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संचरणीय रोग

इस भाग में संचरणीय रोगों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है |

स्वाइन फ्लू क्या है?

स्वाइन इन्फ़्लुएन्ज़ा (स्वाइन फ्लू) सूअरों में एक श्वास संबन्धी रोग है जो टाइप ए इन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस द्वारा होता है और सूअरों में नियमित रूप से फैलता है। मनुष्यों को आमतौर पर स्वाइन फ्लू नहीं होता है, लेकिन मानवीय संक्रमण हो सकते हैं तथा होते हैं। स्वाइन फ्लू वायरस व्यक्ति-से-व्यक्ति को फैलने की जानकारी पहले भी प्रकाश में आई है, लेकिन पूर्व में, इसका संचरण सीमित था तथा तीन लोगों से अधिक में टिकता नहीं था।

मार्च 2009 के अंत तथा अप्रैल 2009 की शुरुआत में स्वाइन इन्फ़्लुएन्ज़ा ए (H1N1) वायरस से दक्षिणी कैलिफोर्निया तथा सैन एन्तेनियो के निकट मानव संक्रमण के पहले मामलों की जानकारी सामने आई। अमेरिका के अन्य राज्यों ने भी  मानवों में स्वाइन फ्लू संक्रमण के मामलों की जानकारी दी है तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मामलों की जानकारी दी गई है।

लोगों में स्वाइन फ्लू के चिह्न तथा लक्षण

लोगों में स्वाइन फ्लू के लक्षण सामान्य मानवीय फ्लू के समान ही होते हैं तथा इनमें शामिल हैं बुखार, कफ, गला खराब होना, शरीर में दर्द, कंपकंपी तथा थकावट। कुछ लोगों ने स्वाइन फ्लू से जुड़े लक्षणों में डायरिया तथा वमन भी बताए हैं। पूर्व में, लोगों में स्वाइन फ्लू से संक्रमण के कारण स्वास्थ्य अत्यंत खराब होने (निमोनिया तथा श्वास प्रणाली की विफलता) एवं मृत्यु की जानकारी दी गई है। मौसमी फ्लू की तरह, स्वाइन फ्लू भी दीर्घकालीन स्वास्थ्य समस्याओं को और बदतर कर सकता है।

फ्लू के वायरस मुख्य रूप से व्यक्ति से व्यक्ति को खांसने या इन्फ़्लुएन्ज़ा से पीड़ित व्यक्ति के छींकने से फैलता हैं। कभी-कभी लोग किसी चीज़ पर लगे फ्लू के वाइरस को छूने एवं उसके बाद उनके मुंह या नाक को छूने से संक्रमित हो सकते हैं।

फ्लू से पीड़ित कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को कैसे संक्रमित कर सकता है?

बीमार होने के बाद संक्रमित व्यक्ति अन्य लोगों को पहले दिन की शुरुआत से लेकर सात दिनों या उससे अधिक दिनों तक संक्रमित कर सकते हैं। इसका मतलब है इससे पहले कि आपको ज्ञात हो कि आप बीमार हैं, आप किसी और को फ्लू संचारित कर सकते हैं, और साथ ही साथ तब भी जब आप बीमार हों।

फ्लू से बचने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?

सबसे पहले तथा अत्यंत महत्त्वपूर्ण: अपने हाथ धोएं। अच्छा सामान्य स्वास्थ्य बनाए रखने का प्रयास करें। पर्याप्त नींद लें, गतिशील रहे, तनाव पर नियन्त्रण रखें, पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लें एवं पोषक भोजन लें। फ्लू वायरस की संभावना वाली सतहों को न छूने का प्रयास करें। बीमार लोगों से नज़दीकी संपर्क रखने से बचें।

बीमार होने से बचने के लिए मैं क्या कर सकता/सकती हूँ?

इस समय स्वाइन फ्लू से बचने के लिए कोई टीका उपलब्ध नहीं है। ऐसी दैनिक क्रियाएं हैं, जो इन्फ़्लुएन्ज़ा जैसी श्वास संबन्धी बीमारियां उत्पन्न करने वाले रोगाणुओं को फैलने से रोकने में मदद कर सकती हैं। अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ये दैनिक कदम उठाएं:

  • खांसते या छींकते समय अपनी नाक तथा मुंह को टिशु से ढंकें
  • अपने हाथों को बार-बार साबुन तथा पानी से धोएं, विशेष रूप से खांसने या छींकने के बाद। अल्कोहोल आधारित हाथ साफ़ करने के पदार्थ भी कारगर हैं,
  • अपनी आँखें, नाक तथा मुंह को छूने से बचें, रोगाणु इस तरह से फैलते हैं,
  • बीमार लोगों से नज़दीकी संपर्क रखने से बचें,
  • यदि आप इन्फ़्लुएन्ज़ा से पीड़ित हों तो यह सिफारिश की जाती है कि आप कार्य पर या स्कूल न जाएं तथा अन्य लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए उनसे दूर रहें।

खांसने या छींकने से वायरस को फैलने से रोकने के लिए सबसे अच्छा तरीका क्या है?

यदि आप बीमार हैं तो जितना अधिक संभव हो, अन्य लोगों से अपने संपर्क को सीमित रखें। यदि बीमार हों तो काम पर या स्कूल न जाएं। खांसते या छींकते समय अपनी नाक तथा मुंह को टिशु से ढंकें। ऐसा करना आपके आसपास के लोगों को बीमार होने से बचा सकता है। उपयोग किया हुआ टिशु रद्दी की टोकरी में डालें। यदि टिशु न हो तो किसी अन्य वस्तु से अपनी खांसी तथा छींक को ढंकें। उसके बाद, अपने हाथ साफ़ करें, एवं प्रत्येक बार खांसने या छींकने के बाद ऐसा करें।

फ्लू से बचने के लिए मेरे हाथ धोने का सर्वोत्तम तरीका क्या है?

बार-बार हाथ धोना आपको रोगाणुओं से बचाने में मदद करेगा। हाथ साबुन या पानी से धोएं, या अल्कोहोल-आधारित हाथ धोने के पदार्थ से। यह सिफारिश की जाती है कि जब आप अपने हाथ धोते हैं - साबुन तथा गर्म पानी से - तो आप 15 से 20 सेकंड के लिए धोएं। जब साबुन और पानी उपलब्ध न हों तो अल्कोहोल-आधारित हाथ पोंछकर फेंकने योग्य कपड़े के टुकडे या जॅल सैनिटाइज़र का इस्तेमाल किया जा सकता है। आप उन्हें अधिकतर सुपरमार्केट्स या दवाई की दुकानों से प्राप्त कर सकते हैं। जेल के लिए पानी की आवश्यकता नहीं होती; उसमें मौज़ूद अल्कोहोल आपके हाथ पर के रोगाणुओं को मार देता है।

यदि आप बीमार हो जाएं एवं इनमें से किसी भी चेतावनी संकेत का अनुभव करें, तो आपातकालीन चिकित्सा देखभाल लें।

बच्चों में आपातकालीन चेतावनी संकेत जिनमें त्वरित चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है, में शामिल हैं:

  • सांस तेज़ी से चलना या सांस लेने में तकलीफ
  • त्वचा का रंग नीला पड़ना
  • पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ नहीं लेना
  • नींद से नहीं जागना या बातचीत नहीं करना
  • इतना चिड़चिड़ा होना कि किसी द्वारा थामे जाना नहीं चाहे
  • फ्लू जैसे लक्षण में सुधार लेकिन बुखार एवं अधिक खांसी के साथ पुनः लौटना
  • त्वचा में दानों के साथ बुखार

वयस्कों में आपातकालीन चेतावनी संकेत जिनमें त्वरित चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है, में शामिल हैं:

  • सांस लेने में तकलीफ या सांस फूलना
  • छाती या पेट में दर्द या दबाव
  • अचानक चक्कर आना
  • भ्रम
  • तेज़ या लगातार उल्टी होना

आंत्र ज्वर (टाइफायड)

आंत्र ज्वर (टाइफायड) जीवन के लिए एक खतरनाक बीमारी है जो कि सलमोनेल्ला टायफी जीवाणु से होता है। आंत्र ज्वर (टाइफायड) को सामान्यतः एंटीबायोटिक दवाइयों से रोका तथा इसका उपचार किया जा सकता है।

आंत्र ज्वर (टाइफायड) कैसे फैलता है ?

सलमोनेल्ला टायफी केवल मानव मात्र में ही पाया जाता है। आंत्र ज्वर(टाइफायड) से पीड़ित व्यक्ति की रक्त धारा और धमनी मार्ग में जीवाणु प्रवाहित होती हैं। इसके साथ ही कुछेक संवाहक कहलाने वाले व्यक्ति आंत्र ज्वर(टाइफायड) से ठीक हो जाते हैं। किंतु फिर भी उनमें जीवाणु रहता है। इस प्रकार बीमार और संवाहक दोनों ही व्यक्तियों के मल से सलमोनेल्ला टायफी निसृत होती है। सलमोनेल्ला टायफी फैलाने वाले व्यक्तियों द्वारा प्रयोग किये अथवा पकड़े गये खाद्य अथवा पेय पदार्थ पीने या सलमोनेल्ला टायफी से संदूषित पानी से नहाने या पानी से खाद्य सामग्री धोकर खाने से आंत्र ज्वर(टाइफायड) हो सकता है। अतः आंत्र ज्वर (टाइफायड) संसार के ऐसे स्थानों में अधिक पाया जाता है जहां हाथ धोने की परंपरा कम पायी जाती है तथा जहां पानी, मलवाहक गंदगी से प्रदूषित होता है।
जैसे ही सलमोनेल्ला टायफी जीवाणु खायी या पी जाती है वह रक्त धारा में जाकर कई गुणा बढ़ जाती है। शरीर में ज्वर होने तथा अन्य संकेत व लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

आंत्र ज्वर (टाइफायड) के संकेत और लक्षण क्या होते हैं ?

सामान्यतः आंत्र ज्वर(टाइफायड) से पीड़ित व्यक्तियों को लगातार 103 से 104 डिग्री फैरेनहाइट का बुखार बना रहता है। उन्हें कमजोरी भी महसूस हो सकती है, पेट में दर्द, सिर दर्द अथवा भूख कम लग सकती है। कुछ मामलों में बीमार व्यक्ति को चपटे दोदरे, गुलाबी रंग के धब्बे पड़ सकते हैं। वास्तव में आंत्र ज्वर(टाइफायड) की बीमारी के संबंध में जानने के लिए केवल एक उपाय है कि मल का नमूना या खून के नमूने में सलमोनेल्ला टाइफी की जांच की जाए।

आंत्र ज्वर (टाइफायड) से कैसे बचा जा सकता है ?

आंत्र ज्वर(टाइफायड) से के दो मौलिक उपाय हैं-

  • जोखिम भरे खाने और पीने की चीजों से बचें
  • आंत्र ज्वर(टाइफायड) का टीका लगवाएं

पीने के पानी को पीने से पहले एक मिनट तक उबाल कर पीएं। यदि बर्फ, बोतल के पानी या उबले पानी से बनी हुई न हो तो पेय पदार्थ बिना बर्फ के ही पीएं। स्वादिष्ट बर्फीले पदार्थ न खाएं जो कि प्रदूषित पानी से बने हो सकते हैं। पूरी तरह पकाए और गर्म तथा वाष्प निकलने वाले खाद्य पदार्थ ही खाएं। कच्ची ऐसी साग सब्जियां और फल न खाएं जिन्हें छीलना संभव न हो। सलाद वाली सब्जियाँ आसानी से प्रदूषित हो जाती है। जब आप छीली जा सकने वाली कच्ची सब्जियां या फल खाएं तो आप स्वयं उन्हें छीलकर खाएं।  (पहले अपने हाथ साबुन से धो लें) छिलके न खाएं। जिन दुकानों/स्थानों में खाद्य पदार्थ/पेय पदार्थ साफ सुथरे न रखे जाते हों, वहां से लेकर न खाएं और न पीएं। याद रखें कि आपको टीका लगवाना पड़ेगा। कई सालो के बाद आंत्र ज्वर (टाइफायड) के टीकों का प्रभाव जाता रहता है। यदि आपने पहले टीका लगवाया हो तो आपने डॉक्टर से जांच करवा लें कि क्या वर्धक टीका लगवाने की आवश्यकता तो नहीं है। रोग प्रतिरक्षी दवाइयां आंत्र ज्वर (टाइफायड) को रोक नहीं सकती है, वे केवल उपचार में सहायक सिद्ध हो सकती हैं।

टीके का नाम

किस प्रकार दिया गया

आवश्यक खुराकों की संख्या

खुराकों के बीच समय की अंतराल

टीकाकरण के लिए अलग से आवश्यक समयावधि

टीकाकरण के लिए न्यूनतम आयु

कितने वर्ष की अवधि में वर्धक टीके की आवश्यकता

टी वाई 21 ए (विवोटिफ बर्ना स्विस
मेरम और वेक्सीन इंस्टीट्यूट

मुंह से 1 कैप्सूल

4

2 दिन

2 सप्ताह

6 वर्ष

5 वर्ष

वी आई सी पी एस (टायफिम वी आई, पास्ट्यूर मैरियोक्स

इंजेक्शन

1

एन/ए

2 सप्ताह

2 वर्ष

2 वर्ष

कुकर खांसी (परट्यूसिस/वूपिंग कफ)

यह जीवाणु का संक्रमण होता है जो कि आरंभ में नाक और गला को प्रभावित करता है। यह प्रायः 2 वर्ष से कम आयु के बच्चों की श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है। इस बीमारी का नामकरण इस आधार पर किया गया है कि इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति सांस लेते समय भौंकने जैसी आवाज करता है।

कारणः
यह बोर्डेटेल्ला परट्यूसिया कहलाने वाले जीवाणु के कारण होता है। यह जीवाणु व्यक्तियों के बीच श्वसन क्रिया से निष्कासित जीवाणु से फैलती है। यह तब होता है जब संक्रमण युक्त व्यक्ति खांसते या छींकते हैं। यह संक्रमण युक्त व्यक्तियों के शारीरिक द्रवों से संपर्क होने से भी फैलता है जैसे नाक का पानी गिरना।

लक्षणः

  • जीवाणु संक्रमण के आरंभ से 7 से 17 दिनों के बाद इसके लक्षण विकसित हो पाते हैं।
  • जिनमें लक्षण विकसित हो जाते हैं, वे अधिकांश में 2 वर्ष की आयु से कम होते हैं।

ये लक्षण लगभग 6 सप्ताह तक रहते हैं और ये 3 चरणों में विभाजित होते हैं -
चरण-1: इन लक्षणों में छींकना, आंखों से पानी आना, नाक बहना, भूख कम होना, ऊर्जा का ह्रास  होना और रात के समय खांसना शामिल है।
चरण-2: इन लक्षणों में लगातार खांसते रहना और इसके बाद भौंकने जैसी आवाज आना तब जबकि बीमार व्यक्ति सांस लेने का प्रयास करता है, आदि शामिल है।
चरण -3: इसके अंतर्गत सुधार की प्रक्रिया आती है जबकि खांसना न तो लगातार होता है और न गंभीर। यह स्तर 4 सप्ताह से प्रायः आरंभ होता है।

यह कुकर खांसी कम आयु के रोगियों को होती है जिनकी खांसी 2 सप्ताह तक रहती है।

रोकथामः
सभी शिशुओं के लिए कुकर खांसी का टीका लगवाना आवश्यक है। यह टीकाकरण प्रायः डीटीपी संयुक्त रूप में {डिप्थेरिया, टिटनेस और कुकर खांसी (परट्यूरसिस} दिया जाता है।
पहले वाला संक्रमण और टीकाकरण जिंदगीभर असंक्रमीकरण की गारंटी नहीं देता है। तथापि 6 वर्ष की आयु के बाद वर्धक टीकाकरण की सिफारिश नहीं की जाती है जब तक कि संक्रमण न हुआ हो।

पोलियो

यह संक्रामक बीमारी है जो कि पूरे शरीर को प्रभावित कर सकता है किंतु हमेशा स्नायुओं और माँस-पेशियों को प्रभावित करता है।

कारणः
पोलियो वायरस संक्रमण से पैदा होता है। पोलियो का वायरस अंतर्ग्रहण से संप्रेषित होता है जो कि मानव-मल और गंदगी में पाया जाता है। जिन स्थानों पर मानव मल, पीने के पानी या कुओं /तालाब/जलाशयों के पानी को प्रदूषित करती है, वहां पर अधिक आयु के बच्चों और वयस्क व्यक्तियों को इस तरह के पानी में तैरने, नहाने या अंदर जाने देने से यह वायरस प्रभावित कर सकता है।  यह प्रायः मल निष्कासन से मुंह के मार्ग से संप्रेषित होता है। यह वायरस नाक या मुंह से होकर प्रवेश करता है और फिर आंतों की ओर बढ़ता है और वहां से यह आंतों की कोशिकाओं में प्रवेश करके हजारों की संख्या के गुणकों में नये वायरस अणुओं में जन्म लेता है। यही मानव मल के साथ हफ्तों तक बाहर आते रहते हैं। इस प्रकार बार-बार आते-जाते रहने के चक्र के माध्यम से समग्र समुदाय को संक्रमण का खतरा होता है।

लक्षणः


हल्का संक्रमण

मस्तिष्क और मेरुदंड का मध्यम संक्रमण

मस्तिष्क और मेरुदंड का गंभीर संक्रमण

अधिकांश मामलों में रोगी का इसके लक्षणों का पता नहीं चलता। अन्य मामलों में लक्षण इस प्रकार है:

  • फ्लू जैसा लक्षण
  • पेट का दर्द
  • अतिसार(डायरिया)
  • उल्टी
  • गले में दर्द
  • हल्का बुखार
  • सिर दर्द

हल्के संक्रमण के लक्षण

  • मध्यम बुखार
  • गर्दन की जकड़न
  • मांस-पेशियाँ नरम होना तथा विभिन्न अंगों में दर्द होना जैसे कि पिंडली में (टांग के पीछे)
  • पीठ में दर्द
  • पेट में दर्द
  • मांस पेशियों में जकड़न
  • अतिसार (डायरिया)
  • त्वचा में दोदरे पड़ना
  • अधिक कमजोरी या थकान होना
  • मांस पेशियों में दर्द और पक्षाघात शीघ्र होने का खतरा (कार्य न करने योग्य बनना) जो स्नायु पर निर्भर करता है (अर्थात् हाथ, पांव)
  • मांस पेशियों में दर्द, नरमपन और जकड़न (गर्दन, पीठ, हाथ या पांव)
  • गर्दन न झुका पाना, गर्दन सीधे रखना या हाथ या पांव न उठा पाना
  • चिड़-चिड़ापन
  • पेट का फूलना
  • हिचकी आना
  • चेहरा या भाव भंगिमा न बना पाना
  • पेशाब करने में तकलीफ होना या शौच में कठिनाई (कब्ज)
  • निगलने में तकलीफ
  • सांस लेने में तकलीफ
  • लार गिरना
  • जटिलताएं
  • दिल की मांस पेशियों में सूजन, कोमा, मृत्यु

 

जोखिम कारकः

  • बच्चों को इस बीमारी का अधिक खतरा रहता है, विशेषकर जिन बच्चों को शौच जाने की आदत नहीं पड़ी है।
  • वयस्क, जिनका टीकाकरण न किया गया हो
  • ऐसे स्थल जहां, संक्रामक मलों की मक्खियों को, खाने को संदूषित करने दिया जाता हो।
  • संक्रामक पानी के स्रोत (गंदगी डाले जाने वाले स्थानों के पास)
  • एड्स और कैंसर जैसी न्यून सुरक्षात्मक शरीर

पोलियो की रोकथाम

  • अपने को और अपने आसपास साफ रखें
  • बच्चों का टीकाकरण कराएं (टीकाकरण अनुसूची देखें)
  • पौष्टिक भोजन खाएं

गलगण्ड रोग

 

गलगण्ड रोग (इसे पैरोटाइटिस के रूप में भी जाना जाता है) एक विकट विषाणुयक्त बीमारी है जो पैरोटिड ग्रंथि को कष्टदायक रूप से बड़ा कर देती है। ये ग्रंथियां आगे तथा कान के नीचे स्थित होती हैं तथा लार एवं थूक का उत्पादन करती हैं।

कारण

गलगण्ड एक संक्रामक रोग है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को एक विषाणु के कारण होता है जो संक्रमित लार से सम्पर्क के ज़रिए फैलता है। 2 से 12 वर्ष के बीच के बच्चों में संक्रमण की सबसे अधिक सम्भावना होती है। अधिक उम्र के लोगों में, पैरोटिड ग्रंथि के अलावा, अन्य ग्रंथियां जैसे अण्डकोष, पैन्क्रियाज (अग्न्याशय) एवं स्नायु प्रणाली भी शामिल हो सकती हैं। बीमारी के विकसित होने का काल, यानि शुरुआत से लक्षण पूर्ण रूप से विकसित होने तक, 12 से 24 दिन होता है।

बीमारी के लक्षण

पैरोटिड ग्रंथि में कष्टदायक सूजन आ जाती है, जो कि शुरुआत में एक ओर होती है तथा 3 से 5 दिनों में दोनों ग्रंथियों में हो जाती है। चबाने तथा निगलने के दौरान दर्द बढ़ जाता है, एवं लार के उत्पादन में वृद्धि करने वाले खट्टे खाद्य पदार्थ एवं रस इस दर्द को और बढ़ा देते हैं। सिरदर्द होने तथा भूख कम लगने के साथ तेज़ बुखार होता है। बुखार सामान्यतः 3 से 4 दिनों में नीचे आ जाता है तथा ग्रंथि की सूजन 7 से 10 दिनों में कम हो जाती है। जब तक ग्रंथि में सूजन रहती है, यानि 7 से 10 दिनों तक, पीड़ित बच्चों से अन्य व्यक्ति में भी रोग फैल सकता है। इस दौरान उसे दूसरे बच्चों से दूर रखना चाहिए एवं स्कूल जाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
अधिक आयु के पुरुषों में अंडकोषों में दर्द एवं सूजन (ऑर्काइटिस) हो सकती है। गलगण्ड से मस्तिष्क में सूजन (एंसिफेलाइटिस) भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से तुरंत सम्पर्क किया जाना चाहिए, यदि ये लक्षण हों:

  • तीव्र सिरदर्द
  • गर्दन में जकड़न
  • नींद के झोंके
  • मुर्छा आना
  • अत्यधिक वमन
  • अत्यधिक तापमान
  • पेट दर्द
  • अंडकोषों में सूजन

उपचार

गलगण्ड के लिए कोई विशिष्ट उपचार नहीं है। दवाइयों से विभिन्न लक्षणों में आराम मिल सकता है। आमतौर पर एंटिबायोटिक्स नहीं दी जाती हैं। बुखार को पैरासिटमॉल जैसी दवाइयों से नियंत्रित किया जाता है जो दर्द से भी राहत देती हैं। बच्चों को एस्पिरिन नहीं दी जानी चाहिए। प्रचुरता में तरल पदार्थों के साथ नर्म, हल्का आहार लेना आसान होता है। खट्टे पदार्थों एवं रसों से बचा जाना चाहिए। गलगण्ड से पीड़ित बच्चे को पूरे समय बिस्तर पर आराम करना आवश्यक नहीं है।

बचने का तरीका

गलगण्ड होने के बाद, व्यक्ति को कभी यह बीमारी नहीं होती है तथा उसका प्रहार जीवन भर के लिए प्रतिरोध प्रदान कर देता है। जिन बच्चों को गलगण्ड नहीं हुआ हो, उनके इससे बचाव के लिए टीके उपलब्ध हैं। एमएमआर टीका तीन वाइरल बीमारियों– मीज़ल्स, मम्प्स एवं रुबेला (गलगण्ड, खसरा एवं हल्का खसरा) के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है। यह सभी बच्चों को 15 माह की आयु में दिया जाना चाहिए। यह टीका एक साल से छोटे बच्चे को नहीं दिया जाना चाहिए, और न ही बुखार से पीड़ित बच्चे तथा गर्भवती महिला को दी जानी चाहिए।

समस्याएँ

गलगण्ड कभी-कभी मस्तिष्क में संक्रमण कर सकता है (एंसिफेलाइटिस) जो कि गम्भीर स्थिति है। यदि पुरुषों में अण्डकोष प्रभावित होते हैं तो इसका परिणाम बांझपन हो सकता है।

स्रोत: : एनडीटीवी डॉक्टर

टेटनस या धनुषटंकार

टेटनस एक संक्रामक बीमारी है, जो मिट्टी में रहनेवाले बैक्टीरिया से घावों के प्रदूषित होने के कारण होती है। इस बैक्टीरिया को बैक्टीरियम क्लोस्ट्रीडियम कहा जाता है। यह मिट्टी में लंबी अवधि तक छेद बना कर दीमक के समान रह सकता है।
जब कोई घाव इस छेदनुमा घर में रहनेवाले दीमक रूपी बैक्टीरिया से प्रदूषित होता है, तो टेटनस बीमारी पैदा होती है। जब ये बैक्टीरिया सक्रिय होकर तेजी से बढ़ने लगते हैं और मांसपेशियों को प्रभावित करनेवाला जहर पैदा करने लगते हैं, तो टेटनस का संक्रमण फैलता है। टेटनस बैक्टीरिया पूरे वातावरण में, आमतौर पर मिट्टी, धूल और जानवरों के मल में पाया जाता है। हमारे शरीर में बैक्टीरिया के प्रवेश के रास्ता आमतौर पर फटे हुए घाव होता है, जो जंग लगी कीलों, धातु के टुकड़ों या कीड़ों के काटने, जलने या त्वचा के फटने से बनता है।

बीमारी के चार संभावित लक्षण

  • सामान्य टेटनस शरीर की संरचना की सभी मांसपेशियों को प्रभावित कर सकती है। यह सबसे सामान्य और सभी चार प्रकार में सबसे गंभीर है,
  • स्थानीय टेटनस बैक्टीरिया से संक्रमित घाव के आसपास की मांसपेशियों को प्रभावित करता है,
  • सिफेलिक टेटनस में शुरुआत में चेहरे की मांसपेशियां तेजी से प्रभावित होती हैं (एक से दो दिन में)। यह आमतौर पर सिर पर चोट या कान में संक्रमण के कारण होता है,
  • नीयोनेटल टेटनस सामान्य टेटनस जैसा ही होता है, लेकिन यह एक माह से कम उम्र के शिशुओं (जिन्हें नीयोनेट कहा जाता है) को प्रभावित करता है। विकसित देशों में यह स्थिति बहुत कम होती है।

टेटनस के कारण

  • इस बीमारी के लिए जिम्मेदार क्लोस्ट्रीडियम टेटानी नामक बैक्टीरिया है। बैक्टीरिया दो स्वरूप में पाये जाते हैं: दीमक या गुणक कोशिका, जो तेजी से बढ़ते हैं।
  • दीमक के स्वरूप वाला बैक्टीरिया मिट्टी, धूल या जानवरों के मल में रहता है और कई वर्षों तक जीवित रह सकता है। दीमक रूपी बैक्टीरिया भीषण तापमान भी सह लेते हैं,
  • टेटनस बैक्टीरिया से, घावों का संक्रमित होना आम बात है। टेटनस हालांकि तभी होता है, जब बैक्टीरिया प्रजनन करते हैं और सक्रिय कोशिका बन जाते हैं,
  • सक्रिय कोशिकाएं दो तरह के जहर, टेटानोलाइसिन और टेटानोस्पैसमिन पैदा करते हैं। टेटानोलाइसिन का काम स्पष्ट नहीं है, लेकिन टेटानोस्पैसमिन ही बीमारी के लिए जिम्मेदार है,
  • यह बीमारी चोट के कारण फटी हुई त्वचा से शुरू होती है। अधिकांश मामलों में त्वचा के कटने या छिलने के कारण त्वचा में पैदा हुई दरार से ही बीमारी शुरू होती है,
  • टेटनस से संक्रमित हो सकनेवाले अन्य घावों में शामिल हैं:
    • शल्य चिकित्सा
    • पिसे हुए घाव
    • छिलना
    • शिशु जन्म और
    • दवा के प्रयोक्ता (सूई के प्रवेश की जगह)
  • मृत उतकों के घाव, जैसे जलना या पिसना या बाहरी तत्वों के घाव में प्रवेश से टेटनस का खतरा बढ़ जाता है।
  • वैसे लोगों को भी टेटनस हो सकता है, जिन्हें इसका टीका नहीं पड़ा हो या जो लोग इसकी बूस्टर खुराक नहीं ले रहे हों।

टेटनस के लक्षण

  • सामान्य टेटनस निम्न लक्षण प्रदर्शित करता है:
    • खुजली, मांसपेशियों में खिंचाव, सूजन, कमजोरी या निगलने में कठिनाई सामान्य रूप से देखा गया है,
    • अक्सर चेहरे की मांसपेशियां सबसे पहले प्रभावित होती हैं। जबड़ों की जकड़न या ट्रिसमस आम बात है। यह स्थिति चबाने के लिए जरूरी मांसपेशियों में आयी जकड़न के कारण पैदा होती है,
    • मांसपेशियों की जकड़न लगातार आगे बढ़ती है और पीठ की मांसपेशियों में दर्द होता है, जिसे ओपीस्थोटोनस कहते हैं। मांसपेशियों की जकड़न इतनी भयानक होती है कि इससे हड्डियां टूट सकती हैं और जोड़ हिल सकते हैं,
    • गंभीर अवस्था में बोलने और सांस लेने की नली में जकड़न होती है,
    • सीफैलिक टेटनस में जबड़े के जकड़ने के अलावा चेहरे की कम से कम एक मांसपेशियों में कमजोरी होती है। दो-तिहाई मामलों में इससे सामान्य टेटनस विकसित होता है,
    • स्थानीय टेटनस में घाव की जगह के आसपास की मांसपेशियों में जकड़न पैदा होती है। यह स्थिति आगे चल कर सामान्य टेटनस में बदल सकती है,
    • नीयोनेटल टेटनस सामान्य टेटनस के जैसा ही है। अंतर केवल इतना है कि यह नवजात शिशुओं को प्रभावित करता है। इससे नवजात बेचैन हो जाते हैं और उन्हें चूसने और निगलने में कठिनाई होती है,

टेटनस से बचाव

  • टीकाकरण द्वारा टेटनस से पूरी तरह बचाव संभव है: 1920 के दशक में शुरू किया गया टेटनस टॉक्सॉयड सबसे सुरक्षित साबित हुआ है। टेटनस टॉक्सॉयड में निष्क्रिय टेटनस टॉक्सीन को रसायनों और ताप के प्रभाव में लाकर उसके जहरीले प्रभाव को कम किया जाता है, लेकिन इसके एंटीजिनिक प्रभाव को बरकरार रखा जाता है,
  • टेटनस टॉक्सॉयड किसी भी टीके के रूप में आमतौर पर आसानी से उपलब्ध है। इसे शिशुओं के आरंभिक टीकाकरण के लिए डिप्थेरिया टॉक्सॉयड और पर्टूसिस वैक्सीन (डीटीपी) और बड़ों तथा बच्चों के टीकाकरण के लिए कम किये हुए डिप्थेरिया टॉक्सॉयड (टीडी) के साथ मिलाया जा सकता है।
  • वयस्कों के आरंभिक टीकाकरण के लिए चार से छह सप्ताह के अंतराल पर टेटनस टॉक्सॉयड की दो खुराक दी जाती है, जबकि छह से 12 महीने बाद तीसरी खुराक। हर 10 साल पर बूस्टर खुराक की सिफारिश की जाती है, ताकि शरीर में जहर रोधी स्तर बना रहे,
  • 50 या उससे अधिक उम्र के वयस्कों में टीकाकरण की सिफारिश की जाती है, क्योंकि हाल के दिनों में इस आयुवर्ग में टेटनस के कई मामले सामने आये हैं। इन लोगों में टेटनस की आशंका अधिक होती है:
    • जो लोग इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं रहते कि उन्हें बूस्टर की आरंभिक खुराक मिली है या नहीं,
    • गर्म और नम वातावरण वाले बाहरी देशों में जानेवाले,
    • धूल या गोबर की खाद के बीच काम करनेवाले खेतिहर मजदूर,
    • जो लोग ऐसा काम करते हैं, जिसमें कटने या छिलने का खतरा रहता है।
  • वैसी गर्भवती महिलाएँ, जिन्हें टीका नहीं दिया गया हो या अपर्याप्त टीका दिया गया हो या जो स्वच्छ माहौल में प्रसव नहीं करती हैं। टीकाकरण के बाद निरोधी तत्व गर्भाशय के द्रव (प्लेसेंटा) के माध्यम से मां से शिशु में चले जाते हैं।

गले का रोग (डिप्थीरिया)

यह ऐसा संक्रमण है जो श्वसन प्रणाली (फेफड़ों), गला, मुंह या त्वचा के घावों को प्रभावित करता है।

कारणः
यह जीवाणु से उत्पन्न होता है। कोरिनेबेक्टीरियम डिप्थेरिया और कफ के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में यह फैलता है। इसके अतिरिक्त जीवाणु एक प्रकार के जीव विष को जन्म देता है जिससे हृदय की पेशियों में सूजन आ सकती है अथवा स्नायु तंत्र की खराबी हो सकती है।

लक्षणः

  • नाक का बहना
  • गले में दर्द
  • बुखार
  • बीमार महसूस करना

रोक थाम

गले की बीमारी (डिप्थीरिया) से सुरक्षा के लिए बच्चों को डीपीटी का टीका लगवाएं। विवरण के लिए शिशु असंक्रमीकरण की अनुसूची देखें। किसी बच्चे को गले की बीमारी(डिप्थीरिया) की संभावना होने पर तत्काल ड\क्टर से परामर्श करें, क्योंकि इससे जीवनभर का खतरा होता है।

छोटी माता (चिकेन पॉक्स)

वेरीसेल्ला जोस्टर वायरस से फैलनेवाली यह एक संक्रामक बीमारी है। यह बहुत ही संक्रामक होती है और संक्रमित निसृत पदार्थों को सांस के साथ अंदर ले जाने से फैलती है।

लक्षणः
दोदरे पड़ने की विशिष्टताएं:

  • लाल, उभरे दोदरे से आरंभ होना
  • दोदरे फफोलों में बदलना, मवाद से भरना, फूटना और खुरदरे पड़ना
  • प्रमुख रूप से चेहरे, खोपड़ी और रीढ़ पर दिखाई देते हैं तथापि भुजाओं, टांगो पर भी यह होते हैं।
  • तेज खुजली हो सकती है।

बुखार
रोकथामः
छोटी माता (चिकेन पॉक्स) के लिए आजकल एक टीका उपलब्ध है जो कि 12 महीने से अधिक आयु वाले उस व्यक्ति को दिया जा सकता है जिसे यह बीमारी न हुई हो और जिसमें छोटी-माता (चिकेन पॉक्स) से सुरक्षा के पर्याप्त प्रतिकारक उपलब्ध न हो।

ध्यान देने योग्य बातें:
छोटी-माता (चिकेन पॉक्स) वाले बच्चों को एस्प्रीन लेने पर रेईस सिन्ड्रोम हो सकता है जो कि बहुत गंभीर बीमारी है तथा इससे मस्तिष्क की खराबी हो सकती है और वह मर भी सकता है। बच्चों को छोटी-माता (चिकेन पाक्स) होने पर एस्प्रीन की गोली कदापि न दें। डॉक्टर द्वारा विशेष रूप से विनिर्धारित करने पर ही बच्चों को किसी अन्य बीमारी के लिए एस्प्रीन देनी चाहिए। बच्चों को गोली की दवाई देते समय डॉक्टर से जांच करा लेना अति उत्तम है।
वयस्क में निमोनिया होने का खतरा विशेष रूप से बना रहता है। इसके अतिरिक्त एचआईवी से संक्रमित या प्रतरोधी प्रणाली में कमी वाले रोगियों को निमोनिया का अधिकतर खतरा होता है।
ऐसी गर्भवती महिलाएं जिनको पहले कभी छोटी-माता (चिकेन पाक्स) नहीं हुई है, उनको सक्रिया वायरस वाले के संपर्क में नहीं आना चाहिए।

डायरिया

  • इसमें या तो बार बार मल त्याग करना पड़ता है या मल बहुत पतले होते हैं या दोनों ही स्थितियां हो सकती हैं।
  • यह अंतड़ियों में अधिक द्रव के जमा होने, अंतड़ियों द्वारा तरल पदार्थ को कम मात्रा में अवशोषित करने या अंतड़ियों में मल के तेजी से गुजरने की वजह से होता है।
  • डायरिया की दो स्थितियां होती हैं- एक, जिसमें दिन में पांच बार से अधिक मल त्याग करना पड़ता है या पतला मल आता है। इसे डायरिया की गंभीर स्थिति कहा जा सकता है। आनुपातिक डायरिया में व्यक्ति सामान्यतः जितनी बार मल त्यागता है उससे कुछ ज्यादा बार और कुछ पतला मल त्यागता है।
  • डायरिया गंभीर व दीर्घावधि की हो सकती है और प्रत्येक प्रकार के डायरिया के भिन्न-भिन्न कारण और इलाज होते हैं।
  • डायरिया की जटिलताओं में निर्जलीकरण (डी-हाइड्रेशन), इलेक्ट्रोलाइट (खनिज) असामान्यता और मलद्वार में जलन, शामिल हैं।
  • निर्जलीकरण (डी-हाइड्रेशन) को पीनेवाले रिहाइड्रेशन घोल की सहायता से कम किया जा सकता है और आवश्यक हो तो अंतःशिरा द्रव्य की मदद भी ली जा सकती है।

खसरा

अन्य नाम- रुबिओला
कारण- वायरस

लक्षण

  • खसरा सांस के संक्रमण से फैलनेवाली बीमारी है।
  • इसके लक्षण में बुखार, सर्दी, आंखें लाल होना, उनसे पानी आना आदि शामिल है।
  • मुंह में छोटे-छोटे लाल दाने आ जाते हैं, जिनके बीच में नीला-सफेद होता है।
  • पूरे शरीर की त्वचा पर दाने उभर जाते हैं।

फैलाव

  • खसरे का वायरस खांसने या छींकने, अत्यधिक नजदीक आने या नाक या गले से निकलनेवाले पदार्थ के सीधे संपर्क में आने से फैलता है।
  • यह वायरस हवा या संक्रमित सतह पर दो घंटे तक सक्रिय रहता है।
  • एक संक्रमित व्यक्ति के शरीर पर दाना निकलने से चार दिन पहले से दाना निकलने के चार दिन बाद तक वायरस फैलाता है।

सामान्य सुझाव

  • डॉक्टर की परची के अनुसार टीकाकरण
  • खसरे के कारण कुपोषित बच्चों की मौत भी हो सकती है।

एंथ्रेक्स

बेसिलस ऐन्‍थ्रेसिस नामक जीवाणु के कारण एंथ्रेक्‍स होता है।

प्रभावित भाग
अत्‍यंत साधारण (ज्‍यादातर)- त्‍वचा (चमड़ी)
कम साधारण- श्‍वसनमार्ग तंत्र, गेस्‍ट्रोइंटस्‍टाइनल तंत्र

फैलाव (प्रसारण)

  • त्‍वचा (चमडी): स्‍पोअर्स (जीवाणु) के साथ सीधा त्‍वचा संपर्क; प्रकृति में, संक्रमित पशुओं का संपर्क या मांस जैसे पशु-उत्‍पाद
  • श्‍वसनमार्ग तंत्र: वायुव्‍याप्‍त (हवा में उप‍स्थित) जीवाणुओं का श्‍वसन संप्रेषण (सांस के साथ) के साथ अंदर चले जाना
  • गेस्‍ट्रोइंटस्‍टाइनल (जीआई) तंत्र: कम पके हुए या कच्‍चे मांस का उपभोग (खाने) या संक्रमित पशुओं से प्राप्त डेयरी उत्‍पाद लेना
  • व्‍यक्ति-से-व्‍यक्ति द्वारा श्‍वसन संप्रेषण से इसका फैलाव या जीआई ऍथ्ररेक्‍स नहीं होता है।

लक्षण

त्‍वचा: किसी एक जगह खुजली व उसके बाद उभरा हुआ जख़्म जो किसी फफोले की तरह हो जाता है और बाद में शुरुआती जख़्म के 7 से 10 दिनों के बाद काले रंग की झिल्ली का विकास होता है।

श्‍वसनमार्ग तंत्र: थोडा-सा ज्‍वर, थकान, तीव्र पसीना, छाती में दर्द (उर्ध्‍वश्‍वसनमार्ग-अपर रेस्पिरेटरी ट्रेक्‍ट) तंत्र के लक्षण बहुत कम होते हैं।

गेस्‍ट्रोइंटस्‍टाइनल तंत्र: जी मिचलाना, भूख में कमी, उल्‍टी आना, एवं तीव्र पेट दर्द ज्‍वर के साथ, हेमेटेमेसिस एवं डायरिया जो अधिकतर हमेशा खून के साथ ही आता है।

त्‍वचा पर लक्षण

दूसरा दिन चौथा दिन छठा दिन दसवाँ दिन

रोग प्रबंधन

  • लक्षण दिखाई देते ही तुरंत डॉक्‍टर से संपर्क करें
  • ऐसे मांस का सेवन न करें जो पूरी तरह पका नहीं हो या फिर वैसे पशु-उत्‍पादों का प्रयोग न करें।
  • मवेशियों से व्‍यवहार के समय स्‍व-सुरक्षा अपनाऍं।

कुष्ठ रोग

कुष्‍ठ रोग या कुष्‍ठ एक रोगाणु के कारण होता है। यह भी तपेदिक (टी.बी), पोलियोमायलिटिस, डिप्‍थेरिया आदि की तरह ही संचरणक्षम (संक्रामक-दूसरों को लगनेवाला) रोग है परंतु बहुत ही कम फैलनेवाला है। केवल ऐसे संक्रामित कुष्‍ठ रोगी जिनका बहुत दिनों से उपचार न हुआ हो उसके संपर्क में आने से कुष्‍ठ फैल सकता है।

लक्षण

  • त्‍वचा पर एक रंगहीन दाग जो थोड़ा या पूरी तरह स्‍पर्शहीन हो या उस दाग पर किसी चीज की चुभन का भी अनुभव नहीं होता।
  • हाथ और पैरों का सुन्‍न हो जाना।
  • चेहरे पर, नितंबों पर, शरीर के अन्‍य हिस्‍सों की दूसरी ओर बहुत सारे, नरम एवं जिनकी परिभाषा न बताई जाए ऐसे लाल व स्‍पर्शक्षम या स्‍पर्शहीन धब्‍बे।

उपचार
कुष्‍ठ रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है। यदि किसी डॉक्‍टर के द्वारा रोग की पुष्टि कुष्‍ठ रोग के रूप में की गई है तो, निम्‍नलिखित बातों का पालन करें:

  • रोग के ठीक होने या किसी और उसके फैलने की आशंका से त्रस्‍त न हों।

बहु-औषधोपचार चिकित्‍सा (मल्‍टी ड्रग थेरेपी) (एमडीटी)

कुष्‍ठ रोग रोग की किसी भी अवस्‍था में बहु-औषधोपचार चिकित्‍सा की मदद से एवं यदि इसे नियमित रूप से लिया जाए तो पूरी तरह ठीक हो सकता है। एम.डी.टी कैप्‍सूल एवं गोली के संयोजन में मिलता है।

बहु-औषधोपचार चिकित्‍सा, (एम.डी.टी) हर जिले में सभी अस्‍पतालों की कुष्‍ठ रोग इकाई में, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं लोक स्वास्थ्य केन्द्रों में मुफ्त प्राप्‍त हो सकती है।

एम.डी.टी चिकित्‍सा डॉक्‍टर द्वारा बताई गई समयावधि के लिये नियमित रूप से लेना अनिवार्य है।

रोगी घर में अपने भोजन के उपरान्‍त एक निश्चित समय अपनी एम.डी.टी लेने के लिये निर्धारित कर लें क्‍योंकि वह इस समय दवा लेना भूल नहीं सकता।

कुष्‍ठ रोग के संबंध में गलत तथ्‍य

  • कुछ लोगों का विश्‍वास है कि वंशानुगत कारणों, अनैतिक आचरण, अशुद्ध रक्‍त, खान-पान की गलत आदतें जैसे सूखी मछली, पूर्वपापकर्म आदि कारणों से कुष्‍ठ रोग होता है।
  • लोग मानते हैं कि कुष्‍ठरोग केवल कुछ ही परिवारों में फैलता है। यह केवल स्‍पर्शमात्र से हो जाता है।
  • कुष्‍ठ रोग प्राय: कुरूपता के साथ जुड़ा हुआ होता है। कुरूपता आने के बाद ही कुष्‍ठ रोग का निदान किया जा सकता है।
  • कुष्‍ठ रोग अत्‍यंत संक्रमणशील है एवं यह संक्रमणशीलता कुरूपता से जुड़ी हुई है।
  • कुष्‍ठ रोग लाइलाज है।
  • जिन परिवारों में कुष्‍ठ रोगी हैं, उस परिवार के बच्‍चों को कुष्‍ठ रोग होगा ही।

तपेदिक

तपेदिक या ट्यूबरोक्युलोसिस (टी.बी) मायकोबेक्टिरियम ट्यूबरोक्युलोसिस नामक जीवाणु के कारण होता है।

फैलाव

तपेदिक का फैलाव इस रोग से ग्रस्‍त व्‍यक्ति द्वारा लिये जानेवाले श्‍वास-प्रश्‍वास (सांस के दौरान छोड़ी गई हवा) के द्वारा होता है। केवल एक रोगी पूरे वर्ष के दौरान 10 से भी अधिक लोगों को संक्रमित कर सकता है।

लक्षण
टी.बी. के साधारण लक्षण हैं:

  • तीन सप्‍ताह या अधिक समय से खांसी, कभी-कभी थूक में खून आना
  • ज्‍वर, विशेषत: रात के समय
  • वजन कम होना
  • भूख में कमी आना

टी.बी. एवं एच.आई.आइ.वी

ह्यूमन इम्‍युनो डेफिशियन्‍सी सिन्ड्रोम वायरस (एच.आइ.वी- HIV) वह वायरस है जिसके कारण एड्स (AIDS) होता है। वयस्‍क लोगों में टी.बी. का खतरा बन सकनेवाला सबसे अधिक शक्तिशाली घटक है। टी.बी.या तपेदिक, HIV ग्रस्त लोगों में शीघ्रता से विकसित होनेवाले रोगों में से एक है। एक एच.आइ.वी ग्रस्‍त व्‍यक्ति को टी.बी. बेसिलीस से संक्रमित होने के बाद तपेदिक होने का खतरा छह गुना अधिक हो जाता है। तथापि एच.आइ.वी ग्रस्‍त लोगों में भी टी.बी का उपचार किया जा सकता है। डॉटस् (DOTS)  के साथ किया गया उपचार एच.आइ.वी (HIV) ग्रस्त लोगों में मृत्‍यु दर एवं रोगग्रस्‍तता को कम करता है।

बच्‍चों में तपेदिक
बच्‍चों के लिये टी.बी.(तपेदिक) एक बहुत बड़ा खतरा है।
बच्‍चों के कुछ समूह अन्‍य लोगों की तुलना में तपेदिक के दायरे में होते हैं। इनमें शामिल हैं:

  • उस घर में बच्‍चों का रहना जिस घर में किसी वयस्‍क को सक्रिय तपेदिक है।
  • उस घर में बच्‍चों का रहना जिस घर में किसी वयस्‍क को तपेदिक लगने का बहुत बडा खतरा है।
  • बच्‍चों का एच.आइ.वी (HIV) से संक्रमित होना  या किसी अन्‍य इम्‍युनो स्‍वीकृति स्थिति में होना।
  • बच्‍चों का एक ऐसे देश में जन्‍म लेना जहाँ तपेदिक की उच्‍च संक्रमण है।
  • बच्‍चों का ऐसे समुदाय से होना जिन्‍हें डॉक्टरी सेवाएं कम मात्रा में उपलब्ध होती है।

टीकाकरण
टी.बी. का टीका- बीसीजी (BCG), बच्‍चों में तपेदिक के प्रसार को कुछ सीमा तक कम करता है।

उपचार
डायरेक्‍टली ऑबज़र्व्ड ट्रीटमेन्‍ट, शॉर्ट-कोर्स (DOTS) टी.बी. के उपचार के लिये अनुसरित की गई नीती है। तपेदिक के उपचार के लिये कम से कम छह महीने के उपचार की आवश्‍यकता होती है।

एक्स्ट्रा-पल्‍मनरी ट्यूबरोक्‍लोसिस
एक्स्ट्रा-पल्‍मनरी ट्यूबरोक्‍लोसिस (EPTB) का संबंध फेफड़ों के बाह्य रोग से है।

लक्षण
एक्स्ट्रा पल्‍मनरी टी.बी. की पहचान, शरीर के किसी विशेष स्‍थान पर हुये संक्रमण (लिंफ नोड) की सूजन से, सक्रियता में कमी आने से (रीढ की हड्डी) या बहुत अधिक सिर दर्द एवं नाड़ी तंत्र की अकार्यक्षमता (टी.बी. मेनिनजायटिस्) के द्वारा की जा सकती है।
एक्स्ट्रा पल्‍मनरी टी.बी. में खॉंसी नहीं होती क्‍योंकि यह फेफडों के बाहर का रोग है।

रोग का विकास

  • प्राथमिक संक्रमण रक्‍त के द्वारा या जीवाणुओं के लिम्‍फेटिक (शरीर के अंदर का पंछा) फैलाव के कारण होता है जो शरीर में फेफड़ा के बाहर किसी भी भाग में स्‍थान बना लेते हैं। जब किसी व्‍यक्ति को पर्याप्‍त मात्रा में भूख लगती है (उसके पाचन-तंत्र का ठीक तरह से क्रियाशील होना) तो इसका मतलब होता है कि ये जीवाणु नष्‍ट हो गये हैं। यदि व्‍यक्ति के पाचन-तंत्र में कोई समस्‍या है तो कुछ जीवाणु, रोग होने से पहले शरीर के किसी स्‍थान विशेष में महीनों या वर्षों तक निष्‍क्रिय अवस्‍था में पड़े रहते हैं।
  • जीवाणु खाँसी के द्वारा फेफड़ों से निकाले या निगले जा सकते हैं। इस प्रकार इस मार्ग से वे ग्रीवा (गर्दन) की लिम्‍फ नोड में या गेस्‍ट्रोइंटस्‍टाइनल (GI) तंत्र में प्रवेश कर जाते हैं।
  • मवेशियों के एम.बोविस संक्रमित दूध के द्वारा, मानवों में यह रोग आ सकता है।

संक्रमित होने वाले अंग हैं

  • लिम्‍फ (ग्‍लैंन्‍ड्स) ग्रंथियाँ एवं विशेषत: गर्दन के आसपास के एबसेसेस
  • अस्थियाँ एवं जोड़। इस प्रकार के आधे मामलों में रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है।
  • जीयू (GU) तंत्र– महिलाओं में प्राय: गर्भाशय संबंधी रोग बहुत सामान्‍य हैं जबकि पुरुषों में प्रभावित होनेवाला अंग एपिडिडायमिस (शुक्राणु विकास नलिका) है। दोनों ही लिंग समान रूप से गुर्दा, गर्भाशय या मूत्राशय संबंधी रोगों से प्रभावित होते हैं।
  • उदर (पेट) – इसके कारण पेट या पेरिटोनियम प्रभावित हो सकता है।
  • मेनिनजाइटिस– यदि समय रहते उपचार न किया गया तो यह प्राणघातक सिद्ध हो सकता है।
  • पेरिकार्डियम– इसके कारण हृदय में की मांसपेशियों में सिकुड़न हो सकती है।
  • त्‍वचा– विशेषत: जो अनेक रूप ले सकती है ।

क्षय रोग पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्षयरोग का क्या कारण है?

क्षय रोग आनुवांशिक नहीं है। यह एक संक्रामक रोग है। कोई भी व्यक्ति क्षयरोग की चपेट में आ सकता है। जब सक्रिय क्षयरोग से पीड़ित कोई रोगी खुले तरीके से खाँसता या छींकता है, तो क्षयरोग पैदा करने वाले जीवाणु बाहर एरोसोल में प्रवेश कर जाते हैं। यह एरोसोल किसी भी ऐसे व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है जो इसमें साँस लेता है।

इस रोग के क्या लक्षण हैं?

तीन सप्ताह से अधिक अवधि तक निरंतर खाँसी होना, खाँसी के साथ कफ का आना, बुखार, वजन में कमी या भूख में कमी इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। यदि इनमें से कोई भी लक्षण तीन सप्ताह से अधिक अवधि तक बना रहे, तो पीड़ित व्यक्ति को नजदीकी डॉट्स टीबी केंद्र (DOTS TB Center) अथवा स्वास्थ केन्द्र जाना चाहिए और अपने कफ की जाँच करवानी चाहिए।

क्षय रोग के निदान हेतु कौन-कौन सी जाँच की जाती है और वे कहाँ उपलब्ध हैं?

क्षय रोग के निदान हेतु यह जरूरी है कि जीवाणु का पता लगाने के लिए लगातार तीन दिन तक कफ की जाँच करवाई जाए। दिल्ली में डॉट्स केन्द्रों को विभिन्न स्थानों पर स्थापित किया गया है जहाँ पर क्षय रोगों की जाँच सुविधा नि:शुल्क रूप से उपलब्ध है।

जाँच के लिए, कफ को ठीक से खाँसने के बाद दिया जाना चाहिए। यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि कफ की जगह जाँच के लिए थूक न दिया जाए। यदि जाँच के लिए थूक चला जाए तो रोग का निदान नहीं हो सकेगा।

क्षय रोग का क्या इलाज है?

यदि क्षयरोग निरोधी दवा पूर्ण अवधि तक लिया जाए तो यह रोग पूरी तरह ठीक हो जाता है। क्षयरोगी को कम से कम छ: महीने तक दवा लगातार लेनी चाहिए। कभी-कभी दवा को एक साल तक भी लेना पड़ सकता है। यह आवश्यक है कि केवल डॉक्टर की सलाह पर ही दवा लेना बंद किया जाए। वे रोगी, जो पूरी इलाज नहीं करवाते अथवा दवा अनियमित लेते हैं, उनके लिए रोग लाइलाज हो सकता है और यह जानलेवा भी हो सकता है।

क्या क्षयरोग साध्य है?

जी हाँ, यदि पर्याप्त अवधि तक नियमित रूप से और लगातार उपचार लिया जाए तो यह रोग पूर्णत: साध्य है।

क्षयरोग से हम कैसे बचाव कर सकते हैं?

क्षयरोग तब फैलता है जब रोगी बिना मुंह ढके खाँसता या छींकता है अथवा जहाँ-तहाँ थूकता है। इसलिए, खाँसने अथवा छींकने के दौरान रोगी को अपना मुँह निश्चित रूप से ढक लेना चाहिए।

उसे इधर-उधर नहीं थूकना चाहिए और थूकने के लिए हमेशा थूकदान का इस्तेमाल करनी चाहिए। घर में भी रोगी को ढक्कनयुक्त डिब्बे का प्रयोग करना चाहिए। निस्तारण से पहले कफ को उबाल देनी चाहिए।

जब किसी व्यक्ति में क्षयरोग के लक्षण दिखे तो यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि रोग से भयभीत न हुआ जाए और न ही उसे छुपाया जाए। यह आवश्यक है कि प्रभावित व्यक्ति अपना परीक्षण करवाए और उसके लिए पर्याप्त समय दें।

क्षयरोग के मरीज को किस प्रकार का भोजन दिया जाए?

अपनी रुचि के अनुसार क्षयरोगी किसी प्रकार का भोजन ले सकते हैं। उनके लिए किसी विशेष प्रकार के भोजन की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे भोजन से जरूर बचना चाहिए जो व्यक्ति विशेष के लिए कोई समस्या पैदा करे।

क्षयरोगी को किन चीजों से परहेज करनी चाहिए?

क्षयरोगी को बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, तमाकू, शराब अथवा किसी भी नशीली वस्तु से परहेज करनी चाहिए।

क्षयरोग में क्या करें, क्या न करें।

करने योग्य:

  • यदि तीन अथवा अधिक सप्ताह से खाँसी हो रही हो तो कफ की दो बार जाँच करवाएँ। ये जाँच सरकारी कफ सूक्ष्मदर्शिकी केन्द्रों पर नि:शुल्क की जाती है।
  • सभी दवाओं को नियमित रूप से, बताई गई पूरी अवधि तक लें।
  • ध्यान रखें कि क्षयरोग पूर्णत: साध्य है।
  • खाँसते या छींकते समय रूमाल का प्रयोग करें।
  • घरेलू जीवाणुनाशी युक्त थूकदान में थूकें।

नहीं करने योग्य:

  • यदि तीन सप्ताह या अधिक अवधि से खाँसी हो रही हो तो डॉक्टरी देखभाल को नजरअंदाज नहीं करें।
  • क्षयरोग के निदान हेतु केवल एक्स-रे पर भरोसा न करें।
  • जब तक आपके डॉक्टर न कहें तब तक दवा बंद न करें।
  • क्षयरोगियों के साथ भेद-भाव न बरतें।
  • जहाँ-तहाँ न थूकें।

डॉट्स क्या है?

क्षयरोग की चिकित्सा हेतु डॉट्स (डाइरेक्टली ऑब्जर्व्ड शॉर्ट कोर्स), अर्थात् सीधे तौर पर लिए जाने वाला छोटी अवधि का इलाज है। यह क्षयरोग की पहचान एवं चिकित्सा हेतु विश्वभर में प्राथमिक स्वास्थ केन्द्रों द्वारा अपनायी जाने वाली एक समग्र रणनीति का नाम है। इसके अंतर्गत 5 बातें आती हैं:

  • राष्ट्रीय क्षयरोग नियंत्रण कार्यक्रम के प्रति राजनैतिक प्रतिबद्धता।
  • फुफ्फुसीय क्षयरोग के लक्षण वाले रोगियों की, विशेषकर जिन व्यक्तियों की खाँसी तीन सप्ताह या उससे अधिक पुरानी हो, उन रोगियों की परिचर्या में लगे व्यक्तियों में संक्रमण की पहचान करने हेतु सूक्ष्मदर्शिकीय सेवाएँ उपलब्ध कराना।
  • क्षयरोगनाशी दवाओं की नियमित एवं निर्बाध आपूर्ति। क्षयरोगियों की निर्बाध चिकित्सा के लिए डॉट्स रणनीति के अंतर्गत सभी स्वास्थ्य केन्द्रों पर क्षयरोगनाशी दवाओं की विश्व्सनीय एवं उच्चगुणवत्तायुक्त आपूर्ति एक महत्त्वपूर्ण कारक है।
  • कम से कम आरंभिक गहन चिकित्सा वाले चरण में इलाज का प्रत्यक्ष प्रेक्षण। डॉट्स नीति के एक अंग के रूप में स्वास्थ्यकर्मी अपने रोगियों को दवा के प्रबल सम्मिश्रण वाली खुराक देते हुए उन्हें परामर्श देंग़े और प्रेक्षण करेंगे।
  • निदान के अंतर्गत प्रत्येक रोगी के इलाज के मूल्यांकन तथा कार्यक्रम पर्यवेक्षण हेतु निरीक्षण एवं उत्तरदायित्व की व्यवस्था।

डॉट्स के क्या लाभ हैं?

  • डॉट्स द्वारा चिकित्सकीय सफलता का स्तर 95% तक होता है।
  • डॉट्स, रोग में त्वरित एवं सुनिश्चित लाभ की गारंटी देता है।
  • डॉट्स ने पूर भारत में 17 लाख रोगियों का जीवन बदला है।
  • डॉट्स गरीबी उन्मूलन की भी एक रणनीति है। जीवन की सुरक्षा, रोग की अवधि को कम करने तथा नये संक्रमण को रोकने का अर्थ है रोजगार के कम वर्षों की हानि।
  • डॉट्स, एचआईवी संक्रमित क्षयरोगियों के जीवन काल को बढ़ाता है।
  • डॉट्स, चिकित्सकीय असफलता तथा अनेक दवाओं के लिए क्षयरोग के प्रतिरोधी हो जाने को रोकने हेतु रोगियों की उचित देखभाल तथा दवाओं की निर्बाध आपूर्ति को सुनिश्चित करता है।
  • डॉट्स, स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच बढ़ाता है। डॉट्स की रणनीति पेरिफेरल स्वास्थ सेवाओं के विकास को प्रोत्साहित करने में महत्त्वपूर्ण रूप से सफल रही है।
  • डॉट्स सभी स्वास्थ केंद्रों पर नि:शुल्क उपलब्ध हैं।

दवाओं के लिए प्रतिरोधी क्षयरोग क्या है?

हाल के वर्षों में ‘दवाओं के लिए प्रतिरोधी क्षयरोग’, जिसपर सामान्य क्षयरोग में दी जाने वाली एंटीबायोटिक का असर नहीं होता, के उत्पन्न होने से क्षयरोग एक बड़ी समस्या बन गया है। दवाओं के लिए प्रतिरोधकता का कारण है रोगियों द्वारा अनियमित और अधूरा इलाज करवाना। एमडीआर(MDR) क्षयरोग को दवाओं का नियमित और पूर्ण अवधि तक सेवन द्वारा रोका जा सकता है। इस तरह के क्षयरोग के लिए अत्यंत मँहगी दवाएँ होती हैं, जो इसके बावजूद असरदार नहीं भी हो सकती हैं, और इलाज की अवधि दो वर्षों से भी अधिक खिंच सकती है।

क्षयरोग तथा एचआईवी किस प्रकार संबंधित हैं?

  • क्षयरोग से कोई भी व्यक्ति संक्रमित हो सकता है किंतु एचआईवी-पीड़ित व्यक्ति के क्षयरोग से संक्रमित होने का खतरा बहुत अधिक होता है।
  • यहाँ तक कि यदि आपको केवल क्षयरोग का संक्रमण हो, जीवाणु आपके शरीर में रह सकता है और यह आपके लिए खतरनाक हो सकता है। एचआईवी के कारण आपके प्रतिरोधी तंत्र के कमजोर पड़ जाने से जीवाणु अपनी संख्या बढ़ाकर बहुगुणित हो सकते हैं और तब यह बढ़कर क्षयरोग बन जाता है।

मेनिनजायटिस

मेनिंगोकोकल रोग निसेरिया, मेनिनजाइटिडिस (मेनिंगोकोकाय भी कहलाता है) नामक जीवाणु के कारण होता है।

रोग का फैलाव
इन जीवाणुओं का फैलाव व्‍यक्ति-से-व्‍यक्ति को श्‍वास मार्ग या कंठस्‍त्रावों के लघुकणों द्वारा हो जाता है। निकट व दीर्घकालीन संपर्क (जैसे चुंबन लेना, किसी पर छींकना एवं खाँसना, खाने-पीने के बर्तनों का उपयोग, आदि) से रोग को फैलने में मदद मिलती है। औसत विकास काल 4 दिनों का होता है, जो 2 से 10 दिनों के बीच सीमित होता है। एन.मेनिनजाइटिडिस केवल मानवों को ही प्रभावित करता है।

रोग के लक्षण
सभी संक्रमित व्‍यक्तियों में मेनिनजायटिस विकसित नहीं होता। इस रोग के साधारण लक्षणों में गर्दन का अकड़ना, उच्‍च ज्‍वर, प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता, भ्रम, सिरदर्द एवं उलटी होना शामिल है। बैक्टिरियल मेनिनजायटिस के कारण 10 से 20 प्रतिशत उत्तरजीवियों में मस्तिष्‍क क्षति (दिमाग की हानि), श्रवण शक्ति की क्षति (बहरापन), या पढ़ने की क्षमता खत्‍म होना जैसे परिणाम हो सकते हैं।

रोग प्रबंधन

  • मेनिनजायटिस एक गंभीर रोग है। इसका शीघ्र निदान व उपचार ही गंभीर क्षति या मृत्‍यु से बचा सकता है।
  • टीकाकरण: इस रोग से बचाव के लिये काफी टीके उपलब्‍ध हैं। बहुधा ये टीके 10 से 14 दिनों तक इंजेक्‍शन देने के उपरान्‍त भी पर्याप्‍त बचाव न कर पाऍं।

Source: एनडीटीवी डॉक्टर

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