, अथवा

ग. किसी अनुशासनात्मक  कार्यवाही लंबित है, अथवा

घ. उसने अपने पद का दुरूपयोग इस सीमा तक किया है कि कार्यालय में उसकी सेवा में निरंतरता को जनहित के प्रतिकूल माना जाएगा,

तो ऐसा अध्यक्ष अधिकारी अथवा सदस्य, यथास्थिति इस समिति से हटा दिया जाएगा। तथा इस प्रकार से होने वाली रिक्ति अथवा ऐसी कोई नैमित्तिक (कैजुअल रिक्ति को नये नामांकन द्वारा इस धारा के प्रावधानों के अनुसार भरा जाएगा।

आन्तरिक शिकायत समिति (आई.सी.सी)

आन्तरिक शिकायत समिति करेगी

यदि कोई कर्मचारी अथवा पुलिस के पास कोई शिकायत दर्ज करना चाहता है तो उसे सहायता उपलब्ध कराएगी,

क. विवाद समाधान के हेतु बातचीत संबंधी तंत्र उपलब्ध कराना ताकि विवादित बातों पर पूर्वानुमान को समीचीन एवं उचित मैत्रीपूर्ण क्रिया द्वारा देखा जा सका जिससे उस शिकायतकर्ता के अधिकारों की हानि न हो तथा जिससे पूरी तरह से दंडात्मक दृष्टिकोणों की न्यूनतम जरूरत हो जिनसे और आधिक जानकारी, विमुखता अथवा हिंसा न बढ़े,

ख. उस व्यक्ति की पहचान उजगार किए बिना उस शिकायतकर्ता की सुरक्षा बनाए रखना तथा स्वीकृत अवकाश अथवा उपस्थिति संबंधी अनिवार्यताओं में छूट द्वारा अथवा अन्य किसी विभाग में अथवा किसी सर्वेक्षणकर्ता के पास स्थानांतरण द्वारा, यथा आवश्यक रूप से उस शिकायत के लंबित होने की अवधि में अथवा उस अपराधकर्ता के स्थानांतरण का भी प्रावधान किया जाएगा,

ग. लैंगिक उत्पीड़न संबंधी शिकायतों के निपटान करते समय सुनिश्चित करें कि पीड़ित व्यक्ति या गवाहों का शोषण ना किया जाए अथवा उनके साथ भेदभाव न किया जाए, तथा

घ. किसी भी आवृत्त व्यक्ति के विरूद्ध अथवा प्रतिकूल कार्रवाई पर प्रतिबंध को सुनिश्चित करना क्योंकि वह कर्मचारी अथवा छात्र एक संरक्षित गतिविधि में व्यस्त है,

शिकायत करने एवं जाँच पड़ताल की प्रक्रिया

आन्तरिक शिकायत समिति किसी भी शिकायत को दायर करने और उस शिकायत की जाँच करने के लिए इन विनियमों और अधिनियम में निर्धारित प्रणाली का अनुपालन करेगी ताकि वह समयवद्ध रूप से पूरी हो सके। उच्चतर शैक्षिक संस्थान, आन्तरिक शिकायत समिति को सभी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराएगा ताकि जाँच पड़ताल शीघ्रता से संचालित हो सके तथा आवश्यक गोपनीयता भी बनी रहे,

लैंगिक उत्पीड़न की शिकायत दायर करने की प्रक्रिया

किसी भी असंतुष्ट व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि वह घटना होने की तिथि से तीन माह के भीतर लिखित शिकायत आन्तरिक शिकायत समिति को प्रस्तुत करें और यदि लगातार कई घटनाएँ हुई हो तो सबसे बाद की घटना से तीन माह के भीतर उसे प्रस्तुत करें,

बशर्ते जहाँ ऐसी शिकायत लिखित रूप में नहीं दी जा सकती है, वहां अध्यक्ष अधिकारी अथवा आन्तरिक समिति का कोई भी सदस्य, उस व्यक्ति के द्वारा लिखित शिकायत प्रस्तुत करने के लिए समस्त संभव सहायता प्रदान करेगा,

बशर्ते इसके साथ ही आई.सी.सी. लिखित रूप से प्रस्तुत तर्कों के आधार पर समय सीमा विस्तारित कर सकती है, परंतु वह तीन माह से अधिक की नहीं होगी, यदि इस बात को आश्वस्त किया गया हो कि परिस्थितियाँ ऐसी थी कि जिनके कारण वह व्यक्ति इस कथित अवधि के दौरान शिकायत दायर करने से वंचित रह गया था।

जाँच पड़ताल की प्रक्रिया

1) शिकायत मिलने पर आन्तरिक शिकायत समिति इसकी एक प्रति को प्रतिवादी को इसके प्राप्त होने से साथ दिनों के भीतर भेजेगी,

2) शिकायत की प्रति मिलने के बाद प्रतिवादी अपना उत्तर इस शिकायत के बारे, में समस्त दस्तावेजों की सूची, गवाहों के नामों एवं पतों के नामों एवं उनके पतों सहित दस दिन की अवधि में दाखिल करेगा,

3) शिकायत प्राप्त होने के 90 दिनों के भीतर ही जाँच पड़ताल पूरी की जानी चाहिए। अनुशंसाओं सहित, यदि वे हो तो जाँच पड़ताल रिपोर्ट उस जाँच के पूरा होने के 10 दिनों के भीतर  उच्चतर शैक्षिक संस्थान के कार्यकारी प्राधिकारी को प्रस्तुत की जानी चाहिए। इस शिकायत से जोड़े दोनों पक्षों के समक्ष इस जाँच के तथ्यों या  सिफारिशों की प्रति दी जाएगी,

4) जाँच रिपोर्ट प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर इस समिति की सिफारिशों पर उच्चतर शैक्षिक संस्थान के अध्यक्ष प्राधिकारी कार्यवाही करेंगे, यदि किसी भी पक्ष द्वारा उस अवधि में जाँच के विरूद्ध कोई अपील दायर न की गई हो,

5) दोनों में से किसी भी पक्ष द्वारा आन्तरिक शिकायत समिति द्वारा प्रदान तथ्यों/अनुशंसाओं की तिथि से तीस दिन की अवधि में अपील दायर की जा सकती है,

6) उच्चतर शैक्षिक संस्थान का कार्यकारी प्राधिकारी यदि आन्तरिक शिकायत समिति की सिफारिशों के अनुसार कार्य नहीं करने का निर्णय लेता है तो वह इसके बारे में लिखित रूप से कारण स्पष्ट करेगा जिन्हें आन्तरिक शिकायत समिति को तथा उस कार्यवाही से जुड़े दोनों पक्षों को भेजा जाएगा। यदि दूसरी ओर वह आन्तरिक शिकायत समिति द्वारा की गई सिफारिशों के अनुसार कार्य करने का निर्णय लेता है तो एक कारण बताओ नोटिस जिसका 10 दिनों के भीतर उत्तर भेजा जाना है- उसे उस पक्ष को भेजा जाएगा जिसके विरूद्ध कार्यवाही की जानी है। उच्चतर शैक्षिक संस्थान के कार्यकारी प्राधिकारी उस असंतुष्ट व्यक्ति का पक्ष सुनने के पश्चात् ही आगे की कार्रवाई करेंगे,

7) मामले को निपटाने के उद्देश्य से पीड़ित पक्ष एक सुलह का आग्रह कर सकता है। सुलह का आधार कोई आर्थिक समझौता नहीं होना चाहिए। यदि कोई सुलह का प्रस्ताव रखा जाता है तो यथास्थिति उच्चतर शैक्षिक संस्थान सुलह की प्रक्रिया को आन्तरिक शिकायत समिति के माध्यम से सुलह कराएगा। किसी भी दंडात्मक हस्तक्षेप की तुलना में, जहाँ तक संभव होता है, उस पीड़ित पक्ष की पूरी संतुष्टि के लिए उस पारस्परिक विरोध के समाधान को अधिमानता दी जाती है,

8) पीड़ित पक्ष अथवा पीड़ित व्यक्ति गवाह अथवा अपराधकर्ता की पहचान सार्वजनिक नहीं की जाएगी या विशेष रूप से उस जाँच प्रक्रिया के दौरान इसे सार्वजनिक क्षेत्र में रखा जाएगा,

अंतरिम समाधान – उच्चतर शैक्षिक संस्थान

क. यदि आन्तरिक शिकायत केंद्र सिफारिश करता है तो शिकायतकर्ता अथवा प्रतिवादी को अन्य किसी अनुभाग अथवा विभाग में स्थानांतरित किया जा सकता है ताकि संपर्क अथवा अन्योन्य क्रिया में शामिल जोखिम कम से कम बना रहे

ख. पीड़ित पक्ष को, संपुर्ण स्तर संबंधी एवं अन्य हित लाभों के संरक्षण सहित तीन माह तक का अवकाश स्वीकृत कर दे,

ग. शिकायकर्ता के किसी भी काम अथवा निष्पादन अथवा परीक्षण अथवा परीक्षाओं  के संबंध में कोई बात प्रकट न करने के लिए प्रतिवादी को बाध्य कर दें,

घ. सुनिश्चित करें की अपराधकर्ताओं को पीड़ित व्यक्तियों से दूरी बना कर रखनी चाहिए तथा यथा आवश्यक, यदि कोई प्रत्यक्ष धमकी है तो उनका परिसर में प्रवेश प्रतिबंधित कर दे,

ङ. लैंगिक उत्पीड़न की किसी शिकायत के परिणाम स्वरुप, शिकायतकर्ता को प्रतिरोध एवं उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने के लिए तथा एक अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने के लिए सख्त उपाय किए जाने चाहिए,

दंड एवं हर्जाना

क.    अपराधकर्ता यदि उच्चतर शैक्षिक संस्थान का कर्मचारी है तथा लैंगिक उत्पीड़न का दोषी पाया जाता है तो उसे संस्थान के सेवा नियमों के अनुसार दंडित किया जाएगा,

ख.    अपराध की गंभीरता को देखते हुए – यदि प्रतिवादी कोई छात्र है, तो उच्चतर शैक्षिक संस्थान –

अ) ऐसे छात्र के विशेषाधिकारों को रोक सकता है तो, जैसे – पुस्तकालय, सभागार,

आवासीय आगारों, यातयात, छात्रवृति, भत्तों एवं पहचान पत्र आदि तक पहुंच

बनाना,

ब) एक विशेष समय तक परिसर में उसका प्रवेश स्थागित अथवा बाधित करना,

स) यदि उस अपराध की ऐसी गंभीरता है तो उस छात्र को संस्थान से निष्कासित  किया जा सकता है तथा उसका नाम उस संस्थान की नामावली से हटाया जा सकता है, इसके साथ ही पुन: प्रवेश की अनुमति उसे नहीं होगी,

द) अधिदेशात्मक परामर्श अथवा समुदायिक सेवाओं जैसे सुधारवादी दंड प्रदान करना,

ग.  पीड़ित व्यक्ति मुआवजे का अधिकारी है। आन्तरिक शिकायत समिति द्वारा अनुशंसित तथा कार्यकारी प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत मुआवजे के भुगतान के लिए उच्चतर शैक्षिक संस्थान निर्देश जारी करेगा, जिसकी वसूली अपराधकर्ता से की जाएगी। देय मुआवजे का निर्धारण निम्न आधार पर होगा -

अ) पीड़ित व्यक्ति को जितना मानसिक तनाव, कष्ट, व्यथा एवं दुख पहुँचा है,

ब) उस लैंगिक उत्पीड़न की घटना के कारण उन्हें अपनी जीविका का सुअवसर हानि उठानी पड़ी,

स) पीड़ित व्यक्ति द्वारा अपने शारीरिक एवं मनोरोगी संबंधी आधार के लिए खर्च किए गए चिकित्सा व्यय,

द) कथित अपराधकर्ता एवं उस पीड़ित व्यक्ति की आय एवं जीवन स्तर और

ई) ऐसे समस्त भुगतान का एकमुश्त रूप से या किस्तों में किए जाने का औचित्य,

झूठी शिकायत के विरूद्ध कार्रवाई

इस बात को सुनिश्चित करने के लिए की लैगिक उत्पीड़न मामलों में कर्मचारियों एवं छात्रों की सुरक्षा के प्रावधानों का दुरूपयोग न हो, असत्य एवं द्वेष भावना पूर्ण शिकायतों के विरूद्ध प्रावधान किए जाने की आवश्यकता है तथा इन्हें उच्चतर शैक्षिक संस्थानों में प्रचारित प्रसारित किया जाना चाहिए। आन्तरिक शिकायत समिति यदि यह निष्कर्ष निकालती है कि लगाए गए अभियोग असत्य थे, विद्वेषपूर्ण थे अथवा यह जानते हुए भी कि वह शिकायत असत्य अथवा जाली है अथवा भ्रामक सूचना को उस पड़ताल के दौरान उपलब्ध कराया गया है तो शिकायतकर्ता विनियम (10) के उप विनियम (1) के तहत दंडित किए जाने के लिए बाध्य होगा यदि शिकायतकर्ता एक कर्मचारी है, तथा यदि वह अपराधकर्ता एक छात्र है तो वह इस विनियम की उप-विनियम (2) के प्रावधानों के अनुसार सजा के लिए बाध्य होगा तथापि किसी को भी प्रमाणित करने अथवा उसके लिए पर्याप्त सबुत उपलब्ध न कर पाने का आधार, शिकायतकर्ता  के विरूद्ध कार्रवाई करने का कारण नहीं माना जा सकता है। शिकायतकर्ता द्वारा द्वेषपूर्ण उद्देश्य से दायर शिकायत की जाँच पड़ताल द्वारा तय किया जाना चाहिए तथा इस बारे में किसी कार्रवाई की सिफारिश किए जाने से पूर्व इस विषय में निर्धारित प्रणाली के अनुसार जाँच की जानी चाहिए,

गैर अनुपालन के परिणाम

(1) ऐसे संस्थान जो जानबूझकर अथवा बारंबार उन दायित्वों के अनुपालन में जिन्हें कर्मचारियों एवं छात्रों के प्रति लैंगिक उत्पीड़न के निराकरण, निषेध एवं समाधान हेतु निर्धारित किया गया है, तो इस स्थिति में आयोग विधिवत नोटिस देकर निम्न में से किसी एक अथवा इससे अधिक बिन्दुओं पर कार्रवाई करेगा -

(अ) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम 1956 की धारा 12 (बी) के अंतर्गत की गई घोषणा जो पात्रता दिए जाने के विषय में हैं, उसका आहरण किया जाना,

(ब) आयोग द्वारा अधिनियम 1956 की धारा 2 (एफ) के अंतर्गतअनुरक्षित सूची में से उस विश्वविद्यालय अथवा महाविद्यालय का नाम हटाना,

(स) संस्थान को आबंटित किसी भी अनुदान को रोक देना,

(द) आयोग को किसी भी सामान्य अथवा विशेष सहायता कार्यक्रमों के अंतर्गत किसी भी सहायता को प्राप्त करने के लिए उस संस्थान को अपात्र घोषित किया जाना,

(ई) जन साधारण को, एवं रोजगार अथवा प्रवेश के इच्छुक भावी प्रत्याशियों को एक नोटिस द्वारा सूचित करना जो समाचार पत्रों में प्रमुख रूप से दर्शाया गया है अथवा उपयुक्त मीडिया में दर्शाया गया है तथा योग की वेबसाइट पर प्रदर्शित किया गया है तथा जिस नोटिस में घोषणा की गई है कि वह संस्थान लैंगिक उत्पीड़न के विरूद्ध शून्य सहनशीलता नीति का समर्थन नहीं करता है

(एफ) यदि वह एक महाविद्यालय है तो उसके संबंद्ध विश्वविद्यालय है तो उसके संबंद्ध विश्वविद्यालय द्वारा उसकी सहसंबद्धता को आहरित करने की अनुशंसा के लिए कहें,

(जी) यदि वह एक मानित विश्वविद्यालय संस्थान है तो केंद्र सरकार को उस मानित विश्वविद्यालय का आहरण की अनुशंसा करना,

(एच) यदि वह किसी राज्य अधिनियम के अंतर्गत स्थापित अथवा नियमित विश्वविद्यालय है तो उसके इस स्तर को आहरित करने के लिए उपयुक्त राज्य सरकार को सिफारिश करना

(आई) जैसा की विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम 1956 के अंतर्गत प्रावधान किया जाना चाहिए तो तदनुसार अपने अधिकारों के अनुसार यथोचित रूप से ऐसी समयावधि के लिए दंड प्रदान कर सकता है जिस समय तक वह संस्थान इन विनियमों में निर्धारित प्रावधानों का अनुपालन नहीं करता है,

(जे) इन विनियमों के अंतर्गत आयोग द्वारा उस समय तक कार्रवाई नहीं की जाएगी जब तक की संस्थान का अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए प्रदत्त सुअवसर के आधार पर उनकी सुनवाई कर ली गई हो।

स्त्रोत: मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार

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