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राइबोफलेविन नामक विटामिन का उत्पादन करने वाले लैक्टोबैसिलाई की पहचान

इस पृष्ठ में राइबोफलेविन नामक विटामिन का उत्पादन करने वाले लैक्टोबैसिलाई की पहचान कैसे करे, इसकी जानकारी दी गयी है।

सारांश

राइबोफ्लेविन, कोशिकाय उपापचय का एक बुनियादी घटक है और सहऐनजाइमी का अग्रदूत है। राइबोफ्लेविन उत्पादन करने वाले लैक्टिक एसिड बैक्टिीरिया संभवतः महत्व के हैं एवम् किणवित खाद्य उद्योग के लिए ये बैक्टीरिया बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। राइवोफ्लेविन उत्पादन के लिए जैव प्रोद्योंगिकी विधियाँ, रासायनिक विधियों का स्थान ले रही हैं। वर्तमान अध्ययन में मानव मल से निकाले गये लैक्टोबैसिलाई को राइवोफ्लेविन उत्पादन करने के लिए जाँचा गया। जाँच में उपयोग किए जाने वाले बैक्टीरिया में, लैक्टोबैसिलस फरमैन्टम और लैक्टोबैसिलस प्लानरम, राइबोफ्लेविन उत्पादन करने के लिए प्रमुख रूप से सक्षम पाए गए। ये बैक्टीरिया दुग्ध उद्योग में नए जामन के रूप में उपयोग होने के साथ-साथ किणवित खाद्य पदार्थों को राइबोफ्लेविन के साथ दृढ़ करने में सहायता कर सकते है और राइबोफ्लेविन उत्पादन करने वाले लैक्टोबैसिलाई, राइवोफ्लेविन का पोषण करने वाले लैक्टोबैसिलाई का स्थान ले सकते हैं। अतः यह प्रणाली कुपोषण से लड़ने का अव्वल समाधान है।

परिचय

लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया, अपने किणवित गुणों के कारण दूध और खाद्य पदार्थों में मख्य रूप से उपयोग होने वाले जीवाणु हैं। इस वर्ग के साधारणतया सुरक्षित और सेहत के लिए हितकारी पाए जाने के कारण प्रोबायोटिक के रूप में इस्तेमाल होते है अथवा विभिन्न प्रकार के तत्वों जैसे बी विटामिन (बी 2 राइवोफ्लेविन, बी 11 सैल्सिलिक एसिड, बी 12 कोबालामिन), कम कैलोरी सगर (मैनिटल, सौरबिंटल), एकजोपलीसैक्राइड और डाइएस्टिोल के उत्पादन में सक्षम पाए गए हैं। उपरलिखित तत्वों में से एक राइबोफ्लेविन बी 2 जो कि मानव, जीव जन्तु, पेड़ और जीवाणुओं के लिए अनिवार्य घटक हैं और कई प्रकार की शारीरिक प्रक्रियाओं में सहायक हैं। स्तनधारी जीव इसका उत्पादन नहीं कर सकते, इसलिए यह विटामिन दिन प्रतिदिन के आहार में लेना जरूरी है या अन्य किसी रूप में (2 मिलीग्राम)की मात्रा में लेना चाहिए। इसकी कमी से बालों का झड़ना, चमड़ी में सूजन और जलन, मुँह में छाले, कष्टप्रद रक्तचाप, शरीर के विभिन्न अंगों में तरल पदार्थों का जमा होना, होंठों का फटना और और जीभ की सूजन इत्यादि प्रमुख हैं। यद्यपि राइबोफ्लेविन विभिन्न प्रकार के आहार (खाद्य और दुग्ध) पदार्थों में उपस्थित हैं, परन्तु इसकी कमी विश्व के अनेक भागों, विशेष रूप से विकासशील देशों में पाई जाती है। इस कमी को राइवोफ्लेविन अनुपूरक दैनिक आहार और राइबोफ्लेविन युक्त हरी सब्जियों, अन्य किणवित खाद्य पदार्थों के पोषण से पूरा किया जा सकता है। इस शोध का मुख्य उद्देश्य राइबोफ्लेविन उत्पादन करने वाले जीवाणुओं का अध्ययन और लक्षणों का वर्णन करना था।

सामग्री एवम् विधियाँ

वर्तमान शोध में तीस मानव मल के नमूने एन.डी.आर. आई., करनाल (हरियाणा) छात्रावास से एकत्रित किए गए। इन नमूनों को कोच की शीशियों में 5 मिली लीटर साधारण लवण युक्त घोल में एकत्रित किया गया और डीमैन,रोगसा. शॉप (एम. आर.एस.) अगार और ब्रोथ में सीरियल डाइल्यूसन के बाद 38° हैं से पर 24 घंटे के लिए उष्मयान किया गया। बाद में एम.आर.एस. प्लेट और ब्रोथ से जीवाणुओं की जाति और प्रजाति का वर्णन किया गया। प्रत्येक प्रयोग से पूर्व इन जीवाणुओं को दो बार एमआर.एस. ब्रोथ में उपसंवर्धि किया गया। जाति और प्रजाति के अध्ययन के बाद इन जीवाणुओं राइबोफ्लेविन उत्पादन की क्षमता के लिए जाँचा गया।

राइबोफ्लेविनत्पादन की जाँच

राइवोफ्लेविन एस्से

सौर एवं सहकर्मी (1996) के माध्यम से वर्णित अध्ययन की सहायता से,जीवाणुओं की राइबोफ्लेविन उत्पादन क्षमता का अनुमान लगाया गया । इस विधि में जीवाणु ब्रोथ को 800 माइक्रोलीटर 1 मोलर सोडियम हाइड्रोक्साइड में घोला गया। इस घोल में से 400 माइक्रोमीटर लेकर 0.1 मीलर पोटाशियम फास्फेट वफर (पी.एच. 6) से निष्प्रभावित किया गया और 444 नैनो मीटर एवजौरवेन्स पर प्लेट रीडर की सहायता से प्रकाशीय घन्तव को आंका गया और राइबोफ्लेविन की मात्रा को अनुमानित किया गया।

माइक्रोबाइलोजिकल एस्से

इस प्रयोग में लैक्टोबैसिलस के.जी.आई. एक्स.टी.सी. सी. 7469 को राइबोफ्लेविन आक्जोटरीम के रूप में इस्तेमाल किया गया।इसके विकास के लिए राइबोफ्लेविन एक अनिवार्य घटक है। इस प्रयोग में (राइवोफ्लेविन एस्से मिडियम) जो कि मैं वृद्धि (रायोफ्लेविन एस्से मीडियम)। राइवोफ्लेविन रहित ब्रोथ है का इस्तेमाल किया गया। जीवाणुओं को जीन्स और प्रजाति स्तर पर जाँचने के बाद इस प्रयोग में की राइबोफ्लेविन उत्पादन की क्षमता के लिए जाँचा गया। (आर. एस.एम.) 2 यू.एल. में इनौलुतम को स्पौट लगाया गया और इसके चारों तरफ मानव मल से निकाले गए जीवाणुओं के 2 यू.एल. के स्पौट लगाए गए और ओ.डी. को 0.2 पर सैट किया गया।इस तरह से हर जीवाणु को औक्ज़ोट्रोफ के स्पौट के चारों और सपोर्ट के रूप में लगाया गया और (आर.एस.एम.) प्लेटस्, को 37 डिग्री से. पर 24 घण्टे के लिए उल्टा करके रखा गया। राइबोफ्लेविन उत्पादन की जाँच में प्रयोग किए गए जीवाणुओं को एम.आर.एस. से निकालने के बाद 3800 ग्राम पर 10 मिनट के लिए सैन्ट्रीफ्यूज किया गया और 3-4 बार साधारण लवणयुक्त घोल से धोया गया और ओ.डी. को (0.2) पर सैट किया गया। टूरवीडोमिटरिक प्रक्रिया को ए.ओ.ए.स 1980 के अनुसार दोहराया गया। संक्षेप में (आई.एम.पी.) जीवाण निलंघन को 100 एम.एल. आर.एम.एम. डाला गया। आर.ए.एम. को राइवोफ्लेविन की विभिन्न मात्रा जैसे कि (0-50 मी.ग्रा./मि.ली) से दृढ़ किया गया ताकि स्टैन्डर्ड कर्व बनाया जा सके।

इस जाँच में मानव मल से निकाले जीवाणु जो कि राइवोफ्लेविन के द्वारा राइबोफ्लेविन उत्पादन के लिए जाँचे गए, उन सब को इस प्रयोग में राइबोफ्लेविन उत्पादक के लिए जाँचा गया। उन जीवाणुओं को 24 घण्टे तक ए.आर.एस. में 37° से. पर रखा गया। अंधेरे में (प्रकाश से वंचित)और उनके सुपरनेटैन्ट को 100 एम.एल. आर.ए.एम. मैं डाला गया और 100 एम.एल. 1 एम.एल.ए.टी.सी सी. 7469 को इनौकुलेट किया गया। 32° सैल्सियस-24 घण्टे पर औसोट्रोफ के विकास के लिए जाँचा गया।

परिणाम और विमर्श

मानव मल से निकाले गए जीवाणुओं में लैं. फरफैन्टम और लै. प्लानटैरम मुख्य थे।इन दो प्रजाति के जीवाणुओं में से लैः फरमैन्टम ने (2.2 मि.ग्रा./ली.) की मात्रा में राइबोफ्लेविन का उत्पादन किया। जीवाणु तत्व सम्बन्धी जाँच के बाद 10 जीवाणु ऐसे पाये गये जोकि औक्जोम लै. फारमैन्टिम और 2 प्लान्टैरस के विकास को बढ़ावा दे रहे थे। इससे यह सिद्ध होता है कि राइवोफ्लेविन जोकि एमोट्रफ के विकास में अनिवार्य घटक है, मानव मल से निकाले जीवाणुओं द्वारा आर.ए.एम. मीडियम में पैदा किया गया और ओक्जोट्रोफ द्वारा इस्तेमाल किया गया और जिसका अनुमान विकास की गति से लगाया गया।

निष्कर्ष

वर्तमान अध्ययन में लै. फरमैन्टम द्वारा अधिक मात्रा में राइबोफ्लेविन उत्पादन की क्षमता पाई गई। अतः इस जीवाणु का उपयोग विभिन्न प्रकार के दुग्ध खाद्य पदार्थों में किया जा सकता है। ताकि इन पदार्थों को राइवोफ्लेविन से दृढ़ किया जा सके और साथ ही इनसीटू विटामिन की दृढ़ता के अभियान की लागत को कम किया जा सकता है। यह राइवोफ्लेविन दृढ़ता की प्रणली लगात प्रभावी होने के साथ-साथ ग्राहकों की सेहत के लिए लाभदायक है क्योंकि लैक्टोबैसिलाई मानव शरीर में नई तरह के अनिवार्य तत्वों का निर्माण करते हैं।

लेखन: किरन ठाकुर एवं सुधीर कुमार तोमर

स्त्रोत: पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय

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