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भारत में तिलापिया के उत्तरदायी पालन के लिए दिशानिर्देश

इस पृष्ठ में भारत में तिलापिया के उत्तरदायी पालन के लिए दिशानिर्देश से संबन्धित जानकारी दी गयी है।

पृष्ठभूमि

तिलापिया अफ्रीका और मध्यपूर्व की मूल प्रजाति है जोकि पहले लुप्त-प्रायः और अप्रसिद्ध थी लेकिन अब यह विश्व में एक सर्वाधिक उत्पादनशील और अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक खाद्य मछलियों में से एक के रूप में उभरी है। तिलापिया का पालन, विशेष रूप से नाईल तिलापिया (ओरियोक्रोमिस निलोटिकस) की उत्पत्ति अपने अपरिष्कृत रूप में मिस्र में 4000 वर्ष से पहले की मानी जाती है। तिलापिया का पहला अभिलेखित वैज्ञानिकोन्मुख पालन केन्या में 1924 में किया गया था, और जल्द ही यह विश्व के कई भागों में फैल गया।

तालाबों में तिलापिया के अनियंत्रित प्रजनन ने इसके घनत्व को अत्यधिक बढ़ा दिया था, जिस कारण उसका विकास अवरुद्ध हुआ और बाजार—योग्य आकार की मछली के निम्न प्रतिशत उपलब्ध होने से, तिलापिया को खाद्य-रूप में उपयोग के प्रारंभिक उत्साह को कम कर दिया था। तथापि, 1970 के दशक में हार्मोनल लिंग-उत्क्रमण के विकास, उसके बाद पोषण और पालन प्रणालियों पर अनुसंधान के अनुपालन के साथ-साथ बाजार विकास और प्रसंस्क्रण उन्नति ने 1980 के दशक के मध्य में इस उद्योग के तीव्र विस्तार को पुनः बढ़ावा दिया। हालांकि वाणिज्यिक रूप से तिलापिया की कई प्रजातियों का पालन हो रहा है लेकिन नाईल तिलापिया विश्व भर में सर्वाधिक पाली जाने वाली प्रजाति है।

पिछले तीन दशकों में विश्वभर में तिलापिया के पालन में महत्व पूर्ण विकास देखा गया। विश्व भर में लगभग 85 देशों में इसका पालन किया जा रहा है (एफएओ, 2008) और इन देशों में उत्पादित लगभग 98 प्रतिशत तिलापिया उसके मूल निवास के बाहर पाली जा रही है (शेल्टन, 2002)। चीन, इंडोनेशिया, मिस्र और फिलीपींस जैसे उच्च उत्पादकों के साथ 2009 में तिलापिया जलीय-कृषि का वैश्विक उत्पादन 3.08 मी. टन था।

जलकृषि के लिए प्रजातियां

तिलापिया पर्सीफार्मिस गण के अंतर्गत सिक्लिडी कुल से संबंध रखती हैं। हाल ही मे, तिलापिया को अण्डों की पैतश गर्मी के आधार पर तीन वंशों में वर्गीकृत किया गया है। सेरोथरोडोन वंश की प्रजाती और ओरियोक्रोमिस मुख–ब्रूडर्स हैं, जबकि तिलापिया झील अथवा तालाब के तल में निर्मित घोसले में अंडों का ऊष्मायन करते है। तिलापिया की लगभग 70 प्रजातियां हैं, जिसमें से 9 प्रजातियां विश्वभर में जलीय कृषि में उपयोग में लाई जाती हैं (एफएओ 2008)। महत्वपूर्ण वाणिज्यिक प्रजातियों में हैं: मोजाम्बिक तिलापिया (ओरियोक्रोमिस मोजाम्बिकस), नीली तिलापिया (ओ. ओरियस), नाईल तिलापिया (ओ. निलोटिकस), जंजीबार तिलापिया (ओ. हारनोरम), और लाल बेली तिलापिया (ओ. जिली)।

निवास स्थान और जीवविज्ञान

नाईल तिलापिया एक उष्णकटिबंधीय प्रजाति है जो उथले जल में रहना पसंद करती है। यह एक सर्वभक्षी है जो पादप प्लवक, पेरीफाईटॉन, जलीय पौधों, लघु अवशेसकी, बैंथिक फौना, अपरद और अपरदों से संबंधित बैक्टीरियल–परतों का आहार लेती है। तालाबों में ये 5-6 महीने के समय में लैंगिक परिपक्वता तक पहुँच जाती हैं। जब जल का तापमान 24 डिग्री सेल्सियस पहुंच जाता है। तो यह अण्डे देना शुरू कर देती है। मादा अण्डों को अपने मुँह में सेती है और तत्पश्चात बच्चों को सेती है जब तक की जर्दी की थैली सूख नहीं जाती। मादा की प्रजनन क्षमता उसके शरीर–भार के आनुपात में होती है। एक 100 ग्रा. की मादा प्रत्येक अंडे देने के समय लगभग 100 अंडे देगी, जबकि 100-600 ग्रा. भार की मादाएँ 1000 से 1500 तक अंडे उत्पादित करती हैं। नाईल तिलापिया 10 वर्षों से अधिक जीवित रह सकती है और 5 कि.ग्रा. से अधिक भार तक पहुँच सकती है।

पालन प्रौद्योगिकियों का विकास

तिलापिया की जनसंख्या में मादाओं की तुलना में नर तेजी से और अधिक आकार में बढ़ते हैं। इस कारण, तिलापिया की मोनोसेक्स जनसंख्या के पालन को, जो मैन्युअल लैंगीकरण, प्रत्यक्ष हार्मोनल लिंग-उत्क्रमण, संकरण अथवा आनुवांशिक हेर-फेर द्वारा प्राप्त की जा रही है; पूर्व-लैंगिक परिवक्तता और अवांछित प्रजनन की समस्या के समाधान के रूप में देखा गया है। मैन्युअल संसर्ग जोकि मादाओं के सामीप्य पर जोर देता है, यह मूत्र-जननांगी-पैपीला में देखे गये लैंगिक-छविरूपता पर आधारित है, यह आसान तो है, परंतु काफी समय लेता है एवं इसके लिए योग्य व्यक्ति की आवश्यकता होती है, तथा आमतौर पर इसके परिणामों में 3-10 प्रतिशत की त्रुटियां पाई जाती है।

विभिन्न प्रजातियों के बीच संकरण मुख्य रूप से सभी नर संकर के सतत उत्पादन में कठिनाई के कारण प्रभावी रूप से अवांछित पुनः उत्पादन की समस्या को हल नहीं करता है। हार्मोनल लिंग-उत्क्रमण, फ्राई–अवस्था के दौरान लघु-अवधि के लिए आहार में स्टेरॉयड को शामिल कर के प्राप्त की जाती है। तथापि इस तकनीक का प्रयोग मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव की चिंता के कारण कुछ देशों में पूर्ण रूप से स्वीकृत नहीं किया जा सका है। आनुवांशिक जोड़तोड़ के जरिये ‘सुपर नरों का उत्पादन इस मुद्दे का हल कर सकेगा।

पालन प्रणालियां

तिलापिया-पालन ग्रामीण जीविका से (सघन, निम्न आदान सेवायें, गैरवाणिज्यिक और घरेलू उपयोग के लिये) से लेकर बड़े पैमाने (पूंजी प्रधान, वाणिज्यिक उद्देश्य और बाजार प्रेरित) तक किया जाता है, जो इसके प्रबंधन के काम में लगे लोगों की संख्या पर निर्भर करता है।

जल आधारित प्रणालियां

पिंजरा (केज) पालन

तिलापिया का केज-पालन अधिक प्रजनन की समस्याओं से बचाता है। क्योकि अण्डे केज जाली से गिर जाते हैं। दूसरा प्रमुख लाभ यह है कि पालकों के लिए जहां केज रखे जाने होते हैं वह जल निकाय स्वयं का होना आवश्यक नहीं है। केजों को जाल अथवा बांस से, अथवा स्थानीय स्तकर पर उपलब्ध अन्य सामग्री से बनाया जा सकता है। मछली अपना अधिकांश पोषण चारों ओर के जल से लेती है, तथापि उन्हें अनुपूरक आहार भी खिलाया जा सकता हैं। विशेष रूप से पालन की फसल-संग्रहण-दर अधिकतम 10 कि.ग्रा. प्रति धन. मी. है। सधन पिंजरा पालन सहित लगभग 25 कि.ग्रा प्रति धन. मी. की संग्रहण दर भी लोकप्रिय हो रही है। औसत उत्पाहदन स्तर विभिन्न प्रणालियों और देशों में परिवर्तनशील है। सघनीकृत केज-पालन के तहत 100–305 कि. ग्रा. प्रति धन. मी. का उत्पादन स्तोर दर्ज किया गया है (एक्लेस्टे और जोरी, 2002, कोस्टा इत्यादि, 2000)।

भूमि आधारित प्रणालियां

तालाब

तालाबों का मुख्य लाभ यह है कि निषेचन के जरिये बहुत सस्ते में मछली को बड़ा किया जा सकता है। तिलापिया पालन के लिए कई विभिन्न प्रकार के तालाबों का उपयोग किया जाता है। सर्वाधिक बड़े पैमाने पर इन्हे निम्न लागत वाले तालाबों में पाला जाता है, परंतु ये सर्वाधिक अनुत्पादक, अनियंत्रित प्रजनन और अनियमित हार्वेस्टिंग देते हैं; इनका उत्पादन 500-2000 कि.ग्रा./हे./वर्ष होता है, एवं मछली आसामान्य आकार की होती है। यदि मोनोसेक्स मछली का स्टॉक किया जाता है और नियमित खाद एवं अनुपूरक आहार दिया जाता है तो उत्पादन 8000 कि.ग्रा./हे./वर्ष तक एक समान आकार की मछली हो सकती है। मीठे-जल के तालाबों में, कृषि एवं पशुपालन के साथ एकीकृत रूप से तिलापिया का अन्य देशी मछलियों के साथ पालन भी विस्तृत रूप से किया जा रहा है।

सघन टैंक

सघन टैंक पालन अत्यधिक प्रजनन की समस्याओं से बचाता है क्योंकि नर के पास अपना अलग क्षेत्र बसाने के लिए जगह नहीं होती है। यह गुरुत्वीय प्रवाह अथवा पम्प के जरिये निरंतर जल की आपूर्ति मांगता है। प्रायः टैंक में अधिकतम स्टॉकिंग दर जहां जल प्रत्येक 1-2 घंटे में बदला जाता है, लगभग 25-50 कि.ग्रा./मी के आसपास होती है।

पालन की तकनीक

पिछले बीस वर्षों के दौरान विकसित मछली पालन की तकनीकों ने तिलापिया पालन की उम्मीदों में एक क्रांति ला दी है और इसे विश्व में फिनफिश जलीयकृषि का सर्वाधिक उत्पादन तरीका बनाया है। इस परिवर्तन मे चार प्रकार की हैचरी और स्टॉकिंग सेवाओं ने सर्वाधिक योगदान दिया है:-

  • अच्छी प्रजातियों की स्टॉकिंग जैसेकि ओरियोक्रोमिस मोजाम्बिकस की बजाय ओरियोक्रोमिस निलोटिकस
  • जुवेनाइल मछली में हस्त संसर्ग : तिलापिया प्रजातियों में लिंगों के बीच स्पष्ट विभिन्नतायें विशेष रूप से मूत्रजनन—मार्ग में, फिन मोरफोलोजी और वयस्क रंगों में होतीं हैं। दक्ष हैचरी कर्मी 5-7 से.मी. मछली की 95 प्रतिशत से अधिक नर जनसंख्यां प्राप्त कर सकता है।
  • संकरण : ओ. हॉरनोरम एकमात्र ज्ञात प्रजाति है जो ओ. निलोटिकस अथवा ओ. मोसाम्बिकस से संकर कराने पर नियमित रूप से केवल नर फ्राई ही उत्पादित करती है। हालांकि शुद्ध वंश बनाए रखना एक मुख्य समस्या है।
  • हारमोनल लिंग-उत्क्रमण : मादा से अलग होने के एक हफ्ते के अन्दर ही छोटी मछलियों को अंडे की जर्दी की थैली से फ्राई को एकत्र किया जा सकता है, और प्रथम आहार चरण मे लिंग-उत्क्रमण हार्मोन मिश्रित हुआ आहार खिलाया जाता है।

भारतीय परिदृश्य

भारत में, तिलापिया (ओरियोक्रोमिस मोसाम्बिकस) का पालन खाली आलों जैसेकि तालाबों और जलाशयों को भरने के दृष्टिकोण के साथ 1952 में प्रारंभ किया गया था। कुछ वर्षों के अंदर ही यह प्रजाति अपनी विपुल प्रजनन क्षमता और विस्तृत श्रेणी की पर्यावरणीय अवस्थाओं की अनुकूलनशीलता के कारण सम्पूर्ण देश में फैल गई। प्रजाति की अधिक जनसंख्या ने नए जलाशयों और झीलों जैसेकि तमिलनाडु में वाईगई, कृष्णागिरी, अमरावती, भवानीसागर, त्रिमूर्थी, उप्पर और पम्बर जलाशय, केरल के वलायार, मालमपुजा, पोथंडी, मीनकरा, चुल्लिपर और पीची जलाशय, कर्नाटक के कबोनी, जलाशय और राजस्थान की जयसमंद झील की मात्स्यिकी को प्रभावित किया। जयसमंद झील में ओ. मोसाम्बिकस पालन की शुरूआत का परिणाम से न केवल प्रमुख कॉर्प के औसत भार में कमी के रूप में बल्कि महसीर (टोर टोर और टी. पुटीतोरा) जैसी प्रजातियों पर भी खतरा मंडरा गया, जोकि विलुप्त होने की कगार पर हैं। भारत की मात्स्यिकी अनुसंधान समिति ने तिलापिया के प्रसार पर 1959 में प्रतिबंध लगा दिया था।

नाईल तिलापिया की शुरूआत भारत में 1970 के अन्तिम दौर में हुई। 2005 में, यमुना नदी में नाईल तिलापिया की केवल नगण्य मात्रा को आश्रय दिया गया था, लेकिन दो वर्षों के समय में, इसका अनुपात नदी में कुल मछली प्रजातियों का लगभग 3.5 प्रतिशत हो गया। वर्तमान में गंगानदी प्रणाली में तिलापिया का अनुपात कुल मछली प्रजातियों का लगभग 7 प्रतिशत है।

तथापि, अधिक मछली की मांग पर विचार करते हुए तिलापिया भारत में जलकृषि के लिए एक महत्वपूर्ण प्रजाति बनने के लिए व्यापक उम्मीद रखती है। मैसर्स वोरिओन केमिकल्स, चेन्नई ने तिलापिया की कुछ किस्मों का सफलतापूर्वक पालन और विपणन किया था, और न तो प्राकृतिक जल निकायों में पलायन और न ही किसी परिस्थितिकीय खतरों को दर्ज किया। था। तमिलनाडु और भारत के कुछ अन्य राज्यों के जलाशयों में तिलापिया के उपलब्धिता के बारे में बहुत सा अप्रकाशित जानकारी है। कोलकाता आर्द्र भूमियों में, कछ किसान मोनोसेक्स तिलापिया का अपशिष्ट जल में वाणिज्यिक स्तर पर उत्पादन कर रहे हैं।

सीआईएफए द्वारा जीआईएफटी के साथ 1998 से 2000 के दौरान तीन वर्षों की अवधि के लिए किये गये अध्यायन में तिलापिया का 4-6 महीनों की अवधि में उत्पौदन स्तर 5-6 मी. प्रति फसल प्रदर्शित किया। साथ ही, अध्ययन पॉली कल्चर के अंतर्गत तीन भारतीय प्रमुख कॉर्प के साथ तिलापिया पालन की संभावना भी दिखाता है और समान स्टॉककिंग स्तरों पर रोहु और मृगल से अधिक वृद्धि दिखाता है। चार सप्ताह की 170 मेथाईल टेस्टोस्टेरोन मिश्रित चारे के प्रावधान से मोनोसेक्स आबादी (केवल नर) भी उत्पादित किये जा सकते है।

केवल चार मत्स्य पालन समूहों, मैसर्स आरेसन बायोटेक, ए.पी., विजयवाड़ा, मैसर्स आनंद एक्वा एक्सपोर्टस (पी) लि., भीमावरम, ए.पी., मैसर्स इंडीपेस्का प्रा. लि., मुंबई, मैसर्स सीपी एक्वा (एस.) प्रा. लि., चेन्नकई और मैसर्स राजीव गांधी सेंटरफॉर एक्वाकल्चर (आरजीसीए), समुद्री उत्पातद निर्यात विकास प्राधिकरण (एमपीईडीए) की अनुसंधान एवं विकास शाखा को भारत सरकार द्वारा पहले ही तिलापिया के बीज उत्पादन और पालन (नाईल/गिफ्ट/गोल्डन तिलापिया का मोनोसेक्स और मोनोकल्चर) की, भारतीय जल में आकर्षक जलीय प्रजातियों की शुरूआत पर राष्ट्रीय समति के तहत उप–समिति द्वारा विकसित हैचरी परिचालन और तिलापिया के पालन के लिए दिशानिर्देशों के अनुसार अनुमति दी जा चुकी है।

भारत में तिलापिया पालन की क्षमता

जैसे-जैसे मछली की मांग बढ़ रही है, उत्पादन स्तरों को बढ़ाने के लिए अधिक प्रजातियों के साथ-साथ जलीयकृषि में प्रजातियों का विविधीकरण भी आवश्यक हो जाता है। हमारी मत्स्य पालन प्रणाली में तिलापिया का स्थान लाभदायक है क्योंकि यह खाद्य श्रृंखला में निम्न स्तर का प्रतिनिधित्व करती है, अतः इसका पालन किफायती और पर्यावरण-अनुकूल होता है। तिलापिया का मोनोसेक्स पालन नरों के बड़े तथा अधिक एक समान आकार के एवं तीव्र वृद्धि के कारण लाभदायक है।

आनुवांशिक रूप से उन्नत तिलापिया (गिफ्ट) विकास की तकनीक परम्परागत चयनित प्रजनन पर आधारित है और उष्ण कटिबंधीय फार्म की मछली के महत्वपूर्ण गुणों को वाणिज्यिक रूप से सुधारने के लिए, तिलापिया जलकृषि के इतिहास में एक प्रमुख मील का पत्थर है। संयुक्त चयन प्रौद्योगिकी के जरिये, गिफ्ट कार्यक्रम ने पांच पीढियों से अधिक प्रत्येक पीढ़ी तक 12.17 प्रतिशत औसत आनुवांशिक वृद्धि और ओ. निलोटीकस में 85 प्रतिशत संचयी वृद्धि दर प्राप्त की है (एकनाथ और अकोस्टा, 1998)। अन्य किस्मों, जैसे कि लाल तिलापिया से भी उम्मीदें हैं। तिलापिया की अमेरिका, यूरोप और जापान में निर्यात की अपार संभावनाएं है।

भारत में तिलापिया पालन के दिशानिर्देश

1. संचालन समिति

i. कृषि मंत्रालय (एमओए), भारत सरकार तिलापिया बीज और बढ़ते उत्पादन को देखने और निगरानी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संचालन समिति का गठन करेगी। यह समिति संबंधित राज्य मात्स्यिकी विभाग को हैचरी/ पालन (बढ़ने के साथ-साथ नर्सरी) सुविधा की देखरेख, नियंत्रण और निगरानी (एमसीएस) के लिए अधिकार दे सकते है।

ii. कृषि मंत्रालय द्वारा गठित संचालन समिति हैचरी और प्रजनन कार्यक्रमों के लिए तिलापिया ब्रूड बीज (स्टॉक) के आयात के लिए आवश्यक संगरोध उपायों के संबंधित मानक दिशानिर्देशों की संस्तुति करेगी।

iii. इस संचालन समिति को दिशानिर्देशों को जब और जैसे आवश्यक हो, संशोधित/संशोधन का अधिकार होगा। संचालन समिति दिशानिर्देशों के कार्यान्वयन के फीडबैक के आधार पर संवदेनशील क्षेत्रों/सेंचुरियों और अनुमति योग्य चिकित्सा विज्ञान पर और अधिक विशिष्ट दिशानिर्देश देगी।

iv. संबंधित राज्य सरकार द्वारा गठित समिति तिलापिया जलकृषि के लिए। पंजीकृत किसी भी हैचरी/प्रजनन/ नर्सरी/फार्म सुविधा से निर्धारित दिशानिर्देशों के उल्लंघन के मामले में विवरण मांगने के लिए अधिकृत

v. किसान/उद्यमी जो तिलापिया हैचरी/प्रजनन/नर्सरी/पालन शुरू करने के इच्छुक हैं, को संचालन समिति द्वारा निर्धारित उचित प्रारूप का प्रयोग करते हुए संबंधित राज्य मात्स्यिकी विभाग के पास पंजीकृत कराना होगा।

II. पालन प्रणालियां एवं सेवायें

i. पंजीकरण : जो किसान तिलापिया पालन शुरू करना चाहते हैं, अनुमति के लिए निर्धारित प्रपत्र (अनुबंध- 1) में राज्य मात्स्यिकी विभाग में आवेदन करेंगे।

ii. स्थापन : खुले जल निकायों में पलायन से बचने के लिए फार्म ऐसे स्थान पर स्थित होना चाहिए जो बाढ़ संभावित क्षेत्र अथवा घोषित सैन्कचुरी के आसपास बफर जोन या जैव-रिजर्व या अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में नहीं होना चाहिए।

iii. प्रकार एवं पालन घनत्व : केवल मोनोसेक्स नर/बांझ (या तो हार्मोनल जोड़तोड़ अथवा संकर–प्रजनन के जरिये) के पालन की अनुमति है।

iv. पालन प्रणाली का क्षेत्र : प्रत्येक फार्म 1.0 एकड़ जल फैले क्षेत्र से कम नहीं होगा। प्रत्येक तालाब का आकार 10.0 एकड़ से अधिक नहीं होगा।

v. प्रजातियां : नाईल तिलापिया अथवा तिलापिया के उन्नत उपभेद/संकर अनुमोदित प्रजातियां है।

vi. स्टॉक किये जाने वाले बीज का आकार : पालन के तालाब में लिंग-उत्क्रमण–तिलापिया (एसआरटी) का 10 ग्राम से बड़ा बीज ऑन फार्म नर्सरियों अथवा पंजीकृत बीज फार्मों में लिंग उत्क्रमण तिलापिया (एसआरटी) को 10 ग्रा. आकार के बढ़ने तक पाली जायेगी।

vii. स्टॉकिंग घनत्वे : अधिकतम संख्या 5 संख्या वर्ग मी

  1. जैव सुरक्षा : तिलापिया पालन के लिए अनुमोदन केवल उन्हीं तालाबों/फार्मों की दी जायेगी जो फार्म की जैव सुरक्षा का रख-रखाव यह सुनिश्चित करने के लिए करेंगे कि फार्म से जैविकीय पदार्थ का पलायन जल स्रोत अथवा किसी अन्यक स्रोत यहां तक कि बाढ़ जैसी स्थितियों में भी नहीं होगा। इसलिए, वहां बांध ऊँचाई, जल प्रबंधन प्रणालियों और अन्य जैव-सुरक्षा उपायों जोकि पालन के लिए आवश्यक हैं, की न्यूनतम आवश्यकताओं को निर्दिष्ट करता मानक डिजाइन होगा। (क) पालन तालाबों से निर्गम जल को प्राकृतिक जल निकायों में अण्डों के पलायन को रोकने के लिए दोहन के बाद अथवा पालन के दौरान नालियों/ नहरों/नदियों में छोड़ने से पूर्व आवश्यक रूप से जांच और उपचार किया जायेगा। (ख) पक्षियों को भगाने का यंत्र/बाढ़ अनिवार्य है, (ग) बांध की ऊंचाई मछली पलायन से बचने के लिए पर्याप्त होनी चाहिए और (घ) मछली/अण्डे/बच्चे के पलायन को रोकने के लिए जलमार्गों को उपयुक्त आकार की जाली लगानी चाहिए।

ix. जलाशयों और टैंकों में पिंजरा पालन : तिलापिया का पिंजरा पालन उन जलाशयों के लिए सीमित होगा जहां पहले से ही तिलापिया का भंडार स्थापित हैं। ऐसे पालन के प्रारंभ से पहले ऐसे जलाशयों में तिलापिया जनसंख्या का उपस्थिति का पता लगाने के संबंध में संबंधित राज्य के मात्स्यिकी विभाग द्वारा मूल्यांकन अध्ययन किया जायेगा। जलाशय में केज क्षेत्र प्रभावी-जल-क्षेत्र (ईडब्ल्यूए) के 1 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। केज में छोड़े गए स्टॉक का आकार 50 ग्रा. भार से अधिक होना चाहिए। तदनुसार, केज जाल का आकार उपयुक्त होना चाहिए। केज पालन के लिए तैयार किये गए तैरते पेलेटेड आहार मे प्रोटीन तत्व की न्यूनतम 25 प्रतिशत मात्रा के साथ उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है।

x. सघन तिलापिया पालन : री-सर्कुलेटरी प्रणालियों को प्रारंभ करने की इच्छुक फार्म को 150 संख्या/घन मी से कम मछली स्टॉकिंग घनत्व समेत तैरने वाले आहार के साथ राज्य के मात्स्यिकी विभाग के पास पंजीकृत करना होगा। ऐसे मामले में मछली पालन वाले फार्मों के लिए निर्दिष्ट जैव सुरक्षा उपायों के मानकों की पुष्टि आवश्यक है।

xi. हैचरी की स्थापना : जो उद्यमी तिलापिया बीज हैचरियों की स्थापना करने के इच्छुक हैं, उनको संचालन समिति से अनुमोदन प्राप्त करना होगा और साथ ही राज्य मात्स्यिकी विभाग के पास पंजीकृत भी करना होगा। हैचरियां, स्वीकृत विदेशी/भारतीय कंपनियों से ब्रूड स्टॉक प्राप्त करेंगी। हैचरियां केवल पंजीकृत नर्सरियों/फार्मों को बीज बेचेंगे।

IV. तिलापिया का बीज उत्पादन

i. संचालन समिति आईसीएआर मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थानों और अन्य समान एजेंसियों के जरिये तिलापिया के लिये तिलापिया राष्ट्रीय प्रजनन कार्यक्रम (टीएनबीपी) की स्थापना की सिफारिश करेगी।

ii. संचालन समिति, विदेशी/भारतीय कंपनियों को चिन्हित और अनुमोदित करेंगी जो वाणिज्यिक हैचरियों के लिए ब्रूड स्टॉक की आपूर्ति की पात्र हैं।

iii. संचालन समिति संगरोध सुविधा समेत हैचरी के ले-आउट और डिजाइन की जांच और अनुमोदन करेगी। रोग प्रकोप की किसी घटना से बचने के लिए आयातित बीज का 21 दिनों के लिए संगरोध आवश्यक है। आयातित स्टाक की विदेशी रोगाणुओं के मुकाबले संवेदनशीलता प्रतिरोध के मूल्यांकन के संबंध में संगी प्रजातियों के साथ संगरोध की भी आवश्यकता है।

iv. हैचरियों द्वारा मोनोसेक्स नर तिलापिया का उत्पादन दिशानिर्देशों के अंतर्गत निर्दिष्ट प्रोटोकॉल के अनुपालन मे करना चाहिए।

v. क्रमानुसार पीढियों में आनुवांशिक सुधार के लिए आनुवांशिकी को शामिल करते हुए चयनित प्रजनन के उद्देश्य के साथ तिलापिया प्रजनन कार्यक्रम अन्तः प्रजनन के कारण भविष्य के विनाश से बचने को प्रोत्साहित किया जायेगा।

vi. लिंग उत्क्रमण का उपयोग करते हुए गैर-हार्मोनल तकनीक/प्रौद्योगिकी प्रोत्साहित की जायेंगी।

V. बीज नर्सरियां

जो नर्सरियां तिलापिया पालन के लिए बीज (बीज फार्म) विकसित करने की इच्छुक हैं उनको बढ़ते हुए फार्मों के लिए उपलब्ध दिशानिर्देशों के अनुपालन करते हुये राज्य के मात्स्यिकी विभाग के पास पंजीकृत कराना होगा। नर्सरियां केवल पंजीकृत हैचरियों से ही लिंग उत्क्रमित तिलापिया (एसआरटी) बीज प्राप्तं करे।

VI. स्वास्थ्य निगरानी

फार्म स्टॉक का स्वास्थ्य आवधिक रूप से जांचा जाये और रोग फैलने के मामले में केवल अनुज्ञेय उपचार का विवेकपूर्ण ढंग से प्रयोग किया जायेगा।

VII. दस्तावेज का रख-रखाव

स्टॉकिंग का विवरण, बीज का स्रोत, आदान, नमूने का विवरण, जल गुणवत्ता विवरण, स्वास्थ्य, वृद्धि आदि को दर्शाता दैनिक फार्म प्रबंधन का तालाब वार रजिस्टर रखा जायेगा। इन दस्तावेजों को संबंधित मात्स्यिकी प्राधिकारियों द्वारा निरीक्षण के समय उपलब्ध कराना होगा।

VIII. दोहन

दोहन से एक/दो दिन पूर्व आहार प्रक्रिया स्थगित कर देनी चाहिए। दोहन को खींच-जाल अथवा अन्य तीव्र दोहन प्रणालियों का प्रयोग करते हुए किया जायेगा।

IX. पोस्ट-हार्वेस्ट और परिवहन

दोहित मछली को तुरंत बर्फ में रखा जायेगा और घरेलू बाजारों/ प्रसंस्करण प्लांटों को भेज दिया जायेगा। तिलापिया के मूल्य संवर्धन मदों में प्रसंस्करण के लिए पर्याप्त अवसंरचना सुविधाओं को प्रोत्साहित किया जायेगा।

X. प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम

धारणीयता प्राप्त करने के लिए तिलापिया को श्रेष्ठतर प्रबंधन प्रथाओं पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों और जागरूकता शिविरों को प्रस्तावित किया जाता है। सरकारी अधिकारियों/अनुसंधान संगठनों/प्रगतिशील किसानों/उद्यमियों की उन देशों में प्रदर्शन यात्रा जहां तिलापिया पालन लोकप्रिय और सफल है। किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम संबंधित राज्य के मात्स्यिकी विभाग/ अनुसंधान संगठन/केवीके द्वारा किये जायेंगे।

XI. मूल्यांकन एवं प्रभाव आकलन

i. तालाबों और पिंजरों से तिलापिया के पलायन को रोकने के लिए उठाये गये सुरक्षात्मक उपायों की प्रभावकारिता का मूल्यांकन करना और उन्हें सुधारना।

ii. पलायित मछलियों का पारिस्थितिक तंत्र पर प्रभाव और इस बात का निर्धारण कि वें मौजूदा तिलापिया प्रजातियों के आक्रमण क्षमता में कैसे बदलाव करेंगी।

XII. अन्य तकनीकी सुझाव

i. उर्वरणः मृदा की पोषकीय अवस्था के आधार पर जब और जैसे आवश्यक | हो जैविक खादों का प्रयोग करते हुए तालाब पालन में उर्वरण किया जा सकता है।

ii. आहार का प्रकारः 20 प्रतिशत न्यूनतम प्रोटीन मात्रा सहित फारमूलित तैरने वाला पैलेट आहार/फार्म में तैयार पैलेट आहार।

iii. आहार भंडारणः फार्म पर उचित वायु संचार और आर्द्रता प्रबंधन समेत उचित आहार भंडारण सुविधा उपलब्ध कराई जाय। आहार को फंफूदी से बचाने के लिए दीवार को बिना छुये ऊंचे लकड़ी के चबूतरे पर रखा जाये। आहार को उत्पादन की दिनांक से तीन महीनों के अंदर प्रयोग कर लिया जाए।

iv. दोहन : दोहन से एक/दो दिन पूर्व आहार प्रक्रिया स्थगित कर देनी | चाहिए। दोहन को खींच-जाल अथवा अन्य तीव्र दोहन प्रणालियों का प्रयोग करते हुए किया जाये।

v. पोस्ट-हार्वेस्ट और परिवहन : दोहित मछली को तुरंत बर्फ में रखा जाये और घरेलू बाजारों/प्रसंस्करण प्लांटों को भेज दिया जाये। तिलापिया के मूल्य संवर्धन मदों में प्रसंस्करण के लिए पर्याप्त अवसंरचना सुविधाओं को प्रोत्सोहित किया जाये।

अनुबंध-I

आवेदन हेतु प्रपत्र

क्र.सं.

विवरण

 

टिप्पणी

 

1.

आवेदक का नाम और पत्राचार का पता/पंजीकृत कंपनी/ स्थापना (स्थायी पते सहित)

 

2.

फार्म की स्थिति :

वैयक्तिक/समिति/निजी/मालिकाना/ हिस्से दारी

 

3.

पत्राचार हेतु पता

 

 

गली :

 

 

शहर :

 

 

जिला :

 

 

राज्य :

 

4.

फार्म की स्थिति :

 

 

राज्य :

 

 

जिला :

 

 

तालुक/मंडल

 

 

राजस्व गांव :

 

 

सर्वेक्षण संख्या :

 

5.

स्वामित्व (स्वतंत्र रूप से या पट्टे पर)

 

6.

यदि पट्टे पर हो तो, पट्टे की अवधि और पट्टे की अवधि की प्रति संलग्न करे

 

7.

क्या फार्म मात्स्यिकी विभाग (डीओएफ) में पंजीकृत है और सीएएए/अन्य एजेंसी द्वारा अनुमोदित है। | (प्रमाणपत्र की प्रति संलग्न करे) ।

 

8.

डीओएफ/एमपीईडीए/चार्टर्ड इंजीनियर द्वारा अनुमोदित फार्म के लेआउट की प्रमाणित प्रति

 

9.

फार्म में पाली जाने वाली प्रजातियों की सूची

 

10.

जल का स्रोत

 

11.

तालाब का इतिहास

 

 

क) तालाब निर्माण का महीना और वर्ष और वित्तीय सहायता यदि कोई प्राप्त की गई हो

 

 

ख) निर्माण के वर्ष से मछली/झींगा के उत्पादन का ब्यौरा

 

 

ग) क्या मछली पालन हेतु केंद्र/राज्य सरकार की किसी योजना के अंतर्गत कोई सहायता प्राप्त हुई है ? यदि हां, तो ब्यौरा दें (रूपयो में)

 

 

घ) तालाबों की वर्तमान स्थिति, यदि मौजूदा है।

 

12.

प्रस्तावित तालाबों का निर्माण/नवीनीकरण/तालाबों की मरम्मत कार्यों का ब्योरा

 

13.

फार्म के परिचालन की प्रस्तावित तिथि और कार्य-कलापों की अंतरिम सूची

 

14.

फार्म में उपलब्ध सुविधाओं और मशीनरी की सूची (परिशिष्ट-1 प्रपत्र के अनुसार)

 

15.

तालाबों और केजो में तिलापिया के पालन में आवक लागत और परिचालनों की अर्थव्यवस्था के संबंध में अनुमान

 

 

स्थान :                                                             आवेदक के हस्ताधक्षर    तिथि :                                                             नाम :

पता :

  • इस प्रपत्र के साथ परिशिष्ट- के अनुसार उपलब्ध अवसंरचना के संबंध में अतिरिक्त सूचना और परिशिष्ट-II के अनुसार आवेदक की घोषण लगा होना चाहिए।

 

परिशिष्ट-I

फार्म में उपलब्ध अवसंरचना के ब्योरे को प्रस्तुत करने हेतु प्रारूप

मालिक/पट्टेधारी का नाम

 

स्थान

 

वास्तविक सुविधाएं

 

फार्म की वास्तिविक सीमा

 

तालाबों की संख्या

 

प्रत्येक तालाब का क्षेत्र

 

प्रत्येक तालाब के बंध की ऊंचाई

 

जलनिकासी (ह्यूम पाईप/स्लूईसगेट)

 

अवसादन टैंक

 

भवन

 

क) कार्यालय/प्रशासन

 

ख) आवासीय क्वार्टर

 

ग) भंडार

 

घ) प्राथमिक जांच हेतु प्रयोगशाला

 

मशीनरी

 

पम्प

 

ऐरेर्ट जेनसेट

 

मशीन रूम

 

 

 

 

 

स्त्रोत: पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय

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